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बाल_दिवस

आज बाल दिवस दिवस हैं फिर अनेक सरकारी- गैर सरकारी आयोजन होंगे । स्कूलों में पिछले वर्षों की भांति  कई कार्यक्रमों का आयोजन होगा, ढेरों बातें होंगी, बच्चों की भलाई के लिए ढेर सारे वादे किये जायेंगे, तालियां बजेंगी, मीडिया में तमाम ख़बरें होंगी । इस साल ये सब कुछ थोड़ा ज्यादा और जुदा भी होगा क्यों कि बच्चों की बेहतरी के लिए समर्पित दो शख्सियतों, सत्यार्थी व मलाला को नोबल शांति पुरस्कार जो मिला है । हां, आजाद भारत के पहले प्रधान मंत्री और बच्चों के चाचा नेहरू के जन्म दिन के उपलक्ष्य में भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे । बस और क्या ?


ज़रा सोचिये, इस मौके पर पूरे देश में जितने रूपये सारे सरकारी –गैर सरकारी आयोजनों में खर्च होंगे तथा खर्च हुए दिखाए जायेंगे, उतनी भी राशि अगर कुछ गरीब, बेसहारा, कुपोषित बच्चों के भलाई के लिए कुछ बेहद पिछड़े गांवों में खर्च किये जाएं तो बच्चों का कुछ तो भला होगा 

बचपन बचाओ

सदा गुदगुदाने वाली यादें।जब खुद दुनियाँ में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का समय आता है तो हर किसी को बचपन बहुत याद आता है।काश कोई मेरा बचपन लौटा दे!लेकिन हर किसी का बचपन उतना आनंदमय भी तो नहीं होता।हर किसी का नसीब उतना अच्छा भी तो नहीं होता।चंदा मामा के सपने तो हर बच्चा ले लेता है लेकिन बुनियादी सुविधाएं हर किसी के नसीब में कहाँ होती है! गरीबी व् बचपन के रिश्ते को दुनियाँ वाले कहाँ समझते है! समझकर भी अनजान बन जाते है।गरीब बच्चे के बचपन का अपहरण घर की दहलीज से शुरू हो जाता है।फिर हर कदम पर बचपन लूटा जाता है।अच्छे कपडे नहीं तो कोई दोस्त नहीं बनता। अकेलापन झेलना पड़ता है।गुरूजी का प्रिय नहीं बन पाता।हर स्तर पर उसके टैलेंट को दबाने की कोशिश होती है।इस तरह दरकिनार करने की कोशिश होती है कि वह किसी दूसरे ग्रह से आया आदिम प्राणी हो। हमारे समाज का हिस्सा ही नहीं है। हमारे समाज में या यूँ कहूँ कि मानव सभ्यता में सदियों से यह काम जारी है।पहले कम था तो आज ज्यादा है। पेज 3 पर आने की कोशिश करने वालों में इतनी इंसानियत बची कहाँ है!असहाय तड़पते बच्चे की व्यथा इनको झकझोर नहीं पाती।देश के हर गाँव,शहर के हर गली,मोहल्ले में दम तोड़ता बचपन नजर आता है लेकिन सावन के अंधों को हरियाली के अलावा कुछ और दिखाई कहाँ देता है!गुरूजी को अपने बच्चे से हटकर ओर बच्चों में अपनापन नजर नहीं आता।व्यापारियों को अपने व्यवसाय के अलावा छोटे छोटे हाथों पर दया कहाँ आती है!कानून बनाने वालों को वापिस मुड़कर देखने की फुरसत कहाँ है!कानून के रखवालों के अपने बच्चों की मुरादें भी इन् नन्हे हाथों की बलि से ही तो पूरी होती है।किसीको क्या पड़ा है इनके मरते बचपन के बारे में सोचने का।ज्यादा हंगामा मचा दिया तो रश्म अदायगी के नाम पर छापा मारकर कुछ बच्चों को बाल कल्याण समिति के हवाले कर दिया जाता है जहाँ कितना इनका कल्याण होता है!यह सबको पता होता है। इसे संस्कृति का व् सभ्यता का पतन बताकर तर्कशास्त्री बचने की कोशिश कर लेते है।सरकारें जाँच समितियां बनाकर अपनी पीठ थपथपा लेती है।कानून के रखवाले कानून के नाम पर वसूली की अपनी दर बढ़ा लेते है।सबको अपना अपना हिस्सा मिल जाता है।क्या लेना देना है इन बेसहारों से?भाग्य व् नसीब के भरोसे चलने वाले समाज की निष्ठुरता के बारे में तो क्या लिखूं!जमीर नाम की चीज तो बची ही नहीं इनके अंदर। बचा है तो अपना स्वार्थ। कैलाश सत्यार्थी ने ठीक ही कहा है कि मैं नहीं मानता कि दुनिया इतनी गरीब है कि इन बच्चों को दो वक्त की रोटी न दे सके,मैं नहीं मानता कि दुनिया इतनी मंदबुद्धि है कि इनको ज्ञान या शिक्षा न दे सके,मैं नहीं मानता कि सरकारें इतनी कमजोर है कि इनके खुशहाल बचपन का तंत्र न खड़ा कर सके,मैं नहीं मानता की जज व् अदालतें इतनी कमजोर है कि इन बच्चों को न्याय न दे सके।फिर कमी कहाँ है?कमी है हमारे आत्म बल की,कमी है हमारी नियत में,कमी है हमारी नीतियों में। अपने गिरेबान में झांकना होगा।अपने आप में सुधार करना होगा।बचपन की हत्या करते नन्हे हाथों से बने बैग मे अच्छे क्यों लगते है?नन्हे हाथों से धुले कप में चाय हमें स्वादिष्ट क्यों लगती है?भीख मांगते नन्हे हाथों में दो रूपए डालकर अपने आप को गौरान्वित महसूस क्यों करे?हर ऐसे मुद्दे पर सोचकर अपने आप को बदलना होगा। बचपन को बचपन की तरह सजने,संवरने का मौका देना होगा।कल सुप्रीम कोर्ट ने एक्शन प्लान बनाने का आदेश दिया है। प्लान क्या व् कैसे होगा उससे मुझे भी ज्यादा उम्मीद नहीं है लेकिन एक्शन का इंतजार जरूर करता रहूँगा।
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कश्तियाँ बचपन की है मझधार में.....

सोनू दरभंगा बिहार से अपने गाँव के ठेकेदार के साथ दिल्ली आया था । पांच भाई बहनों में सबसे बड़ा था लेकिन उम्र यही 14 वर्ष के करीब थी । बाप की मौत तो टीबी की बीमारी से हो गई । माँ के हाथ में कुछ काम नहीं था । दो भाई व दो बहनों का भार भी उसके कन्धों पर आ गया । स्कूल छोड़कर घर का मुखिया  बन गया । मुखिया  का बोझ उठाकर गाँव से दिल्ली की तंग गलियों में  आ गया । बालश्रम के लिए कुख्यात दिल्ली के नबी करीम इलाके में बैग बनाने वाले कारखाने में काम करने लग गया । उसको यहाँ आये डेढ़ साल के करीब हो गए । रोज सुबह  8 बजे से रात 10 बजे तक काम करता । प्रत्येक बैग में चेन-जिप लगाने पर 3 रूपये मिलते । रोज दो सौ से लेकर तीन सौ रुपये कमा लेता था । सपना एक ही था घर को पालना । कमाई के हर नोट पर माँ की लाचारी व भाई-बहनों की उदासी ख़ामोशी के साथ अंकित करके जेब में रख लेता । हर बैग को तैयार करके जब वह साइड में रखता तो थोड़ी देर तक उसी को घूरकर देखता रहता । फिर एकदम झिझकर अगले बैग को तैयार करने में लग जाता । शायद उसको अपना स्कूल बैग याद आ जाता होगा और फिर अपने कंधों पर आये मुखिया  के भार को याद करके अगले बैग को तैयार करने में लग जाता होगा क्योंकि हर बैग किसी न किसी सदस्य के सपनों की बुनियाद के लिए कीमत देता था |

काश कोई मेरा बचपन लौटा दे!

सदा गुदगुदाने वाली यादें। जब खुद दुनियाँ में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का समय आता है तो हर किसी  को बचपन बहुत याद आता है। काश कोई मेरा बचपन लौटा दे!लेकिन हर किसी का बचपन उतना आनंदमय भी तो नहीं होता। हर किसी का नसीब उतना अच्छा भी तो नहीं होता। चंदा मामा के सपने तो हर बच्चा ले लेता है लेकिन बुनियादी सुविधाएं हर किसी के नसीब में कहाँ होती है!गरीबी व् बचपन के रिश्ते को दुनियाँ वाले कहाँ समझते है!समझकर भी अनजान बन जाते है। गरीब बच्चे के बचपन का अपहरण घर की दहलीज से शुरू हो जाता है।फिर हर कदम पर बचपन लूटा जाता है। अच्छे कपडे नहीं तो कोई दोस्त नहीं बनता।अकेलापन झेलना पड़ता है। गुरूजी का प्रिय नहीं बन पाता। हर स्तर पर उसके टैलेंट को दबाने की कोशिश होती है। इस तरह दरकिनार करने की कोशिश होती है कि वह किसी दूसरे ग्रह से आया आदिम प्राणी हो। हमारे समाज का हिस्सा ही नहीं है। हमारे समाज में या यूँ कहूँ कि मानव सभ्यता में सदियों से यह काम जारी है। पहले कम था तो आज ज्यादा है। पेज 3 पर आने की कोशिश करने वालों में इतनी इंसानियत बची कहाँ है!असहाय तड़पते बच्चे की व्यथा इनको झकझोर नहीं पाती।देश के हर गाँव,शहर के हर गली,मोहल्ले में दम तोड़ता बचपन नजर आता है लेकिन सावन के अंधों को हरियाली के अलावा कुछ और दिखाई कहाँ देता है!गुरूजी को अपने बच्चे से हटकर ओर बच्चों में अपनापन नजर नहीं आता। व्यापारियों को अपने व्यवसाय के अलावा छोटे छोटे हाथों पर दया कहाँ आती है!कानून बनाने वालों को वापिस मुड़कर  देखने की फुरसत कहाँ है!कानून के रखवालों के अपने बच्चों की मुरादें भी इन् नन्हे हाथों की बलि से ही तो पूरी होती है। किसीको क्या पड़ा है इनके मरते बचपन के बारे में सोचने का।ज्यादा हंगामा मचा दिया तो रश्म अदायगी के नाम पर छापा मारकर कुछ बच्चों को बाल कल्याण समिति के हवाले कर दिया जाता है  जहाँ कितना इनका कल्याण होता है!यह सबको पता होता है। इसे संस्कृति का व् सभ्यता का पतन बताकर तर्कशास्त्री बचने की कोशिश कर लेते है।सरकारें जाँच समितियां बनाकर अपनी पीठ थपथपा लेती है। कानून के रखवाले कानून के नाम पर वसूली की अपनी दर बढ़ा लेते है।सबको अपना अपना हिस्सा मिल जाता है।क्या लेना देना है इन बेसहारों से?भाग्य व् नसीब के भरोसे चलने वाले समाज की निष्ठुरता के बारे में तो क्या लिखूं!जमीर नाम की चीज तो बची ही नहीं इनके अंदर।बचा है तो अपना स्वार्थ। कैलाश सत्यार्थी ने ठीक ही कहा है कि मैं नहीं मानता कि दुनिया इतनी गरीब है कि इन बच्चों को दो वक्त की रोटी न दे सके,मैं नहीं मानता कि दुनिया इतनी मंदबुद्धि है कि इनको ज्ञान या शिक्षा न दे सके,मैं नहीं मानता कि सरकारें इतनी कमजोर है कि इनके खुशहाल बचपन का तंत्र न खड़ा कर सके,मैं नहीं मानता की जज व् अदालतें इतनी कमजोर है कि इन बच्चों को न्याय न दे सके।फिर कमी कहाँ है?कमी है हमारे आत्म बल की,कमी है हमारी नियत में,कमी है हमारी नीतियों में। अपने गिरेबान में झांकना होगा।अपने आप में सुधार करना होगा। बचपन की हत्या करते नन्हे हाथों से बने बैग हमे अच्छे क्यों लगते है?नन्हे हाथों से धुले कप में चाय हमें स्वादिष्ट क्यों लगती है?भीख मांगते नन्हे हाथों में दो रूपए डालकर अपने आप को गौरान्वित महसूस क्यों करे?हर ऐसे मुद्दे पर सोचकर अपने आप को बदलना होगा। बचपन को बचपन की तरह सजने,संवरने का मौका देना होगा।कल सुप्रीम कोर्ट ने एक्शन प्लान बनाने का आदेश दिया है।प्लान क्या व् कैसे होगा उससे मुझे भी ज्यादा उम्मीद नहीं है लेकिन एक्शन का इंतजार जरूर करता रहूँगा।


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डरा-धमका कर तुम मुझे वफ़ा करने को कहते हो

डरा-धमका कर तुम मुझे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पाँव का कांटा निकलता है!
जिसे भी जुर्म-ए-गद्दारी में तुम कत्ल करते हो
उसकी ही जेब से क्यूँ मुल्क का झंडा निकलता है?

मुनव्वर राणा का यह शेर आजकल किसानों के लिए सटीक बैठता है। जिस कौम के लहू में ईमान बहता है, जो मिट्टी को भी माँ समझते है उसको तुम देशद्रोही व् आतंकवादी कहते हो! जिस देश की सीमाओं की रक्षा के लिए 90 %बलिदान जो कौमे देती है उनके ही परिवार वालों को तुम दरकिनार करते हो!बहुत भयावह हालात हो जायेंगे इस देश के!

नफरतें घोल दी अहले सियासत ने लेकिन

पानी आज तक उस कुए से मीठा निकलता है.......

आगे का पता नहीं!अति हर जगह बुरी होती है।सब्र बहुत है इन लोगों में लेकिन जब परीक्षा की घडी आई  या सब्र की सीमाएं टूटी तो न सियासत बचेगी ,न तख़्त-ओ-ताज बचेगा!मुझे पता है...

हुकूमत मुंह भराई की रस्म से खूब वाकिफ है

यह हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

हमारी किसान कौम के शाही कुत्ते टुकड़ों की तलाश में निकल चुके है।हमे बखूबी पता है कि कौनसा कुत्ता किसके दरवाजे पर दुम हिला रहा है फिर भी हम खामोशियों की चादर ओढ़कर सोये हुए है।जब पूरी की पूरी किसान कौम को राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्र हासिल करने की दुकान के आगे पंक्ति में खड़ा किया जा रहा है और बुझदिल लोग तमाशा देख रहे है!अजीब विडंबना है चीर निद्रा में सोने की!

कुछ दिन और बौझ उठा लो भाई

फिर ये गद्दार मय्यसर नहीं होंगे।
हर जगह मंच-महफिले सजेगी
मगर ये कौम के सौदागर नहीं होंगे।।
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बिलखता बचपन

बचपन इंसानी जिंदगी का खूबसूरत लम्हा होता है।जिसने बचपन को नहीं जिया,उसने जिंदगी को नहीं जिया। खिलखिलाते बच्चों की आवाज ही सुनकर हमारे अंदर आनंद की लहर उठ जाती है। नन्हे-मुन्नों की अठखेलियां देखकर हम रोमांचित हो उठते है।वो पानी पर कागज की नांव चलाना हो,वो मिट्टी के घर बनाना हो,वो लकड़ी-पत्थर की गाड़ियां बनाकर चलाना हो,वो हम सब छोटे बच्चों का एकत्रित होकर शादी रचानी हो या आपस में हाथ पकड़कर श्रृंखला बनाकर छुक-छुक रेल चलाना हो!हर पल,हर लम्हा रोमांचित कर जाता है।वाकई बचपन जिंदगी का स्वर्णकाल होता है।न भविष्य की चिंता न घाटे-नफे की बौखलाहट! जब संसद ने बाल सरंक्षण कानून 1986 में कुछ दिन पहले संशोधन किया तो मेरे सामने एक एक करके घटनाये हकीकत के परदे की तरह तैरने लगी।निराशा छाने लगी।न विपक्ष का विरोध् न सत्ता पक्ष की कोई गंभीरता।न बुद्धिजीवियों की कलम चली न समाजसेवियों का हंगामा हुआ। न मीडिया में कोई चर्चा न नागरिकों में कोई हलचल।वाकई बहुत डरावना मंजर प्रतीत हो रहा है।युवा देश के युवाओं का खून भी जम गया।दिल्ली के नबी करीम,चांदनी चौक,सदर बाजार,गांधीनगर सहित तमाम मासूमों के बूचड़खानों को दुगुनी गति से आगे बढ़ने का निर्देश दे दिया गया उत्तरप्रदेश,बिहार,झारखण्ड सहित तमाम राज्यों के छोटे-छोटे बच्चे इन  कारखानो की तंग गलियों में तिल तिलकर मर रहे है।सुबह 6 बजे से देर रात 10बजे तक ये नन्हे कोमल हाथ कहीं झूठे बर्तनों को धो रहे है तो कहीं सुई-धागे पकड़कर बटन-ज़िप लगा रहे है।कहीं लिपाई-पुताई की कुञ्जी हाथ में थामे नजर आते है तो कहीं कोमल कंधे बोझ तले दबकर सिकुड़ रहे है।न खाने की कोई माकूल व्यवस्था और न पीने को साफ़ पानी। हर बड़े शहर का यही डरावना सच है।कहीं माँ-बाप की मजदूरी में हाथ बंटाते है तो कहीं ईंट के भट्टों पर बंधुआ मजदूरी करते है।पूरी दुनियां में सवा सौ करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करने को मजबूर है।भारत में सरकारी आंकड़ो के हिसाब से एक करोड़ तीस लाख बच्चे जिनकी उम्र 5 साल से 18 साल है,मजदूरी कर रहे है जिनमे 43 लाख बच्चे 5-14 साल उम्र के है।गैर सरकारी आंकड़ों के हिसाब से लगभग 6करोड़ बच्चे बाल मजदूरी कर रहे है जिनमे से सवा चार करोड़ बच्चे 5-14 वर्ष की उम्र के है।यह वो उम्र है जो देश की नींव के पत्थर है जिनको तराशकर एक सभ्य व् ताकतवर देश खड़ा किया जा सकता है। इन बच्चों में से 52%बच्चे यौन शोषण के शिकार है।36%बच्चे बार बार यौन हिंसा के शिकार होते है। कितनी बड़ी विडम्बना है इस देश के लोगों की,कि जब तक बचपन बचाओ आंदोलन चलाने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला तब तक कोई नहीं जानता था।इससे यह जाहिर हो गया कि हम बचपन व् बाल मजदूरी को लेकर कितने संजीदा है?बाल संरक्षण अधिनियम 1986 में सरकार ने यह कहकर संशोधन किया कि उसको हम ठीक से लागू नहीं कर पा रहे थे इसलिए सुधार जरुरी है। अगर किसी कानून को ठीक से लागू नहीं कर पाओगे तो अपनी नाकामी को इस तरह जायज ठहरा दोगे?बलात्कार कानूनों को ठीक से लागू नहीं कर पाओगे तो क्या इन कानूनों की मूलभावना व् व्यवहारिकता के उद्देश्यों को छिन्न-भिन्न करने वाले संशोधन करके बलात्कार को जायज ठहरा दोगे? यह किसी एक सरकार या कार्यकाल की नाकामी नहीं है। उतरोतर सत्ता की बाल मुजदूरों की हालात में सुधार के प्रयास के प्रति उदासीनता है। अब 5-14 साल के बच्चे पारिवारिक कार्यों,कुटीर उद्योगों आदि में काम कर सकेंगे।आपको याद होना चाहिए कि भूमि बंटवारे के आंदोलन को परिवार की परिभाषा ने किस प्रकार गहरे खड्डे में डाला था!आपने परिवार के साथ साथ रिश्तेदारों का भी उल्लेख कर दिया।आज तक ठीक से आप परिवार को परिभाषित नहीं कर पाये तो अब रिश्तेदार को कौन व् कैसे परिभाषित करेंगे?14 से 18 साल की उम्र के बच्चों को खतरनाक कार्यों में न लगाने का प्रावधान था।आप खतरनाक कामों की सूची को 83 से सीधे 3 पर ले आये।इसका मतलब 80 वो काम जो आज तक बच्चों के लिए खतरनाक थे और अब एकदम सुविधाजनक हो गए? भ्रष्ट तंत्र ने जो लुटिया इस देश की डुबोई है उसको जायज ठहराने के लिए कानूनों को ही बदलकर ठीक करने  का प्रयास इस देश को ले डूबेगा।आज सयुंक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ आपसे पूछ रही है कि जिन बच्चों को गरीबी के कारण स्कूल नहीं भेज पा रहे थे उस नाकामी को छुपाने के लिए आपने एक मजदुर बनाकर क़ानूनी जामा कैसे पहना दिया? द हेग कन्वेंशन में किये आपके बाल मजदूरी के वादे को कैसे पूरा करोगे?देश के विकास की रफ़्तार को बढ़ाने के लिए,उद्योगों को बढ़ाने के लिए अपनी भावी पीढ़ी को इस तरह बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।नन्हे मुन्नों को कीड़े-मकोड़े की तरह इन भभकती भट्टियों में नहीं धकेला जाना चाहिए । असफलता को छिपाने के लिए मानव सभ्यता के कलंक को कानूनों के जरिये जायज ठहराने की कोशिश ही भविष्य में देश को हर जगह,प्रगति के हर मोड़ पर शर्मसार करती जायेगी। बाल मजदूरी सिर्फ प्रशासनिक असफलता नहीं है,यह सामाजिक-आर्थिक समस्या है।सामाजिक भेदभाव व् गरीबी इसके मुख्य कारण है।दलितों को सदियों से शिक्षा से वंचित रखा गया उनको हक़ से दरकिनार किया गया।आज थोड़ी चेतना आई है उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है।उनको ओर आगे ले जाने की जरूरत है। आज बाल मजदूरों में 90%से ज्यादा बच्चे दलितों-पिछड़ों और मुसलमानों के है।ये हमेशा शिक्षा स्थलों पर सामाजिक भेदभाव के शिकार होते है।स्कूलों में भेदभाव के कारण, अपनेपन की भावना न होने के कारण इनका उनसे मोहभंग हो जाता है और अपने गरीब माँ-बाप की माली हालात को देखकर उनके साथ या उनके लिए काम शुरू कर देते है।जिनको काम नहीं मिलता वो भीख मांगना शुरू कर देते है। हमे गरीबी मिटाने की तरफ हमारे कदम बढ़ाने थे।हमे सामाजिक भेदभाव मिटाने के लिए प्रयास करने थे।हमे सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना था।हमे पढ़ने वाले गरीब बच्चों के लिए 18 साल तक खर्चे का समुचित भार हमारे कन्धों पर लेना था।हमे धर्म के अंधविश्वासों की बेड़ियाँ तोड़कर गरीबों को वैज्ञानिक शिक्षा की तरफ लाना था।हमे तंत्र की रग-रग में समाये भ्रष्टाचार के संक्रमण को साफ़ करना था।हमे तो हमारी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करके बचपन को आनंदमय,जवानी को रोजगारपरक व् बुढ़ापे को सम्मानजनक बनाना था।आज हम किस दिशा में जा रहे है?ऑनलाइन की आड़ में गरीबों को सुविधाओं से महरूम करके गरीबी के आंकड़े को नीचे लाने के प्रयास करने लग गए!बुजुर्गों की पेंशन बंद कर रहे है! सरकारी अस्पतालों को श्मसान घाटों में तब्दील कर रहे है!भ्रस्टाचारियों के आगे अनुनय-विनय करने लगे गए कि आप कालेधन की घोषणा कर दो!बाल मजदूरी को जायज बनाने लग गए!शिक्षा संस्थानों को अकुशल श्रमिक बनाने की फैक्ट्री बनाने लग गए!गरीब,शोषित,दलित आज भी टकटकी लगाये दिल्ली के सिंहासन की तरफ उसी तरह देख रहा है जैसे अकबर के जमाने से देखता रहा है।कभी निराशा के भंवर में फंसकर अपने जीवन को जारी रखने के लिए अपनी कोख को ही बेच डालता है तो कभी सत्ता-परिवर्तन के साथ उनकी उम्मीदों को पर लग जाते है लेकिन न बदलता तो सिर्फ सत्ता का रवैया!असंवेदनशीलता की दीवार लुटियन जोन में इतनी बड़ी खड़ी कर दी गई है कि इनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँचने से पहले ही ख़ामोश हो जाती है। हमे याद रखना चाहिए कि अमीरों के बच्चों की तरह गरीब बच्चे भी समुचित परवरिश,माँ-बाप के प्यार व् शिक्षा के हक़दार है।कब तक हम मुंह मोड़कर इनका गला घोंटते रहेंगे?


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आज दिल्ली का परिणाम आया।

आज दिल्ली का परिणाम आया।या यूँ कहूँ की कुछ लोगों के लिए खुमारी करने का मौका लाया तो कुछ की खुमारी उतारने का पैगाम लाया।पिछले नौ महीने के विकास की कोख से नई उम्मीदों व् वादों की पूर्ति के लिए एक नए शख्स का जन्म हुआ है।मोदी लहर,मोदी लहर चिल्लाने वालों को शायद इस लहर में घुटन होने लगी। लोकसभा का चुनाव सपनो का सौदा करके जीता गया।उम्मीदों व् आकांक्षाओं की जीत थी।अच्छे दिनों के भरोसे की जीत थी। पिछले दिनों भूमि अधिग्रहण पर अध्यादेश से भरोसा टूटने लग गया।कालेधन की हवा तो उसी दिन निकल गयी जिस दिन लोकसभा में हारे हुए को देश का वित् मंत्री बना दिया गया।जिनकी खुद की विश्वसनीयता शक के दायरे में हो उन पर भरोसा कैसे हो?स्वास्थ्य बजट में 20%की कटौती कर दी गयी।शिक्षा के बजट में तक़रीबन 13%की कटौती कर दी।तमाम तरह की सब्सिडी पर पूंजीवादी मानसिकता के मंत्रियों की कैंची चल गई।झुमला पकड़ा दिया कि हम रोजगार देकर मुफ्तखोरी में खाने की आदत समाप्त करेंगे।

रोजगार एक को भी नहीं मिला लेकिन वसूली पहले ही शुरू हो गयी।भारतीय रेल के हालात में कोई बदलाव 
नहीं लेकिन ज्यादा किराया वसूली शुरू हो गयी।कहने का मतलब है सारी सामाजिक कल्याणकारी योजनाएं दरकिनार की जाने लगी है जैसे अब कोई गरीब ही नहीं बचा है। क्या करे जनाब!हर कदम पर भरोसा टूटता गया।जनता आपसे दूर होती गयी।जनता सोच रही थी कि चाहे हमारे खाते में 15 लाख न आएं लेकिन कम से कम काले धन के कुबेरों को तिहाड़ जेल तो भेज ही देंगे।बहाने दर बहाने किये गए और अंत में सिर्फ चुनावी झुमला बता दिया!वाह रे भरोसा पार्टी के नुमाइंदों कैसी कब्र खोदी हमारे भरोसे की!कैसे हत्या कर दी हमारे सपनो की!एकदम पानी फेर दिया हमारी उम्मीदों पर।फिर बार बार क्यों उम्मीद करो हमारे वोट की।हम कोई नाग नागिन का जोड़ा नहीं है जो हर बांसुरी की धुन पर फनकार भरेंगे ही।हम व्यवस्था के सताए इंसान है।हम बार बार ठगे गए वोटर है जिनको चाँद की चांदनी दिखाने का वादा हर बार किया गया लेकिन पूर्णिमा की रात कभी आने नहीं दी। एक बार फिर से सोचलो यह किसी चमत्कारी नेता के करिश्मे की जीत नहीं है,यह भाजपा पर जनता के गुस्से की जीत है।कुछ तो मजबूरियां रही होगी दिल्ली की जनता की,कोई यूँ ही बेवफाई नहीं 
करता।आप कितने ही झुमले पढ़ लेना,आप कितने ही तर्कों के तीर चला लेना लेकिन यह स्पष्ट तौर पर मोदीजी की हार है।यह उस मोदी ब्रांड की हार है जो बाते किसान व् गरीब की करते है लेकिन काम सिर्फ उद्योगपतियों के होते है।यह उस मोदी नीति की हार है जो बात दिल को छूने वाली करते है लेकिन काम दिल को जख्म देने वाले। ज्यादा हवा में उड़ना भी मुनासिब नहीं होता जनाब।आपको दिशा बतानी जरुरी थी।दिल्ली को मात्र एक राज्य की हार मत मान लेना।जो देश का मूड है वो ही दिल्ली का मूड है।आपने ही कहा था।दिल से कहा था या यह भी चुनावी झुमला ही था।आप कुछ भी कह लीजिये लेकिन दिल्ली में देश के हर हिस्से के लोग निवास करते है।दिल्ली की 2 करोड़ की आबादी में 80 लाख लोग यू पी व् बिहार के है जहाँ निकट भविष्य में आप चुनाव जीतने का सपना देख रहे है।हम मानते है वहां पर केजरीवाल जैसा नया व् भरोसे लाइक नेता नहीं है लेकिन जनता के गुस्से का ऊंट किस करवट बैठेगा यह अंदाजा लगाना मुश्किल है। इतनी बड़ी जीत के बाद केजरीवाल को भी अहसास हो गया होगा कि अगर जनता से किये वादों का तेजी से क्रियान्वयन नहीं हुआ तो जनता उसके साथ भी यही सलूक करेगी।वादे आपने भी कम नहीं किये है जनाब!1लाख cctv कैमरे लगाएंगे।

दिल्ली का एक साल का कुल बजट 36 हजार करोड़ रूपए है।1 लाख कैमरे लगाने व् देखरेख का खर्च 1लाख 
20 हजार करोड़ के करीब बैठेगा।मतलब तक़रीबन 3 साल के बजट का पैसा तो कैमरों पर ही खर्च हो जायेगा।बाकी मुफ़्त का पानी,आधी दर पर बिजली,पूरी दिल्ली में फ्री वाई फाई सुविधा कैसे दोगे?आपके वादों के पुरे होने का इंतजार हमे भी रहेगा।शायद आपने कुछ प्लान किया होगा।आपको पिछली बार बिजली की दर कम करने में ही पसीने छूट गए थे।शायद आपने सबक लिया होगा।आपने गरीब नारायण को सपने दिखाए है।कहते है गरीब व् असहाय की दुआ व् बददुआ कभी खाली नहीं जाती।आप हमेशा कहते रहे कि हमारे साथ भगवान् है।यह गरीब ही साक्षात् भगवान है जिनकी सेवा से अमूल्य पूण्य कमाया जा सकता है।इस गरीब नारायण ने आपको खूब आशीर्वाद दिया है।अब इनकी सेवा करके मोक्ष प्राप्त करने का मौका है आपके पास।कहते है ज्यादा पढ़ने से कोई समझदार नहीं हो जाता,समझदार वो होता है जो हाथ में आये अवसर को भुनाने में कामयाब होता है।

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