आप अगर कुछ भी लिख दें तो कई लोग आ जाते हैं यह कहने कि आप फलां विषय पर क्यों नहीं लिखते , आपको अमरनाथ यात्रियों की पीड़ा पर लिखना चाहिए,आपको हज यात्रियों की तकलीफ पर लिखना चाहिए या आपको कश्मीरी पंडितों के बारे में लिखना चाहिए!तरह तरह के सुझाव आते हैं।आपको ओवैसी पर लिखना चाहिए,आपको गांधी पर लिखना चाहिए,आपको मोदी पर लिखना चाहिए,यानी जिस विषय पर लिखा है उसके अलावा हर विषय पर लिखने का आदेश आने लगता है।मैं भी इस तरह के टिप्पणीकारों के लिए एक साथ ही पोस्ट के माध्यम से जवाब पेश कर देता हूँ।
मैं गरीब किसान का बेटा हूँ।दर-दर के संघर्षों से कुछ हासिल किया है।जब भी घर से निकलता हूँ और ट्रेक्टर में प्याज लेकर गली में बेचते किसान को देखता हूँ तो खुद के बचपन का संघर्ष याद आ जाता है।आसपास के बुजुर्ग किसानों के चेहरों की झुर्रियां के साथ चिलचिलाती धूप व हाड़ गलाती ठंड में तड़पते धरती के भगवान की याद आ जाती है।आगे बढ़ता हूँ तो गली में एक मंदिर आता है उसमें बड़ी तोंद का पंडित ए सी के सामने देखता हूँ।अब आप ही बताइए मैं प्याज बेचते किसान को भगवान मानू या मंदिर में मुफ्त में माल बटोरते पंडित के सामने संगमरमर की मूर्ति की लाचारगी को भगवान मानूँ?
आप ही मेरा मार्गदर्शन करिये कि आज तक 15लाख किसान इस देश का पेट भरते-भरते संघर्ष करते हुए अपने खेतों में ही फांसी पर लटक गए मगर अपने खेत को अलविदा नहीं कहा।अपने वतन पर आये कुछ आतताइयों से डरकर संघर्ष का रास्ता छोड़कर भागे चंद हजार कश्मीरी कायरों के बारे में लिखूं या जिन्होंने संघर्ष के मैदान में अपना जीवन कुर्बान कर दिया हो उनके बारे में लिखूं?
अपने खेत पर चौबीसों घंटे मेहनत करके फसल तैयार करके ये यात्री अपना सामान लेकर मंडी में जाते है और जलालत झेलकर अपनी फसल कौड़ियों के दाम लुटेरों के अड्डों पर फेंककर आते है और दूसरी तरफ ये लुटेरे धर्म की चादर ओढ़कर हज व अमरनाथ की यात्रा के नाम पर माल उड़ाने निकल पड़ते है!आप ही मार्गदर्शन करिये मुझे क्या लिखना चाहिए?
जब मेरा किसान मर रहा है,मेरे किसान के बच्चे बेरोजगार घूम रहे है तो मुझे सत्ता के खिलाफ लिखना चाहिए या सत्ता का गुणगान करना चाहिए?जब मेरे देश का आधा बचपन कुपोषित है,आधी महिलाएं कुपोषित है,बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है,शिक्षक नहीं,अस्पतालों में इलाज नहीं है तब मुझे सत्ता से सवाल करना चाहिए या सत्ता के सहयोगी चंद राजनेताओं का गुणगान शुरू कर देना चाहिए?
मेरा तमाम ऐसे टिप्पणीकारों से प्रतिक्रिया स्वरूप सवाल है कि अपने इर्द-गिर्द के मुद्दों से मुँह मोड़कर आप भक्ति की परंपरा निभा सकते हो मगर मेरे सोचने का,मेरे लिखने का रास्ता जरा अलग है।जो लोग जनता के बुनियादी मुद्दों पर तार्किक सोच व गरीब-मजलूम के बेहतरी की सोच रखते है,कार्य करते है मैं उनका समर्थन जरूर करता हूँ मगर राजनीति में सबकुछ जायज है,कहने वालों के साथ कभी खड़ा नहीं हो सकता!
मेरे दिल मे आक्रोश है,मेरे अंदर बगावत है।इस सत्ता से,इस व्यवस्था से,इस घटिया स्तर की राजनीति से,कुर्सी के लालची कीड़ों से और इनके पीछे चल रहे झुंडों से मुझे नफरत है क्योंकि पथभ्रष्ट,मानवभक्षी भेड़िये है जिनकी गुलाम मानसिकता लक्जरी लाइफ में अपना मसीहा ढूंढती है और मैं अंतिम छोर पर बैठे किसान-कमेरे को क्रांति का नेता मानता हूँ।
मेरी कलम के लिए न गांधी महत्वपूर्ण है और न मोदी!मेरी कलम के लिए न ओवैसी महत्वपूर्ण है और न योगी!मेरे लिए व्यक्ति नहीं विचारधारा महत्व रखती है और जो भी गरीब-मजलूम की विचारधारा के खिलाफ जाएगा उसके प्रति कलम बगावत करेगी!मेरी कलम की स्याही गरीब किसान के संघर्षों की दास्ताँ है जो सिर्फ और सिर्फ किसान-कमेरों के हित मे लिखती जाती है।इसकी राहों में कोई संघर्ष का सारथी दिखता है तो उस पर रुक जाती है या संघर्ष में कोई रोड़ा बनता नजर आता है तो उसके साथ भी बगावत कर बैठती है क्योंकि कलम को बहुत लंबा सफर तय करना है।
कौन मुझे समाज द्रोही कहे,कौन मुझे देशद्रोही कहे,कौन मुझे पागल कहे उसकी मुझे कोई परवाह नहीं है।मुझे परवाह भूख से तड़पते इंसानों की है,मुझे परवाह कुपोषित बचपन की है,मुझे परवाह रोज शहीद होते मेरे जवानों की है,मुझे परवाह इलाज के अभाव में मरते नागरिकों की है,मुझे परवाह सड़क पर आश्रय लिए,ठंड में कांपते इंसानों की है,मुझे परवाह हाड़तोड़ मेहनत के बाद फांसी पर लटकते किसानों की है और उसी अंदाज मैं मेरी कलम चलती है।
लिखने के लिए सारा जहां पड़ा है!जिसकी जो मर्जी वो लिखे मगर मेरी कलम न पैसे की खनक से,न पावर की धौंस से,न जाति-धर्म के बंधन की दुहाई से रुकती है और न सत्ता से नजदीकियों की चाहत रखती है।
कभी उसके बारे में भी लिख दिया करो!कभी इसके बारे में भी लिख दिया करो सरीखी बचकानी बातें लिखने वालों को मेरा स्पष्ट जवाब है कि मैं हवा के साथ बहकर नहीं लिखता।मैं तथाकथित चौकीदारों की जमात में शामिल होकर वाहवाही सुनकर आत्मसंतुष्टि का भूखा इंसान नहीं हूँ बल्कि मैं इन असली चौकीदारों अर्थात देश की हिफाजत के लिए निकले असली यात्रियों की हालत को सामने रखते हुए गाली खाकर भी खुद को खुशनसीब समझता हूँ।







