दुनियाँ में जितनी भी क्रांतियां हुई है वो मजदूरों व किसानों ने की है और इन्हीं के बीच से निकलकर जिन्होंने मध्यमवर्ग का दर्जा हासिल किया उन्होंने नेतृत्व दिया है मगर भारतीय समाज मे कभी कोई क्रांति क्यों नहीं होती इसकी जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते है तो पता चलता है कि किसान-कमेरों के बीच से निकलकर जो मध्यमवर्ग में पहुंचे है उन्होंने नेतृत्व देने के बजाय किसान-कमेरों के आक्रोश को दबाने की दलाली की है।
1857की किसानों की क्रांति का गला देशी रियासतों के झंडाबरदारों ने घोंटा था और आजाद भारत के
इतिहास में किसानों के हर आक्रोश का गला तथाकथित किसान नेताओं ने घोंटा है व इनका सहयोग
तथाकथित मध्यम वर्ग ने किया है।आजादी से पहले गद्दार कहलाते थे व आजादी के बाद चापलूस/दलाल/ किसान नेता कहलाने लग गए! इस देश के नागरिकों की समस्याओं को लेकर कई बार आक्रोश चरम पर पहुंचा मगर उस आक्रोश को शांत करके सत्ता के सहयोगी गुनाहगारों की तलाश करते है
तो अपने आसपास का ही कोई अपनत्व का वेश पहना सामने नजर आता है।यह कोई राकेट साइंस नहीं बल्कि सामान्य समझ की खोज है। 2012के बाद जैसे ही सोशल मीडिया ने जोर पकड़ा,देश की जनता के कोने में पड़े बुनियादी मुद्दे कपड़े झाड़कर सामने आ खड़े हुए।किसान,चिकित्सा,शिक्षा, बिजली, पानी सहित तमाम मुद्दे उठे मगर देश की बहुसंख्यक आबादी अर्थात किसान के गरीब लड़कों ने कलम उठाई तो किसान आज सियासत का मुख्य मुद्दा बन गया।भारत मे विज्ञान को अपनाना है तो धर्म के नाम पर पाखंड व अंधविश्वास के वाहक बाबा/मौलवी/पादरी आदि रोड़ा बनकर खड़े हो जाते है!देश का मजदूर अगर अपने श्रम का मूल्य लेना चाहता है तो उनके ही समाज से निकले व मध्यम वर्ग वाले पेज-3पर स्थापित लोग ठेकेदार बनकर उनकी आवाज दबा देते है! अगर देश का किसान अपना आक्रोश प्रकट करता है तो तथाकथित किसान नेता उनकी आवाज को कुंद कर देते है!अगर तथाकथित लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से परे सोशल मीडिया में आवाज बुलंद हो रही है तो मूल किसान-कमेरे वर्ग से निकले नेता उसको दबाने का नेतृत्व करते है और इन समाजों में से छलांग लगाकर मध्यम वर्ग में पहुंचे लोग उनके गार्ड बनकर सुरक्षा देते है क्रांति की शुरुआत सदा जीवन-मरण के सवाल से होती है और धीरे-धीरे समान समस्याओं वाले नागरिकों को जोड़ती जाती है।
देशभर के किसान क्षेत्र,जाति व धर्म से परे एकजुट होने लगे और आक्रोश चरम सीमा पर पहुंचने लगा तो सियासतदानों के कान फ्रीक्वेंसी को कैच करने लगे।किसान व उनकी समस्याओं को मुख्य मुद्दा बनाने के लिए देश के लाखों किसानों ने आत्महत्याएं की,हजारों किसानों ने सत्ता के बल से हाथ-पैर तुड़वाये,हजारों बेरोजगार किसानों के बच्चे ने अपना भविष्य कुर्बान करके रात-दिन कलम घिसी है तब जाकर कहीं किसानों की समस्याओं पर इस देश की सियासत लौटी है। मोदी सरकार के खिलाफ वादाखिलाफी का ऐसा आक्रोश किसानों में पनपा कि अगर 2019में मोदी सरकार दुबारा सत्ता में आ जाती तो भी 2024तक सत्ता में नहीं रह सकती मगर कांग्रेस ने किसानों के इस आक्रोश को किसान नेताओं के माध्यम से भटका दिया है।कर्जमाफी! क्या इस देश का किसान गुनाहगार है जिसे माफी दी जाए?किसान कर्ज में डूबा तो कांग्रेस की गलत नीतियों व बीजेपी द्वारा उसको आगे बढ़ाने की फितरत के कारण! दुविधा क्रांति में यह नहीं होती कि पूर्व व वर्तमान की सत्ताधारी पार्टियां क्या कर रही है?दुविधा यह है कि देश मे इस व्यवस्था से नव-निर्मित मध्यम वर्ग कहाँ खड़ा है?पूर्ण किसान कर्ज मुक्ति की जैसे ही बात हुई उसको कर्जमाफी तक ले जाने वाला भी मध्यम वर्ग है और आधी-अधूरी घोषणाओं को जायज ठहराकर किसानों की आवाज दबाने वाला भी मध्यमवर्ग है।
भारतीय समाज का मध्यम वर्ग बड़ा अनूठा है।अपनी जड़ता/मूढ़ता व मूर्खताओं से परे सोचने की हिम्मत इसके अंदर नहीं है।यह भी विभिन्न टुकड़ों में बंटा हुआ है।तमाम बुद्धिजीवी इनको सामूहिक रूप से मध्यम वर्ग मानने की भारी भूल कर रहा है।धार्मिक मध्यम वर्ग,जातीय मध्यम वर्ग,राजनैतिक मध्यम वर्ग,सरकारी तंत्र का मध्यम वर्ग सहित बहुत सारे मध्यम वर्ग है।अगर पाखंड व अंधविश्वास के खिलाफ क्रांति हो तो धार्मिक मध्यम वर्ग उसको दबा देता है!अगर जातीय नेता के खिलाफ बगावत हो तो उसके चापलूस अर्थात जातीय मध्यम वर्ग उस आवाज को दबा देता है!अगर किसी राजनेता या राजनैतिक पार्टी के खिलाफ बगावत हो तो राजनैतिक मध्यम वर्ग उसका गला दबा देता है!अगर किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ आमजन में नाराजगी है और बगावत होती है तो उसके समर्थक अर्थात चमचा रूपी मध्यम वर्ग उसकी आवाज को कुंद कर देता है और सबसे बड़ी विडंबना है कि इस मध्यम वर्ग का आपसी तालमेल बड़ा तगड़ा होता है इसलिए हर क्रांति का गला यह मध्यम वर्ग मिलकर घोंट देता है। मोदी सरकार के खिलाफ किसान कर्ज मुक्ति ,उचित मूल्य व बुनियादी सुविधाओं को लेकर लामबंद हुए तो कांग्रेस ने कर्जमाफी का पासा फेंककर अपने राजनैतिक मध्यम वर्ग को मैदान में उतार दिया और अन्य समूहों का मध्यम वर्ग किसानों को चोर-बेईमान घोषित करने लग गया।जैसे ही तीन राज्यों में कांग्रेस ने किसान क्रांति का गला घोंटने हेतु फर्जी कर्ज मुक्ति अर्थात कर्जमाफी का छलावा पेश किया तब से आजाद भारत की किसान क्रांति की बुनियाद में मठा डालने का सबसे बेहतरीन कार्य किसान कौम के नेता व किसान कौम से निकला मध्यम वर्ग करने में लग गया। अगर समय रहते तथाकथित बाबाओं/किसान नेताओं/किसान वर्ग के अधिकारियों का इलाज नहीं किया गया तो इनके पीछे खड़ा मध्यम वर्ग असली जड़ को बर्बाद करने में ज्यादा वक्त नहीं लगाएगा!
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