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बलात्कार- शब्द ही इतना घिनोना कि इंसानियत ही सहम जाती है।

बलात्कार!

शब्द ही इतना घिनोना कि इंसानियत ही सहम जाती है।मानव सभ्यता पर कलंक।इस बात की खोज की जानी चाहिए कि इस शब्द के रचियता कौन हैसारे बुद्धिजीवी माफ़ करना!मुझे आजकल बुद्धिजीवी शब्द भी कमघिनोना नहीं लगता।टीवी पर आकर एक घंटे का बेतुका तर्कशास्त्र पढ़कर चले जाने वाले लोगों से क्या उम्मीद!शाम के समय चौराहों पर लगने वाली मोमबत्ती ब्रिगेड में ही छेड़खानी की घटनायेकानून!ऐसा बेतुका झमेला जो थाने की चौखट पर ही दम तोड़ देता है।हाथ इतने लंबे कि आपस में ही उलझ जाते है।न्याय क्या होता है यह बलात्कार पीड़िता से पूछो जिसने अदालत तक जाने की हिम्मत जुटाई है?पीड़ितों को इंसाफ तो मिथ्या भ्रम लगता है। तमाम महिला संगठनों के बारे में तो क्या लिखे?जब मीडिया में किसी बलात्कार के क्रियाकर्म पर हंगामा मचता है तो सोलह श्रृंगार के साथ मुख्या टीवी पर आती है और निंदा प्रस्ताव रख देती है।उसका ध्यान पीड़िता के दर्द पर न होकर इस बात पर ज्यादा रहता है कि चंदे के पैसे से जो मेक-अप किया है,वो ख़राब न हो जाये।पूरी पुरुष जमात को ही पृथ्वी पर मिथ्या रचना सिद्ध करने में लग जाती है।क्या करे जनाबस्कोरिंग तो करनी पड़ती हैचार कानून के जानकर भी बरसाती मेंढक की तरह आ टपकते है।टीवी एंकर ऐसे सवाल जवाब करता है कि पुलिस भी वही,जज भी वही!अभी तुरंत फाँसी का फंदा यहीं मंगा लेगा।2-4 घंटे में सभी ऐसे गायब हो जाते है जैसे आसोज के महीने में पश्चिमी भारत से मानसून के बादल होते है।पूंजीवाद का जमाना है जनाब।जिधर पूंजी दिखी उधर रंगरोगन शुरू। तिल तिल कर मरती उस पीड़ित अबला का दर्द कौन जाने?सब अपनी मन की बात प्रस्तुत करने की होड़ में लगे है।यह मन है कि........... मानता नहीं।दर्शनशास्त्र,समाजशास्त्र,मनोविज्ञान आदि सारे शास्त्रों के जानकर भी मन की परिभाषा नहीं दे पाते। जब अपनी संस्कृति की याद दिलाई जाती है तो तमाम पश्चिमपरस्त जमातें हमेंढ़िवादी,सांप्रदायिक,आदिम मानव ना जाने किन किन प्रशस्ति पत्रों से नवाजती है।जब आप किसी बंधन को मानने को तैयार ही नहीं हो तो मुफ़्त में आपके कुकर्मों के परिणाम भी तो मिलेंगे।लोकतंत्र के नाम पर अपनी दकियानूसी सोच की रोटियां सेकोगे तो इन अपराधों पर लगाम कैसे लगेगी?हर बड़े नेता व् अधिकारी की पत्नी ही NGO खोलकर समाजसेविका बनेगी तो समाज की सेवा ही तो ऐसी ही होगी। जब स्वतंत्रता के नाम पर स्वछँदता करोगे तो अंजाम भी तो भुगतना पड़ेगा।जब अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़कर सिर्फ अधिकारों की रट लगाओगे तो अधिकार भी तो मृग मरीचिका की तरह ही प्राप्त होंगे।जब अनुशासन भूलकर कुकर्मों में लगे रहोगे तो इसके साइड इफेक्ट वापिस लात मारने लगते ही है।फिर घायल कुत्ते की तरह किंकियाने से क्या फायदा?अभी भी वक्त है अपने आप को सुधारने का,अपने शब्दकोष से बलात्कार शब्द को हटाने का।संभालना ही होगा अपने आप को।नहीं तो आने वाली पीढियां हमें माफ़ नहीं करेगी। उठो,जागो और सुधार करो इस समाज का।हर लात्कारी को,चाहे कहीं भी छिपा बैठा हो,खींचकर कानून के हवाले करो।पुलिस थाने से लेकर अदालत तक घसीटकर ले जाओ।समयबद्ध तरीके से फाँसी के फंदे पर लटकाओ।बलात्कार शब्द को सुनते ही हवस के दरिंदो का कलेजा काँपना चाहिये। न्याय सिर्फ मिलना ही नहीं चाहिए मिलते हुए दिखना भी चाहिए।सिस्टम सुधरना ही चाहिए।जब कोई दरिंदा कानून के शिकंजे से बच जाये तो कानून के रखवालों की जवाबदेही तय करके उनकी सजा मुकर्रर होनी चाहिए,ताकि इन मानसिक बलात्कारियों को भी सबक मिले।


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महिलाओं को बराबरी का हक़ कैसे मिले ?

एक मजेदार बहस चल रही थी। मैं इस बहस को मजेदार इसलिए कह रहा हूँ की बहस बड़ी गंभीरता से हो रही थी लेकिन समस्या की जड़ पर प्रहार करके हल खोजने के बजाय समस्या के समाधान के लिए सिर्फ दिखावे के लिए कानून बनाने पर जोर दिया जा रहा था। बहस का मुद्दा था कि महिलाओं को बराबरी का हक़ कैसे मिले? महिलाओं पर अत्याचारों में कैसे कमी आये? अपवाद दोनों तरफ होते है लेकिन बहुत से गुण दोनों में समान रूप से विद्यमान रहते है। पुरुष अभी विकास के निम्न स्तरीय दौर से गुजर रहा है। महिलाएं विकास में पुरुषों से कई कदम आगे है सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा,अपनापन, ममता आदि ऐसे अनेकों गुण है जो एक औरत को पुरुष के मुकाबले कहीं अव्वल दर्जे का विकसित इंसान बनाते है। एक गुण पुरुषों में अलग होता है वह है पशुत्व ! पशुता का गुण जब तक पुरुषों में रहेगा तब तक महिलाओं के विकास व उच्चता प्राप्त सोपानों का सम्मान नहीं कर सकता। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि पुरुषों के अंदर बैठा पशु बाहर कैसे निकले? इसको निकालने के उपाय ढूंढें जाने चाहिए। इसकी शुरुआत माँ-बाप अपने बच्चों से कर सकते है। लड़की को सहनशीलता सिखाते हो वह अच्छी बात है। उद्दंडता सिखाकर लड़कों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। ध्यान लड़कों पर दिया जाना चाहिए। लड़कों के अंदर पशुगुण पैदा होने से रोककर उनको सहनशील बनाओ व एकदूसरे को सम्मान देना सिखाओ। किसी भी सभ्यता में एकाएक किसी संवैधानिक या नैतिक कानून से बदलाव नहीं आ सकते। अच्छे बदलाव पीढ़ी दर पीढ़ी स्थापित किये जाते है। हाँ कुछ सभ्यता का बुरा करना हो तो बिना सोचे-समझे कानून थोप दो। जरूर दरारे बढ़ने लग जाएगी। हमे संघर्ष को ख़त्म करने की और बढ़ने के लिए पहले मानसिकता पर प्रहार करना होगा।
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 नवभारत टाइम्स 

नाबालिग लड़कियों के साथ महीनो तक बलात्कार

कल एक दिल दहलाने वाली खबर महाराष्ट्र से आई। बुलडाणा के बोर्डिंग स्कूल में 12 नाबालिग लड़कियों के साथ महीनो तक बलात्कार किया गया।जब लड़कियां दीवाली पर घर गई तो 3 लड़कियों ने पेट दर्द की शिकायत की तो परिजन अस्पताल लेकर पहुंचे।अस्पताल में जांच से पता चला कि वो गर्भवती है। जब लड़कियों  से पूछा गया तो पूरा मामला खुल गया। सोचो कि इतना बड़ा अपराध महीनों तक होता रहा वो भी एक स्कूल में और किसी को भनक तक नहीं लगी। इससे साबित होता है कि सरकारें गरीब आदिवासियों के कल्याण के लिए कितनी गंभीर है! इससे यह भी साबित होता है कि तमाम गैर-सरकारी संगठन व् नागरिक समाज अपनी जिम्मेदारी कितनी संवेदनशीलता के साथ निभा रहा है? इसमें गलती सिर्फ चुनी हुई सरकारों की ही नहीं है बल्कि गरीबों के भले की बात करने वाले हर संगठन व् संस्था की है।आजादी के बाद हजारों योजनाओं की घोषणाएं हुई।अरबों रूपए आदिवासी कल्याण के नाम पर लुटे गये लेकिन आज भी आदिवासी दुगुनी तेजी के साथ ख़त्म या विस्थापित किये जा रहे है।इस घटना ने ऐसे तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी।

हर दावे व् दावा करने वाला कठघरे में खड़ा है।पिछले साल जयपुर में भी मिशनरी के एक बोर्डिंग स्कूल में इसी तरह के मामले में पादरी गिरफ्तार हुआ था।2013 में बिहार के कोसी इलाके में काम करने वाली मिशनरी का मुख्या भी नाबालिगों के यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार हुआ था।ये तो वो घटनाएं है जिस पर कुछ स्वतंत्र  पत्रकारों की नजर पड़ जाती है और हम जान जाते है।आदिवासी इलाकों में आदिवासी कल्याण की बातें करने वाले हवस के भूखे दरिंदे खुलेआम घूमते है।नक्सलवाद की मुख्य वजहों में यह भी बहुत बड़ी वजह है।जमीन छीन रहे है।रोजगार के नाम पर शोषण किया जाता है।लड़कियों को पढाई के नाम पर अपने इन हवस के अड्डों पर लाकर अपनी यौन कुंठाओं को शांत करने में उपयोग करते है।कोई विरोध करता है तो उनको नक्सली बताकर मार दिया जाता है।क्या ऐसा संभव है कि लाखों करोड़ रूपये लेकर पूरा तंत्र आदिवासियों की भलाई में ईमानदारी के साथ लगने के बावजूद आजादी के 70 सालों के बाद इनकी समस्याओं का समाधान न निकाल पाएं और अंतिम विकल्प के तौर पर गोली से इनको मिटाकर ही समस्या का समाधान करना पड़े! देश की लगभग एक चौथाई आबादी को ही मिटाकर कैसे हम इस समस्या का समाधान कर पाएंगे?क्या यह हमारी गौरवशाली कही जाने वाली मानव सभ्यता पर कलंक नहीं है?क्या बहुसंख्यक लोगों की मानसिकता के हिसाब से अल्पसंख्यक लोगों का शोषण करने की प्रवृति में बदलाव नहीं किया जा सकता है?क्या  आशाराम जैसे लोग गुजरात व् महाराष्ट्र के आदिवासी लोगों को धर्म परिवर्तन करने से किस तरह रोक रहे थे या ईसाई मिशनरी किस तरह गरीब आदिवासी लोगों को मुफ्त में शिक्षा व् चिकित्सा उपलब्ध करवा रही है उस पर सरकारों को निगरानी नहीं रखनी चाहिए?क्या शिक्षा व् चिकित्सा जैसी बुनियादी सेवाओं को निजी व् गैर-सरकारी संगठनों के हवाले छोड़कर सरकारें चिर निद्रा में सोने के लिए चुनी जाती है?आरएसएस जैसा दावा करता है कि उनके लाखों कार्यकर्त्ता आदिवासियों के कल्याण में लगे हुए है तो क्या यह संभव है कि उनको यह पता नहीं चले कि गरीब आदिवासी इलाकों से लड़कियों को उठाकर ऐसे हवस के अड्डों पर पहुँचाया जाता है?क्या महीनों एक बोर्डिंग स्कूल में नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण होता रहा और शिक्षा विभाग मृत अवस्था में पड़ा था?आदिवासी भाग,महिला व् बाल विकास विभाग के लोग क्या कर रहे थे?क्या उनकी जिम्मेवारी नहीं होती कि स्कूलों पर नजर रखी जाए?क्या उनकी जिम्मेवारी नहीं थी कि जानवरों की तरह उठाकर कोई लड़कियों को आदिवासी इलाकों से ले जाये तो उस पर ये नजर रखे? अब जब सब कुछ सामने आ गया तो दरिंदों को गिरफ्तार करके फांसी पर लटका दो लेकिन इन गरीब बच्चियों के साथ जो हुआ उसकी भरपाई कौन व् कैसे करेगा?भविष्य में दुबारा न हो इसकी जिम्मेवारी कैसे तय होगी? हाथ में तिरंगा लेकर शहरों की गलियों में देशभक्ति के नारे लगाकर उत्पात मचाना ही देशभक्ति नहीं होती! गौमाता-गौमाता चिल्लाकर गरीब दलितों व् मुसलमानों को पीटने से ज्यादा राष्ट्रवादी नहीं बन जाओगे!अगर वाकई में दिलों में देशभक्ति है तो अभी भी जाग जाओ।गरीबों-दलितों-शोषितों-मजदूरों-किसानों-आदिवासियों के हकों 
की आवाज को खुद की आवाज बनाओं।इन हमारे गरीब भाइयों के दर्द को समझो!उनकी समस्याओं को ईमानदारी के साथ सुनो!उनकी पीड़ाओं का उनकी भावनाओं का आदर करते हुए समाधान निकालों!गरीबों को उपयोग की वस्तु समझने की भूल में सुधार करो!हर समस्या का समाधान बम-बन्दूक-गोली नहीं हो सकता! हर अलग सोच को गद्दार या देशविरोधी बताकर दरकिनार मत करो!बार बार किसी को देशद्रोही कहोगे तो सामने वाला विद्रोह करने पर मजबूर होता है इसी कारणों से ये समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है! सत्ता के अच्छे कामों की प्रशंसा जरूर करो लेकिन गलत कामों की आलोचना व् विरोध भी करो।सत्ता की गलत नीतियों की आलोचना करना या सवाल करना कतई देशद्रोह नहीं होता बल्कि इससे देश व् लोकतंत्र मजबूत होता है।कोई भी सरकार लोकतंत्र में सौ प्रतिशत मतों से नहीं बनती है।विरोध सत्ता में आने से पहले भी होता है वो अच्छे कामों से कम हो सकता है लेकिन बुरे काम व् नीतियों के कारण जिनका मोहभंग होता है वो अगले चुनाव में आपका साथ छोड़ भी सकते है इसलिए सत्ता को अपने बाप की जागीर समझने के बजाय देश की गरीब जनता की भलाई के लिए मिले अवसर के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। आप भी ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछिये।जो सरकार ने अच्छा किया है उसी के लिए हमने उनको चुना है।जो कमियां है उनके बारे में सवाल पूछकर याद दिलाओ।हर जागरूक नागरिक को याद रखना चाहिए कि पहले कर्तव्य निभाओगे तो ही अधिकार मिल पाएंगे.........
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वो चीखती रही,चिल्लाती रही और मर्दानगी मरती रही

यह घटना जंगलों में गुम गाँव,घाटी में छिपे बसेरे या तलहटी में तड़पती बस्ती की नहीं है।यह घटना 21वीं सदी की दुनियां में नुमाइंदगी करने वाले देश की राजधानी की है।21वर्षीय लड़की पर 34वर्षीय शादीसुदा दरिंदा बुराड़ी में बीच रोड़ पर, भोर की किरणों के बीच 8बजे कैंची से ताबड़-तोड़ हमला कर रहा था और आधुनिक,उच्च शिक्षित,उच्च सभ्य लोग उसकी दरिंदगी को देखते हुए,अपनी नामर्दानगी पेश करते हुए गुजरते गये।एक अबला इस मेट्रो शहर के खोखले दावों-खोखले वादों से रूबरू होते हुए देश के माथे-मुंह पर कालिख पोतकर रुखसत हो गई लेकिन देश के हुक्मरानों,अपने अहम में डूबी दिल्ली पुलिस व् देश की संस्कृति व् मानव सभ्यता को दिशा देने की बात करने वाले धर्मगुरुओं की छिपी हकीकत दुनिया के सामने उजागर कर गई। न अपने आप को नंबर -1 कहने वाले दलाल मीडिया का दिल पसीजा और न दिल्ली जैसे शहरों में सोफे पर बैठकर हमेशा गरियाने वाले नकली देशभक्तों का मुंह खुला।जिस देश में नेता जवान,किसान,महिला के मुद्दों को चुनावी समर में भुनाने की फ़िराक में हो उस देश का गर्त में खिसकना निश्चित है। आज यह लड़की मरी है,कल कोई और मरेगी!कड़ी निंदा होगी!दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा!कानून अपना काम करेगा!पीड़ित परिवार की हरसंभव मदद करेंगे आदि वक्तव्य आ जायेंगे लेकिन राजधानी की मुख्य रोड़ पर जो कानून का जनाजा निकला है उसका सन्देश हर नागरिक के दिलो-दिमाग का प्रदर्शन है जिसे सत्ता में बैठे लोगों को समझना चाहिए।क्यों लोग पास से गुजर रहे थे लेकिन बीच-बचाव करने नहीं आये?क्यों सनकी किस्म का दरिंदा  इतना हौंसला जुटाने में सफल हो गया कि भरी सड़क पर एक लड़की को मारने पर उतारू हो गया?स्कॉटलैंड पुलिस की तर्ज पर सुरक्षा का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस कहाँ थी?इस दरिंदगी के बाद भी दिल्ली के नागरिकों की संवेदना क्यों खामोश हो गई?पहले भी दिल्ली में ऐसी घटनाएं हुई लेकिन हम सबने उससे सबक क्यों नहीं लिया?बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हो जाती है? जो स्मार्ट सिटी की हर महीने बौछारे हो रही है वो देश की राजधानी का प्रतिबिंब ही होगी।जब राजधानी कलंकित है,दरिंदों-गुंडों के हाथों में नाच रही है तो नहीं चाहिए ऐसे शहर जो महिला को महिला की इज्जत न दे सके!नहीं चाहिए हमे ऐसे शहर जहाँ के नागरिक कानून से कम गुंडों से ज्यादा डरकर खामोश हो जाए!नहीं चाहिए ऐसे शहर जहाँ मानवता ही बीच सड़क पर दम तोड़ दे और कानून-सत्ता असुरी मुस्कान के साथ वातानुकूलित कमरों में बैठकर हाई लेवल मीटिंगों के नाम पर मस्कारे मारती रहे!नहीं चाहिए सड़कों पर दूधिया रौशनी जिसकी चकचौन्ध के बीच माँ-बहनों की इज्जत ही लुट जाये!घर में माँ महफूज नहीं,सड़क पर बहन सलामत नहीं,दफ्तर में पत्नी सुरक्षित नहीं! क्या करेंगे हम आधुनिकता के बदबूदार फूलों को सजाकर?जरा सोचिए! ऐसी हृदय-विदारक घटना पर कोई सभ्य समाज कैसे खामोशी की चादर ओढ़कर सो सकता है?कैसे कानून के हाथ राजनीति के खोलते तेल में जलकर खाक हो जाते है?कैसे हुक्मरानों का कलेजा अपने बेटे-बेटियों के चेहरे की मुस्कान तक सिमटकर रह जाता है?कैसे पुलिस वाले अपनी माँ-बहन के चेहरे को आँखों में देखते हुए ऐसी घटनाओं पर ऊपरवाले के आदेशों की गुलामी में भविष्य तलाशने लग जाते है?यह मानवता का क्षरण है,यह देश की दुर्गति की मिसाल  है, कितनी ही तरक्की व् तकनीक हासिल कर लो लेकिन इंसानियत का इस तरह कत्ल होगा तो भविष्य  अंधकारमय ही होगा।इन सभी दुविधाओं-समस्यायों-नाकामियों-संवेदनहींताओं का प्रदर्शन ही इस लड़की की मौत ने हमारे सामने प्रस्तुत किया है....
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जरा सोचिये....

दिल्ली!देश की राजधानी,हिंदुस्तान का दिल,दिल्ली दिलवालों की आदि न जाने ऐसे कितने नामों से आप जानते होंगे।लेकिन इस शहर पर लगे इस प्रकार के तमाम तमगे परसों शाम को बेमानी व् खोखले नजर आये जब आनंद पर्वत जैसे भीड़ भाड़ वाले इलाके में दिन दहाड़े 19 वर्षीय मीनाक्षी को दो दरिंदो ने चाकुओं से गोदकर बीच सड़क पर मार दिया। सैंकड़ों लोग तमाशबीन बनकर यह सब देख रहे थे।किसी की हिम्मत नहीं हुई उसे बचाने की।वो चीखती रही।चिल्लाती रही।मदद की गुहार लगाते इधर उधर भागती रही।वो दोनों दरिंदे पीछे भाग भागकर चाकुओं से हमला कर रहे थे।मरती उस अबला को देखकर किसी का भी दिल नहीं पसीजा।

किसी को भी मरती उस इंसानियत पर शर्म नहीं आई। उस मीनाक्षी की गलती यही थी कि उसने उन दरिंदो के विरुद्ध दो साल पहले शिकायत दर्ज करवाई थी।15 दिन की जेल भी हुई।अगर खाकी सही कार्यवाही करती व् काले कोट वाले को उनको छोड़ते वक्त अपनी बेटी याद आई होती तो कल मीनाक्षी नहीं मरती।लेकिन जब जनप्रतिनिधि ही दिल्ली की जनता को केजरीवाल व् मोदी के बीच फुटबॉल बना दे तो सारी न्याय की उम्मीदें टूट जाती है। दिल्ली की जनता भगवान के भरोसे है या इन गुंडों,दरिंदों के रहमों कर्म पर।पुलिस की कमाई में केजरीवाल के आने के बाद गिरावट आई तो बदले में पुलिस ने अपने हाथ पीछे खींच लिए।डरी-सहमी जनता खुलकर सामने आने से कतराने लग गई।ले-देकर अपराधियों के साथ ही समझौता करने को मजबूर है।जब पता हो कि जब किसी के साथ खड़ा होने की सजा पुलिस व् गुंडे मिलकर तय करेंगे तो कौन आगे आएगा। दिल्ली के दामन में रोज नए दाग लगते है।दिल्ली रोज सड़कों पर दम तोड़ती है।हर पल दिल्ली हैवानियत की शिकार होती है।हर चौक चौराहे पर दिल्ली शर्मसार होती है।संकरी गलियों में बच्चों का बचपन लूट जाता है।सड़कों के किनारे भूख व् इलाज के अभाव में गरीब तिल-तिल कर मर जाता है।फिर भी लुटियन जॉन के 100 हेक्टेयर के बीच घूमकर,राजपथ व् इंडिया गेट का दीदार करके मज़बूरी में कहना पड़ता है वाकई दिल्ली बहुत खूबसूरत है!क्योंकि देश की सत्ता यहीं से चलती है।दिये तले अँधेरा देखने की आदत हमारे हुक्मरानों में नहीं है। बचकर रहना।आज मीनाक्षी का शिकार हुआ है कल किसी और का होगा।कोई रखवाला नहीं।कोई सुनने वाला नहीं।दर्द उस माँ के दिल में है जिसने अपने जिगर के टुकड़े को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है।कितना ख़ौफ़नाक मंजर रहा होगा।माँ उस समय खूब चिल्ला रही थी।आज भी चिल्ला रही है।लेकिन दिल्ली उसी अंदाज में चलती रहेगी।क्योंकि हम मोटी चमड़ी के बुझदिल इंसान जो ठहरे!जो जिन्दा होता है उम्मीद उनसे की जाती है।पहले दिल्ली पुलिस मरी फिर दिल्ली की जनता मरी।आज जनप्रतिनिधि मर रहे थे।जब सब मर रहे है तो आशा की किरण कैसी?सबके घर में माँ होगी!सबके घर में बहन होगी!जरा एक बार अपने अंदर झांककर जरूर देखना।हम कितने गहरे कुएं में बैठ चुके है।
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ख़बरों की खबर

शरद यादव ने एक साल पहले 25 साल के लड़कों के लिए कुछ बात कही तो मीडिया ने कठघरे में खड़ा कर या।इस बजट सेशन में सांवले रंग की महिलाओं की प्रशंसा की तो मीडिया चिल्लाया कि शरद यादव ने अभद्र टिपण्णी की।अब मामला देश की सबसे पुरानी पार्टी की मुख्या पर एक केंद्रीय मंत्री की टिपण्णी का सुर्ख़ियों में है।ऐसे बीच बीच में बयान आने चाहिए ताकि लोगों के बीच बहस हो।राजस्थान के एक पूर्व विधायक ने भी सोनिया गांधी व् राहुल गांधी पर अभद्र टिपण्णी की थी। आप और हम जैसे अल्पज्ञानी इन नेताओं को पागल,मंदबुद्धि,मानसिक दिवालिया आदि कहकर अपनी भड़ास निकालते रहते है।ये सारे लोग राजनीति के पुराने व् मंजे हुए नुमाइंदे है।ये जानते है कि किस बात पर कैसे बहस शुरू करवानी है।राजस्थान के विधायक ने जो भाषा चुनी थी उसको कतई सभ्य नहीं कहा जा सकता।लेकिन उन विधायक महोदय को बेईमान बताने वालों की जानकारी के लिए बता दूँ कि वो सांसद भी रहे विधायक भी रहे और उनका बेटा पिछले दिनों चपरासी की नौकरी के लिए साक्षात्कार दे रहा था।आपने ऐसा कभी सुना है?उनके जीवन के बारे में जरूर सोचिये।जे पी आंदोलन से निकले युवा छात्र नेता शरद यादव आज तक निष्कलंक राजनीति कर रहे है।उनकी समझदारी व् कुशल व्यवहार के कारन सर्वश्रेष्ठ सांसद का ख़िताब मिला है।उनके कहने के मतलब को समझना चाहिए।उन्होंने कहा है कि कोई खुली बहस करना चाहे तो आइये सामने व् करिये।सब लोग चुप क्यों हो गए?मैदान में आना था। देश में जानबूझकर इस तरह का माहौल खड़ा किया जा रहा है।बातों को नकारात्मक रूप देकर जनता को परोसने की कोशिश हो रही है।उलटे तवे के रंग वाला लड़का चाहता है कि मुझे एकदम गोरी पत्नी चाहिए।यह मानसिकता किसने पैदा की है?टीवी पर न्यूज़ सुनने बैठते है तो ये ख़बरों के व्यापारी न्यूज़ कम विज्ञापन के रूप में गोरे होने के नुस्खे ज्यादा बताते है।कभी इन्होंने इनके खिलाफ एक भी शब्द बोला है?बड़ी बड़ी कम्पनीज के उत्पाद बेचने वाली लड़कियों में कभी सांवली रंग वाली क्यों नहीं नजर आती? पश्चिम को सर्वश्रेष्ठ बताने की जिद में लगे लोग इस देश के समाज व् परिवार को तोड़ने के नए नए तरीके ईजाद कर रहे है।कभी एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ खड़ा कर रहे तो कभी एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ।इनसे मन नहीं भरा या यूँ कहूँ कि सफल होने की सम्भावना क्षीण होने लगी तो महिला को पुरुष के खिलाफ मैदान में उतारने की कोशिश हो रही है।मैं मानता हूँ कि महिलाओं पर अत्याचार होते है।उनके सामने अवसरों की कमी होती है।समाज में कुरीतियों की शिकार होती है।यह गंभीर विषय है लेकिन पुरुष को दुश्मन के रूप में प्रस्तुत करके इन समस्याओं से कैसे निजात पाओगे?जनमानस में सकारात्मक बहस हो व् समस्या को जड़ से ख़त्म किया जाये। पैसों के बल पर मीडिया ख़बरों का व्यापार करता है।विदेशी कम्पनीज अपने उत्पाद बेचने के साथ साथ अपनी सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध कर रही है।विदेशी चंदे के बल पर चलने वाली नारी ब्रिगेड खुद इस तरह से व्यवहार करती है कि पूरा पुरुष समाज ही अपराधी है।पैदा होने वाला हर लड़का अपराधी ही होता है।चारो तरफ से लोगों की मानसिकता को नकारा करके दोषारोपण किसी समाज या खाप पंचायतों पर कर दिया जाता है।यह घर परिवार तोड़ने का नया तरीका ईजाद किया है। अगर वास्तव में कुरीतियों को मिटाने की इच्छा है तो समाज के लोगों के साथ बैठकर नियम कायदे बनाओ।नहीं तो बनने वाला हर कानून कागज के टुकड़ों में सिमटा सपना ही रहेगा।दहेज़ प्रताड़ना का कानून बनाया था तो क्या दहेज़ प्रथा समाप्त हुई है?कई गुना बढ़ी है।पहले दहेज़ के लिए महिलाओं की हत्या नहीं होती थी।इतिहास खंगालकर देख लो जैसे जैसे पश्चिम की सभ्यता व् भोगविलास को अपनाने की होड़ मची है वैसे वैसे दहेज़ प्रताड़ना के मामलों का ग्राफ बढ़ता गया।पश्चिम परस्त मीडिया की चीखों से अगर देश में कानून बनेंगे तो हर कानून का यही हश्र होगा। प्यार को युवाओं के बीच इस तरह परोसा जा रहा है कि जैसे मानव ने पहले कभी प्यार करना सीखा ही नहीं था।आजकल चैनलों पर लव गुरुओं ने अपनी दुकाने सजा ली है।लड़की को कैसे पटाना है उसके नुस्खे सिखाये जाते है।कालिदास की रचनाओं को भी याद कर लो।भगवान राम का सीता विलाप याद करलो।मूर्खों की जमात में शामिल होने से पहले अपने पूर्वजों की वसीयत याद रखो।हजारों साहित्य प्रेम कहानियों से भरे पड़े है।लेकिन आज प्यार के नाम पर मीडिया जो कामुकता या सेक्स की भूख परोस रहा है उससे बचने की जरुरत है। न तो चार हवस के दरिंदे तय करेंगे कि नारी किस तरह रहे और न चंदे के भंवर में फंसे तथाकथित नारीवादी संगठनो की चार मुख्या बैठकर तय करेगी कि पुरुष समाज को किस तरह रहना है?जीवन पुरुष व् महिला के बीच सामंजस्य से ही आगे बढ़ेगा।एक दूसरे के विरुद्ध तलवारे खींचने से समाज में बिखराव आएगा।जब नारी कमजोर होती है तो परिवार व् समाज का विनाश होने लगता है।नारी घर की धुरी होती है।रंग सांवला होने से सुंदरता कम नहीं होती।रंग सांवला होने से माँ की ममता कम नहीं होती।रंग सांवला होने से बहन का प्यार कभी फीका नहीं होता। मैं मानता हूँ आज भी समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है।पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर अत्याचार ज्यादा होते है।लेकिन ऊपर से या पश्चिम से नैतिकता व् सभ्यता के कानून परोसना इन समस्याओं का समाधान कतई नहीं है।किसी एक बयान पर चीख चिल्लाकर उस एक पुरुष को किनारे तो किया जा सकता है लेकिन यह मानसिकता समाज में जागरूकता व् सामाजिक नेताओं के अथक प्रयासों से ही दूर होगी।इस तरह के सतही हंगामे से महिलाओं के भीतर भय पैदा किया जा रहा है।हर लड़की शादी के बाद चाहती है कि मेरी कोख से पहला बेटा हो हर लड़का चाहता है कि मेरे लड़का हो।इतनी गहरी बैठी मानसिकता को अथक प्रयासों से दूर किया जा सकेगा। आज ईश्वर चंद्र विद्यासागर,राजा राम मोहन राय दयानंद सरस्वती जैसे हजारों महापुरुषों को आगे आना होगा।समाज की सदियों पुरानी मानसिकता चंद फैसलों या चंद घंटो से ख़त्म नहीं की जा सकती।वैदिक समाज में महिलाओं को बराबर का दर्जा मिला हुआ था। बाद की परिस्थितियों व् मनुवाद ने पश्चिम के रोग को उपजाने के लिए जो मैदान तैयार किया है उसको मिटाने की अब हरसंभव कोशिश होनी चाहिए।इन बयानों को माध्यम बनाकर सामाजिक कुरूतियों तक पहुंचकर इनको जड़ से समाप्त करने की दिशा में कोशिस होनी चाहिए।
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