शरद यादव ने एक साल पहले 25 साल के लड़कों के लिए कुछ बात कही तो मीडिया ने कठघरे में खड़ा कर या।इस बजट सेशन में सांवले रंग की महिलाओं की प्रशंसा की तो मीडिया चिल्लाया कि शरद यादव ने अभद्र टिपण्णी की।अब मामला देश की सबसे पुरानी पार्टी की मुख्या पर एक केंद्रीय मंत्री की टिपण्णी का सुर्ख़ियों में है।ऐसे बीच बीच में बयान आने चाहिए ताकि लोगों के बीच बहस हो।राजस्थान के एक पूर्व विधायक ने भी सोनिया गांधी व् राहुल गांधी पर अभद्र टिपण्णी की थी। आप और हम जैसे अल्पज्ञानी इन नेताओं को पागल,मंदबुद्धि,मानसिक दिवालिया आदि कहकर अपनी भड़ास निकालते रहते है।ये सारे लोग राजनीति के पुराने व् मंजे हुए नुमाइंदे है।ये जानते है कि किस बात पर कैसे बहस शुरू करवानी है।राजस्थान के विधायक ने जो भाषा चुनी थी उसको कतई सभ्य नहीं कहा जा सकता।लेकिन उन विधायक महोदय को बेईमान बताने वालों की जानकारी के लिए बता दूँ कि वो सांसद भी रहे विधायक भी रहे और उनका बेटा पिछले दिनों चपरासी की नौकरी के लिए साक्षात्कार दे रहा था।आपने ऐसा कभी सुना है?उनके जीवन के बारे में जरूर सोचिये।जे पी आंदोलन से निकले युवा छात्र नेता शरद यादव आज तक निष्कलंक राजनीति कर रहे है।उनकी समझदारी व् कुशल व्यवहार के कारन सर्वश्रेष्ठ सांसद का ख़िताब मिला है।उनके कहने के मतलब को समझना चाहिए।उन्होंने कहा है कि कोई खुली बहस करना चाहे तो आइये सामने व् करिये।सब लोग चुप क्यों हो गए?मैदान में आना था। देश में जानबूझकर इस तरह का माहौल खड़ा किया जा रहा है।बातों को नकारात्मक रूप देकर जनता को परोसने की कोशिश हो रही है।उलटे तवे के रंग वाला लड़का चाहता है कि मुझे एकदम गोरी पत्नी चाहिए।यह मानसिकता किसने पैदा की है?टीवी पर न्यूज़ सुनने बैठते है तो ये ख़बरों के व्यापारी न्यूज़ कम विज्ञापन के रूप में गोरे होने के नुस्खे ज्यादा बताते है।कभी इन्होंने इनके खिलाफ एक भी शब्द बोला है?बड़ी बड़ी कम्पनीज के उत्पाद बेचने वाली लड़कियों में कभी सांवली रंग वाली क्यों नहीं नजर आती? पश्चिम को सर्वश्रेष्ठ बताने की जिद में लगे लोग इस देश के समाज व् परिवार को तोड़ने के नए नए तरीके ईजाद कर रहे है।कभी एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ खड़ा कर रहे तो कभी एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ।इनसे मन नहीं भरा या यूँ कहूँ कि सफल होने की सम्भावना क्षीण होने लगी तो महिला को पुरुष के खिलाफ मैदान में उतारने की कोशिश हो रही है।मैं मानता हूँ कि महिलाओं पर अत्याचार होते है।उनके सामने अवसरों की कमी होती है।समाज में कुरीतियों की शिकार होती है।यह गंभीर विषय है लेकिन पुरुष को दुश्मन के रूप में प्रस्तुत करके इन समस्याओं से कैसे निजात पाओगे?जनमानस में सकारात्मक बहस हो व् समस्या को जड़ से ख़त्म किया जाये। पैसों के बल पर मीडिया ख़बरों का व्यापार करता है।विदेशी कम्पनीज अपने उत्पाद बेचने के साथ साथ अपनी सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध कर रही है।विदेशी चंदे के बल पर चलने वाली नारी ब्रिगेड खुद इस तरह से व्यवहार करती है कि पूरा पुरुष समाज ही अपराधी है।पैदा होने वाला हर लड़का अपराधी ही होता है।चारो तरफ से लोगों की मानसिकता को नकारा करके दोषारोपण किसी समाज या खाप पंचायतों पर कर दिया जाता है।यह घर परिवार तोड़ने का नया तरीका ईजाद किया है। अगर वास्तव में कुरीतियों को मिटाने की इच्छा है तो समाज के लोगों के साथ बैठकर नियम कायदे बनाओ।नहीं तो बनने वाला हर कानून कागज के टुकड़ों में सिमटा सपना ही रहेगा।दहेज़ प्रताड़ना का कानून बनाया था तो क्या दहेज़ प्रथा समाप्त हुई है?कई गुना बढ़ी है।पहले दहेज़ के लिए महिलाओं की हत्या नहीं होती थी।इतिहास खंगालकर देख लो जैसे जैसे पश्चिम की सभ्यता व् भोगविलास को अपनाने की होड़ मची है वैसे वैसे दहेज़ प्रताड़ना के मामलों का ग्राफ बढ़ता गया।पश्चिम परस्त मीडिया की चीखों से अगर देश में कानून बनेंगे तो हर कानून का यही हश्र होगा। प्यार को युवाओं के बीच इस तरह परोसा जा रहा है कि जैसे मानव ने पहले कभी प्यार करना सीखा ही नहीं था।आजकल चैनलों पर लव गुरुओं ने अपनी दुकाने सजा ली है।लड़की को कैसे पटाना है उसके नुस्खे सिखाये जाते है।कालिदास की रचनाओं को भी याद कर लो।भगवान राम का सीता विलाप याद करलो।मूर्खों की जमात में शामिल होने से पहले अपने पूर्वजों की वसीयत याद रखो।हजारों साहित्य प्रेम कहानियों से भरे पड़े है।लेकिन आज प्यार के नाम पर मीडिया जो कामुकता या सेक्स की भूख परोस रहा है उससे बचने की जरुरत है। न तो चार हवस के दरिंदे तय करेंगे कि नारी किस तरह रहे और न चंदे के भंवर में फंसे तथाकथित नारीवादी संगठनो की चार मुख्या बैठकर तय करेगी कि पुरुष समाज को किस तरह रहना है?जीवन पुरुष व् महिला के बीच सामंजस्य से ही आगे बढ़ेगा।एक दूसरे के विरुद्ध तलवारे खींचने से समाज में बिखराव आएगा।जब नारी कमजोर होती है तो परिवार व् समाज का विनाश होने लगता है।नारी घर की धुरी होती है।रंग सांवला होने से सुंदरता कम नहीं होती।रंग सांवला होने से माँ की ममता कम नहीं होती।रंग सांवला होने से बहन का प्यार कभी फीका नहीं होता। मैं मानता हूँ आज भी समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है।पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर अत्याचार ज्यादा होते है।लेकिन ऊपर से या पश्चिम से नैतिकता व् सभ्यता के कानून परोसना इन समस्याओं का समाधान कतई नहीं है।किसी एक बयान पर चीख चिल्लाकर उस एक पुरुष को किनारे तो किया जा सकता है लेकिन यह मानसिकता समाज में जागरूकता व् सामाजिक नेताओं के अथक प्रयासों से ही दूर होगी।इस तरह के सतही हंगामे से महिलाओं के भीतर भय पैदा किया जा रहा है।हर लड़की शादी के बाद चाहती है कि मेरी कोख से पहला बेटा हो हर लड़का चाहता है कि मेरे लड़का हो।इतनी गहरी बैठी मानसिकता को अथक प्रयासों से दूर किया जा सकेगा। आज ईश्वर चंद्र विद्यासागर,राजा राम मोहन राय दयानंद सरस्वती जैसे हजारों महापुरुषों को आगे आना होगा।समाज की सदियों पुरानी मानसिकता चंद फैसलों या चंद घंटो से ख़त्म नहीं की जा सकती।वैदिक समाज में महिलाओं को बराबर का दर्जा मिला हुआ था। बाद की परिस्थितियों व् मनुवाद ने पश्चिम के रोग को उपजाने के लिए जो मैदान तैयार किया है उसको मिटाने की अब हरसंभव कोशिश होनी चाहिए।इन बयानों को माध्यम बनाकर सामाजिक कुरूतियों तक पहुंचकर इनको जड़ से समाप्त करने की दिशा में कोशिस होनी चाहिए।
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