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आएगा मोदी ही!

यह आत्म विश्वास नहीं बल्कि अंधभक्तों का वहशी घमंड है जो इनके सिर चढ़कर बोल रहा है!2014 में अंधभक्त बनाने वाली महामारी फैलाई गई जिसकी जद में कुल मतदान करने वाली 31%आबादी आ गई और मोदी आ गए!सवाल यह नहीं था उस समय कि कौन आयेगा!सवाल यह था कि आने वाला करेगा क्या?आने वाले के दावे थे व इरादे जताए थे वो क्या थे?
1.किसानों को कर्ज मुक्त करूँगा मगर आंदोलन करने वाले वाले किसानों पर लाठीचार्ज,आंसू गैस के गोले चलाये व दिल्ली में घुसने तक नहीं दिया।
2.स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करूँगा मगर सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं।
3.किसानों की आय दोगुनी करूँगा मगर पांच साल से कम ही हुई है बढ़ी नहीं और न बढ़ाने का ठोस रोड मैप लागू किया।
4.आतंकवाद-नक्सलवाद का खात्मा करूँगा मगर आज भी आतंकी हमले जारी है।उरी, पठानकोट,पुलवामा जैसे बड़े हमले भी हुए है।44फौजियों के बदले बता रहे है कि हमने उनके सेंकडो आतंकी मार गिराए!वादा तो आतंकवाद खत्म करने का था मगर रोज हमारे जवानों की लाशें क्या आ रही है?
5.दो करोड़ रोजगार दूंगा मगर आंकड़े बता रहे है कि 1लाख 35हजार रोजगार दिये है और नोटबंदी व जीएसटी की जद में आकर 13लाख लोग बेरोजगार हो गए!अगर हर साल 2करोड़ मतलब पांच साल में 10करोड़ रोजगार देते तो लगभग इतनी ही बेरोजगार है सबको रोजगार मिल जाता लेकिन बेरोजगारी 45साल के रिकॉर्ड पर पहुंच गई!
6.सबका साथ व सबका विकास करेंगे मगर धार्मिक नफरत से जो जहर घोला गया वो जातिय नफरत तक पहुंचा दिया गया है!
7.हम सत्ता में आएंगे तो सेना को खुली छूट देंगे और अब दावा भी कर रहे है मगर जवानों के शहीद होने की दर पिछले पांच साल में बढ़ी है।यह कोई नहीं पूछता कि क्या खुली छूट का मतलब ज्यादा जवानों की शहादत से था?
8.भ्रष्टाचार का खात्मा करेंगे मगर तमाम आंकड़े बता रहे है कि भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ बल्कि इसकी रेट बढ़ी है व छोटा भ्रष्टाचार बड़े भ्रष्टाचार में तब्दील हुआ है।देश का माल लूटकर 53के करीब लुटेरे देश छोड़कर पिछले पांच सालों में विदेश भाग गए!
9.सामाजिक न्याय करेंगे मगर upsc से चाहे ओबीसी के लड़कों को चयन के बाद बाहर निकलना हो या 13पॉइंट रोस्टर लागू करके विश्वविद्यालयों में ओबीसी/एससी/एसटी को आने से रोकना हो या रोहिणी आयोग द्वारा ओबीसी के खिलाफ षड्यंत्र रचना हो,चाहे संविधान के खिलाफ जाकर 10%आर्थिक आधार पर सवर्णों को आरक्षण देना हो,बिना किसी परीक्षा के स्वर्ण सचिव बनाने हो,हर कदम पर सामाजिक न्याय का गला घोंटने का काम किया गया!
10.समान नागरिक संहिता,राममंदिर,धारा 370 की मैं बात नहीं करूंगा क्योंकि ये बचकानी बातें थी और इन्होंने खुद स्वीकार करके किनारे कर दिया है!यह देश यूनियन ऑफ स्टेटस है,यह देश यूनियन ऑफ रिलिजन है,यह देश यूनियन ऑफ ट्राइब्स है इसलिए ऐसी बातों का कोई महत्व नहीं है!
मोदी 2014 में भी आया था और आगे भी हो सकता है आ जायेगा मगर तुम्हे दिया क्या है उस पर कभी विचार किया?मोदी आने से इन पांच सालों में तुमने क्या हासिल क्या और आगे क्या हासिल कर लोगे!यही न कि बेरोजगार मोदी-मोदी करके बर्बाद होते रहे!यही न कि किसान फांसी पर लटकता रहे मगर दिल्ली में आकर अपनी आवाज न उठा सके!यही न कि जवानों की लाशों का आवागमन बढ़ता रहे!यही न कि छोटे व्यापारियों का माल बड़े उद्योगपत्तियों के हवाले करके बर्बाद कर दिया जाए!यही न कि ओबीसी/एससी/एसटी के लोगों को सत्ता व सिस्टम से बाहर कर दिया जाएं!
सोचिये और गौर करिये इस फर्जी राष्ट्रवाद व फर्जी हिंदुत्व के नशे में झूमने से पहले कि आयेगा तो मोदी ही कहकर अपने घमंड से खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे हो?
मुझे पता है मेरे अकेले के लिखने से कोई क्रांति नहीं आने वाली है मगर मैं इस बात से खुद को संतुष्ट पाता हूँ कि जब करोड़ो लोग झांसे में आकर अपनी बर्बादी की गाथा लिख रहे है तब मैं अपने मुद्दों पर डटकर खड़ा हूँ।मुझे पता है मेरे लिखने मात्र से मोदी का रास्ता नहीं रुकने वाला लेकिन इस बात से खुश हूँ कि जब झूठ का बवंडर चल रहा है तब भी मैं लोगों को बुनियादी मुद्दे बेबाक व बेख़ौफ़ अंदाज में याद दिला रहा हूँ।अगर कोई मुर्दा बस्तियों में जिंदा हो तो जरूर उठिए और पूछिये "तू इधर-उधर की बात न कर,मुझे यह बता काफिला लुटा क्यों?"

देश मजबूत या बूथ मजबूत!

श्रीलंका में आतंकी हमला हुआ और अब तक 70से ज्यादा संदिग्ध हिरासत में लिए गए है!एक पूरा अरबपति परिवार इस हमले में शामिल पाया गया है।अक्सर तमाम आतंकी हमलों में जो भी भागीदार बनता है वो खुद को अपने परिवार से खुद को अलग कर लेता है मगर यह पहला मामला है जिसमे पूरा परिवार शामिल था।
खैर आतंकी हमलों का बदलता ट्रेंड हमारा आज का मुद्दा नहीं है।पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमला हुआ,44जवान मारे गए(शहीद नहीं कह सकते क्योंकि सरकार नहीं मानती),सुरक्षा में चूक खुद राज्यपाल ने स्वीकार की थी मगर आज तक न हमले के आयोजन कर्ताओं के नेटवर्क का खुलासा हुआ,न कोई दोषी गिरफ्तार हुआ और न ही सुरक्षा में लापरवाही बरतने वालों पर कोई कार्यवाही हुई!
श्रीलंका में न अंतर्राष्ट्रीय प्रधानमंत्री है और न 56इंची सरकार है।श्रीलंका की जांच एजेंसियां हमारे से बेहतर किसी भी हालत में नहीं है!संसाधनों के मामले में भी श्रीलंका हमारे मुकाबले में कहीं नहीं ठहरता है मगर कार्यवाही होते देख श्रीलंका की जनता का सिस्टम पर भरोसा कायम है।
जब ऐसे हमलों के आरोपी गिरफ्तार नहीं होंगे,लापरवाही बरतने वालों पर कार्यवाही नहीं होगी तो जनता सरकार पर भरोसा करने के बजाय सरकार की भूमिका ही संदिग्ध मानने लगती है!आज बहुत से लोग दबी जुबान से चर्चा कर रहे है कि पुलवामा हमला चुनावों के मद्देनजर हुआ है!ऐसा तो था नहीं कि डेढ़-दो क्विंटल आरडीएक्स एक गाड़ी में भरकर मसूद अजहर का रसोइया पाकिस्तान से सीधा आया और बस को उड़ा दिया व खुद भी उड़ गया इसलिए पाकिस्तान को गालियां देकर इतिश्री कर ली जाए या बालाकोट में बम फेंककर देश की जनता को गुमराह कर दिया जाए!
आतंकी ठिकानों पर बम फ़ेंकना साहस भरा कार्य है उसके लिए सेना धन्यवाद की पात्र है मगर भारत सरकार की भूमिका इस हमले की जांच की थी और दोषियों पर कार्यवाही की उसका क्या हुआ?
नेटवर्क का खुलासा न होना,हवाई जहाज के बजाय काफिले को सड़क मार्ग से भेजना,सिविलियन गाड़ियों की आवाजाही को न रोकना(अक्सर सुरक्षा बलों का काफिला गुजरता है तो सड़क मार्ग खाली करवाया जाता रहा है),लापरवाही बरतने वालों पर कार्यवाही न होना,सरकार के मुख्या व उनके सहयोगी मंत्रियों द्वारा राजनैतिक सभाओं में पुलवामा के नाम पर वोट मांगना पूरे सिस्टम को ही शक के घेरे में खड़ा करता है!
इस तरह के बुनियादी सवाल पूछने वालों को देशद्रोही,गद्दार, पाकिस्तानपरस्त घोषित करने का अभियान चलाना बहुत कुछ कहता है!

कृषि प्रधान या कुर्सी प्रधान!

लोकसभा व राज्यसभा की वेबसाइट पर सांसदों के बॉयोडाटा देखने पर पता चलता है कि 543सांसदों में से 5सांसद किसान है 39सांसद एग्रीकल्चर साइंस पढ़े हुए शिक्षक,लेक्चरर, प्रोफेसर है।543सांसदों में से सिर्फ पांच सांसदों ने अपना पेशा शुद्ध रूप से किसानी बताया है।80%आबादी जो खेती पर निर्भर है उसका प्रतिनिधित्व सबसे बड़ी पंचायत में संकटग्रस्त श्रेणी से भी नीचे है अर्थात रेड बुक में इस प्रजाति का नाम दर्ज होने वाला है।80%आबादी का 1%भी प्रतिनिधित्व नहीं है!इससे बड़ी सिस्टम की विडंबना क्या हो सकती है?
खेती के मामलों की संसदीय समिति के 20सदस्यों में 10सांसद बिल्डर है।कर्नाटक के सांसद नलिन कुमार पेशे से बिल्डर है,रीवा से सांसद जनार्दन मिश्रा पेशे से वकील है,तमिलनाडु के सांसद सी महेन्द्रन पेशे से बिजनेसमैन है,बिहार से सांसद जय प्रकाश पेशे से वकील है।इस समिति में एकमात्र बिजनेसमैन व किसान लिखने वाले राजस्थान के जालोर से सांसद देवजी पटेल है।किसानों का भला करने वाली 20सदस्यों की समिति में आधा-अधूरा किसान है!
लोकसभा की कृषि स्टैंडिंग कमेटी में 20सदस्यों का बॉयोडाटा देखा तो यह समिति भी सांसदों को स्पेशल भत्ते वितरण के लिए एडजस्ट करने वाली ही नजर आई।बिजनेसमैन/बिल्डर/समाजसेवी आदि लोगों के बीच चार ऐसे सांसद है जिन्होंने अपनी खेती से आय दिखाई है!फार्महाउस आजकल खेती से आय दिखाकर काले धन को सफेद करने का धंधा भी बन चुके है इसलिए इनको किसानी पेशा मानना भी उचित नहीं है!
किसानों का प्रतिनिधित्व नगण्य है और किसानों के भले के लिए नीति-निर्माण की कुर्सियों पर बिल्डर/व्यापारी/समाजसेवी बैठे है तो खेतों में बिल्डर व सड़कों पर किसान नजर नहीं आएंगे तो फिर दूसरा नजारा क्या हो सकता है?जिन 39सांसदों ने खुद को कृषि की शिक्षा से संबंधित बताया है उनमें से 23सांसद एक ऐसे वर्ग विशेष से है जिनकी पुश्तों ने कभी खेती नहीं की है!इनका बॉयोडाटा लेकर कृषि अनुसंधान में इनके कार्यों की जानकारी जुटाने की कोशिश की तो एक भी होनहार कृषि विशेषज्ञ ऐसा नहीं निकला जिन्होंने कोई बीज उत्पाद,कृषि रसायन,नई प्रजाति,नई खेती की तकनीक ईजाद की हो या स्कूल/कॉलेज/विश्विद्यालय में रहते हुए कोई नवाचार किये हो या किसानों के बीच जाकर कोई जागरूकता अभियान ही चलाया हो!
पिछले एक दशक में कृषि से संबंधित जो बिल पास हुए है उनमें किसी पर 2घंटे से ज्यादा कोई बहस नहीं हुई है और चर्चा में भाग लेने वाले सभी सांसदों में से भाग लेने वाले एक भी सांसद ने यह नहीं पूछा कि अबतक जो कृषि उपक्रम/प्राधिकरण है उनका आउटपुट क्या है?खेती में व्यापक बदलाव तो छोड़िए जमीनी स्तर पर असर डालने वाला कोई एक भी बिल न संसद में आया न पास करने की कोई नौबत आई!
2008में कृषि/खाद्य प्रसंस्करण निर्यात विकास प्राधिकरण बिल पास हुआ।
2012में रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय बिल पास हुआ।
2013में कृषि जैव-विविधता सुरक्षा बिल आया।बताया जाता है कि कुछ बिल्डरों की आपत्ति के बाद पास कराने में किसी ने रुचि नहीं ली और यह बिल लेप्स हो गया।
2015में राजेंद्र केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय बिल पास हुआ।
2016में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय संशोधन बिल पास हुआ।
2017में राष्ट्रीय कृषि/ग्रामीण विकास बैंक संशोधन बिल पास हुआ।
पिछले एक दशक में ये तमाम बिल पास हुए है व बजट व पदों की बंदरबाट का इंतजाम जरूर हुआ मगर खेत मे किसानों का भला किस तरह हो उस पर कोई बिल नहीं आया!किसान आंदोलन व किसानों पर गोलियां चली तब एक दिन जरूर लोकसभा में पूरे दिन इन बिल्डरों/व्यापारियों व समाजसेवियों ने घड़ियाली आंसू जरूर बहाए थे!
भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर 15वीं लोकसभा के बिल्डर/व्यापारी भी जरूर उतावले नजर आ रहे थे और 16वीं लोकसभा के भी बिल्डर/व्यापारी उतावले नजर आए मगर जमीनी विरोध का आकलन करने के बाद समाजसेवियों ने आगाह कर दिया इसलिए यह बिल अटक गया।यह हाल सिर्फ केंद्रीय पंचायत का ही नहीं है,कमोबेश हालात राज्य विधानसभाओं के भी यही है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि 200से ज्यादा सांसद जो अपने आप को किसान नेता/किसान मसीहा कह रहे है उनको क्या समझा जाएं?मान लिया इन्होंने किसान कौमों में जन्म लिया है व बाद में बिल्डर/व्यापारी बन गए मगर जब 80%आबादी के हकों की बात आती है,हितों की बात आती है वहाँ ये किसान नेता के बजाय बिल्डर/व्यापारी बनकर ही कार्य करते क्यों नजर आते है?क्या लोकी के भाव,प्याज के भाव,टमाटर के भाव के सवाल पूछकर किसान नेता होने की पदवी बरकरार रखी जा सकती है?
खेतों से,किसान आंदोलनों से निकलने वाले लोगों की राजनीति की कब्र ये किसान कौम में पैदा हुए बिल्डर/व्यापारी ही खोदते है।किसानों का जरूरी प्रतिनिधित्व जब तक नीति-निर्धारण वाले पदों पर नहीं होगा तब तक ये किसानों को भिखारी समझते हुए कभी कर्जमाफी तो कभी खाते में 6हजार रुपये डालकर बर्बादी के जंजाल में फंसाएं रखेंगे!किसानों को 60साल की उम्र के बाद पेंशन देने का दावा ये किसानों के दलाल जरूर करते है मगर ये लोग इस हकीकत से नजर चुरा लेते है कि किसानों की जीवन प्रत्याशा ही 60साल के आसपास है तो पेंशन लेगा कौन?
देश का किसान संकट में है,खेती संकट में है,खेती से सर्विस सेक्टर की तरफ जिस अंदाज में जीडीपी शिफ्टिंग हुई है उसके अनुरूप रोजगार सृजन हुए नहीं है और किसानों के बच्चे बेरोजगार घूम रहे है।इन मुद्दों पर कहीं कोई बहस नहीं।फर्जी किसान नेताओं की खेप किसानों के रास्ते का रोड़ा बनकर खड़ी है जो किसानों को जाति/धर्म मे उलझा रही है और किसानों के बच्चों को जातीय/धार्मिक सेनाओं में भर्ती करके बर्बाद कर रहे है!व्यापारी का पेशा मुनाफा कमाने का होता है,बिल्डर का पेशा जमीन छिनने का होता है,यह बात जिस दिन किसान व किसानों के बच्चे समझ लेंगे उसी दिन बदलाव की आहट आने लग जायेगी।
कहाँ छुपा के रख दूँ मैं अपने हिस्से की सराफ़त,
जिधर भी देखता हूँ उधर बेईमान खड़े है!
क्या ख़ूब तरक़्क़ी कर रहा है अब देश देखिये,
खेतों में बिल्डर ओर सड़कों पर किसान खड़े है!!



गुलामी की व्यथा कथा!

राजनैतिक पार्टियां सत्ता के लिए किस तरह तड़प रही है उसका अंदाजा भारत की जनता को शायद नहीं है!उस समय भी नहीं था जब सिकंदर भारत आक्रमण करने आया था!असल मे भारत देश प्राचीन काल मे छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था और एकदूसरे से आपस मे लड़ते रहते थे।राज्य पर कब्जे के लिए ईमान धर्म का कोई बंधन नहीं था।सत्ता पर काबिज होने/रहने या विरोधी को सबक सिखाने के लिए दुश्मनों की मदद करने में कभी परहेज नहीं किया गया था।
चंद एशो-आराम या चंद टुकड़ों के लालच में देश बेचना श्रेष्ठी वर्ग के खून में सदा रहा है।आज देश मे विदेशी निवेश,विदेशी कंपनियां आ रही है और देशी उपक्रम ध्वस्त हो रहे है तो इतिहास के झरोखों से हमे देखना चाहिए कि सत्ता के लिए हमारे प्राचीन राजाओं,मंत्रियों व पंडितों ने कैसे देश बेचा था!
राजा पौरस पर आक्रमण के लिए राजा अम्भी ने सिकंदर को न्यौता भेजा था क्योंकि अम्भी की नजर पौरस के राज्य को हड़पने की थी।
सोमनाथ पर आक्रमण के लिए पंडित तिलक ने गजनवी का सहयोग क्योंकि वो मंदिर की संपदा पर कब्जा करना चाहता था!
राजा दाहिर पर आक्रमण के लिए मोहम्मद बिन कासिम को न्यौता ब्राह्मण मंत्री ज्ञानबुद्ध ने भेजा था व युद्ध के समय दाहिर की सेना का मनोबल तोड़ने के लिए पुजारी मनसुख व हरनन्दराय ने दीपल मंदिर का ध्वज झुका दिया था।
पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण के लिए मुहम्मद गौरी को न्यौता जयचंद ने अपने पुरोहितों के माध्यम से भेजा था और चौहान जब हार रहा था तब जयचंद खुशी का तमाशबीन था।
बाबर को आक्रमण के लिए पंडित रेमीदास ने बुलाया था।राणा प्रताप से लड़ने अकबर की तरफ से मानसिंह आया और बुलावा देने वाला राणा प्रताप का भाई था!
सिराजुदौला के खिलाफ ईस्ट इंडिया को बुलावा भेजने वाला मीर जाफर था।थॉमस रो को सूरत में फैक्ट्री लगाने की अनुमति देने वाला जहांगीर था।
आपसी झगड़े में व सत्ता के लालच के लिए दुश्मनों से सहयोग लेने में कभी कोई गुरेज नहीं करता था।उस समय राष्ट्र नाम की कोई परिकल्पना/भावना अस्तित्व में नहीं थी।अंग्रेजों ने देश का एकीकरण करके राष्ट्र का स्वरूप दिया मगर भारतीय श्रेष्ठी वर्ग की मानसिकता चंद टुकड़ों के लिए ईमान बेचने से आगे नहीं बढ़ पाई।
अंग्रेजों के समय भी राजे-रजवाड़े आपस मे सहयोग करके अंग्रेजों का विरोध करने के बजाय अधीनता की संधियां कर रहे थे और पंडे-पुजारी अंग्रेजों की नौकरियां लेने में व्यस्त हो गए थे।
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनके राज्य पर अंग्रेजों का कब्जा हो रहा है,सब चंद टुकड़ों व सत्ता में हिस्सेदारी के लिए बिक रहे थे!
आजादी के आंदोलन में सिर्फ किसानों-मजदूरों ने कुर्बानियां दी थी और दूसरी तरफ अंग्रेजो के साथ भागीदार बना तबका सत्ता पर कब्जे के लिए आपस मे लड़ रहा था।भला हो द्वितीय विश्वयुद्ध का कि ब्रितानिया हुकूमत जर्जर हो गई और अमेरिका के दबाव में सत्ता हस्तानांतरण करना पड़ा!
आजादी के बाद भी एक राष्ट्र होने की भावना हमारे राजनेताओं में पैदा न हो पाई।सत्ता में बैठने के लिए व बैठकर लूट-खसोट तक ही राजनीति सिमटकर रह गई।चंद कंपनियों के नाम पर देशी सामंत तैयार कर दिए व कुछ निवेश के नाम विदेशी लुटेरों को गर्व के साथ न्यौता दे रहे है!
चाहे गजनवी आये,चाहे बाबर आये,चाहे थॉमस रो ईस्ट इंडिया कंपनी आये,चाहे अमेज़ॉन-वालमार्ट आएं न्यौता देने वाले गद्दार तो इसी देश के है!
यह पूरी कहानी लिखने का मतलब यह नहीं था कि मैं आपको इतिहास पढ़ाऊँ बल्कि बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ।मार्च 2018में मोदी सरकार ने FCRA अर्थात फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट 1976 में बदलाव करके राजनैतिक पार्टियों के लिए विदेशी चंदे का रास्ता खोल दिया।
जनता के बुनियादी मुद्दों वाले बिल लोकसभा में पास होकर राज्यसभा में अटक जाते है मगर यह बिल 20मिनट में पास हो गया और किसी भी राजनैतिक पार्टी ने विरोध नहीं किया!जब बिल में बदलाव हो गया तो मोदी सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आई।
अब इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदकर अमेज़ॉन,वालमार्ट, अलीबाबा आदि कंपनियां भारत की राजनैतिक पार्टियों को चंदा देगी और उस पैसे से सत्ता पर कब्जा करवाने में मदद करेगी।
इस चंदे से बड़े-बड़े मंचो से,बड़ी-बड़ी रैलियों से नेता कसमें खाएंगे कि "मैं देश नहीं बिकने दूंगा!"और कुर्सी मिलते ही देश इन कंपनियों को बेचना शुरू कर देंगे।देश इसी तरह से बिकता रहा है व इसी तरह से बिक रहा है!बाकी देश बिकने की कोई अंतरराष्ट्रीय मंडी थोड़े ही लगती है!
हमारे हुक्मरान गुलाम थे,गुलाम है और गुलाम ही रहेंगे और सत्ता के बदलते चेहरों को देखकर जनता समझ लेती है कि हमने कोई बड़ी क्रांति कर दी है या व्यवस्था परिवर्तन की नींव रख दी है!हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है!


शिक्षा,समृद्धि व धार्मिक आधार पर वर्गीकरण

भारतीय समाज के वर्तमान स्वरूप को देखा जाए तो त्रिस्तरीय नागरिक पाए जाते है।पहला वो,जो नितांत अनपढ़ है।दूसरा वो जो शिक्षित है मगर बेवकूफ है।तीसरा वो जो शिक्षित है और समझदार भी है।यह शिक्षा के आधार पर नागरिकों का त्रिस्तरीय ढांचा है।
संसाधनों के वितरण को लेकर भी उच्च वर्ग,मध्यम वर्ग व निम्न वर्ग,त्रिस्तरीय ढांचा है।धर्म को लेकर भी कट्टर धार्मिक,सेक्युलर व नास्तिक का त्रिस्तरीय स्वरूप नजर आता है।
भारतीय समाज विचारों व चेतना के संघर्ष से जूझ रहा है।इसमें उपरोक्त तीनो आधार के वर्गीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।वर्तमान समस्याओं के फैलाव,संसाधनों के वितरण,विकास का स्वरूप,जागरूकता व आगे बढ़ने के रास्ते को अगर एक समाजशास्त्री के नजरिये से समझना चाहे तो इन त्रिस्तरीय तीनों वर्गों का क्रॉस संकरण करके विश्लेषण करना चाहिए।
हम न्यून से अधिकता के क्रम में तीनों आधार से एक-एक वर्ग को लेकर जांचते है कि समाज व देश किस तरफ जा रहा है!
समूह A
1.नितांत अनपढ़
2.निम्न वर्ग
3.सेक्युलर
आपको यह सोचकर हैरानी होगी कि सेक्युलर को मैंने न्यून वर्ग में शामिल किया है मगर मेरे सोचने का नजरिया अलग है।एक निम्न वर्ग(गरीब) के अनपढ व सेक्युलर इंसान की वर्तमान भारत मे क्या भूमिका है?अनपढ़ है इसलिए नई चेतना के संसाधनों से पूर्णतया वंचित है।सेक्युलर है इसलिए जो भी सुनेगा उसको या तो पूर्णतया सच मान लेगा या पूर्णतया नकार देगा।उसके पास नई चेतना के आगमन का माध्यम क्या है उस पर निर्भर करेगा कि वो वास्तव में उसको जागरूक करना चाहता है या झूठ द्वारा उसको उपयोग में लेने का प्रपंच कर रहा है।इस तरह के लोगों के पास चेतना के नाम पर अपना कुछ नहीं है मगर उसके पास ग्रहण करने या नकारने के विकल्प जरूर मौजूद है।ग्रहण करना चाहता है तो भी उसके पास दो विकल्प निश्चित है दाता सच्चा है या झूठा!आप इसे रिस्क के रूप में प्रतिशत में बदलकर देखे तो 50%नकारना 50%स्वीकारना है।स्वीकारने को दुबारा विभक्त करना पड़ेगा,अगर दाता सच्चा है तो 25%और दाता झूठा है तो 25%।ऐसे लोगों के लिए एक चौथाई रास्ता बाकी लोगों की तुलना में आगे बढ़ने के लिए उपलब्ध होता है।उसको स्वीकारना भी है और उसको दाता भी सच्चा मिलना चाहिए तब जाकर।
भारत की एक चौथाई आबादी इसी वर्ग में आती है।जिसकी आधी अर्थात 50% जड़ता की शिकार होकर उपलब्ध अवसरों को नकार देती है और 25%अवसर पाने में सफल हो जाती है और 25%अवसर के झांसे में आकर खत्म हो जाती है।नकारने में सबसे ज्यादा किसान वर्ग आता है,स्वीकारने में सामाजिक रूप से निम्न समझी जाने वाली जातियों के लोग आते है।नकारने वाले लोगों की बर्बादी धीरे-धीरे आती है इसलिए उनके अंदर सहनशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है।स्वीकारने वालों में से 25%लोग ऊपरी वर्ग में छलांग मारने में कामयाब हो जाते है और 25%लोग बर्बाद हो जाते है।जो ऊपरी वर्ग में छलांग मारने वाले लोग है ये धार्मिक होने की प्रक्रिया में होते है इसलिए ये लोग ऊपरी वर्ग अर्थात बीच के वर्ग में भी जाकर दोयम दर्जा बना पाते है!आजादी के समय वाली खेती अब तक करने वाले,पैदल धार्मिक यात्राओं में चलने(पीर बाबा,ख्वाजा साहब की दरगाह व वैष्णो देवी जाने वाले एक ही वर्ग के लोग है) वाले,कुपोषित,इलाज के अभाव में दम तोड़ने वाले लोग इसी वर्ग के होते है।धार्मिक जुलूसों,राजनैतिक सभाओं की भीड़ का हिस्सा ये ही लोग बनते है।
समूह B
1.शिक्षित मगर बेवकूफ
2.मध्यम वर्ग
3.धार्मिक
यह तीनों आधार का बीच का वर्ग है।इनकी शिक्षा का स्तर सिर्फ साक्षर से लेकर पीएच डी तक का हो सकता है।इन्होंने कुछ रिस्क स्वीकार किये और गरीबी का दुष्चक्र तोड़कर ऊपरी छलांग लगाई है और अपने धर्म का पालन करते है मगर दूसरे धर्मों का भी सम्मान करते है।इसमें भारत की आधी आबादी आती है।वर्तमान में ऐसे लोगों की पहचान बड़ी आसान है।सर्जन होगा मगर ऑपरेशन थिएटर में हनुमान चालीसा बजाते हुए अगरबत्ती करेगा फिर ऑपरेशन शुरू करेगा।वैज्ञानिक होगा मगर अगरबत्ती करके सैटेलाइट लांच का बटन दबाएगा।टीचर होगा तो सरस्वती की वंदना करके उसको ज्ञान की देवी बताते हुए बच्चों को विज्ञान की किताब पढ़ायेगा!व्यापारी है तो ग्राहक बाहर इंतजार करेगा मगर पूरी दुकान/कार्यालय के डिब्बो/कोनो में अगरबत्ती लिए घूमेगा।कहीं नौकरी करता है तो सुबह पूजा/इबादत करते हुए पूरा दिन अच्छा गुजरने की मनौती मांगकर घर से निकलेगा और रास्ते मे पड़ने वाले मंदिरों/मजारों से दुआ मांगता हुआ निकलेगा।धर्म के नाम पर दंगे-फसादी लोग ये ही होंगे और व्यक्तिवादी राजनीति के जयकारे लगाने वाले भी ये ही होंगे!
यह अपने निचले वर्ग को हेय दृष्टि से देखेगा व ऊपरी वर्ग को निहारता रहेगा।थिएटर में पिक्चर देखते हुए पॉपकॉर्न खरीदेगा और पिक्चर के बजाय घर आकर पॉपकॉर्न की महंगाई पर चर्चा करेगा।कामचोरी का हर हथकंडा ढूंढता नजर आयेगा।इस वर्ग का 90%हिस्सा खुदगर्ज होता है।भारतीय संस्कृति व विरासत का ढोंग करता हरदम नजर आयेगा मगर दुनियाँ के सारे एशो-आराम हर बंधन तोड़कर तलाशता घूमेगा।इसी वर्ग का 50%हिस्सा प्रत्यक्ष रूप से नीचे से ऊपर खींचता है व 50% प्रत्यक्ष रूप से ऊपर से नीचे की तरफ खींचता है।जब अपने से निचले वर्ग से जुड़ता है तो वो निचले वर्ग की चेतना को 25%सच्चाई उपलब्ध करवाता है व 25%लोगों को बर्बाद करने में कामयाब हो जाता है।जब अपने से ऊपर वाले वर्ग से जुड़ता है तो नई चेतना/विचार प्राप्त करता है मगर खुदगर्जी इतनी होती है कि प्राप्त चेतना को खुद तक सीमित कर लेता है।इक्के-दुक्के लोग होते है जो प्राप्त चेतना को अपने से निचले वर्ग में बांटते है।ये लोग चाहे तो निचले वर्ग को साथ लेकर क्रांति ला सकते है और चाहे तो आंदोलन का स्वरुप दे सकते है।ये अपनी धार्मिकता का चेतना के साथ गठजोड़ करके निचले वर्ग में बड़ी सेंध लगा सकते है।निर्भर इनके ऊपर करता है कि ये बाबा बनकर निचले वर्ग को लूटना चाहते है या मसीहा बनकर क्रांति करना चाहते है।एक बात स्पष्ट है कि क्रांति कभी अहिंसक नहीं हो सकती!हाँ, आंदोलन अहिंसक हो सकते है।क्रांति व्यवस्था परिवर्तन का हथियार है और आंदोलन हिस्सेदारी मांगने का,ताकतवर के सामने शांतिपूर्वक कटोरा लेकर भीख मांगने का जरिया है।
समूह C
1.शिक्षित व समझदार
2.उच्च वर्ग
3.नास्तिक
इस वर्ग के लोग अपने आप से स्पष्ट होते है।अच्छे पढ़े लिखे होते है,समझदार होते है,संसाधन प्रचुर मात्रा में होते है और धार्मिक होने के लाख दावे करे मगर अंतर्मन से नास्तिक होते है।भारत मे यह आबादी 25%के करीब है।हर क्षेत्र में ये लोग नेतृत्वकर्ता के रूप में होते है और इनके बीच सर्वश्रेष्ठ होने की अहिंसक प्रतियोगिता चलती रहती है।ये लोग धार्मिक होने का ढोंग करने के लिए बीच-बीच मे धार्मिक स्थलों का दौरा कर लेते है व दान/चंदा दे आते है।ये दिमाग से शातिर मगर दिल से कायर लोग होते है।इनके लिए मानवता के कोई मायने नहीं होते है।राष्ट्रभक्ति जाति/धार्मिक आदि बंधनो से पूर्णतया मुक्त होते है।75%जनता इनकी ग्राहक मात्र होती है या मैनपावर हासिल करने की मंडी!इससे ज्यादा रिश्ता इनका 75%जनता से नहीं होता है।
असल मे देखा जाए तो यह C समूह B समूह को माध्यम बनाते हुए A समूह का हत्यारा है।एक समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते यह मेरा आकलन है।आप भी सुझाव देकर मदद कर सकते है।

कैपिटलिज्म बनाम क्रोनी कैपिटलिज्म

दुनियाँ के देशों का इतिहास उठाकर देखते है तो कहीं सामंतवाद के बाद पूंजीवाद की स्थापना हुई तो कहीं सामंतवाद के बाद साम्यवाद की स्थापना हुई।दुनियाँ भर में सोवियत रूस के नेतृत्व में साम्यवाद व ब्रिटेन-अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवाद के बीच संघर्षों की कहानियों से इतिहास की किताबें भरी पड़ी है मगर भारत के संदर्भ में देखा जाएं तो सामंतवाद के बाद न साम्यवाद का रास्ता अपनाया गया और न पूंजीवाद का!बीच का ढुलमुल रवैया अपनाया गया जिसे समाजवाद कहा गया!
साम्यवाद धीमी पूंजी निर्माण की प्रक्रिया के कारण ध्वस्त होता नजर आया तो पूँजीवाद ने तीव्र गति से पूंजी निर्माण करके दुनियाँ पर छा गया।आज जो भी साम्यवादी देश होने का दावा कर रहे है असल मे वो पूंजीवाद अपनाने की प्रक्रिया में चल रहे है या सैद्धान्तिक रूप से उन्होंने अपने रास्तों में बदलाव कर लिया है।
एक नजर से भारत की व्यवस्था को देखा जाएं तो पुराने सामंतों को विस्थापित करके पूंजीवादी सामंतों को उनकी जगह देकर देश की जनता को एक सपना दिखाया गया था जो 1990का दशक आते-आते नंगा हो गया।भारत ने आजादी के तुरंत बाद साम्यवाद व पूंजीवाद में से एक रास्ता चुना और न आर्थिक मंदी झेलकर 1990 में पूर्णतया पूंजीवाद रास्ता अपनाया।कैपिटलिज्म अर्थात पूंजीवाद कहकर जो लोग देश की जनता के सामने वर्तमान मॉडल को पेश कर रहे है वो निहायत ही बेवकूफ बनाते है!असल मे भारत मे क्रोनी कैपिटलिज्म लागू है।
उद्योगपत्ति पूंजी के बल पर राजनेताओं को नॉमिनेट करते है, इलेक्ट करते है और जनता के सामने दिखावा रिप्रेजेंट करने का जरूर करवाते है।मनमोहन सिंह के राज में भी यही चल रहा था जिसे मोदी ने विस्तार दिया है।पूंजीवाद का यह घिनौना स्वरूप इस देश को बर्बादी के कगार पर ले गया।
राजनेता सत्ता में आते ही सरकारी उपक्रमों को बर्बाद करने की नीतियां बनाते है,बैंकों पर दबाव डालकर अपने हित के उद्योगपत्तियों को कर्ज दिलवाते है और फिर कंपनियों को दिवालिया घोषित कर देते है।पैसा एक कंपनी से दूसरी कंपनी में ऑफ दी रिकॉर्ड ट्रांसफर कर दिए जाते है।पैसा अर्थव्यवस्था में चल रहा है।पैसे से खरीद फरोख्त हो रही है।शेयर बाजार आसमान छू रहा है मगर किंगफ़िशर दिवालिया हो जाती है,जेट एयरवेज बंद हो जाती है,BSNL व MTNL बंद होने की कगार पर है,HAL, ONGC आदि का नंबर लग चुका है,कई बैंक खोखले हो चुके है।रोजगार सृजन हो नहीं रहा है और इन कंपनियों के हजारों कर्मचारी सड़कों पर आ चुके है।
असल मे पूंजीवादी व्यवस्था होती तो 30सालों में निपटने की कगार पर नहीं पहुंचती है।बर्बाद करती तो है मगर गति इतनी तीव्र नहीं होती है।असल मे सामंतवाद को विस्थापित करके जो नए सामंत तैयार किये थे वो पहले समाजवाद के नाम पर फसलें चाट रहे थे और बाद में पूंजीवाद के नाम के नाम पर चट करने लग गए मगर अपना सामंती स्वरूप बनाये रखा।यूरोप की कंपनियों के मालिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करते या साईकिल से आफिस जाते देखे जा सकते है मगर क्या भारत मे अम्बानी/अडानी/सिंघानिया/डालमिया/बिड़ला आदि से यह अपेक्षा कर सकते है?
पूंजीवाद के नाम पर जो कृषि की कब्र पर सर्विस सेक्टर को तवज्जो दी गई वो भारतीय हालातों के अनुरूप नहीं थी।अर्द्ध शिक्षित युवाओं को गांवों से भगाकर जो शहरों में बसाने का सब्जबाग दिखाया जा रहा था वो शुरुआत के कुछ समय तो झेल लिया मगर अब बढ़ते बोझ से चरमरा चुका है।हालात यह है कि देश के किसान बर्बाद हो गए,12करोड़ युवा आज रोजगार पाने के लिए लाइन में खड़े है और दूसरी तरफ सरकारी उपक्रम ध्वस्त हो रहे है जिसके कारण बेरोजगारों की भीड़ बढ़ती जा रही है।सरकारी उपक्रमों की पूंजी क्रोनी कैपिटलिज्म के हवाले होकर शेयर बाजार में गोते लगाने लग गई मगर बेरोजगार हुए कर्मचारियों को खपाने के लिए निजी कंपनियां असहाय नजर आती है।
2014तक 3लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का एनपीए हो गया था जो कि 2019आते-आते 15लाख करोड़ रुपये तक हो गया है!इसका साफ मतलब है कि क्रोनी कैपिटलिज्म के जरिये बड़ी तेजी से जनता के खजाने पर हाथ फेरा गया है।बेईमान सत्ता में बैठे लोगों को न देश नजर आया और न देश के भूख से बिलखते,इलाज के लिए तड़पते इंसान नजर आए।हालात इस कदर तक बिगड़ चुके है कि सरकारें 5साल सत्ता में रहकर अपना रिपोर्ट कार्ड देने के बजाय किसानों,मजदूरों,बेरोजगारों को धर्म,संस्कृति, राष्ट्रभक्ति का झुनझुना थमा रही है!
अब 20000जेट एयरवेज के,12000फर्स्ट फ्लाइट करियर कंपनी के कर्मचारी बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो चुके है और 1,74000कर्मचारी बीएसएनएल,45हजार कर्मचारी एमटीएनएल के जुड़ने वाले है।बाकी ONGC, HAL सहित कई बैंकों के कर्मचारी लाइन में लग चुके है!
पूंजीवाद का मॉडल हमने भी कई बार पढ़ा है और सेंकडों सालों से कई देशों में लागू है और अभी भी ठीकठाक चल रहा है मगर इस देश की तरह खुली बंदरबांट वाला क्रोनी कैपिटलिज्म कहीं नहीं है।मानते है यूरोप में जनता जागरूक है,अमेरिका में जनता जागरूक है जो लगातार सत्ताधारियों पर दबाव बनाए रखती है और भारत मे जनता जागरूक नहीं है और पढ़े-लिखे तमाशबीन है मगर हुक्मरानों की इस देश के प्रति कोई जिम्मेवारी नहीं है?ठरके से आवारा पशुओं की तरह देश को खा रहे है!
क्या समाजवादी झुनझुना सिर्फ जनता का मन बहलाने का झुनझुना मात्र था?क्या पूंजीवाद व साम्यवाद का मध्यम मार्ग देश के संसाधनों को नव सामंतवाद के द्वारा लूटने का मार्ग था?पूंजीवादी व साम्यवादी देशों के सत्ताधारी व उद्योगपत्ति कम से कम अपने अपने देश के प्रति तो वफादार है!गौरी,मुगल,अंग्रेज सेंकडों सालों तक यूँ ही बजाकर नहीं गए है!इस देश का श्रेष्ठी वर्ग बेईमान था।आज दुबारा WTO, IMF, ADB आदि घर-घर पहुंच चुके है।
गलती इस शहरी मध्यम वर्ग की भी है क्योंकि यह अहसान फरामोश,खुदगर्ज होकर ग्रामीण व कमजोर तबके से कट चूका था!अब मार पड़ी तो आंसुओं का सैलाब आया है!जबकि इस वर्ग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी लोगों को जागरूक करने की व सत्ता पर दबाव बनाए रखने की!

धर्म/जाति व किसान नेताओं का मारा किसान!

आज एक खबर आई कि जिन 111किसानों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया था उन्होंने यह कहकर ऐलान वापिस ले लिया कि हमारी अमितशाह से बात हो गई है और उन्होंने हमारी मांगे मान ली है तब से सोच रहा हूँ कि पिछले पांच सालों बड़े-बड़े किसान आंदोलन हुए थे वो क्या सिर्फ दिखावी थे!और इन्होंने जो मांगे मानने की बात कही है वो भी चुनाव आचार संहिता में और मांगे भी ऐसी की सारी नदियां जोड़ने की बात हो गई!
मुझे यह महसूस हो रहा है कि किसान की फसल पैदा नहीं करता है बल्कि किसानों के नाम पर भी फसल तैयार हो रही है और शातिराना अंदाज में किसान का खून चूस रही है।चार साल किसानों को बरगलाकर आंदोलनों में झोंका जाता है और पांचवें साल में किसान नेता बनकर बिक जाते है!पिछले 3दिन से बेमौसम बारिश उत्तरी भारत मे कहर बनकर टूटी है मगर चौतरफा खामोशी है।कोई किसान आयोग नहीं जो राजनीति से परे स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करे और इस आचार संहिता के दौर में भी किसानों के नुकसान का आकलन करके उनकी भरपाई कर सके,बीमा कंपनियों के हलक में हाथ डालकर किसानों को मुआवजा दिलवा सके!
आज इस देश की आधी से ज्यादा आबादी शुद्ध रूप से खेती पर निर्भर है मगर उसके लिए ऐसा कोई तंत्र नहीं जो इनकी आवाज उठा सके,इनके हितार्थ नीति-निर्माण कर सके,इनके दुःख मे उम्मीद जगा सके!आपको चंद उदाहरणों के माध्यम से बताता हूँ कि सत्ता किधर जा रही है!नीतियां किसके लिए बन रही है!कौन लोग किसानों की बर्बादी के जिम्मेदार है!
2008 में कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला के नेतृत्व में आईपीएल खेलों की शुरुआत हुई और महज 10सालों में यह संघ हजारों करोड़ रुपये का खेल बन गया।जनता के खून-पसीने की कमाई से बनाये गए सेंकडो स्टेडियम इनको उपलब्ध करवाए गए और कानून व्यवस्था के नाम पर पूरा सरकारी तंत्र इनके लिए तैनात हो गया!खिलाड़ी/पदाधिकारी मिलाकर 1000के करीब लोग होंगे जो इससे कमा रहे है!दूसरी तरफ 50करोड़ से ज्यादा किसान खेती में लगे है और पूरे देश का पेट इन्हीं के हाथों भरा जा रहा है।इनकी पकी हुई फसलें खुली मंडियों में बारिश में बर्बाद हो रही है लेकिन पिच की तरह ढकने के लिए कोई तिरपाल लेकर दौड़ता नजर नहीं आता है!आजादी के 70साल बाद भी हम भंडारण की व्यवस्था नहीं कर पाए क्योंकि सरकारें कह रही है कि हमारे पास संसाधन नहीं है!आप खुद तय करिये कि कमी संसाधनों की है या नियत की?
2साल पहले देश मे दाल की कीमत बढ़ी थी तब सारी राजनैतिक पार्टियों व मीडिया ने बवाल काटा और उसकी आड़ में अडानी की कम्पनी ने अफ्रीकी देशों से दाल सस्ते में आयात कर ली।शहरी लोगों को सस्ती कीमत पर दाल जरूर मिल गई मगर देशी किसानों की दलहन की फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे बिकी और किसानों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।एक तरफ गरीबों के लिए मुफ्त में खाद्य पदार्थों का वितरण किया जा रहा है तो दूसरी तरफ शहरी मानसिक गरीबों के लिए सस्ता खाद्य उपलब्ध करवाने का टेंडर भी सरकार अपने पास रखती है और इसका पूरा बोझ किसानों के कंधों पर लाद रही है।अगर शहरों के पास देने के नाम पर कुछ नहीं है तो गांवों से यह भीड़ क्यों एकत्रित करके पाली जा रही है?
पाकिस्तान से सस्ती चीनी मंगाकर देश के बाजार में डाली गई जिससे देशी चीनी मीलों ने उत्पादन में कमी कर दी व कई घाटे में चली गई व गन्ना किसानों का बकाया 2000करोड़ से बढ़कर 8000करोड़ से ज्यादा हो गया और दावा चुनाव से पहले 14दिन में बकाया देने का किया गया था!क्या सरकार की नीति किसानों को बचाने वाली रही?आप खुद सोचिये!
मलेशिया व इंडोनेशिया से कच्चे पाम आयल और सरसों व मूंगफली के रिफाइंड आयल पर मोदी सरकार ने इम्पोर्ट ड्यूटी घटा दी जिसके कारण भारत मे 26%तेल की आवक बढ़ गई और भारतीय रिफाइनरी की उत्पादन क्षमता 30%कम कर दी गई जिसके कारण शहरी वर्ग को तो सस्ता तेल मिल गया मगर किसान वर्ग को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ क्योंकि देशी रिफाइनरी द्वारा उत्पादन घटाने के कारण किसानों की फसलें ओने-पौने दामों में बिकी।
ये मात्र उदाहरण नहीं है बल्कि सत्ता में बैठे लोगों की कथनी व करनी का दोगला रवैया है जो यह स्पष्ट करता है कि इनके लिये चुनाव में किसान का क्या महत्व है और सत्ता मिलने के बाद महत्व क्या रह जाता है!मैंने अपने कई लेखों के माध्यम से बताया है कि किसानों की समस्या क्या है और उनका समाधान क्या है मगर किसान नेता इस देश का सबसे खराब बिकाऊ माल है जो किसानों को रौंदकर,उनके सपनों की हत्या करके कुर्सी के लिए बिक जाता है।बिकाऊ नेता कभी भी अपने वर्ग की नुमाइंदगी नहीं कर सकता,नीति-निर्माण में अपने वर्ग के हितों की हिफाजत नहीं कर सकता।
भूमिअधिग्रहण बिल पर सेंकडों किसानों के नाम पर जीते हुए उजले बगुले संसद में बैठे रहे मगर एक का भी मुंह नहीं खुला!एक भी किसान नेता खाद्य आयात पर नहीं बोलता!एक भी किसान नेता प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की लूट पर नहीं बोला!एक भी किसान नेता नहीं पूछ रहा है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट का क्या हुआ!साइल हेल्थ कार्ड का क्या हुआ!किसानों की आय दुगुनी करने के कौनसे ठोस कदम उठाए गए!कृषि औजारों पर जीएसटी 18से 28%तक क्यों की गई?
किसानों की सबसे बड़ी समस्या धर्म व जाति के रूप में विभाजन है जिसका दोहन करके बेईमान लोग सत्ता पर कब्जा कर लेते है।किसान जब तक अपनी साझी समस्याओं को देखकर एकजुट नहीं होगा तब तक इनकी सुनने वाला कोई नहीं होगा,नदियों को जोड़ने की बातें पिछले 20सालों से सुन रहे है मगर इस पर कार्य शुरू कोई नहीं करेगा!खाद-बीज की उपलब्धता कोई सुनिश्चित नहीं करेगा!इनकी फसलों के लिए पर्याप्त मुआवजे व भंडारण की व्यवस्था कोई नहीं करेगा!जब तक किसान विरोधी लोग सत्ता पर काबिज रहेंगे और फर्जी किसान नेता उनके पीछे बैठकर संसद की टेबलें बजाते रहेंगे तब तक भारत मे तो किसानों की बर्बादी रोकने का दावा मृग-मरीचिका बनकर किसानों को चिढ़ाता रहेगा।


प्रेरणा के स्रोत या इबादत के अड्डे!

आज आपसे मैं दो समान घटनाओं का जिक्र करना चाहता हूँ।एक घटना से देश के लोगों ने सबक लिया,हिम्मत दिखाई और कायापलट कर दिया।दूसरी घटना पर देश के लोग जमकर रोये,कायरता दिखाई और आज भी उनकी कुर्बानियों को याद कर-करके रो ही रहे है।मैं तो इनको रोना भी नहीं कहता क्योंकि जहां समझ हो वहां दर्द होता है!यहां न समझ है न हिम्मत है!इनके लिए सिर्फ ये पूजा स्थल है,टूरिस्ट स्पॉट है!
22जनवरी 1905को जॉर्जी गेपोन के नेतृत्व में सेंट पीटर्सबर्ग में हजारों लोग शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे और इन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर निरंकुश जार ने गोलियां चलवा दी थी जिसमे मासूम बच्चे,औरतें ,युवा व बुजुर्ग लोग हजारों की संख्या में काल कवलित हो गए।जिसे दुनियाँ ब्लडी संडे के नाम से जानती है क्योंकि उस दिन रविवार था।उसके बाद लेनिन का उदय होता है और निरंकुश जारशाही को दफन कर दिया जाता है।
13अप्रैल 1919को भारत के पंजाब सूबे के अमृतसर में एक मैदान में औपनिवेशिक अंग्रेजी सरकार के खिलाफ निहत्थे लोग शांतिपूर्वक सभा कर रहे थे जिसे जलियांवाला बाग कहा जाता था।जिसमे बच्चे,बूढ़े व औरतें भी शामिल थी।तत्कालीन अंग्रेज सरकार के जनरल डायर ने गोली चलाने के आदेश दे दिए।1000से अधिक लोग मारे गए और 2000से ज्यादा लोग घायल हुए थे।बाद में सरदार उधमसिंह ने जनरल डायर को लंदन में जाकर गोली मारकर बदला भी लिया था।भगतसिंह के जीवन पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य पढ़ना शुरू किया।
धर्म व जाति में बंटा और देशी रियासतों के रोड़ों के कारण यह देश एकजुट न हो सका और भगतसिंह के नेतृत्व में जो क्रांति का बीजारोपण हो रहा था वो सफल न हो सका!अगर कांग्रेसी बूढ़े भगतसिंह का कहना मानते या भगतसिंह का सहयोग करते तो देश क्रांति की घाटी से निकल पड़ता और मूढ़ता,मूर्खता भरा प्राचीन रोग आज हम नहीं ढो रहे होते!
इसी जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगतसिंह के माध्यम से हमे एक विचारधारा उपलब्ध करवाई है।जलियांवाला बाग में शहीद हुए उन हजारों लोगों को नमन करते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए।ब्लडी संडे के बाद रूस के लोगों ने हिम्मत दिखाई थी और आज रूस एक ताकतवर देश के रूप में खड़ा है और हम भारतीय जलियांवाला बाग कांड के बाद वो हिम्मत नहीं दिखा सके इसलिए हमारे पास आज भी उन शहीदों को नमन करने के लिए आंखों में आंसू व कांपते हाथों में पकड़ी सिर्फ मालाएं है!
ब्लडी संडे के बाद रूस में नया सवेरा आया मगर हम आज 100बाद भी जलियांवाला बाग से बाहर निकलते है तो डबडबाई आंखों के सामने घनघोर अंधेरा छाया नजर आता है।उस समय भी हम कायरों का चोला ओढ़कर बैठ गए थे और आज भी कायरों की तरह रोने-धोने से बाहर नहीं निकल पा रहे है।
"शहीदों की चिंताओं पर लगेंगे हर बरस मेले" सरीखे नारे गढ़ लिए और भेड़ों की तरह झुंड बनाकर मेलों में घूम रहे है मगर बै-गैरत के इस देश मे कोई गैरत का खिताब हासिल करना नहीं चाहता!हम पाखंड व अंधविश्वास में इतने डूबे हुए है कि हमने शहीद स्थलों को सिर्फ पूजा स्थल मान लिया है जबकि ये शहीद स्थल,इन शहीदों की निशानियाँ हमे अधूरे पड़े कार्यों को पूर्ण करने,देश को आगे ले जाने की प्रेरणा देते है,हमे विचार देते है,रास्ता बताते है।
अपने बच्चों को ले जाइए !इन शहीदों की निशानियाँ बताइए!इनका इतिहास पढ़ाइये!इनके विचार समझाइए ताकि हमारी कायरता की चादर शायद ये हटाने में कामयाब हो सके!

पूंजीवाद से दबे-कुचले भारतीय मजदूर

जब आक्रोश सहनशीलता की सीमा लांघ जाता है तो जनता क्रांति को तैयार होती है।चाहे चे ग्वेरा की जुलाई क्रांति हो,चाहे लेनिन की अक्टूबर क्रांति हो या हो ची मिन्ह का राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम हो सब जगह एक ही दृश्य नजर आता है कि जनता के सामने करो या मरो के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा था!ऐसे में ये लोग क्रांति की चिंगारी लेकर जनता के बीच गए,मुक्ति के लिए प्रेरित किया व क्रांति का जरूरी प्रशिक्षण दिया और जनता के साथ मिलकर क्रांति का आगाज कर दिया!
दुनियाँ में फ्रांस की क्रांति व ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को ही ज्यादा पढ़ाया गया,प्रचारित-प्रसारित किया गया जिससे दुनियाँ इन असली क्रांतियों को पढ़ने/जानने से अनभिज्ञ रह गई!ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के दौरान बच्चों/महिलाओं व बूढ़ों को 18-18घंटे कार्य करवाया जाता था।दयनीय हालत में मजदूरों की जिंदगी थी।कार्ल मार्क्स ने जब यह देखा तो उन्होंने एक सिद्धांत दिया वर्ग संघर्ष का।यह कोई वैज्ञानिक सोच नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के अहसास से/अनुभव से बताई गई हकीकत थी।
मानव की मूलभूत आवश्यकता है रोटी,कपड़ा और मकान।ये भौतिक वस्तुएं है और ये उत्पादन से हासिल की जा सकती है।कच्चे माल को उपयोग लायक बनाने की प्रक्रिया को उत्पादन कहा जाता है और कच्चा माल प्राकृतिक संसाधनों से मिलता है।पूंजीवाद में ताकतवर लोग येन-केन-प्रकारेण प्राकृतिक संसाधनों व उत्पादन की प्रक्रियाओं के मालिक बन जाते है और कम ताकतवर लोगों को मजदूर बना दिया जाता है।इस प्रकार मालिक व मजदूर के रूप में दो वर्ग बनकर उभर जाते है।जब मालिक मजदूरों के शोषण की सीमा लांघ जाते है तब वर्ग संघर्ष होता है और मजदूरों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों व उत्पादन-उपभोग की प्रक्रियाओं पर समान अधिकारों की लड़ाई को क्रांति कहा जाता है।दुनियाँ में जितनी भी क्रांतियां हुई है उनका आधार यही रहा है चाहे कहीं कम तो कहीं ज्यादा!
भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो कभी क्रांति नहीं हुई है।आज के समय मे भी क्रांति संभव नहीं है।उसका मुख्य कारण वर्ण व्यवस्था,धर्म व जाति रहा है।वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण मालिक रहे है,क्षेत्रीय रक्षक व वैश्य उत्पादन की प्रक्रिया का हिस्सा और क्षुद्र मजदूर के रूप में रहे है।क्षुद्र बगावत न कर दें उसके लिए हथियार उठाने से लेकर शिक्षा तक पर पाबंदियां रही है।शुरुआत में ठीकठाक चलता रहा मगर जब लगा कि क्षुद्रों में आक्रोश बढ़ रहा है बुद्ध के नेतृत्व में बगावत हुई तो उसको थामने के लिए क्षुद्रों को जातियों के रूप में टुकड़ों में तोड़ने की योजना ईजाद की गई जो अभी तक चल रही है।
आप देखिए क्षेत्रीय आज मजदूर होगा मगर वो वैश्य मजदूर की पीड़ा को अपने बराबर की नहीं मानता,वैश्य मजदूर अपनी पीड़ा को क्षुद्र मजदूर के समान नहीं मानता मगर पीड़ित सब है।सब धर्म व जातियों में बंटे हुए मजदूर है।धर्म व जाति का सिद्धांत इतना मजबूत है कि मजदूरों को एकसाथ आने ही नहीं देता है।मजदूर सारे एक हो गए तो क्या होगा!सबकी पीड़ा समान हो जायेगी तो क्या होगा!यही डर मालिकों को सताता रहता है और मालिक इनको एक न होने देने के जतन रोज करते रहते है।
पूंजीवाद का ढांचा दुनियाँ भर में ढह रहा है मगर मालिक कंपनियां बनाकर अपने देशों से बाहर निकल चुके है इसलिए बगावत के सुर अभी सुनाई नहीं देंगे मगर भारत जैसे देश मे पूंजी के मालिक कब्जा किये हुए बैठे ही थे ऊपर से दुबारा विदेशी कंपनियां आ धमकी है,विदेशी मालिक आ धमके है।मतलब देशी व विदेशी मालिकों की दोतरफा मार भारत के बहुसंख्यक मजदूरों पर पड़ रही है।किसी भी धर्म का हो,किसी भी जाति का हो मगर है तो मजदूर ही!है तो मालिकों से परेशान ही!देशी मालिकों के साथ मिले हुए विदेशी मालिकों को अभी 30साल भी पूरे नहीं हुए है मगर मजदूरों में बैचेनी पैदा होने लगी है।आखिर मजदूर तो मजदूर है।बेसिक नीड्स अर्थात रोटी,कपड़ा,मकान तक नसीब नहीं हो रहा है तो क्या करेंगे?बुनियादी जरूरतों के आगे या तो हारकर आत्महत्या कर ले क्योंकि धर्म व जाति का बंधन तोड़ने में खुद को असहाय समझता है या फिर धर्म-जाति की बेड़ियां उतारकर फेंक दें और खुद को सिर्फ मजदूर समझकर लड़-भिड़े!
इस देश का किसान जातियों में,धर्म मे विभक्त न होते तो 15लाख किसान आत्महत्या न करते मगर वो धर्म/जाति का बंधन तोड़ने में नाकाम रहे है और हारकर आत्महत्या कर ली!भारत मे तो मालिकों ने और भी विभेद की दीवारें खड़ी कर दी!सफाई मजदूर हड़ताल करेंगे तो खान मजदूर कहेंगे हम इनसे अलग है उनके साथ खड़े क्यों हो?फैक्ट्री मजदूर हड़ताल करेंगे तो खेतिहर मजदूर कहेंगे उनका तो अलग मैटर है हमारा उनसे क्या लेना देना?असल मे देखा जाये तो सबका मैटर तो एक ही है।सबके लिए मैटर बुनियादी जरूरतें ही है!मगर उनके मन मे मालिकों ने भाव पैदा कर दिया कि उनका मैटर अकेले का मैटर है इसलिए सब टुकड़ों में लड़ रहे है।
भारत मे कहने को तो दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ संविधान है मगर वो कांच के बॉक्स में बंद पड़ा है।भारत के मजदूरों ने जिस दिन संविधान पढ़ लिया उस दिन से मालिकों की शामत आने लग जायेगी!मगर राजनेता भी मालिक बन बैठे।मालिकों व राजनेताओं का एक अनूठा गठबंधन इस देश मे चल रहा है और पश्चिम के पढ़े लिखे पूंजीवादी अर्थशास्त्री मजदूरों को शांत करने की इनको नई-नई युक्तियां बता रहे है।इन्हीं की सलाह पर किसानों को हर साल 6हजार रुपये देने की योजना आई है व इन्हीं की सलाह पर मजदूरों को हर साल 72हजार का वादा आया है।किसान आक्रोश में है मजदूर बर्बाद है,कहीं बगावत न कर दें इसलिए लोकतंत्र के टेंट हाउस में बैठाकर राहत के छींटे डाल दिये जायें ताकि मजदूर शांत हो जाएं!आगे कोई नई युक्ति तलाश लेंगे!
इस देश के मजदूरों को कभी धर्म मे फँसाकर मारा गया,कभी जातियों में फंसाकर मारा गया,कभी अलग-अलग मजदूर संगठनों में बांटकर मारा गया है।एक बात और गौर करने वाली है कि मजदूरों को जितनी भी टुकड़ियों में बांटे गए है उनका नेतृत्व मालिकों के रिश्तेदार ही करते है!मगर मजदूर खुश है कि हमारी लड़ाई मालिकों के घर से आया ही लड़ रहा है!
कोई राजनैतिक बगावत न कर दें इसलिए जो भी मजदूरों के वर्ग से कोई आवाज उठाता है उसको मालिकों के गठजोड़ में शामिल कर लिया जाता है।उसको बता दिया जाता है कि देख अब तू भी मालिक है और मजदूरों को जगाने की बात की तो तुझे भी खतरा है।मजदूर वर्ग से मालिक बना आदमी खतरा तुरंत भांप लेता है और चुपचाप मालिकों के साथ चल देता है!क्रांति तुरंत भ्रांति में तब्दील हो जाती है।मजदूर गुमराह होकर नया क्रांतिकारी ढूंढने लग जाता है।भारतीय मजदूरों को सदा बताया गया है कि कोई चमत्कारिक मसीहा आयेगा, वो ही तुम्हारी समस्याओं का समाधान लायेगा!इसलिए कोई मजदूर बगावत नहीं करता है।सबके सब राहत के छींटों का इंतजार कर रहे है या आत्महत्या कर रहे है!मालिक चाहे अहिंसा की रक्षा के लिए हिंसा करते रहे है मगर मजदूरों को समझा दिया गया है कि अहिँसा परमोधर्मः!खुद जहर खा लेना,खुद फाँसी पर लटक जाना मगर बुनियादी जरूरतों को हासिल करने के लिए हिंसा मत करना!
मालिक मजदूरों को कह रहे है कि गीता पढ़ो,कुरान पढ़ो,गांधी पढ़ो मगर मैं मजदूरों को कहता हूँ तुम भगतसिंह को पढ़ो,तिलका मांझी को बढ़ो,असफाक उल्लाह को पढ़ो,बिरसा मुंडा को पढ़ो,चौधरी छोटूराम को पढ़ो, बाबा साहेब अंबेडकर को पढ़ो और इन सबसे ऊपर भारत के संविधान को पढ़ो।तुम इस देश के मालिक हो।प्राकृतिक संसाधनों पर तुम्हारा भी उतना ही हक है जितना मालिकों का है।उत्पादन की प्रक्रियाओं के निर्माण के संसाधन ये बाहर से नहीं लाये है बल्कि तुम्हारे खून-पसीने से जमा तुम्हारे बैंकों की पूंजी है।


सुविधाजनक क्रांतिकारियों को मेरा इस्तकबाल!

देश आजाद हुआ तो हजारों सालों की गुलामी से निकलते हुए सबके लिए शिक्षा,चिकित्सा,शुद्ध पेयजल,रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं का एक सपना देखा गया था।उस समय सरकार की हालत यह नहीं थी कि तुरंत सबके लिए रातों-रात इन सुविधाओं का इंतजाम कर दें।देश शोषण के बाद गरीबी,भुखमरी में जकड़ा हुआ था और खजाना खाली था।आधारभूत सरंचनाओं के नाम कुछ रेल लाइन,कुछ सड़क मार्ग व स्थानीय धन्ना सेठों की रहम पर कुछ स्कूल व अस्पताल थे।सरकार ने कुछ क्षेत्रों में निजी लोगों को भागीदारी निभाने का न्यौता दिया था मगर बुनियादी जरूरतों वाले क्षेत्रों में सार्वजनिक रुख अपनाया गया।
1947से लेकर 1990तक सरकारों ने अस्पतालों का ढांचा खड़ा किया,शिक्षण संस्थानों की श्रृंखला खड़ी की,पानी के लिए नहरों का इंतजाम किया,रोटी के लिए पीडीएस सिस्टम खड़ा किया, लोगों को अनाज के बदले सड़क,तालाब आदि बनाने के कार्यों में लगाकर रोजगार उपलब्ध करवाया और ऐसा लगा कि आने वाले 20वर्षों में हर बच्चा स्तरीय शिक्षण पद्धति का हिस्सा होगा,हर घर शुद्ध पेयजल पहुंच जायेगा, हर गरीब के लिए चिकित्सा व्यवस्था सुलभ हो जाएगी,हर युवा के हाथ मे काम होगा मगर कभी हमने यह सोचा कि ऐसा क्या हुआ कि गाड़ी एकाएक बेपटरी हुई और नजदीक आती बुनियादी सुविधाएं मृग मरीचिका बनकर रह गई!
बाबा साहब ने कहा था कि मेरे समाज के 100पढ़े-लिखे ईमानदार लोग अगर मेरे रास्ते चल पड़े तो समाज तरक्की की राह पकड़ लेगा मगर 100ईमानदार लोग तो समाज मे तैयार हो गए मगर उन्होंने समाज के लिए क्या कार्य किये?इन लोगों ने समाज के बेईमान लोगों के खिलाफ बगावत करने वाले लोगों का रास्ता यह कहकर रोक दिया दिया कि समाज के सारे नेता बेईमान नही होते है बल्कि ईमानदार भी बहुत है!देखिये इन ईमानदार लोगों की कारस्तानियों को कि इन लोगों ने कभी बेईमानों के खिलाफ झंडा बुलंद नहीं किया।एकतरफ बेईमानों ने अपनी दुकानें लगा ली तो दूसरी तरफ इन लोगों ने ईमानदारी के नाम पर आलस्य की चादर ओढ़कर या तो बैठ गए या ईमानदारी बेचने की अपनी दुकानें लगा ली।
मैं भी मानता हूँ कि सारे डॉक्टर बेईमान नहीं होते मगर नब्बे के दशक के बाद जब नजदीक आ रही चिकित्सा को बेईमान डॉक्टर सरकारी अस्पतालों से निकालकर कॉरपोरेट अस्पतालों की तरफ ले जा रहे थे तब कितने ईमानदार डॉक्टरों ने इनके खिलाफ जन-आंदोलन खड़े किए!
मैं भी मानता हूँ कि सारे शिक्षक बेईमान नहीं होते मगर जब बेईमान शिक्षक गरीब बच्चे के पास आ रही शिक्षा को उठाकर निजी स्कूलों व कोचिंग संस्थानों में ले जा रहे थे तब ये ईमानदार क्रांतिकारी शिक्षक क्या कर रहे थे?
आज कुछ क्रांतिकारी ईमानदार नेता हमे पाठ पढ़ा रहे है कि सारे नेता बेईमान नहीं होते है तो हमे यह सवाल पूछने का हक भी है कि जब बेईमान नेता जमीने लूटने लगे,पानी की पाइपलाइन उखाड़कर कबाड़ी का कारोबार करने,पीडीएस का धान मंडियों में बेचने लगे तब ईमानदारी का चोला पहने ये नेताजी कहाँ थे?
सब अपने अपने हिस्से की बेईमानी व ईमानदारी की दुकानें खोलकर बैठे है और अपनी सुविधा के अनुरूप क्रांतिकारी लवाजमा ओढ़ लेते है।यह देश बेईमानों की बेईमानी से नहीं ईमानदारों की इस सुविधाजनक क्रांति के आगे बेबस व लाचार होकर बर्बाद हो रहा है।
महंगी शिक्षा,चिकित्सा,पानी आदि से वंचित रहे व दूर हो रहे गरीब इन ईमानदार क्रांतिकारियों से सवाल क्यों नहीं करें?मैं तो सिर्फ आगाह कर रहा हूँ जब जनता जागरूक होकर बगावत पर उतरेगी तो आपसे ईमानदारी के प्रमाणपत्र नहीं मांगेगी बल्कि एक ही लपेटे में सबको कठघरे में खड़ा करेगी!

कांग्रेस की जवानी

जब कांग्रेस पार्टी की 1885में स्थापना हुई तो उसका मकसद था अंग्रेजो व भारतीयों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करना।स्थानीय लोगों का गुस्सा बड़े गुब्बार का रूप न ले लें इससे बचने के लिए गुस्से को ट्रेस करके अंग्रेजों तक बात पहुंचाना व कुछ अंग्रेजों की तरफ से राहत लेकर गुस्से पर शांति के छींटे डालना इसका कार्य रहा था।धीरे-धीरे स्थानीय व अंतराष्ट्रीय परिस्थितियां बदलती गई और उसके साथ कांग्रेस का स्वरूप बदलता गया मगर कांग्रेस का केंद्र बिंदु सदा स्थानीय मांगों के अनुरूप अंग्रेजो से अनुनय-विनय का ही रहा था।यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि अकेली कांग्रेस ने देश को आजाद कराया है!यह आजादी के आंदोलन में शहीद हुए साढ़े सात लाख शहीदों का अपमान करने वाली बात होगी। यह बात सच है कि कांग्रेस व आरएसएस की विचारधारा अलग थी और आपस मे तालमेल की भावना के बजाय आजादी बाद की सत्ता पर कब्जे की प्रतिस्पर्धा ज्यादा थी।एक तरफ देश के करोड़ों किसान-कमेरों की कुर्बानियां हो रही थी तो दूसरी तरफ इन दोनों गुटों में कब्जे की रार चल रही थी।द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन की हालत आज की कांग्रेस की तरह  हो गई थी जो दावा तो सबसे पुरानी व महान पार्टी का करती है मगर चंद चापलूसों के सिवाय महारानी के मुकुट या प्रिंस के ताज के आगे कुछ बचा नहीं है!देश की जनता के आक्रोश व अंतराष्ट्रीय दबाव के कारण अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा था और कांग्रेस कटोरा लेकर लार्ड माउंटबेटन के पीछे-पीछे चल पड़ी!जिन्नाह व पंडित नेहरू की सत्ता लोलुपता के कटोरे को देखकर स्वयं गांधीजी ने कहा था कि अब कांग्रेस को समाप्त हो जाना चाहिए।कांग्रेस को सेतु से हटाकर आजादी के असली वाहक बताने के गांधीजी के सपने को उस समय ठेस पहुंची जब कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी के रूप में सत्ता पर काबिज हो गई।

खैर कांग्रेस का इतिहास ज्यादातर भारतीयों को पता ही है व सत्ता के लिए दी कुर्बानियों को देश के लिए शहादत बताने का खेल भी अनवरत जारी है।एक विशेष सर नाम वाले परिवार से हटकर कांग्रेस के पास कभी कोई विकल्प रहा नहीं है।पुराने पत्रकार मित्रों को पता ही है कि किस प्रकार सीताराम केसरी को कांग्रेस कार्यालय से बाहर किया गया था!गैर-गांधी परिवार के कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के नाम भी वर्तमान कांग्रेसियों की जुबां पर नहीं आ पाते है क्योंकि कांग्रेस ब्रिटिश व्यवस्था से प्रेरित है और पूरी कांग्रेसी क्राउन गांधी परिवार के सामने नतमस्तक है।

गांधी परिवार के सामने कांग्रेसियों की लाचारगी कहें या स्वामिभक्ति कहें,इतनी थी कि सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कोई बगावत नहीं कर पाया!कांग्रेस सोनिया गांधी की उम्र के साथ बूढ़ी होती गई और युवाओं को आगे लाने के नाम पर बुजुर्ग सोनिया किनारे सरक गई और बेटे राहुल गांधी को अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी गई।जब राहुल गांधी को जनता के बीच कांग्रेसी चापलूस ग्लोरीफाई ढंग से नहीं कर पाए तो कांग्रेस को बुढ़ापे से बाहर निकालने के लिए राजमाता के पास प्रियंका गांधी को आगे करने का निवेदन लेकर पहुंचे!

जाहिर सी बात है कि कांग्रेस ने देश पर लंबे समय तक राज किया है इसलिए स्वामिभक्त परिवार राज्यों में भी तैयार हुए है!कुछ स्वामिभक्त मीडिया घराने भी इनके साथ चिपककर तैयार हुए है!कुछ नए स्वामिभक्त युवा भी तैयार हुए है!इन सबने मिलकर पहले राहुल गांधी को भारत का युवा भविष्य घोषित करने की कोशिश की व अब प्रियंका गांधी को लेकर मास्टर स्ट्रोक बता रहे है!

कांग्रेस पार्टी की एक व्यवस्था है जिसमे एक पिरामिड साफ झलकता है जिसके शीर्ष पर गांधी परिवार है और उसके पीछे देशभर से कुछ चुने हुए परिवार है और प्रचार-प्रसार के लिए अपना पुराना/रूढ़िवादी मीडिया है  जो सिर्फ गांधी परिवार को ग्लोरीफाई करके जनता के बीच स्थायित्व देने की जंग लड़ता नजर आता है।एक परिवार की अगली पीढ़ी को देश के युवा भविष्य के रूप में परोस रहा है जबकि जाहिर सी बात है कि केंद्र में युवाओं के नाम पर राहुल-प्रियंका-वाड्रा है तो राज्यों में इनके खानदानी गुलामों के पुत्र-पुत्रियाँ है।

किसी राष्ट्रीय पार्टी के किसी क्षेत्र-विशेष पर किसी परिवार की राजनीति अनवरत जारी रहे तो यह बात थोड़ी हजम भी हो जाती है कि शायद जनता से उसका जुड़ाव होगा मगर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद एक परिवार के पास गिरवी पड़ा हो तो यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि यह पार्टी लोकतांत्रिक है और इस देश के लोकतंत्र की सही मायने में हिफाजत करने वाली है!एक केंद्रीय परिवार ने राज्यों के कुछ परिवारों के साथ मिलकर इस देश के लाखों युवाओं के सपनो की हत्या की है जो राजनीति में आकर देशसेवा करना चाहते थे!आज राहुल-प्रियंका देश के लाखों युवाओं के सपनों की कब्रगाह पर खड़े होकर यह दावा करे कि कांग्रेस युवा हो गई तो यह देश के लोगों को अपमानित करके अपने गुरुर का प्रदर्शन मात्र है जिसके आगे कांग्रेसी चापलूस लोग तो नतमस्तक हो सकते है मगर देश के करोड़ों युवाओं के आगे बेमानी सा लगता है!30साल की जवां कांग्रेस पर 1915में जो कब्जा किया गया वो 133साल की होने पर भी जारी है।
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क्या देश की राजनीति सिर्फ हितैषी दिखने मात्र तक की रह गई?

दुनियां बड़ी अजीब है। जरा सोचिये।जिसको किसानी-खेती से कोई लेना देना नहीं वो खेतों की खाक छान रहा है।झुग्गियों में रहने वालों की कभी सुध नहीं ली,वो आज दो कमरों के मकान वालों का हितैषी बन रहा है। तो क्या देश की राजनीति सिर्फ हितैषी दिखने मात्र तक की रह गई?जंतर-मंतर पर एक आदमी मर जाता है। रैली किसानो की थी तो तत्काल किसान घोषित करके आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच सब मुआवजा देने पहुँच गए। ऐसे विलाप हुआ कि शायद आत्महत्या करने वाला यह पहला और अंतिम किसान है। क्या कुछ बदला है उसके बाद।जरा रोज के अख़बार व् अन्य माध्यम से सजग रहिये और देखते जाइये।एक दिन ऐसा नहीं मिलेगा,जिस दिन किसी किसान ने आत्महत्या न की हो।लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पीपली लाइव कभी नहीं बनाया।क्या माने?मरने वालों को दिल्ली आकर मरना चाहिए?नहीं ।आत्महत्या कायरता है।पहले कारण को ढूंढो।उसका निदान पहले करो।जाते-जाते कुछ बोझ साथ ले जाना चाहिए।बात किसी पार्टी विशेष की नहीं है।हमाम में सब नंगे है। 2012 में एक लड़की की दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के बाद बेदर्दी से हत्या कर दी गई।जमकर हंगामा हुआ।सारे अति महत्वाकांक्षी लोगों ने बहुत विलाप किया था।ऐसा लगा कि आगे बहन बेटियां सुरक्षित हो जायेगी।लेकिन समय के साथ वो भ्रम भी दूर हो गया।आज भी रिकॉर्ड के अनुसार हर दो घंटे में तीन औरतें दरिंदगी का शिकार होती है।रोज बसों में छेड़कानी होती है।किसी को क्या मतलब। देश की राजधानी में कोई घटना घटे व् राजनीति की पूरी सम्भावना हो तभी हंगामा मचता है।आज भी दिल्ली में बलात्कार बदस्तूर जारी है।लेकिन अभी कोई चुनाव नहीं है तो क्यों कोई समय ख़राब करेगा।लोकतंत्र की  इसके रखवाले ही इस तरह हत्या करते रहेंगे तो हम से भरोसे व् विश्वास की कसमें दिलाने का भ्रम क्यूँ पाला जाये?जनता सब जानती है।पिछलों का हिसाब चुकता कर दिया है।अब बारी वर्तमान में मौज उड़ाने की फ़िराक में फंसे हुक्मरानों की है।अगर जनता नादान होती तो आज एसी के कमरों से निकालकर तपती धुप में खेतों की खाक कौन छानने जाये! सजग रहिये,जागरूक रहिये।हुक्मरान आज भी मध्यकाल में जी रहे है।वो सोचते है कि मैंने जो कह दिया,जनता दैवीय प्रसाद मानकर स्वीकार कर लेगी।लेकिन आज हर जगह से जागरूक लोग आगे आ रहे है।उम्मीद है जनता को बिना हवाई सपने दिखाए जागरूक करते रहेंगे।बाकी जनता अपना फैसला खुद दे देगी....
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वामपंथी विचारधारा क्या है ?

नौजवानो को इस विचारधारा को समझना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी देश में नौजवान देश के विकास की  धुरी होते है। उनकी समझ, लगन, विचार ही राष्ट्र बनाते हैं, देश में अभी खूब लेफ्ट राइट चल रहा है, चाहे केरला,  त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, बिहार, पूरे देश में  एक तरफ वामपंथी विचारधारा प्रखर हो रही है, वहीं दूसरी पूंजीवादी व्यवस्था को कुचलने की कोशिश में लगी है, आज देश की नई पीढ़ी बहुत ही कम शब्दो में इसको समझना चाहती है, अब हम इसके मुख्य विषय पर बात करते है ।

Repercussion's of revolution

दुनियाँ में जितनी भी क्रांतियां हुई है वो मजदूरों व किसानों ने की है और इन्हीं के बीच से निकलकर जिन्होंने मध्यमवर्ग का दर्जा हासिल किया उन्होंने नेतृत्व दिया है मगर भारतीय समाज मे कभी कोई क्रांति क्यों नहीं होती इसकी जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते है तो पता चलता है कि किसान-कमेरों के बीच से निकलकर जो मध्यमवर्ग में पहुंचे है उन्होंने नेतृत्व देने के बजाय किसान-कमेरों के आक्रोश को दबाने की दलाली की है।

1857की किसानों की क्रांति का गला देशी रियासतों के झंडाबरदारों ने घोंटा था और आजाद भारत के 

इतिहास में किसानों के हर आक्रोश का गला तथाकथित किसान नेताओं ने घोंटा है व इनका सहयोग 
तथाकथित मध्यम वर्ग ने किया है।आजादी से पहले गद्दार कहलाते थे व आजादी के बाद चापलूस/दलाल/ किसान नेता कहलाने लग गए! इस देश के नागरिकों की समस्याओं को लेकर कई बार आक्रोश चरम पर पहुंचा मगर उस आक्रोश को शांत करके सत्ता के सहयोगी गुनाहगारों की तलाश करते है
तो अपने आसपास का ही कोई अपनत्व का वेश पहना सामने नजर आता है।यह कोई राकेट साइंस नहीं बल्कि सामान्य समझ की खोज है। 2012के बाद जैसे ही सोशल मीडिया ने जोर पकड़ा,देश की जनता के कोने में पड़े बुनियादी मुद्दे कपड़े झाड़कर सामने आ खड़े हुए।किसान,चिकित्सा,शिक्षा, बिजली, पानी सहित तमाम मुद्दे उठे मगर देश की बहुसंख्यक आबादी अर्थात किसान के गरीब लड़कों ने कलम उठाई तो किसान  आज सियासत का मुख्य मुद्दा बन गया।भारत मे विज्ञान को अपनाना है तो धर्म के नाम पर पाखंड व अंधविश्वास के वाहक बाबा/मौलवी/पादरी आदि रोड़ा बनकर खड़े हो जाते है!देश का मजदूर अगर अपने श्रम का मूल्य लेना चाहता है तो उनके ही समाज से निकले व मध्यम वर्ग वाले पेज-3पर स्थापित लोग ठेकेदार बनकर उनकी आवाज दबा देते है! अगर देश का किसान अपना आक्रोश प्रकट करता है तो तथाकथित किसान नेता उनकी आवाज को कुंद कर देते है!अगर तथाकथित लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से परे सोशल मीडिया में आवाज बुलंद हो रही है तो मूल किसान-कमेरे वर्ग से निकले नेता उसको दबाने का नेतृत्व करते है और इन समाजों में से छलांग लगाकर मध्यम वर्ग में पहुंचे लोग उनके गार्ड बनकर सुरक्षा देते है क्रांति की शुरुआत सदा जीवन-मरण के सवाल से होती है और धीरे-धीरे समान समस्याओं वाले नागरिकों को जोड़ती जाती है।

देशभर के किसान क्षेत्र,जाति व धर्म से परे एकजुट होने लगे और आक्रोश चरम सीमा पर पहुंचने लगा तो 
सियासतदानों के कान फ्रीक्वेंसी को कैच करने लगे।किसान व उनकी समस्याओं को मुख्य मुद्दा बनाने के लिए देश के लाखों किसानों ने आत्महत्याएं की,हजारों किसानों ने सत्ता के बल से हाथ-पैर तुड़वाये,हजारों बेरोजगार किसानों के बच्चे ने अपना भविष्य कुर्बान करके रात-दिन कलम घिसी है तब जाकर कहीं किसानों की समस्याओं पर इस देश की सियासत लौटी है। मोदी सरकार के खिलाफ वादाखिलाफी का ऐसा आक्रोश किसानों में पनपा कि अगर 2019में मोदी सरकार दुबारा सत्ता में आ जाती तो भी 2024तक सत्ता में नहीं रह सकती मगर कांग्रेस ने किसानों के इस आक्रोश को किसान नेताओं के माध्यम से भटका दिया है।कर्जमाफी! क्या इस देश का किसान गुनाहगार है जिसे माफी दी जाए?किसान कर्ज में डूबा तो कांग्रेस की गलत नीतियों व बीजेपी द्वारा उसको आगे बढ़ाने की फितरत के कारण! दुविधा क्रांति में यह नहीं होती कि पूर्व व वर्तमान की सत्ताधारी पार्टियां क्या कर रही है?दुविधा यह है कि देश मे इस व्यवस्था से नव-निर्मित मध्यम वर्ग कहाँ खड़ा है?पूर्ण किसान कर्ज मुक्ति की जैसे ही बात हुई उसको कर्जमाफी तक ले जाने वाला भी मध्यम वर्ग है और आधी-अधूरी घोषणाओं को जायज ठहराकर किसानों की आवाज दबाने वाला भी मध्यमवर्ग है।

भारतीय समाज का मध्यम वर्ग बड़ा अनूठा है।अपनी जड़ता/मूढ़ता व मूर्खताओं से परे सोचने की हिम्मत इसके 
अंदर नहीं है।यह भी विभिन्न टुकड़ों में बंटा हुआ है।तमाम बुद्धिजीवी इनको सामूहिक रूप से मध्यम वर्ग मानने की भारी भूल कर रहा है।धार्मिक मध्यम वर्ग,जातीय मध्यम वर्ग,राजनैतिक मध्यम वर्ग,सरकारी तंत्र का मध्यम वर्ग सहित बहुत सारे मध्यम वर्ग है।अगर पाखंड व अंधविश्वास के खिलाफ क्रांति हो तो धार्मिक मध्यम वर्ग उसको दबा देता है!अगर जातीय नेता के खिलाफ बगावत हो तो उसके चापलूस अर्थात जातीय मध्यम वर्ग उस आवाज को दबा देता है!अगर किसी राजनेता या राजनैतिक पार्टी के खिलाफ बगावत हो तो राजनैतिक मध्यम वर्ग उसका गला दबा देता है!अगर किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ आमजन में नाराजगी है और बगावत होती है तो उसके समर्थक अर्थात चमचा रूपी मध्यम वर्ग उसकी आवाज को कुंद कर देता है और सबसे बड़ी विडंबना है कि इस मध्यम वर्ग का आपसी तालमेल बड़ा तगड़ा होता है इसलिए हर क्रांति का गला यह मध्यम वर्ग मिलकर घोंट देता है। मोदी सरकार के खिलाफ किसान कर्ज मुक्ति ,उचित मूल्य व बुनियादी सुविधाओं को लेकर लामबंद हुए तो कांग्रेस ने कर्जमाफी का पासा फेंककर अपने राजनैतिक मध्यम वर्ग को मैदान में उतार दिया और अन्य समूहों का मध्यम वर्ग किसानों को चोर-बेईमान घोषित करने लग गया।जैसे ही तीन राज्यों में कांग्रेस ने किसान क्रांति का गला घोंटने हेतु फर्जी कर्ज मुक्ति अर्थात कर्जमाफी का छलावा पेश किया तब से आजाद भारत की किसान क्रांति की बुनियाद में मठा डालने का सबसे बेहतरीन कार्य किसान कौम के नेता व किसान कौम से निकला मध्यम वर्ग करने में लग गया। अगर समय रहते तथाकथित बाबाओं/किसान नेताओं/किसान वर्ग के अधिकारियों का इलाज नहीं किया गया तो इनके पीछे खड़ा मध्यम वर्ग असली जड़ को बर्बाद करने में ज्यादा वक्त नहीं लगाएगा!

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