दोहरी मानसिकता...

जब घर से निकलता हूँ तो सोचता हूँ कि आज कुछ नया देखने को मिलेगा।कभी-कभी बिना कारण ही शहर मे घूमना अच्छा लगता है।घर में बिस्तर पर लेटकर दोगले लोगों की बकवास पढ़ने से अच्छा होता है हकीकत मेंअपनी आँखों से घटनाओं को देखकर विश्लेषण करना।एक दिन ऐसे ही घर से निकलकर मेट्रो स्टेशन की तरफ चल पड़ा।रिक्शे वाले ने पूछा कि साहब मेट्रो?मनाही का इशारा करते हुए आगे बढ़ गया।चलते-चलतेसोचने लगा कि बेचारा किसी गांव से दो जून की रोटी की आस में दिल्ली आया है।कमाई ठीक से नहीं हो रही होगी तभी हड्डियों से चमड़ी सीधे संपर्क में आ गई होगी।तभी एक आवाज एकदम कानों में गूंजी कि बाबूजी कुछ दे दो मैंने दो दिन से खाना नहीं खाया!सहसा चेतन अवस्था में आकर देखा तो सड़े हुए पैर व् एक हाथ का इंसान मेट्रो की सीढियाँ पर बैठा था जो हर आने-जाने वाले सूट-बूट वाले के विकास के घमंड को चकनाचूर करता नजर आ रहा था।10 मिनट तक एक तरफ खड़ा होकर नजारा देखता रहा।सेंकडो लोग आये व् गए लेकिन सब नजरअंदाज करते निकल गए।उन सबको देखकर मुझे लगा कि शायद इसी को तरक्की कहते है। लोग मुझे पागल न समझ ले इसलिए चुपचाप मैं भी तरक्की की दौड़ के साथ धीरे से आगे खिसक लिया। मेट्रो में सवार हुआ तो लोग खंभों पर चलती ट्रेन से ऊपर की ही बाते करते नजर आ रहे थे।2-3 स्टेशन के बाद ट्रेन से बाहर आ गया।स्टेशन से बाहर आने लगा तो वही नजारा।छोटे-छोटे बच्चे कड़ाके की ठण्ड में अर्धनग्नअवस्था में भीख मांग रहे थे। मैं उनके पास रुका और पूछा कि बेटे मम्मी पापा क्या करते हैएक बच्चे ने जवाब दिया कि कौन मम्मी-पापा?मैं थोडा सकपकाया और हिम्मत करके अगला सवाल किया। घर कहाँ हैदूसरा बच्चा तपाक से बोला बाबूजी हमारा कौनसा घर होता हैमैं बेसवाल व् चुप हो गया। मानो मेरे से ही सवाल कर गया...

क्या करोगे और बर्बाद मुझे!
कि राख को और जलाया भी नहीं जाता?



भीड़ पास से ऐसे ही गुजर रही थी।वो ही तरक्की व् विकास वाली भीड़। मेरी तरफ कुछ लोग गुजरते हुए जरूर देख रहे थे बच्चों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा था। मैं भी भीड़ का हिस्सा बनकर आगे बढ़ गया। बड़े बड़े मॉल,दमकती रौशनी,चमकते शीशों के बीच बड़ी बड़ी गाड़ियों से उतरते लोग और हजारों-लाखों की खरीददारीवाकई लाजवाब नजारा होता है ऐसी जगहों का। फटाफट बाहर निकल गया। रोड पर पैदल चलने लगा।एक बूढ़ी औरत जिंदगी के अंतिम पड़ाव में सब्जी बेच रही थी। थोड़ी देर उसके पास बैठा तो उसने अपनी ऐसी दर्दनाक कहानी बयाँ की कि मैं सीधा चुपचाप घर आ गया।पुरे रास्ते विचलित रहा। हैरान-परेशान रहा।तरक्की व् पिछड़ेपन के बीच झूलता रहा।घर पहुंचकर टीवी चालू किया तो बहस चल रही थी कि शनि भगवान है या ग्रहचार-पांच पंडित लोग बैठकर बहस कर रहे थे।  टीवी वापिस बंद कर दिया और बिस्तर पर लेट गया।करवटें बदल रहा था लेकिन तरक्की की उलझने इतनी अंदर बैठ गयी कि कुछ सोच भी नहीं पा रहा था।आज भी उसी उलझन में हूँ  संवेदनशीलतामानवतासामाजिक सरोकारपरोपकार आदि शब्दों की फिर से परिभाषाएं समझ रहा हूँ.....


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