बारामूला के उरी सेक्टर में आर्मी बेस पर हुए आतंकी हमले में 17जवान शहीद हो गए।चार फिदायीन हमलावर मारे गए है।जिन शहीदों ने देश के लिए कुर्बानी दी है,उनकी शहादत को नमन करता हूँ।जिन माँ-बाप ने अपने चिरागों को,कलेजे के टुकड़ों को खोया है उनके प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ।एक जवान सिर्फ देश के लिए बंदूकधारी ही नहीं होता है,वो किसी का बेटा,किसी का पति,किसी का भाई,किसी का बाप होता है।एक परिवार का स्तम्भ होता है जिसकी भरपाई कभी हो नहीं सकती।हाँ भौतिक रूप से परिवार को मिले जख्म को भरने में भी पीढियां गुजर जाती है।
तिरंगे में सुपुर्द-ए-खाक करने,देशभक्ति के नारों के साथ जुलुस निकालने, चंद रूपए परिवार वालों को बाँटने,नेता-मंत्री के सम्बंधित परिवारों के एकदिवसीय दौरों से इसकी भरपाई नहीं हो सकती।मैं यह लिखकर शहीद की शहादत को कम नहीं आंक रहा हूँ।देश के लिए दिया बलिदान दुनियां का सबसे बड़ा बलिदान होता है लेकिन बलिदान को बलि बनाने के बजाय बलिदान का स्वरूप दिया जाना चाहिए।इसके लिए दोषियों को 100%सजा दी जानी चाहिए,200%बदला लिया जाना चाहिए। सिर्फ दो दिन तिरंगे में ढके ताबूतों में शहीदों को लिटाकर नारे लगाने से उस बलिदान को सम्मान नहीं दिया जा सकता।जब बुरहान वाणी को मारा गया तो पहले शहीद हुए अधिकारी की बेटी ने कहा था कि अब मेरे पापा के बलिदान का सम्मान हुआ है।
शहादत को भौतिक सम्मान दिए जाने चाहिए लेकिन साथ-साथ में उस शहादत के जिम्मेवार लोगों को जब तक सजा नहीं दी जाती तब तक ये तमगे,पैसे,यात्रा-नारे सब खोखले होते है।अगर अमेरिका का एक सैनिक मारा जाता है तो बदले में 100 मारता है।जब सुपर पावर बनने की तरफ चले हो तो शहीदों को सम्मान देना भी सीख लो।लुटियन जोन में सिमटी सत्ता के वातानुकूलित कमरों में छिप-छिपकर चलने वाली वार्ताओं से इस तरह के बलिदानों को सम्मान नहीं दिया जा सकता।सत्ता में बैठे लोगों को शहीदों को सिर्फ एक जवान नहीं समझना चाहिए।उसके साथ पूरे देश के माँ-बाप,भाई-बहन,पुत्र-पुत्रियों,पत्नियों की भावनाएं जुडी होती है।एक जवान की मौत पर पूरे देश के लोगों का खून खोलता है,दुःख होता है,आक्रोश होता है।
आज केंद्र में बैठे लोगों को कश्मीर में जारी हालात पर नजर रखनी चाहिए लेकिन दूसरी तरफ देश के लोगों की भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए।अनिर्णय की अवस्था में सत्ता होती है जनता कभी नहीं।इस देश के लोग अपने वतन के लिए बलिदान देने के लिए हर समय तैयार बैठे है।सत्ता वीरों के देश को मुर्दों का देश बनाती है और मुर्दे सिर्फ मातम मनाते है।अब वक्त सिर्फ मातम मनाने का नहीं है
हमे तो अपनों ने मारा,गैरों में कहाँ दम था
तिरंगे में सुपुर्द-ए-खाक करने,देशभक्ति के नारों के साथ जुलुस निकालने, चंद रूपए परिवार वालों को बाँटने,नेता-मंत्री के सम्बंधित परिवारों के एकदिवसीय दौरों से इसकी भरपाई नहीं हो सकती।मैं यह लिखकर शहीद की शहादत को कम नहीं आंक रहा हूँ।देश के लिए दिया बलिदान दुनियां का सबसे बड़ा बलिदान होता है लेकिन बलिदान को बलि बनाने के बजाय बलिदान का स्वरूप दिया जाना चाहिए।इसके लिए दोषियों को 100%सजा दी जानी चाहिए,200%बदला लिया जाना चाहिए। सिर्फ दो दिन तिरंगे में ढके ताबूतों में शहीदों को लिटाकर नारे लगाने से उस बलिदान को सम्मान नहीं दिया जा सकता।जब बुरहान वाणी को मारा गया तो पहले शहीद हुए अधिकारी की बेटी ने कहा था कि अब मेरे पापा के बलिदान का सम्मान हुआ है।
शहादत को भौतिक सम्मान दिए जाने चाहिए लेकिन साथ-साथ में उस शहादत के जिम्मेवार लोगों को जब तक सजा नहीं दी जाती तब तक ये तमगे,पैसे,यात्रा-नारे सब खोखले होते है।अगर अमेरिका का एक सैनिक मारा जाता है तो बदले में 100 मारता है।जब सुपर पावर बनने की तरफ चले हो तो शहीदों को सम्मान देना भी सीख लो।लुटियन जोन में सिमटी सत्ता के वातानुकूलित कमरों में छिप-छिपकर चलने वाली वार्ताओं से इस तरह के बलिदानों को सम्मान नहीं दिया जा सकता।सत्ता में बैठे लोगों को शहीदों को सिर्फ एक जवान नहीं समझना चाहिए।उसके साथ पूरे देश के माँ-बाप,भाई-बहन,पुत्र-पुत्रियों,पत्नियों की भावनाएं जुडी होती है।एक जवान की मौत पर पूरे देश के लोगों का खून खोलता है,दुःख होता है,आक्रोश होता है।
आज केंद्र में बैठे लोगों को कश्मीर में जारी हालात पर नजर रखनी चाहिए लेकिन दूसरी तरफ देश के लोगों की भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए।अनिर्णय की अवस्था में सत्ता होती है जनता कभी नहीं।इस देश के लोग अपने वतन के लिए बलिदान देने के लिए हर समय तैयार बैठे है।सत्ता वीरों के देश को मुर्दों का देश बनाती है और मुर्दे सिर्फ मातम मनाते है।अब वक्त सिर्फ मातम मनाने का नहीं है
हमे तो अपनों ने मारा,गैरों में कहाँ दम था
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें