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राजनीति, धर्म और मीडिया

We care for cast capitalism and Religions√√

जी! यही हकीकत है इस देश की सियासत व हुकूमत की!आप ज्यादा पीछे मत जाइए बस पिछले चार साल  की मोदी सरकार की कार्यप्रणाली का ही विश्लेषण कर लीजिए।आपके समझ मे आ जायेगा कि इस देश की राजनीति आपके साथ कितना भद्दा मजाक कर रही है!चौबीसों घंटे नेताओं के मुंह से निकलने वाले बयानों व मीडिया में चल रही बहस को देखते जाइये तो आपको अहसास होता जाएगा कि सरकार को शायद हमने धर्म व जातियों को आबाद रखने के लिए ही चुना है।बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था कि संविधान बहुत अच्छा है लेकिन इनकी अच्छाइयां लोगों तक कितनी पहुंचेगी यह इस बात पर निर्भर करेगी कि इसको लागू करने के  लिए सत्ता में बैठे लोगों की नीयत कैसी है!अब बात संविधान से बिछड़कर कार्यपालिका में बैठे लोगों की नियत पर ही आ टिकी है। पिछले चार साल में हमे हर रोज यह बताया गया कि मुस्लिम हिंसक होते है,ईसाई धर्म परिवर्तन का धंधा कर रहे है,हिन्दू बहुसंख्यक है इसलिए अल्पसंख्यकों को दबा रहे है!हर छोटी बड़ी घटना को जाति व धर्म के नजरिये से परोसा जा रहा है।कार्यपालिका और मीडिया मिलकर इस देश की जनता का मानसिक शोषण कर रही है और जनता को बुनियादी मुद्दों से भटकाकर धर्म के अखाड़े में लाकर खड़ा कर दिया है।क्या हमने सरकार हमारी बुनियादी समस्याओं से निजात दिलवाने के लिए चुनी है या धर्म का धंधा करने के लिए?अगर दिमाग मे धर्म की अफीम ज्यादा घुसा दी गई है और आपकी स्मरण शक्ति कमजोर हो गई है तो मैं कुछ बुनियादी समस्याओं से जुड़े आंकड़े आपके सामने रख रहा हूँ आप दिमाग पर जोर डालकर पढ़ते हुए अपने चारों तरफ नजर घुमाने की कोशिश करिये.....

गीता पर लिखूं या रामायण पर!

गीता पर लिखूं या रामायण पर!
बाइबिल पर लिखूं या कुरान पर!

यथार्थ लिखूं तो भावनाएं आहत?भगवान-यीशु या अल्लाह ने तो ये किताबें लिखी नहीं है! तुम सभी ही तो कहते हो यह ही सबका मालिक है,सबका बाप है तो मैं सवाल क्यों न पूछूँ? मैंने भी बहुत सजदे किये है जनाब!सवाल पूछने का हक़ तो मेरा भी है!सारी ये धार्मिक किताबें पढ़ने के बाद थोड़ा इंसान बन पाया हूँ और इसी इंसानियत को आगे ले जाना चाहता हूँ। इंसान होने का सबसे बड़ा सबूत भावुक होना है न कि तर्कसंगत होना।तर्क आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है लेकिन भावुकता इंसानियत को जिन्दा रखने का वाहन है।न हिन्दू बनो!न ईसाई बनो!न मुसलमान बनो!सिर्फ और सिर्फ इंसान बनो क्योंकि

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,ईसाई
इंसान न होने की कसमें खाई।।

किसी हिन्दू को पूछ लीजिये कि तुम कौन हो?तो जवाब मिलेगा कि मैं हिन्दू हूँ,हमारा धर्म प्रेम सिखाता है!हम वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात पुरी दुनियां हमारा परिवार के सिद्धांत पर चलते है!जब उसी को पूछो कि मुसलमानों के बारे में कुछ जानते हो?तो जवाब मिलेगा गद्दार,देशद्रोही,मानवता के विरोधी,क्रूर लोग है!इनका खात्मा ही दुनियां में शांति ला सकता है!मतलब एकदम व् एक साँस में वसुधैव कुटुम्बकम को किनारे फेंककर अपने ही कुटुंब के लोगों के प्रति ये भावना!अजीब ज्ञान होता है इनका और यह ज्ञान हिन्दू धर्म का अनुयायी बनकर हासिल किया है! किसी मुसलमान को पूछकर देख लो तो बताएगा कि इस्लाम मोहब्बत सिखाता है,इस्लाम गला काटना नहीं बल्कि गले मिलना सिखाता है!जब पूछो कि हिंदुओं के बारे में क्या राय है तो बोलेंगे कि जाहिल लोग है,काफिर है,ये मुसलमानों के दुश्मन लोग है और यह अद्भुत ज्ञान इन्होंने इस्लाम का झंडा थामकर हासिल किया है। यही हाल ईसाई धर्म का है।मतलब हर धर्म का आदमी प्रेम,मोहब्बत,सद्भावना की बात तो करता है लेकिन अपने धर्म की सीमा के भीतर तक।फिर धर्म की सीमाओं के भीतर जाति, फिरका,गुटों में सिमट जाता है।इसके इतर अपने गुरु,मौलवी, पादरी के पीछे स्वयंभू कबीला अलग से बना लेते है। इन सबका गहनता के साथ अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि जो लोग अपने आप को उच्च धार्मिक बताते है उनसे ज्यादा लालची, कपटी,धूर्त लोग नहीं होते! ये इंसानियत के दुश्मन लोग होते है और अपने उन्माद की मदहोशी में मानवता का क़त्ल करते चलते है। अगर वाकई में इस देश को किसी से असली खतरा है तो इन धार्मिक उन्मादी लोगों से है।गाँवों व् दूरदराज के क्षेत्रों में अज्ञानी लोग इनके बहकावे में आकर खुद लुटते है लेकिन बड़े शहरों में पढ़े-लिखे धार्मिक उन्मादी लोग बीच सड़कों पर इंसानियत का क़त्ल करते है।धमकी, अपहरण , हत्या हफ्तावसूली आदि से अर्जित धन को धार्मिक पर्वों पर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए उड़ाते है।हर धर्म के उच्च धार्मिक लोगों का लगभग यही हाल है।जिनके गुनाहों से पर्दा उठ जाता है वो ढोंगी व् जो छिपाने में कामयाब हो जाते है वो धर्मगुरु!
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धर्म हमेशा से सत्ता पर कब्जे की सीढ़ी मात्र रहा है

जहाँ इंसान की सोच ख़त्म होती है वहां से धर्म की धूर्तता शुरू होती है।धर्म हमेशा से सत्ता पर कब्जे की सीढ़ी मात्र रहा है और इंसानी शोषण की शुरुआत यहीं से होती है।पहले धर्म खुद को सर्वेसर्वा रखकर सत्ता अपने प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपता था व् बाद में धीरे-धीरे परिवर्तित होता गया(ब्राह्मण श्रेष्ठ व् सत्ता क्षेत्रियों को/चर्च श्रेष्ठ व् सत्ता राजा को) व् आज सत्ता सर्वोपरि हो गई व् धर्म सत्ता पर कब्जे की चाबी के रूप में उपयोग होने लग गया।इसका भी कारण है।पहले सत्ता-धर्म के गठजोड़ का सीधा सामना जनता से था लेकिन आज उसका स्वरूप बदल गया है आज एक नए बिचौलिये वर्ग का उदय हो गया जिसे हम व्यापारी-उद्योगपत्ति कहते है। यह वर्ग पहले जनता का शोषण करता है और प्राप्त पूंजी का एक निश्चित हिस्सा धर्म को दान के नाम पर व् राजनेताओं को चंदे के नाम पर बांटता है।यह वर्ग तय करता है कि सत्ता किसको सौंपनी चाहिए!धर्मगुरु-राजनेता-उद्योगपत्ति मिलकर जनता के भविष्य का फैसला करते है।इनकी संख्या ज्यादा नहीं है लेकिन पूंजी का  90%हिस्सा इनके कब्जे में है जिसके बल पर ये लोग हर षड्यंत्र को सफल बनाने में कामयाब होते रहे है। किसको बेहतर धर्मगुरु सिद्ध करना है ये इनके हाथों में है। मीडिया में लगभग 100%कब्ज़ा इन्हीं दलालों का है। कहाँ-किसको चमत्कारी बताना है! किसके पीछे गरीब जनता की आँखों में धुल झौंककर अंधभक्तों की भीड़ खड़ी करनी है! किसको सब समस्याओं के समाधान का ज्ञाता घोषित करना है!यह सब मीडिया के माध्यम से ये दलाल तय करते है।किस राजनेता को जनता की सब समस्या के समाधानकर्ता के रूप में पेश करना है! यह पहले ही बंद कमरों में तय हो जाता है।सत्ता सौंपने के पहले ही सारे सौदे तय हो जाते है।सत्ता सौंपने के बदले इन दलालों को सत्ता क्या-क्या सहूलियतें देगी उसका खाका पहले ही खींच दिया जाता है।गरीब-अज्ञानी जनता उसी के शोषण से अर्जित पूंजी से निर्मित इन नेताओं व् धर्मगुरुओं के ख्याली अच्छे दिनों की आस में भागती नजर आती है।शोषण के दुष्चक्र में उलझती ही जाती है।अच्छे भक्त व् कार्यकर्त्ता की पहली शर्त ही मानसिक गुलामी होती है।जो धर्मगुरुओं के इशारों पर अपनी अक्ल की कुर्बानी दे बैठे ऐसे लोगों को भक्त कहा जाता है। जो राजनेताओं के इशारों पर अपने समाज की बलि देने को तैयार रहे ऐसे लोगों को कार्यकर्त्ता कहा जाता है। बहुत सारे समाजसुधारकों ने इनके खिलाफ आंदोलन चलाये,बहुत सारे क्रांतिकारियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया लेकिन यह वर्ग समय के हिसाब से इनके जीवन इतिहास को ही अपने हिसाब से स्थापित करते गया । जो इनके धंधे में फिट नहीं बैठे उनको दरकिनार कर दिया गया।गांधी-दीनदयाल-सावरकर का गुणगान करने से पूंजीपतियों को कोई नुकसान नहीं है बल्कि इनके सत्ता हस्तानांतरण के काम में फायदेमंद है। जब बात भगतसिंह-बाबा साहेब-सर छोटूराम आदि की होगी तो सीधे निशाने पर धर्म व् दलाली ही आएगी  इनकी विचारधारा को सामने लाने से इनका धंधा चौपट हो जायेगा।ये लोग बाबा साहेब का यह विचार क्यों स्वीकार करेंगे कि वर्ण व्यवस्था मानवता के खिलाफ है जबकि वर्ण व्यवस्था की रचना ही इन्होंने अपने हिसाब से शोषण के लिए की है।धर्म की रचना ही बहुसंख्यक जनता का शोषण करने के लिए की हो,भय पैदा करके लूटने के हथियार के रूप में की हो! ये भगतसिंह के उन विचारों का गुणगान कैसे करेंगे जिसमे इनको शोषक के रूप में प्रस्तुत किया है व् आम जनता को शोषित के रूप में?शोषणकर्ता व् शोषित कभी एक हो सकते है क्या?क्या शोषितों को भगतसिंह की क्रांति की विचारधारा को बताकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे? क्या सर छोटूराम के उस विचार को मानेंगे कि किसान का असली दुश्मन मंडी-फंडी है?फिर इनकी शोषण की दुकानें कैसे चलेगी? इसलिए अपना भविष्य इन असली दुश्मनों के षड्यंत्रों में ढूंढने के बजाय अपने अच्छे कार्यों में ढूंढो।अपनी सही दिशा में जाती मेहनत में ढूंढों।इनके बहकावी नारों में बहने के बजाय अम्बेडकरवादी तर्कों में खोजों!इनके प्रति वफादारी जताने के बजाय सर छोटूराम द्वारा बताये दुश्मनों को पहचानकर किनारे करो! इनको अपना बाप समझने के बजाय असली दुश्मन समझो और भगतसिंह के पद-चिन्हों पर चलते हुए क्रांति का बिगुल फूंको।अपने दिमाग में भरे हुए इस धर्म रूपी कचरे की सफाई करो!धर्म कभी मानवता का हक न कभी था न कभी होगा।जितने भी बड़े-बड़े जन-संहार हुए है वो धर्म ने ही करवाये है।धार्मिक नहीं सिर्फ और सिर्फ इंसान बनो!धर्म रूपी अफीम के नशे में मदमस्त होकर झूमना बंद कर दोगे तो आधी से ज्यादा समस्याओं का समाधान अपने आप ही हो जायेगा।शोषण का सबसे बड़ा द्वार बंद हो जायेगा।जब इंसान बनने की ओर अग्रसर हो जाओगे तो धर्म का पहला षड्यंत्र यानि जातीय भेदभाव एक झटके में समाप्त हो जायेगा। कोई धर्म अपने आप को सबसे पुराना बताये तो समझो कि सबसे सड़ा व् बदबूदार कूड़ेदान यही है!कोई धर्म अपने आप को सबसे बड़ी संख्या वाला बताये तो समझो सबसे बड़ा कुड़ापात्र यही है!
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धर्म व् राजसत्ता का गठजोड़ फासीवाद व् अंधवाद पैदा करता है

धर्म व राजसत्ता का गठजोड़ फासीवाद व् अंधवाद पैदा करता है। धर्म को सत्ता से दूर करने के लिए ही लोकतंत्र का उद्भव हुआ। रोम को धराशायी करने में सबसे बड़ा योगदान समानता, संप्रभुता व् बंधुत्व का नारा लेकर निकले लोगों का था। ये लोग धर्म के दुरूपयोग से सत्ता पर कब्ज़ा करके बैठे लोगों को उखाड़कर फेंकने को मैदान में उतरे थे व् राजशाही को एक महल तक समेटकर ब्रिटेन में लोकतंत्र की और आगे बढे। बहुत सारे यूरोपीय देश इससे भी आगे निकलकर राजतन्त्र को दफन करते हुए लोकतंत्र की और बढे और धर्म को सत्ता से गलियारों से हटाकर एक चाहरदीवारी तक समेट दिया जिसे नाम दिया गया वेटिकन सिटी। आज किसी भी यूरोपीय देश में धर्मगुरु सत्ता के गलियारों में घुसते नजर नहीं आएंगे। ये तमाम बदलाव 16वीं शताब्दी के बाद नजर आने लगे जिसे पुनर्जागरण काल कहा जाने लगा अर्थात पहले लोग सही राह पर थे फिर धार्मिक उन्माद फैलाकर लोगों का शोषण किया गया और अब लोग धर्म के पाखंड को छोड़कर उच्चता की और दुबारा अग्रसर हो चुके है। आज यूरोपीय समाज वैज्ञानिक शिक्षा व् तर्कशीलता के बूते दुनियां का अग्रणी समाज है। मानव सभ्यता की दौड़ में कहीं ठहराव आता है तो कहीं विरोधाभास पनपता है लेकिन उसका तोड़ व् नई ऊर्जा वैज्ञानिकता के बूते हासिल तकनीक से प्राप्त कर ली जाती है। आज हमारे देश में सत्ता पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों की सोच 14 वीं शताब्दी में व्याप्त यूरोपीय सत्ताधारी लोगों से ज्यादा जुदा नहीं है। मेहनत लोगों व् वैज्ञानिकों के एकाकी जीवन व् उच्च सोच के कारण कुछ बदलाव नजर तो आ रहे है लेकिन धर्मवाद व् पाखंडवाद में लिप्त नेताओं ने उनको इस बात का कभी क्रेडिट नहीं दिया। जब किसी मंच पर आधुनिकता की बात करने की मज़बूरी होती है तो इन लोगों की मेहनत व् सोच को अपनी उपलब्धि बताने की कोशिश करने लगते है।ये ही लोग दूसरे मंच पर जाते है रूढ़िवाद व् पाखंडवाद में डूबे इतिहास का रंगरोगन करने लग जाते है। धर्मगुरुओं का चोला पहनकर इन बौद्धिक व् नैतिक भ्रष्ट नेताओं के सहयोगी पहले तो लोगों के बीच भय व् उन्माद का माहौल पैदा करते है और फिर सत्ता मिलते है अघोषित सत्ता के केंद्र बन बैठते है।सरकारे किसी भी दल की हो,यह कारनामा हर कोई करने से नहीं हिचकता। पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक हर प्रधानमंत्री की तस्वीरें धर्मगुरुओं के चरणों में नतमस्तक होते हुए नजर आ जायेगी।जब धर्मगुरु जनता द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री से ऊपर होते है तो लोकतंत्र सिर्फ दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं होता और बेईमान लोग इसी लोकतंत्र नाम की दुहाई देकर मख़ौल उड़ाते नजर आते है। इसी रोगग्रस्त लोकतंत्र की चौपाई का जाप करते करते अपराधी संसद में बैठने लगते है तो धर्मगुरु लोकतंत्र के संस्थानों को मंदिर बताकर पाखंड के प्रवचन पेलने लग जाते है और नागरिकों का दिमाग चक्करगिन्नी की तरह घूमने लग जाता है। नागरिक भ्रमित होकर संविधान भूल जाते है और टुकड़ों बंटी सत्ता के टीलों के इर्द-गिर्द भटकने लग जाते है। जहाँ जाने के दरवाजे तो बड़े चमकीले होते है लेकिन लौटने के मार्ग मरणासन्न तक पहुंचा देते है। इस प्रकार लोकतंत्र समर्थक होने का दावा करने वाले लोग प्राचीनकालीन कबायली जीवन जीने लग जाते है जहाँ हर 5-7 परिवारों का मुख्या महाराज अधिराज कहलाता था।आजकल लोकतंत्र में यह उपाधि वार्डपंच, निगमपार्षद व् लगभग हर सरकारी कर्मचारी ने हासिल कर ली है। जिनको नहीं मिली वो कोई निजी संगठन का मनगढ़त निर्माण करके हासिल  कर लेता है।इस प्रकार मानव सभ्यता वापिस पुरातन काल की और चलने लग गई व् लोकतंत्र अपने पतन की ओर। जहाँ सत्ता धर्म से सहारे की उम्मीद करने लगे व् धर्म सत्ता के सहारे की तो लोकतंत्र का पतन नजदीक होता है क्योंकि लोकतंत्र का निर्माण ही इन उम्मीदों पर पानी फेरने के लिए ही हुआ है। आज ये दोनों ताकत के केंद्र आपस में मिल गए है तो लोकतंत्र असल में अपना वजूद खो चुका है।अब हर अपराधी, भ्रष्ट, बेईमान, धर्मगुरु,लुटेरे आदि हर कोई अपने-अपने हिसाब से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करने लग गया है। जब सत्ता में इन लोगों का बोलबाला होने लग गया तो लोकतंत्र आम नागरिकों से दूर हो चूका है। संवैधानिक प्रावधान चमत्कार का रूप ले चुके है जिसको सुना जाए तो बहुत ही सुहावने लगते है लेकिन कभी हकीकत में नहीं बदल सकते!
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मरती मानवता-मुस्कराती सत्ता

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 26%जनता इतनी गरीब है कि रोटी-कपडा-मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए मोहताज है। पिछले दिनों मैंने खबर पढ़ी कि एक आदिवासी इस उम्मीद के साथ अपने दो बच्चों व् बीवी को लेकर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर गया कि शायद वहां खाने का इंतजाम हो जायेगा लेकिन तीन दिनों के प्रयास के बावजूद न कोई काम मिला और न खाना। सोचा भूख से तड़पकर मरना ही तो वापिस गाँव में ही जाकर मरेंगे। वापिस पैदल बच्चों को लेकर गाँव की तरफ चल दिया। चलते-चलते रास्ते में ही एक बच्चे ने भूख से तड़पकर दम तोड़ दिया फिर भी वह उसके शव को लेकर चलता रहा है। दोनों पति-पत्नी रो रहे थे और चल रहे थे। रास्ते में कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता मिल गया। उसने बात की तो यह हृदय-विदारक घटना सामने आई। फिर सरकारी कार्यवाही शुरू हुई।बच्चे का पोस्टमार्टम करवाया गया तो रिपोर्ट से पता चला कि बच्चे की आँते खाली थी। चिपककर सड़ चुकी थी। शायद पिछले 4-5 दिनों से उसने कुछ नहीं खाया।सरकारी अफसरों की कार्यशैली देखो कि पांच दिन बाद 20 किलो चावल दिए गए तब तक दूसरा बच्चा भी दम तोड़ देता यदि उस सामाजिक कार्यकर्त्ता ने अपनी जेब से उनको खाना नहीं खिलाया होता! यह हमारा तंत्र है गरीबी से लड़ने का जो कभी गरीबों के आसपास पहुँच नहीं पाता। गरीबों के लिए योजनाएं बनाकर धन आवंटन करने वालों से लेकर अंतिम सरकारी आदमी पटवारी-ग्रामसेवक-सरपंचो ने बड़े-बड़े बंगले खड़े कर लिए। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमकर गरीबी से लड़ने का दावा करते है लेकिन सिर्फ गरीबों से लड़ते प्रतीत होते है। क्या यह संभव है कि ये तीनों एक गाँव में ईमानदारी के साथ काम करे और कोई गरीब भूख से मर जाए?क्या यह संभव है कि ये ठीक से काम करे और कोई गरीब बिना मकान के ठण्ड-बारिश या बिना इलाज के मर जाये? नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता!तो कमी कहाँ है? कमी हमारे तंत्र में है।कमी उस जनता में है जो गरीबी के दुष्चक्र को तोड़कर बाहर निकली और अपने सफर को भूल गई। कमी हम युवाओं में है जो गाय की मौत पर घरों को, बस्तियों को जिन्दा लोगों को आग के हवाले करने के लिए तो निकल जाते है लेकिन किसी गरीब की मौत के लिए जिम्मेदार इन दरिंदों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कमी हमारे संस्कारों में है कि पैदा होते ही हमें उस दिशा में हांकना शुरू किया जाता है कि तुम हिन्दू हो,तुम मुसलमान हो,तुम ईसाई हो लेकिन कभी यह नहीं सिखाया जाता कि तुम इंसान, तुम मानवता के वाहक हो। कमी हमारी शिक्षा व्यवस्था में है जहाँ रोज सुबह हाथ जोड़कर प्रार्थना करवाई जाती है कि "धर्म के वास्ते जीना,धर्म के वास्ते मरना"लेकिन यह कभी नहीं बताया जाता कि इंसान के वास्ते जीना, इंसानियत के वास्ते मरना। मैं बार बार कहता हूँ कि गरीबी हुक्मरान कभी नहीं मिटायेंगे।ये एक योजना को ख़त्म करके दूसरी योजना पेश करते रहेंगे।ये करोड़ों रूपए बर्बाद यह  बताने में कर देंगे कि देखो मेरी बोतल की वाइन कितनी बेहतर है! धर्म के ठेकेदार कभी गरीबों को सही रास्ता नहीं बताएंगे क्योंकि इनकी दुकाने गरीबों के शोषण से ही चलती है। अपनी दुकान अपनी मर्जी से कौन बंद करना चाहेगा? कोई उद्योगपति अपनी मर्जी से मुनाफा गरीबों में नहीं बाँटेगा क्योंकि यह मुनाफा गरीबों का खून चूसकर ही हासिल किया जाता है। गरीबों के हाथों जो बड़ी-बड़ी इमारते खड़ी होती है उसमे से एक भी कमरा कभी किसी गरीब के हवाले करते किसी को देखा है? नहीं न! फिर हम इन लोगों से उम्मीद लगाकर क्यों बैठे है? हम इन लोगों को सत्ता सौंपकर शांत क्यों हो गए? हम बड़े-बड़े मॉल बनाकर इन लुटेरों के अड्डों को क्यों आबाद करे? हम पेट पर तौलिया बांधकर लंबी-लंबी यात्राएं करके इन पाखंडियों की दुकाने क्यों गुलजार करे? अब हमे खड़ा होना पड़ेगा! खुद को पहचानना पड़ेगा! खुद पर भरोसा करना पड़ेगा! संघर्ष के लिए तैयार करना पड़ेगा! हमे इनसे हमारा हक छीनकर लेना पड़ेगा! अब हमे हर मौत पर जिम्मेवार का इलाज करना होगा! हुक्मरानों को सवाल नहीं पूछेंगे सिर्फ जवाब देंगे। हक़ दो या बोरिया-बिस्तर समेटो! उद्योगपतियों को जवाब देंगे कि राहत-पैकेज नाम से जो हमारी कमाई लूटी है वो वापिस दो! धर्म के ठेकेदारों को जवाब देंगे कि देश में 31करोड़ गरीबों की मदद करने में तुम्हारे 33करोड़ देवता असफल कैसे हो गए? जागो! उठो! जलाओ मशाल संघर्ष की! जलाओ मशाल सोये हुओं को जगाने की! तब तक न रुको, जब तक अंतिम गरीब का चेहरा न खिल जाये! उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारी सफलता होगी! उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारी सत्ता होगी!उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारा धर्म 


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