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क्या लिखें-क्या न लिखे के निर्देशकों सुनो

आप अगर कुछ भी लिख दें तो कई लोग आ जाते हैं यह कहने कि आप फलां विषय पर क्यों नहीं लिखते , आपको अमरनाथ यात्रियों की पीड़ा पर लिखना चाहिए,आपको हज यात्रियों की तकलीफ पर लिखना चाहिए या आपको कश्मीरी पंडितों के बारे में लिखना चाहिए!तरह तरह के सुझाव आते हैं।आपको ओवैसी पर लिखना चाहिए,आपको गांधी पर लिखना चाहिए,आपको मोदी पर लिखना चाहिए,यानी जिस विषय पर लिखा है उसके अलावा हर विषय पर लिखने का आदेश आने लगता है।मैं भी इस तरह के टिप्पणीकारों के लिए एक साथ ही पोस्ट के माध्यम से जवाब पेश कर देता हूँ।
मैं गरीब किसान का बेटा हूँ।दर-दर के संघर्षों से कुछ हासिल किया है।जब भी घर से निकलता हूँ और ट्रेक्टर में प्याज लेकर गली में बेचते किसान को देखता हूँ तो खुद के बचपन का संघर्ष याद आ जाता है।आसपास के बुजुर्ग किसानों के चेहरों की झुर्रियां के साथ चिलचिलाती धूप व हाड़ गलाती ठंड में तड़पते धरती के भगवान की याद आ जाती है।आगे बढ़ता हूँ तो गली में एक मंदिर आता है उसमें बड़ी तोंद का पंडित ए सी के सामने देखता हूँ।अब आप ही बताइए मैं प्याज बेचते किसान को भगवान मानू या मंदिर में मुफ्त में माल बटोरते पंडित के सामने संगमरमर की मूर्ति की लाचारगी को भगवान मानूँ?
आप ही मेरा मार्गदर्शन करिये कि आज तक 15लाख किसान इस देश का पेट भरते-भरते संघर्ष करते हुए अपने खेतों में ही फांसी पर लटक गए मगर अपने खेत को अलविदा नहीं कहा।अपने वतन पर आये कुछ आतताइयों से डरकर संघर्ष का रास्ता छोड़कर भागे चंद हजार कश्मीरी कायरों के बारे में लिखूं या जिन्होंने संघर्ष के मैदान में अपना जीवन कुर्बान कर दिया हो उनके बारे में लिखूं?
अपने खेत पर चौबीसों घंटे मेहनत करके फसल तैयार करके ये यात्री अपना सामान लेकर मंडी में जाते है और जलालत झेलकर अपनी फसल कौड़ियों के दाम लुटेरों के अड्डों पर फेंककर आते है और दूसरी तरफ ये लुटेरे धर्म की चादर ओढ़कर हज व अमरनाथ की यात्रा के नाम पर माल उड़ाने निकल पड़ते है!आप ही मार्गदर्शन करिये मुझे क्या लिखना चाहिए?
जब मेरा किसान मर रहा है,मेरे किसान के बच्चे बेरोजगार घूम रहे है तो मुझे सत्ता के खिलाफ लिखना चाहिए या सत्ता का गुणगान करना चाहिए?जब मेरे देश का आधा बचपन कुपोषित है,आधी महिलाएं कुपोषित है,बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है,शिक्षक नहीं,अस्पतालों में इलाज नहीं है तब मुझे सत्ता से सवाल करना चाहिए या सत्ता के सहयोगी चंद राजनेताओं का गुणगान शुरू कर देना चाहिए?
मेरा तमाम ऐसे टिप्पणीकारों से प्रतिक्रिया स्वरूप सवाल है कि अपने इर्द-गिर्द के मुद्दों से मुँह मोड़कर आप भक्ति की परंपरा निभा सकते हो मगर मेरे सोचने का,मेरे लिखने का रास्ता जरा अलग है।जो लोग जनता के बुनियादी मुद्दों पर तार्किक सोच व गरीब-मजलूम के बेहतरी की सोच रखते है,कार्य करते है मैं उनका समर्थन जरूर करता हूँ मगर राजनीति में सबकुछ जायज है,कहने वालों के साथ कभी खड़ा नहीं हो सकता!
मेरे दिल मे आक्रोश है,मेरे अंदर बगावत है।इस सत्ता से,इस व्यवस्था से,इस घटिया स्तर की राजनीति से,कुर्सी के लालची कीड़ों से और इनके पीछे चल रहे झुंडों से मुझे नफरत है क्योंकि पथभ्रष्ट,मानवभक्षी भेड़िये है जिनकी गुलाम मानसिकता लक्जरी लाइफ में अपना मसीहा ढूंढती है और मैं अंतिम छोर पर बैठे किसान-कमेरे को क्रांति का नेता मानता हूँ।
मेरी कलम के लिए न गांधी महत्वपूर्ण है और न मोदी!मेरी कलम के लिए न ओवैसी महत्वपूर्ण है और न योगी!मेरे लिए व्यक्ति नहीं विचारधारा महत्व रखती है और जो भी गरीब-मजलूम की विचारधारा के खिलाफ जाएगा उसके प्रति कलम बगावत करेगी!मेरी कलम की स्याही गरीब किसान के संघर्षों की दास्ताँ है जो सिर्फ और सिर्फ किसान-कमेरों के हित मे लिखती जाती है।इसकी राहों में कोई संघर्ष का सारथी दिखता है तो उस पर रुक जाती है या संघर्ष में कोई रोड़ा बनता नजर आता है तो उसके साथ भी बगावत कर बैठती है क्योंकि कलम को बहुत लंबा सफर तय करना है।
कौन मुझे समाज द्रोही कहे,कौन मुझे देशद्रोही कहे,कौन मुझे पागल कहे उसकी मुझे कोई परवाह नहीं है।मुझे परवाह भूख से तड़पते इंसानों की है,मुझे परवाह कुपोषित बचपन की है,मुझे परवाह रोज शहीद होते मेरे जवानों की है,मुझे परवाह इलाज के अभाव में मरते नागरिकों की है,मुझे परवाह सड़क पर आश्रय लिए,ठंड में कांपते इंसानों की है,मुझे परवाह हाड़तोड़ मेहनत के बाद फांसी पर लटकते किसानों की है और उसी अंदाज मैं मेरी कलम चलती है।
लिखने के लिए सारा जहां पड़ा है!जिसकी जो मर्जी वो लिखे मगर मेरी कलम न पैसे की खनक से,न पावर की धौंस से,न जाति-धर्म के बंधन की दुहाई से रुकती है और न सत्ता से नजदीकियों की चाहत रखती है।
कभी उसके बारे में भी लिख दिया करो!कभी इसके बारे में भी लिख दिया करो सरीखी बचकानी बातें लिखने वालों को मेरा स्पष्ट जवाब है कि मैं हवा के साथ बहकर नहीं लिखता।मैं तथाकथित चौकीदारों की जमात में शामिल होकर वाहवाही सुनकर आत्मसंतुष्टि का भूखा इंसान नहीं हूँ बल्कि मैं इन असली चौकीदारों अर्थात देश की हिफाजत के लिए निकले असली यात्रियों की हालत को सामने रखते हुए गाली खाकर भी खुद को खुशनसीब समझता हूँ।

किसकी जीत,किसकी हार!

देश मे चुनावी पर्व चल रहा है।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,प्रिंट मीडिया व सोशल मीडिया में धूम मची हुई है।कोई किसी को जीता रहा है तो किसी को मगर जमीन पर इस बार खामोशी ज्यादा नजर आ रही है।सोशल मीडिया से आमजन तक सूचनाएं पहुंच रही है और लोग अपने-अपने हिसाब से चुपचाप मानस बना रहे है।पैसे के बल पर कहीं कहीं भीड़,जुलूस व रैलियां जरूर की जा रही है मगर शामिल होने वाली जनता किसको मतदान करेगी यह तय नहीं है।
कुछ चर्चाएं आम है जिसका बिना जिक्र किये आगे बढ़ना उचित नहीं होगा!बीजेपी की खामोश हार होगी!कांग्रेस खत्म हो जाएगी!प्रधानमंत्री तो मोदी ही बनेंगे!राहुल प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं!गठबंधन की सरकार बनेगी।क्षेत्रियों दलों का रुतबा बढ़ेगा आदि!मेरा नजरिया इन चर्चाओं से थोड़ा अलग है।मेरे हिसाब से यह चुनाव मोदी ब्रांड बनाम जनता होता प्रतीत हो रहा है।तमाम असमंजस के बीच जनता के मानस पटल पर द्विधारी सोच तैर रही है।मोदी को जिताने वाली व मोदी को हराने वाली!जिताने की सोच वालों के दिमाग मे बस यही है कि मोदी हर हाल में जीते नहीं तो देश खत्म हो जायेगा और हराने की सोच वालों के दिमाग मे बस यही है कि मोदी दुबारा आ जायेगा तो संविधान बदल दिया जायेगा, लोकतंत्र खत्म कर दिया जायेगा, तानाशाही का आगाज होगा।
एक बात गौर करने वाली यह भी है कि जो जीताना चाहते है वो सिर्फ सुनाना चाहता है!सुनना उनको कतई पसंद नहीं है मतलब एकतरफा प्रचार हो रहा है।शायद उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए कुछ खास है नहीं!या फिर इनको अंदर ही अंदर कुछ डर सता रहा है या इनको भटका दिया गया है!दूसरी तरफ हराने वाले बाकायदा तथ्यों के साथ जनता के सामने जा रहे है,जनता के सवालों के जवाब दिए जा रहे है और ये लोग कांग्रेस की विचारधारा से इतर लोग है।कहने का मतलब यह है कि इनका कांग्रेस से कोई लेना देना नहीं है।चाहे कांग्रेस जिये या खत्म हो!
जब मुझे लगा कि असल मे बीजेपी व कांग्रेस जनता के बुनियादी मुद्दों पर न आकर हवा-हवाई क्यों चल रहे है तो दूसरे नजरिये से कुछ छानबीन शुरू की।सबसे पहले संघ के मुख्यालय की तहकीकात की।बड़ी-बड़ी फार्च्यूनर जैसी गाड़ियों का काफिला खड़ा नजर आया।10 साल पहले बाकायदा इस मुख्यालय में साइकिलों के लिए पार्किंग स्टैंड बने हुए थे जो अब लगभग गायब हो गए है और उनकी जगह इन लक्जरी गाड़ियों ने ले ली है।स्वदेशी व सादगी की गाथा गाने वाले व साइकिलों पर चलने वाले प्रचारक अब खुलकर आरएसएस के स्वयंसेवक लिखा टी शर्ट पहनते है और इन लग्जरी गाड़ियों में घूमने लगे है।कभी संघ कहा करता था कि यह शुद्ध रूप से सांस्कृतिक संगठन है और इसका राजनीति से कोई मतलब नहीं है!बीजेपी से सदा अलग होने की दुहाई देता रहा था मगर पिछले पांच सालों में उतरोतर म्यान से तलवार बाहर आती गई और अब खुलकर बीजेपी व संघ देश के सामने आ गया है।
मैंने पहले एक लेख के माध्यम से लिखा था कि संघ ने भाजपा के सामने समर्पण कर दिया है।सत्ता की धौंस व पैसे की खनक संघ को लील रही है।यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक और न कांग्रेस के लिए,न देश के लिए निर्णायक है और न जनता के लिए!ये चुनाव सिर्फ और सिर्फ आरएसएस के लिए निर्णायक है।कोई जीते या कोई हारे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है मगर यह चुनाव इस सांस्कृतिक संगठन के ताबूत में आखिरी कील जरूर ठोक देगा।
पिछले पांच सालों में बीजेपी के विधायकों-सांसदों,पार्टी पदाधिकारियों, मंत्रियों के इर्द-गिर्द संघ के स्वयंसेवको का जमावड़ा रहा है और पैसे का खून उनके मुँह पर लग चुका था इसलिए मोदी सरकार की विदेशनीति से लेकर एफडीआई तक पर संघ ने कभी मुंह नहीं खोला।सार्वजनिक उपक्रम निजी पूंजीपतियों के हवाले होते गए,मेक इन इंडिया के नारे के बीच विदेशी कंपनियां देश के संसाधनों पर कब्जा करती रही मगर संघ खामोश रहा।किसान पर लाठियां बरसती रही और संघ का संगठन भारतीय किसान संघ ने कभी मुँह नहीं खोला।11अशोका रोड से कार्यालय अरबों रुपये के हाईटेक केंद्र में बदल गया और संघ उसके पीछे चलता गया।कहने लबो-लुआब यही है कि 90साल जो स्वयंसेवक शाखाओं में प्रशिक्षण ले रहे थे वो प्रशिक्षण कहीं काम नहीं आया और सत्ता ने एक ही झटके में अपने आगोश में ले लिया।
2014के जीत के बाद बीजेपी के प्रभावी नेतृत्व व धनबल के साथ संघ का जो टकराव शुरू हुआ था वो 2019आते-आते मुकम्मल तरीके से खत्म हो चुका है।इन पांच सालों में स्वयंसेवक देशी चे-ग्वेरा की तरह क्रांति करते हुए सत्ता के इर्द-गिर्द माल लूटते नजर आए!स्वयंसेवकों को इन पांच साल की सत्ता के लुत्फ ने यह समझा दिया है कि बिना उत्पादन के हरामखोरी में कैसे एशो-आराम की जिंदगी काटी जाती है।कहा जाता है कि फुल टाइम स्वयंसेवकों के पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती मगर अब देख सकते है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 3करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का ब्यौरा चुनावी घोषणापत्र में दिया है।यह सभी स्वयंसेवको को साफ संदेश है कि पूंजी पर ध्यान केंद्रित करो!आज कई स्वयंसेवकों ने लक्जरी गाड़ियां,बंगले व फार्म हाउस तक हासिल कर लिए है!नौकरशाही में समाया स्वयंसेवक राज्यपाल,वाईस चांसलर सरीखे पदों पर बैठकर आनंद-मंगल में है।अब स्वयंसेवक पेड कार्यकर्ता है।पूंजी निर्माण वाला सिनेमा कभी विचारधारा का वाहक नहीं होता है।देश व समाज के प्रति निष्ठा का लोप बड़े बड़े सांस्कृतिक संगठनों को ले डूबता है जिसमे संघ भी अपवाद नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि राम-मंदिर कौन बनायेगा?धारा 370कौन हटायेगा?समान नागरिक संहिता लागू करके देश को एकसूत्र में कौन पिरोयेगा?हिन्दू राष्ट्र कौन बनायेगा?इन सवालों को समझने के लिए पिछले पांच सालों में आरएसएस व बीजेपी की चुपी बहुत कुछ कहती है।पथभ्रष्ट लोगों का झुंड कभी बनाने में विश्वास नहीं करता है।इनका कार्य स्थापित चीजों को तोड़ना होता है।इनकी नींव ही विध्वंस के रास्ते से हुई है।दो-नेशन थ्योरी के जनक ये ही लोग थे।देश के नागरिकों को नफरत की बुनियाद पर धर्मों के बाड़े में बांटने वाले ये ही लोग है!इनका इतिहास उठाकर देख लीजिए इन्होंने कभी जोड़ने/बनाने का कोई कार्य नहीं किया है!अब संघ व भाजपा आपस मे घुल-मिलकर एक होने का नजारा पेश कर रही है तो यकीन मानिए जड़ अर्थात संघ पूंजीवादी भाजपा के चंगुल में है और 2019 के बाद संघ की शाखाएं पार्कों/मैदानों/खेतों से निकलकर शहरों में दलाली के आउटलेट बनती नजर आयेगी!जिस गति से तोड़क बाण से देश को टुकड़ों में तोड़ने का काम किया है,धर्म से निकलते हुए जातियों में तोड़ रहे है,यह कार्य अब दुगुनी तेजी से होगा!
आपका ध्यान किधर है!
टुकड़े-टुकड़े गैंग इधर है!!


गर्व नौकरों पर या नेतृत्वकर्ता पर

कल शाम को यूपीएससी के भारतीय प्रशासनिक सेवा के नतीजे आये और तमाम बहुजन समाज की जातियों के लोग अपनी-अपनी जाति के सफल युवाओं को बधाइयां दे रहे है और इनके माध्यम से जातीय गौरव का उभार दिखा रहे है।अच्छा हुआ बेरोजगार थे और रोजगार मिल गया!अच्छा हुआ नेतृत्व करने की क्षमता नहीं थी इसलिए नौकर बन गए!अच्छा हुआ गरीब युवा को घर संभालने का अवसर मिल गया मगर इनसे समाज,देश,गरीब, मजलूम के फेवर में क्रांति की उम्मीद कभी मत पालियेगा।दुग्ध क्रांति लाने वाले पीजे कुरियन,हरित क्रांति लाने वाले स्वामीनाथन,टेलीकॉम क्रांति लाने वाले पित्रोदा,देश को मिसाइल व परमाणु से लैस करने वाले कलाम ये कभी नहीं बन सकते!
किसान-कमेरों की आवाज बनने वाले चौधरी छोटूराम,दलित-पिछड़ों की कलम बनने वाले भीमराव अंबेडकर,बहुजन समाज को कलम थमाने वाले ज्योतिबा फुले,पाखंड व अंधविश्वास की बेड़ियों को उतारने वाले पेरियार ये कभी नहीं बन सकते!न ये कृषि को मुनाफे में बदलने के तरीके बताने वाले चौधरी चरणसिंह बन सकते है और न ये बहुजन समाज को जगाकर सत्ता की चाबी बताने वाले कांशीराम बन सकते है!
मैं मेरे अनुभव व अध्ययन के बल पर दावे के साथ कहता हूँ कि जिस कच्चे मकान में बैठकर, जिस झोंपडी में बैठकर इन्होंने पढ़ाई की होगी उसकी लीपापोती तो दूर खंडहर बन जायेगी और ये बड़े बाबू बनकर शहरों में शिफ्ट हो जाएंगे।गांवों की मिट्टी की खुशबू से हासिल तरक्की से ये शहरों की सड़कों के बराबर की टाइल्स हर साल बदलते नजर आएंगे मगर जिस गांव की सरकारी स्कूल से इन्होंने शुरुआत की उस स्कूल को खंडहर में बदलते देख मुस्करायेंगे कि कब गिरे और कब मेरी पत्नी/मेरे पति के नाम निजी स्कूल खोलूं!
इस देश को सबसे ज्यादा आईएएस व आईपीएस कोसी नदी के किनारे वाले बिहार ने दिए है मगर ये हजारों आईएएस/आईपीएस मिलकर उस क्षेत्र में शिक्षा,चिकित्सा,रोटी,कपड़ा व मकान की व्यवस्था नहीं कर पाएं!जब भी किसी गांव से कोई प्रशासनिक अधिकारी बनता है तो उसकी मेहनत को देखकर मैं भी भावुक हो जाता हूँ व उसको सलाम करता हूँ मगर फिर दूसरा पहलू सोचकर व्यथित हो जाता हूँ कि मेरे गांव की मेहनत इस देश का सिस्टम,इस देश का भावुक समाज शहर में शिफ्ट करने में कामयाब हो गया!
अंग्रेजों के जमाने मे फाइल्स की नोटिंग/ड्राफ्टिंग करने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर इस सेवा की स्थापना की गई थी मगर काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हुए तब इस सेवा में बदलाव करने/खत्म करके राज्यों को सौंपने के बजाय इन्होंने भी हूबहू जारी रखा।देश के मेहनती बच्चों/नवाचार पैदा करने की प्रतिभाओं को इन फाइल्स में रौंदकर रख दिया।सर्विस रूल्स ऐसे कि इंसान के बजाय नोटिंग/ड्राफ्टिंग करने के कंप्यूटर/फोटो कॉपी की मशीन की तरह बना दिये जाते है।खुलकर कहता हूँ कि यह सेवा देश की प्रतिभाओं का बूचड़खाना बन चुकी है।
अगर गर्व करना है तो बेहतर खेती करने वाले किसान पर करो,अगर गर्व करना है तो बेहतर कारीगरी करने वाले मजदूर पर करो,अगर गर्व करना है तो गाय-भैंस पालकर डेयरी खोलने वाली बहनों पर करो,अगर गर्व करना है कॉलेजों-विश्विद्यालयों में कमजोर छात्रों की लड़ाई लड़ने वाले छात्र-नेताओं पर करो,अगर गर्व करना है तो समाज की गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा,भुखमरी,प्यास के मुद्दों को लेकर सत्ता से संघर्ष करने वाले लोगों पर करो!फिर देखना कैसे समाज मे रेडिकल बदलाव आते है!गर्व नौकरों पर नहीं,नेतृत्वकर्ताओं पर करना चाहिए।
हमे गर्व PURA अर्थात Providing urban amenities in rural area सरीखे रोडमैप देने वाले अब्दुल कलाम पर करना चाहिए, हमे गर्व बाड़मेर में ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान के माध्यम से हजारों महिलाओं का हस्तशिल्प के क्षेत्र में नेतृत्व करने वाली बहन रूमादेवी पर करना चाहिए ताकि हमारा ग्रामीण भारत मजबूत हो,सशक्त हो,स्वावलंबी हो।


भारत मे जातिवाद

अक्सर मेरा रोज ऐसे लोगों से सामना होता है जो जातिवाद को खत्म करने की बात करते है व दूसरी तरफ ऐसे लोगों से भी सामना होता है जो जातीय गोलबंदी का झंडा लिए खड़े है।मैं भी दिल से चाहता हूँ कि जातिवाद खत्म हो मगर जब जमीन पर उतरता हूँ तो अपनी जाति का झंडा उठा लेता हूँ।यह दुविधा सिर्फ मेरे अकेले की नहीं है बल्कि जातिवाद के खिलाफ जो भी दिल मे भावना रखता है वो अपने समाज/जाति के साथ नाइंसाफी देखता है तो उसके विचार बदलने लग जाते है।मैं किसान जाति से हूँ इसलिए अस्पृश्यता रूपी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है मगर समाज के विकास की बात आती है,उचित अवसरों की बात आती है,लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की बात आती है,सत्ता में भागीदारी की बात आती है तो हमारे साथ अव्वल दर्जे की नाइंसाफी इस देश का सिस्टम करने लग जाता है!
यह साबित बात है कि अपनी श्रेष्ठता व सत्ता कायम रखने के लिए इस देश की जनता को लगभग 6700जातियों में बांटा गया और सहूलियत के हिसाब से ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई कि कुछ को तो बिल्कुल अधिकारविहीन कर दिया गया और कुछ को सीमित अधिकार दिए गए।खुद को सुप्रीम पावर बताकर स्वछंदता हासिल कर ली।खैर इतिहास में जो भी हुआ उसे हमे एकबारगी भूल जाना चाहिए और आजादी के बाद बने संविधान के आधार पर हमें सोचना है।
भारत का संविधान अपनी प्रस्तावना अर्थात कलेजे से कहता है भारत के सभी लोग समानता,स्वतंत्रता व बंधुता की भावना से आगे बढ़ेंगे।भारत का संविधान हमे गरिमामय जीवन जीने की गारंटी प्रदान करता है।रूल्स ऑफ लॉ का राज कायम होगा अर्थात कानून के सामने सब बराबर होंगे।राज्य का कर्तव्य है कि अपने नागरिकों में वैज्ञानिक सोच पैदा करे अर्थात भारत सरकार अपने नागरिकों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने का कार्य करेगी।
अब मैं 3घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा जिससे स्थिति साफ हो जायेगी।1997में बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में रणवीर सेना ने निम्न कही जाने वाली जाति के 60लोगों की हत्या कर दी थी और 2011में मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुख्या जेल से बाहर आ गया।न राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बनी और न टीवी चैनलों पर कोई हायतौबा हुई।
1999 में में दिल्ली में जेसिकालाल नामक एक मॉडल की गोली मारकर हत्या कर दी गई।2006में सभी आरोपी बरी हो गए।हर राष्ट्रीय अखबार की खबर थी No body killed jesica और जेसिका को किसी ने नहीं मारा।इस पर No one killed नाम से फ़िल्म भी बनाई गई।
2012में दिल्ली में निर्भया गैंग रेप की घटना घटी।4आरोपियों को फांसी की सजा,एक ने जेल में खुद फांसी खा ली व एक नाबालिग को 3साल के लिए सुधारगृह भेज दिया गया।1971में महाराष्ट्र के चंद्रपुर थाने के दो पुलिस वालों ने 12वर्षीय आदिवासी लड़की मथुरा के साथ गैंगरेप किया और 1979में दोनों आरोपी बरी हो गए।
2002 को गोड्डा में साबरमती एक्सप्रेस में 68 यात्रियों को जलाकर मार दिया गया।इनके आरोपियों में से ज्यादातर को सजा दे दी गई।2007 में समझौता एक्सप्रेस में बम ब्लास्ट हुआ और चारो आरोपी पिछले दिनों बरी हो गए।इन घटनाओं व हुए इंसाफ के बारे में आप गहराई से सोचिये।इस देश के सिस्टम ने इंसाफ किया है यह!
जम्हूरियत में धर्म व जाति की कट्टरता को कम करने के लिए हुकूमत को चाहिए कि वो संविधान को जमीन पर उतारे और सबको एक नजरिये से देखें।जब देश का दस्तूर कहता है कि कानून के सामने सब बराबर है तो धर्म/सम्प्रदाय/वर्ग/जाति देखकर ये फैसले क्यों होते है?जब अखलियतों पर/अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों द्वारा अत्याचार किये जाते है तो देश का सिस्टम संविधान के अनुरूप चलने से इनकार क्यों कर देता है?जब सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार होते है तो देश का वर्गीय मीडिया खामोशी क्यों बरत लेता है?देश के हुक्मरान बयानबाजी तक सीमित क्यों हो जाते है?देश का प्रशासन वर्ग विशेष के गिरेबां में हाथ डालकर कानून के सामने लाने से क्यों लड़खड़ाने लग जाता है?अंधी कानून की देवी के आगे बैठे काले झोले वाले मी लार्ड की कलम संविधान भूलकर अपने धर्म व जाति के आईने में अपराधियों को देखकर सजा लिखने से पीछे क्यों हट जाती है?
जहां मुल्क की मरकजी हुकूमतें धर्म व जाति के आधार पर विभाजन की नीति पर चलती है,जहां का मीडिया धर्म व जाति के आधार पर मुद्दे तय करता हो,जहां की कार्यपालिका धर्म व जाति देखकर कार्य करती हो,जहां की न्यायपालिका पूजा/इबादत के तौर तरीके देखकर, पहना लिबास देखकर इंसाफ का ढोंग करती हो उस देश मे धर्म विशेष के अनुयायी धार्मिक गोलबंदी करेंगे,जाति विशेष के लोग जातिय गोलबंदी करेंगे ही क्योंकि उनको इस देश के तंत्र पर भरोसा नहीं है,इस देश की व्यवस्था से कोई उम्मीदें नहीं होती है!
जब देश की विधायिका कानून बनाते समय भेदभाव करती है,कार्यपालिका लागू करते समय भेदभाव करती है,न्यायपालिका इंसाफ करते समय भेदभाव करती है तो मजलूमों में एक भय का माहौल पैदा होता है और धार्मिक व जातीय गोलबंदी ही उनके अस्तित्व के लिए एकमात्र उम्मीद नजर आती है।संविधान की पोथी कांच के डिब्बे में रखने के लिए नहीं रची गई थी बल्कि उसमे लिखे एक-एक वाक्य को हिंदुस्तान की फिजाओं में समान रूप से घोलना था!
जिन अल्पसंख्यकों ने,जिन निम्न व मध्यम जातियों ने आजादी के बाद बेहतर भविष्य की कल्पना की थी उनके अरमानों का क्या हुआ!उनके सपनों का हिसाब कहाँ गया!उनकी रोज टूटती उम्मीदों की भरपाई कौन करेगा!न्यायपालिका पर वर्ग विशेष का कब्जा,सत्ता पर वर्ग विशेष का कब्जा,शिक्षा पर वर्ग विशेष का कब्जा,मीडिया पर वर्ग विशेष का कब्जा!हर कदम पर यह अहसास करवाया जाता है कि आप अल्पसंख्यक हो या कमजोर जाति के हो इसलिए आपको अत्याचार सहन करना पड़ेगा!आप किसान कमेरे के बच्चे हो इसलिए ऊपरी ओहदों पर तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं हैं!तुम अल्पसंख्यक हो इसलिए संसद में आने की तुम्हे कोई जरूरत नहीं है!तुम निम्न जाति के हो इसलिए तुम्हे बैंक से कर्ज नहीं मिलेगा और तुम उद्योग नहीं लगा सकते,तुम मजदूरी करने के लिए पैदा हुए हो!
कैसे मिटेगी धार्मिक व जातिय दूरियाँ जब धर्म व जाति देखकर ही सबकुछ तय होता है?इसलिए मेरा तो यही कहना है कि अगर धार्मिक सौहार्द्र पैदा करना है,अगर जातिय भेदभाव दूर करना है तो हुक्मरान नागरिकों को फालतू का ज्ञान बांटने के बजाय संविधान को लागू करे।संविधान मजबूती से लागू होगा तभी देश के नागरिक भयमुक्त होंगे,संविधान मजबूती से लागू होगा तो जाति-धर्म की कट्टर बेड़ियां खुद ही ढीली पड़ने लगे जाएगी,संविधान मजबूती से लागू होगा तो धर्म/जाति से परे हर आदमी खुद को इस राष्ट्र का अव्वल दर्जे का नागरिक महसूस करेगा और आत्मविश्वास से लबरेज,जोश से परिपूर्ण नागरिक ही राष्ट्र की असली पूंजी होती है।

भगतसिंहवाद जियेगा,मनुवाद-पूंजीवाद मरेगा

आज सबसे पहले मैं शहीद भगतसिंह संधू के शहीदी दिवस पर उनको नमन करता हूँ,श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ।जब मैं समाज मे असमानता,गरीबी,लाचारी,बेबसी, अन्याय,अत्याचार,शोषण आदि देखता हूँ तो खुद के सामने भगतसिंह को जिंदा खड़ा पाता हूँ।मैँ कई बार ओशो की एक बात को बार-बार दोहराता हूँ कि जिस दिन भगतसिंह को फांसी हुई थी उसी दिन इस देश की जवानी मर गई थी।भगतसिंह कहा करते थे कि ये मनुवादी-पूंजीवादी गोरे अंग्रेज जाएंगे और मनुवादी-पूंजीवादी काले अंग्रेज उनकी जगह बैठ जाएंगे।अंग्रेजों की पूंजीवादी व्यवस्था से पैदा हुआ ऐशो-आराम वाला बुढापा व्यवस्था परिवर्तन को तैयार नव तरुण जवानी के ऊपर बैठ गया।आजादी के समय इस देश मे शिक्षित लोगों की बेहद कमी थी और इस जटिल पूंजीवादी व्यवस्था को समझने में नाकाम रहे!
पूंजीवादी-मनुवादी भेड़ियों ने भेड़ों के झुंड में पहुंचकर कहा कि मैं आप ही के खानदान से हूँ और आपका ही हित करने आया हूँ और देश की जनता ने काले मन के बजाय काले तन को देखकर अपने खानदान का समझ लिया था।जो लोग धर्म के नाम पर इस देश की बहुसंख्यक जनता को अपने ऐशो-आराम के लिए गुलाम बनाकर रखे थे वो ही गोरे अंग्रेजों की जगह प्रतिस्थापित हो गए।भगत सिंह जिस वर्ग चेतना की बात करते थे उन्हीं वर्गों को खंड-खंड करके बीच मे असमानता की मोटी दीवारें खड़ी कर दी गई।अंग्रेजों के समय जो वर्ग चेतना का भाव जगा था ,अंग्रेजों के जाते ही उस वर्गीय चेतना को टुकड़ों में बांटकर गला घोंट दिया गया।
भगतसिंह जिस धार्मिक व जातीय असमानता को दूर करने की बात करते थे उसी असमानता को आज उस मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर दिया है कि देश की जवानी उसमे उलझकर मर रही है।चंद मनुवादी/पूंजीवादी लोग अपने ऐशोआराम के लिए इस देश की तरुण जवानी के अरमानों को,सपनों को ,उम्मीदों को मार रहे है और धार्मिक-जातीय समूहों में बंटे उन्मादी झुंड एक दूसरे के खून के प्यासे होकर भाग रहे है।आज कर्ज में डूबा अन्नदाता आत्महत्या कर रहा है।अन्न पैदा करने वाला भूख से मर रहा है तो उसका बेटा सीमा पर पर्याप्त भोजन के अभाव से जूझ रहा है।अन्न पैदा करने वाला खेत मे मर रहा है व उसका बेटा सीमा पर शहीद हो रहा है।कौन लोग है जो बाप की मेहनत को अपने बेटे तक नहीं पहुंचने दे रहे है!कौन लोग है जो किसान को उसकी उपज का भाव नहीं लेने देते और सीमा पर खड़े उसके बेटे की थाली से दाल गायब कर रहे है!यह बात इस देश के नौजवानों को समझने की जरूरत है।
छत्तीसगढ़,झारखंड,मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,उड़ीसा,बंगाल के आदिवासियों की जमीनें छीनकर धन्ना सेठों को देने वाले कौन लोग है?जब आदिवासी/किसान रोजी-रोटी मांगते है तो उनको नक्सली बताकर उनके ही बेटों के हाथों गोलियों से भुनवा दिया जाता है।लुटा-पीटा बाप जब हक मांगता है तो उसी का बेटा सीने में गोलियां दाग देता है!कौन लोग है जो बाप-बेटे के बीच यह खाई खड़ी कर रहे है यह बात आपको समझनी होगी!कम से कम नौजवानों को अपने ईमान को कोयले की खदान समझकर जिंदल-अडानी के हाथों में जाने से रोकना होगा!
आज देशभर में हर दूसरे दिन कहीं न कहीं से धार्मिक-जातीय तनाव/हिंसा की खबरे आती है।कौन लोग है जो धार्मिक अड्डों में बैठकर माल लूट रहे है?कौन लोग है जो इन दंगों से हुए ध्रुवीकरण से राजनीति साधकर सत्ता की मलाई मार रहे है?क्या किसी मंदिर के पुजारी,मस्जिद के मौलवी या चर्च के पादरी का बेटा/भाई सीमा पर शहादत देने जाता है?क्या किसी विधायक/सांसद/मंत्री का बेटा वर्दी पहनकर,हाथ मे बंदूक लेकर सीमा पर खड़ा है?क्यों आज भगतसिंह वाली जवानी धार्मिक उन्मादी समूहों में बंटकर मर रही है?क्यों भगतसिंह वाली जवानी काले अंग्रेजों के समर्थक गुटों में बंटकर आपस मे जूतमपैजार कर रही है?
आज किसी गरीब का बच्चा दो जून की रोटी हासिल नहीं कर पाता है,शिक्षा से वंचित है,बीमारीं में इलाज नहीं मिल रहा है तो हमारा खून क्यों नहीं खोलता?धर्म के नाम पर हजारों सालों से गरीबों का शोषण हो रहा है।क्यों भारत के नौजवान गरीबों के हित मे खड़ा होकर धार्मिक सत्ता के खिलाफ बगावत नहीं करते?हर अन्याय भरी,भेदभाव भरी व्यवस्था पर सवाल क्यों नहीं खड़े कर पाते?आज धार्मिक उन्मादी लोग बाबर की गलती का बदला सलीम से लेने की बात करते है तो शम्बूक के कानों में शीशा भरने वाले राजा रामचंद्र के वंशजों के सामने हम सवाल खड़े करने से क्यों कतराते है?अगर पूर्वजों की गलतियों का हिसाब ही करना है तो सबका हिसाब हो!
हम भगतसिंह के सपनों का भारत बनाना चाहते है और मनुवादी लोग नाथूराम के सपनों का भारत बनाना चाहते है।हम धर्म व जाति से परे समतामूलक समाज की बात करते है और मनुवादी लोग एकल हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात करते है।हिन्दू राष्ट्र कैसा होगा?वो ही चार वर्ण होंगे और वो तुलसीदास की चौपाई में कहा जायेगा कि "क्षुद्र,ढोर, पशु और नारी,ये सब ताड़न के अधिकारी!"क्या मनुवाद व भगतसिंहवाद एक साथ चल सकते है?भगतसिंह को चाहने वालों!खेतों में धान रोपने वाली,खलिहानों में गेहूं काटने वाली,सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली,सड़क निर्माण में गिट्टी कंक्रीट डालने वाली तुम्हारी भारत माता है।भगतसिंह प्रेमियों!खेतों में हल चलाने वाला,खानों में पत्थर तोड़ने वाला, ऊंची-ऊंची इमारतों पर ईंटे ढोने वाला तुम्हारा राष्ट्र पिता है।काल्पनिक कार्टूनों,धार्मिक पाखंडियों,आदर्श वादी/हवाई किताबों,तथाकथित मसीहाओं को छोड़कर राष्ट्रनिर्माण में लगे असली लोगों को नमन/सलाम/प्रणाम करना शुरू कर दोगे उसी दिन से व्यवस्था परिवर्तन की शुरुआत हो जाएगी।
अगर आपके पडौसी का बच्चा शिक्षा से वंचित है,आपका पडौसी इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है,कर्ज में डूबा किसान आत्महत्या कर रहा है,शांतिकाल में भी आपका भाई सीमा पर शहीद हो रहा है,चोर लुटेरे गरीबों की जमीनें लूट रहे है,पाखंडी लोग गरीबों का शोषण कर रहे है,काले अंग्रेज धंनसेठों से गलबहियाँ करते हुए घूम रहे है,महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे है,बेटियों को गर्भ में ही मारा जा रहा है,दलितों पर जाति के आधार पर अत्याचार हो रहे है,अल्पसंख्यकों को दुश्मन बताकर बहुसंख्यक लोगों को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है और आप चुपचाप देख रहे है तो आपको आज भगतसिंह को नमन करने की कोई जरूरत नहीं है!आपने भगतसिंह का मात्र फोटो देखा है उनको पढ़ा नहीं है।फोटो लगाकर जोश में आना धार्मिक उन्मादी लोगों से ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि धार्मिक उन्मादी लोगोँ को अपना मकसद/उद्देश्य पता होता है लेकिन आप लोग फोटो लगाकर अनजाने में उनके विचारों की हत्या कर रहे होते हो!
भगतसिंह की पसंदीदा शायरी....
उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।


भारतीय क्रांतिकारी स्वरूप!

भारत मे निजी फाइव स्टार अस्पतालों में जुकाम का इलाज करवाकर 

सरकारी अस्पतालों व सरकारी डॉक्टरों को तकिया लगाकर गालियां देने 

वाले लोग चिकित्सा जगत के क्रांतिकारी नेता माने जाते है! जबकि 

हकीकत यही है कि जो लोग अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में करवाते 

हुए असुविधाओं के प्रति सत्ता का ध्यान आकर्षित करते है,सत्ता से बेहतर 

सुविधाओ की मांग करते है वो क्रांतिकारी बदलाव के वाहक होते है।

भारत मे जो लोग अपने बच्चों को महंगे कान्वेंट/निजी स्कूलों में भेजकर 

शिक्षा व्यवस्था को गालियां देते है,सरकारी शिक्षकों को कामचोर/बेईमान 

घोषित करते है,सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमियों का मख़ौल 

उड़ाते है वो शिक्षा पद्धति में बदलाव के क्रांतिकारी माने जाते है! जबकि 

अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजकर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की 

कमी,आधारभूत सुविधाओं की कमी,सेलेबस पर नजर रखते हुए सत्ता 

से उपलब्धता सुनिश्चित करने,सुविधा उपलब्ध करवाने व वैज्ञानिक शिक्षा 

पद्धति को लेकर सत्ता से मांग करते है,सत्ता से सवाल करते है वो ही 

असल मे शिक्षा सुधार की क्रांति के वाहक होते है। अक्सर यह देखा गया 

है कि मिनरल वाटर पीने वाले लोग जनता के लिए शुद्ध पेयजल की मांग 

करते है। लग्जरी गाड़ियों में घूमने वाले लोग सार्वजनिक यातायात प्रणाली 

को दुरुस्त व बेहतर करने की मांग करते है। फर्स्ट क्लास ए सी कोच में 

सफर करने वाले जनरल डिब्बे की भीड़ व सीट को लेकर सवाल खड़ा 

करते है! किसान आंदोलनों के मंचों पर हवाई सफर करके,लग्जरी 

गाड़ियों से तकरीरें करने के लिए क्रांतिकारी किसान नेता पहुंचते है!

मजदूर बिगुल फूंकने के लिए महंगे सुइटेड-बूटेड लोग सबसे आगे सफेद 

चक कपड़ों में चलते है। क्रांति के लिए इतने महंगे क्रांतिकारी नेताओं की 

जरूरत बनी रहती है वहां कोई क्रांति नहीं हो सकती।कभी-कभी इन 

भ्रान्तिकारी नेताओं को दुनियाँ भी क्रांतिकारी नेता समझ बैठती है!भारत 

जैसे अभागे हजारों साल गुलाम रहे देश मे सदा लॉजिक पर मैजिक को 

महत्व दिया जाता रहा है इसलिए जनता भ्रांति को ही क्रांति मान 

लेती है।
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ये जिंदगी बहुत रुलाती है!

ये जिंदगी बहुत रुलाती है!
कभी अपनों से,
कभी अपनों के लिए ,
हार जाती है !!
ये जिंदगी बहुत रुलाती है!!

देश कैसे बनता है!


कोई भी देश वहां के नागरिकों की बदौलत बनता है। देश की विश्व मे पहचान कैसी होगी,इज्जत कितनी होगी,ताकत कितनी होगी वो देश के नागरिकों का व्यवहार तय करता है।
देश रोज सुबह एलीट क्लास के उठने से पहले सड़को पर सफाई का झाड़ू फेरने वाले नागरिकों से बनता है।
देश कारखानों में जनता की बुनियादी जरूरतों वाली वस्तुओं को बनाने में लगे मजदूरों से बनता है।
देश सर्दी-गर्मी,रात-दिन,घाटे-नफे की बिना परवाह किये पेट भरने के लिए खुद को खपाने वाले किसानों से बनता है।
देश सरहद पर चौबीसों घंटे रखवाली करने वाले जवानों से बनता है।
देश सरकारी स्कूलों में ईमानदारी से वैज्ञानिक शिक्षा देने वाले शिक्षकों से बनता है।
देश कोई छोटे बच्चे की मिट्टी से खेलते हुए तैयार चित्रकारी का नमूना नहीं होता है।
देश राजाओं-महाराजाओं की विरासत को ढोने का हथियार नहीं होता है।
देश चंद व्यापारियों द्वारा समर्थित नेताओं के बाप की जागीर नहीं होता है।
देश गुंडों-मवालियों की धौंस सत्ता,मीडिया व सिस्टम के पर्दे पर दिखाने का पर्दा मात्र नहीं होता है।
एक देश झूठे इतिहास,झूठे नफरती भविष्य के सपनो को दरकिनार करके वर्तमान के मुद्दों पर सत्ता से सवाल करने वाले नागरिकों की बदौलत मजबूत होता है।
याद रखिये!कोई जातीय प्रवृत्ति के नेता हो,धार्मिक प्रवृत्ति के नेता हो,राष्ट्रभक्त प्रवृति के नेता हो सब देश के नागरिकों के दिमाग की चाबी चुराने के महाचोर बदमाश है।
जाति, धर्म,राष्ट्रवाद के नाम पर किसी नेता के भक्त हो तो अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य की बर्बादी की बेजोड़ कथा लिख रहे हो।
देश अंधभक्तों से नहीं!देश राजनीतिक भक्तों से नहीं!देश संविधान भक्तों से!देश तार्किक व विवेकशील भक्तों से मजबूत होगा।
सत्ता से सवाल करना देशद्रोह नहीं राष्ट्रधर्म है।कलम द्वारा सत्ता की आलोचना करना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का सम्मान है।
अंधभक्तों की परवाह न करे एक जिंदा नागरिक होने का अपना कर्तव्य जरूर निभाये।
मानता हूँ जगह कम है मगर मैंने 72सीट वाले इंडियन रेल के जनरल कोच में 300 से ज्यादा लोगों के साथ सफर किया है।
इस देश मे स्पेस बन जाता है,इस देश मे बोलने वालों को महत्व मिल जाता है,इस देश मे सच लिखने वालों को कद्र मिलती है मगर टीवी बंद करके हमारे साथ आइए!
आईना है तो सच है!हम आईना दिखाते है फ़िल्म नहीं!हम आपकी जरूरतों पर फोकस करते है न कि दूसरों की जरूरतों के लिए आपका उपयोग इसीलिए जुड़ते जाइये।
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दोहरी मानसिकता...

जब घर से निकलता हूँ तो सोचता हूँ कि आज कुछ नया देखने को मिलेगा।कभी-कभी बिना कारण ही शहर मे घूमना अच्छा लगता है।घर में बिस्तर पर लेटकर दोगले लोगों की बकवास पढ़ने से अच्छा होता है हकीकत मेंअपनी आँखों से घटनाओं को देखकर विश्लेषण करना।एक दिन ऐसे ही घर से निकलकर मेट्रो स्टेशन की तरफ चल पड़ा।रिक्शे वाले ने पूछा कि साहब मेट्रो?मनाही का इशारा करते हुए आगे बढ़ गया।चलते-चलतेसोचने लगा कि बेचारा किसी गांव से दो जून की रोटी की आस में दिल्ली आया है।कमाई ठीक से नहीं हो रही होगी तभी हड्डियों से चमड़ी सीधे संपर्क में आ गई होगी।तभी एक आवाज एकदम कानों में गूंजी कि बाबूजी कुछ दे दो मैंने दो दिन से खाना नहीं खाया!सहसा चेतन अवस्था में आकर देखा तो सड़े हुए पैर व् एक हाथ का इंसान मेट्रो की सीढियाँ पर बैठा था जो हर आने-जाने वाले सूट-बूट वाले के विकास के घमंड को चकनाचूर करता नजर आ रहा था।10 मिनट तक एक तरफ खड़ा होकर नजारा देखता रहा।सेंकडो लोग आये व् गए लेकिन सब नजरअंदाज करते निकल गए।उन सबको देखकर मुझे लगा कि शायद इसी को तरक्की कहते है। लोग मुझे पागल न समझ ले इसलिए चुपचाप मैं भी तरक्की की दौड़ के साथ धीरे से आगे खिसक लिया। मेट्रो में सवार हुआ तो लोग खंभों पर चलती ट्रेन से ऊपर की ही बाते करते नजर आ रहे थे।2-3 स्टेशन के बाद ट्रेन से बाहर आ गया।स्टेशन से बाहर आने लगा तो वही नजारा।छोटे-छोटे बच्चे कड़ाके की ठण्ड में अर्धनग्नअवस्था में भीख मांग रहे थे। मैं उनके पास रुका और पूछा कि बेटे मम्मी पापा क्या करते हैएक बच्चे ने जवाब दिया कि कौन मम्मी-पापा?मैं थोडा सकपकाया और हिम्मत करके अगला सवाल किया। घर कहाँ हैदूसरा बच्चा तपाक से बोला बाबूजी हमारा कौनसा घर होता हैमैं बेसवाल व् चुप हो गया। मानो मेरे से ही सवाल कर गया...

क्या करोगे और बर्बाद मुझे!
कि राख को और जलाया भी नहीं जाता?



भीड़ पास से ऐसे ही गुजर रही थी।वो ही तरक्की व् विकास वाली भीड़। मेरी तरफ कुछ लोग गुजरते हुए जरूर देख रहे थे बच्चों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा था। मैं भी भीड़ का हिस्सा बनकर आगे बढ़ गया। बड़े बड़े मॉल,दमकती रौशनी,चमकते शीशों के बीच बड़ी बड़ी गाड़ियों से उतरते लोग और हजारों-लाखों की खरीददारीवाकई लाजवाब नजारा होता है ऐसी जगहों का। फटाफट बाहर निकल गया। रोड पर पैदल चलने लगा।एक बूढ़ी औरत जिंदगी के अंतिम पड़ाव में सब्जी बेच रही थी। थोड़ी देर उसके पास बैठा तो उसने अपनी ऐसी दर्दनाक कहानी बयाँ की कि मैं सीधा चुपचाप घर आ गया।पुरे रास्ते विचलित रहा। हैरान-परेशान रहा।तरक्की व् पिछड़ेपन के बीच झूलता रहा।घर पहुंचकर टीवी चालू किया तो बहस चल रही थी कि शनि भगवान है या ग्रहचार-पांच पंडित लोग बैठकर बहस कर रहे थे।  टीवी वापिस बंद कर दिया और बिस्तर पर लेट गया।करवटें बदल रहा था लेकिन तरक्की की उलझने इतनी अंदर बैठ गयी कि कुछ सोच भी नहीं पा रहा था।आज भी उसी उलझन में हूँ  संवेदनशीलतामानवतासामाजिक सरोकारपरोपकार आदि शब्दों की फिर से परिभाषाएं समझ रहा हूँ.....


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संवेदनशील होना गुनाह है?

अपनी समझ व् बुद्धि के अनुसार किसी घटना पर उपजी ऐसी तात्कालिक प्रतिक्रिया जो इंसान को अंदर ही अंदर झकजोर देती है।सोचने के लिए मजबूर कर देती है।ऐसा नहीं है कि संवेदनशीलता सिर्फ इंसानो में ही होती है बल्कि हर जीवित प्राणी का यह नैसर्गिक गुण होता है।किसी में कम व् किसी में ज्यादा हो सकती है। संवेदनशीलता को समाज के संस्कार हमेशा प्रेरित करते है व् समाज को इसके फलस्वरूप भविष्य का फल मिलता है।हर दिन हर पल की अनवरत प्रकिया है जो समय-समय पर पना परिणाम समाज के सामने प्रस्तुत  करती है।किस घटना को किस रूप में लिया जाये यह उस व्यक्ति के इस गुण पर निर्भर करती कि उसमे संवेदनशीलता कितनी है।जब सहिष्णुता व् असहिष्णुता का मुद्दा देश की फिजाओं में गूंज रहा हो तो मैंने भी सोचा कि क्यों न संवेदनशीलता पर भी बात हो जाये?किसी बलात्कार की घटना को पढ़ने-ुनने के बाद आपकी प्रतिक्रिया क्या होती होगी यह मैं नहीं जानता!मैं यह भी नहीं जानता कि आप क्या सोचते होंगेयह व्यक्ति विशेष का अपना गुण है।मैं जब भी ऐसी घटना को पढता हूँ या सुनता हूँ तो एकदम मेरी प्रतिक्रिया होती है कि दोषी को पकड़कर हाथों हाथ फाँसी पर लटका देना चाहिए।मेडिकल रिपोर्ट व् पीड़ित के बयान के अलावा क़ानूनी उलझन नहीं होनी चाहिए।चाहे देश का कानून या बुद्धिजीवी मेरे मत से सहमत हो या नहीं  क्योंकि यह मेरी उस घटना पर प्रतिक्रिया मात्र है जिसे आप लोग भावावेश में बताकर इसको नकार दोगे  लेकिन यह मेरा गुण है जो बचपन से संस्कार के रूप में मेरे अंदर पैदा हुआ है। मुझे आप एकदम बदल नहीं सकते। जब किसी मुठभेड़ में फौजी भाई की मौत होती है तो मैं कहता हूँ कि इस देश को बुलेट ट्रेन से पहले बुलेट जैकेट की जरूरत है तो कोई कैसे मुझे कांग्रेस का एजेंट बताकर मेरी संवेदनशीलता को नकार  सकता  हैजब रोहित वेमुला की मौत पर मैं लिखता हूँ तो मुझे नकारात्मक बताकर कोई कैसे मुझे दरकिनार कर सकता हैराहुल गांधी किसी दलित के घर खाना खाते है तो मैं बता देता हूँ कि आपके पूर्वजों ने ईमानदारी से समाज कल्याण की योजनाएं आगे बढ़ाई होती तो आपको आज यह नाटक करने की नौबत ही क्यों आती?यह मेरी बुद्धि व् समाज के हिसाब से मेरी प्रतिक्रिया है।हर घटना अगर मुझे कुछ कहने को मजबूर करती है तो मैं इसे मेरी संवेदनशीलता समझता हूँ आप मेरे बारे में जो बोलना चाहते हो बोलते रहो।नजरअंदाज करना चाहो कर सकते हो।वह आपकी समझ से उपजी संवेदनशीलता का परिणाम होता है। अगर आपको किसी घटना या दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि इससे मुझे क्या लेना-देना है तो आप जड़ इंसान है।कैसे कोई बुजुर्ग दंपत्तिको भीख मांगते हुए देखकर आप आराम से पास से गुजर सकते हो?कैसे आप सड़कों पर अर्धनग्न अवस्था में लूटते बचपन को नजरअंदाज कर सकते हो?कैसे किसी इंसान की आत्महत्या आपको सिर्फ एक छोटी घटना मात्र लगने लगती है? सड़क किनारे ठण्ड से मरते इंसान के हालात आपको क्यों नहीं झकझोर पाते है?अन्नदाता की उपाधि प्राप्त इंसान अपने ही खेत में पेड़ पर लटक जाता है तो आपको रोटी खाते वक्त ख़ुशी  कैसे हो सकती है?पड़ौसी के घर किसी की मौत से कोहराम मचा हुआ है और अपने घर के दरवाजे बंद  करके गानों को सुनकर खुश कैसे हो सकते है?आप उन चीत्कारों को दरकिनार कैसे कर सकते हैमुझे फर्क पड़ता है।मैं हर घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देता हूँ।मुझे देश के हर नागरिक की मौत पर दुःख होता है।मुझे हर बुरी घटना विचलित करती है।मुझे हर अन्याय की खबर पर अफ़सोस होता है।मैं मेरे द्वारा प्राप्त संस्कारों से उपजी संवेदनशीलता के हिसाब से प्रतिक्रिया देता हूँ।हाँ दोगली संवेदनशीलता का मुजाइरा करना मैंने नहीं सीखा है।मुझे हर समान घटना समान रूप से प्रभावित करती है।मुझे निर्भया गैंगरेप ने भी विचलित किया था तो मुज्जफरनगर गैंगरेप ने भी उतना ही विचलित किया है।मुझे अख़लाक़ की मौत पर अफ़सोस है तो उतना ही अफ़सोस प्रशांत पुजारी की मौत पर है।मुझे सलमान द्वारा फूटपाथ पर सोये लोगों पर गाडी चढाने से जितना दुःख होता उतना ही दुःख किसी राजनेता का दुर्घटना में मारे जाने पर होता है।मुझे जितनी परेशानी हिन्दू धर्म के पाखंड से है उतनी ही परेशानी इस्लाम या ईसायत के पाखंड से है। मुझे हर गरीब की गरीबी ठेस पहुंचाती है चाहे वो किसी धर्म या जाति से क्यों न हो!आप चाहे मुझे कांग्रेस का एजेंट बताओ या बीजेपी का बताकर खुश हो जाओ।आप आरएसएस का एजेंट बताकर अपने आप पर गौरव करो या आम आदमी पार्टी का बताकर गदगद महशूस करो।मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।मैं खुश हूँ कि मेरे अंदर संवेदनशीलता के गुण   का पैमाना उच्चतर स्तर पर है।मेरी आपसे एक ही गुजारिश है कि आप भी संवेदनशील बनिए।इस गुण को अपने अंदर चरम तक पहुँचने दीजिये।संवेदना रूपी प्रतिक्रिया जब फूटती है तो समाज को जागरूक करती है। समाज एक साथ खड़ा होने की हिम्मत जुटाता है।संवेदना को विकास की चमक व् एक-दूसरे के साथ दिखावे की होड़ में मरने मत दीजिये।अगर संवेदना मर गई तो इंसान को तो छोडो प्राणी मात्र से भी पीछे चले जाओगे।संवेदना नहीं बचेगी तो इंसानियत किसी भी रूप में अपना वजूद नहीं बचा पायेगी।तो हर घटना पर खुलकर बोलिये।अपने इस अनमोल गुण का समाज में प्रचार करते रहिये....
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