बेख़ौफ मीडिया,बदहवास जनता...वाकई लाजवाब है देश का चौथा स्तम्भ!

सबसे तेज ख़बरों का दावा करने वाले लोग भी बहुत ही क्रांतिकारी निकले।ऐसी क्रांति कि थोड़ी सी भी 
तकनीक की जानकारी रखने वाला इंसान इनकी क्रांति को देखकर अपनी हंसी नहीं रोक पाया।अगर ऐसा चौथा स्तम्भ यूरोप के किसी देश में होता तो या तो वहां की जनता दफ़न कर देती या शर्म से खुद ही आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता ।लेकिन यह देश है बड़ा निराला।विविधता में एकता!अनेकता में एकता!सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय!न जाने क्या क्या जुमले गड़े गए इस देश की जनता को मुर्ख बनाने के लिए। ये सारे  जुमले इन चारों स्तंभों ने आपस में मिल-बैठकर खाने के लिए उपयोग कर लिए और गरीब जनता मुंह ताकतीरह गई जिस प्रकार मंदिर के बाहर भूखा इंसान पंडित का भोग देखकर ताकता ही रह जाता है।

जिनको चाटुकारिता के लिए टुकड़ा मिला वो देशभक्त चैनल होने का दावा करके फिर से जनता को बेवकूफ बनाने लग गए और समाजसेवी प्रचारक बनकर उपदेश बांटने लग गए।जनता सब जानती है जनाब!उपदेशों सेदेश चलता तो तराइन के मैदान में गौरी ने जब मुंह पर तमाचा मारा था तब मंदिरों से उपदेश ही दिए जा रहे थे। बाद में अंग्रेजों ने औकात बताई थी तब भी मंदिरों-मस्जिदों से उपदेश ही बांटे जा रहे थे।फर्क इतना था कि उस समय धार्मिक संस्थाएं लोगों को बेवकूफ बना रही थी उसमे अब मीडिया भी शामिल हो गया।जिसको    टुकड़ा नहीं मिला वो बिन जल मछली की तरह तड़पने लग गए।सत्ता के गलियारों के बीच सीमित दायरे मेसिमटकर रह गए है।तड़प समझ में आती है।सरकारें बदलती है तो आपकी थाली के व्यंजनों में बदलाव आते ही है।गरीब असहाय लोगों का क्या?उनको तो बेवकूफ बनना ही है क्योंकि वो आपके बारे में निर्णय करने की क्षमता विकसित नहीं कर पाये।इसलिए आप कल भी अफीम खिला रहे थे और आज भी खिला रहे हो।मानवता को जानने वाले समाजशास्त्री भी आज अपना सर दीवारों से टकराकर अपने आप को कोस रहे होंगे कि हिंदुस्तान के आम लोगों को हमने उम्मीदों के सिद्धांत देकर भारी भूल कर दी।किसी ने नहीं सोचा होगा कि प्यासा तालाब के किनारे जाकर मर जायेगा!किसी ने नहीं सोचा होगा कि हिंदुस्तान की पत्रकारिता हुक्मरानों के बगीचों में जाकर दफ़न हो जायेगी!.....

जब 1947 में देश आजाद हुआ तो देश की उम्मीदों के पर फैलने लगे,जनमानस के चेहरों पर मुस्कान तो दिल में अरमान जगने लगे।पंडित नेहरू भारी उम्मीदों के पहाड़ पर बैठे थे।उस समय विश्व दो गुटों में बंटा हुआ था। सामरिक तौर पर अमेरिका व् ब्रिटेन का गुट एक तरफ था तो दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व वाला। सामाजिक तौर पर अमेरिकी नेतृत्व वाला गुट पूंजीवाद की नुमाइंदगी कर रहा था तो सोवियत संघ समाजवाद  की।नेहरू के सामने दो विकल्प थे जिसमे से एक विकल्प चुनना था लेकिन उन्होंने अपनी सूझबूझ से तीसरा गुट चुना अर्थात दोनों के बीच का रास्ता। किसी गुट में शामिल होने के बजाय दोनों के साथ हो जाना या यूँ कहूँ कि दोनों हाथों को एक साथ फैलाकर मदद लेना।देश में विकास की जो सोवियत मॉडल की पंचवर्षीय योजनाएं अपनाई गई उसको भी तोड़-मरोड़कर पूंजीवाद व् समाजवाद के बीच सामंजस्य बिठाते हुए चलाई गई।सरकार खुद व्यापारी के रूप में बाजार में उतरी।बड़े-बड़े उद्योगों की नींव रखी गई।शिक्षा,स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को अपने हाथ में लेकर आगे बढ़ाया गया।उसका एक कारण यह भी था कि अंग्रेजों के लंबे शोषणकाल में स्थानीय निजी उद्योगों को पनपने का मौका नहीं मिल पाया।बजाज-टाटा-बिड़ला के अलावाकोई नाम सुनने को नहीं मिलता था। ऐसी अवस्था में सरकार की भूमिका निर्णायक हो जाती है।शुरुआती समय में इसे बखूबी निभाया गया।देश ने तरक्की की राह पकड़ी लेकिन सदियों की गुलामी की मानसिकता वाले सिस्टम में हम बदलाव नहीं ला पाये।स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाली पीढ़ी के हटते ही देश का विकास भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने लग गया।इसका मुख्य कारण यह था कि हम न तो देशभक्ति के साथ मानवीय मूल्यों की स्थापना कर पाये व् न ही अंग्रेजों द्वारा निर्मित कानूनों में बदलाव करके ऐसा कोई सिस्टम खड़ा कर पाये जो देश की तरक्की की राहों में आने वाले अवरोधों को दरकिनार कर सके।

1975 में आपातकाल के रूप में सामने आई असफलता से लेकर 1990 के दशक की गठबंधन की सरकार 
के बिखराव के साथ नेहरू द्वारा स्थापित तीसरा मध्यमार्गी विकल्प डूब गया।1991 में पी वी नरसिम्हा राव की सरकार के समय देश दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गया।तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के सामने पूंजीवाद के सामने घुटने टेकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।भारी दबाव के बीच  वैश्विकरण,उदारीकरण,निजीकरण अर्थात LPG को अपनाना पड़ा। पूंजीवाद ऐसी व्यवस्था है जहाँ पर सिर्फ और सिर्फ पूंजी को महत्व दिया जाता है।सरकार की भूमिका सीमित हो जाती है और सबकुछ बाजार के हवाले हो जाता है।सबकुछ दुनियां में बाजार तय करने लगता है।इसमें गरीबों का सामाजिक मूल्य घट जाता है।जहाँ गरीबी सिर्फ मजदुर उपलब्ध कराती है।जब तक हाड़-मांस काशरीर आपके साथ है मजदूरी करके जिन्दा रहो।जिस दिन शरीर ने जवाब दिया उस दिन इस दुनियां से रुखसत हो जाओ क्योंकि आपको बचाने की जिम्मेवारी पूंजीवाद में किसी के लिए भी तय नहीं होती।सरकार ूपी जो संस्था आपने चुनी है वो भी बाजार के आगे नतमस्तक है।धीरे-धीरे सामाजिक सरोकार का चोला उत्तर गया या बचा-खुचा भी उतर रहा है।आप सोच रहे होंगे कि मुझे यह लिखने की अभी क्यों जरूरत आ पड़ी!कल दुनियां में गरीबी के बारे में सर्वे करने वाली संस्था ओफ़्सेम ने चोंकाने वाले आंकड़े जारी किये है।चोंकाने वाले सिर्फ समाजवादी विचारधारा या मानवीय मूल्यों को,जो अभी तक दिल के कोने में छुपाये बैठे है सिर्फ उनके लिए।दुनियां के 50%गरीबों की संपदा के बराबर सम्पदा सिर्फ 62 लोगों के पास है जिसमे भारत के भी 4 लोग है।दुनियां के उद्योगपति मिलकर 20-23 जनवरी को स्विट्ज़रलैंड में एकत्रित होकर भावी रणनीति तय करेंगे।वो तय करेंगे कि आगे का व्यापार किस तरह बढ़ाये?90%कंपनियां व् 95%उद्योगपति टैक्स बचाने के लिए भारी मात्रा में अपनी पूंजी कालेधन के रूप में टैक्स हैवन में जमा कर देते है।जो टैक्स गरीबों की मजदूरी का मेहनताना सरकारों को उनके सरोकारों वाली योजनाओं पर खर्च करना होता है वो कालेधन के रूप में सरकारों के लचीले नियमों या मिलीभगत के कारण विदेशों में चला जाता है।दुनियां के धन-कुबेर जिस जगह मिलेंगे उस जगह कालेधन का अथाह भंडार पड़ाहोगा।कालेधन के खजाने पर बैठकर ये लोग तय करेंगे कि दुनियां में व्यापार का रुख या दिशा क्या हो?बड़ी विडम्बना होगी दुनियां के लिए। दो दिन पहले रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि हम बड़े लुटेरों पर जब तक हाथ नहीं डाल पाते जब तक वो खुद ही कमजोर होकर कानून के कमजोर जाल में आत्महत्या न कर ले।बड़े लुटेरे सत्ता के लुटेरों के साथ मिलकर गरीबों का हक मार रहे है।देश के कानून हैसियत देखकर अपना काम करते है।जो लूटा है वो तो लूट चुका है लेकिन जब सत्ता दलालों के हाथों में चली जाती है तो टैक्स में भारी छूट देकर उनको खड़ा करने की कोशिशें होने लग जाती है।बाजार को चलाने की ठेकेदारी सत्ता के दलाल लेने लग जाते है जबकि पूंजीवाद में सबकुछ बाजार के हवाले होता है।सरकार सिर्फ नियामक की भूमिका में होती है।जिम्मेवारी गरीबों का कोई हक़ नहीं मार सके इसकी पहरेदारी करने की होती है।जब रक्षक ही खुद भक्षक बन जाये तो किसी को कौन बचा सकता है।गरीब भुखमरी से मरे या इलाज के अभाव में अस्पताल की चौखट पर दम तोड़े!बचपन कुपोषण का शिकार हो या खेतों में किसान आत्महत्या करेकिसी को क्या मतलब!जब पूरा सिस्टम ही अपनी रखवाली की भूमिका छोड़कर बाजार के साथ हो जाये तो सबको अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी।अगर कुछ बदलाव होने की उम्मीद करे तो सिर्फ और सिर्फ क्रांति सम्पूर्ण क्रांति।सबकुछ फिर से व्यवस्थित करने की जरूरत के साथ।बाजार बहुत मजबूत है।पूंजीपति व् सत्तापति का गठजोड़ बड़ा निर्दयी हो चला है हर चाल का तोड़ निकाल ही लेता है इसलिए ज्यादा परिवर्तन कम समय में होते नजर नहीं आएंगे।जिस प्रकार मौत का रहस्य समझने के लिए मृत शरीर का पोस्टमार्टम करना पड़ता है उसी प्रकार किसी समाज के पतन के कारणों का विश्लेषण करने के लिए समाज के पढ़े लिखे लोगों के कामो को तर्क,तीक्ष्ण बुद्धि व् वैज्ञानिक ज्ञान से समझने की जरुरत है।आज अपने आप पर गर्व करने का दिखावा करने वाले लोगों की फ़ौज तो तैयार हो गई है लेकिन वास्तव में उनके पास गर्व करने लाइक कुछ होता नहीं है।समाज का कोई एक महापुरुष वर्षों पहले समाज को उसकी दिशा बता देता है लेकिन हम उसकी जयंती-पुण्यतिथि पर दो-चार माला पहनाकर फोटो खींचकर अपना कर्तव्य पूरा करने का ढोंग रच देते है।साल के 363 दिनों तक हम उस महापुरुष को याद ही नहीं करते।बदलाव झुण्ड में फोटो सेशन करने से कभी नहीं आ सकते न रजाइयों में घुसकर सोशल मीडिया में एक दूसरे को नीचा दिखाने से खुद् को सफलता के चरम पर खड़ा कर सकते है।डॉ आंबेडकर चाहते थे कि जब मैं अकेला पढ़ा-लिखा पीड़ित समाज में इतना कुछ बदलाव ला सकता हूँ तो जब समाज में सैंकड़ों पढ़े लिखे लोग हो जायेंगे तो समाज के विकास का कारवां कभी नहीं रुकेगा।आज उसी समाज के पढ़े-लिखे लोगों को देखता हूँ तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि पाखंडियों से त्रस्त अम्बेडकर ने उस समय बौद्ध धर्म अपना लिया    लेकिन आज वो जिन्दा होते तो आत्महत्या करनी पड़ती।आज पढ़े-लिखे लोग अपने समाज के संगठन बनाकर पूंजीवाद से अंक हासिल करने के लिए अपने समाज को कुर्बान कर रहे है।आज पढ़े-लिखे लोग अपने आप को सभ्य दिखाने के लिए मनुवादियों के कर्म-कांडों मेंआकंठ डूब चुके है।जिन मंदिर व् रजवाड़ों के बंधन को तोड़ने के लिए पूर्वजों ने कुर्बानियां दी है उन्ही के पुनर्निर्माण में रात-दिन जुटे है।जिस शिक्षा के अधिकार के लिए सदियों लड़ाईयां लड़ी उसी शिक्षा को दरकिनारकरके धर्म की चादर ओढ़ने में व्यस्त है।वैज्ञानिक ज्ञान व् तार्किककता को छोड़कर अंध-विश्वास में लिपटेनजर आ रहे है। हमारे सपनो के घर को कुर्बान करके पत्थर मंदिरों के निर्माण में लगा रहे है।अपने बच्चों का भविष्य चौपट करके पाखंडियों के संगठनो को चंदा दे रहे है।सक्षम लोग अपने ही समाज के युवाओं की भीड़ को अपने वोट बैंक की ताकत के रूप में इस्तेमाल कर रहे है।महापुरुषों के संघर्ष की गाथाएं आज फिर पूंजीवाद की चौखट पर माथा टेकने लग गई।महापुरुषों के सपने व् आत्मा फिर से पूंजीवाद की कैद में है।आज पोस्टमार्टम करने की हिम्मत किसी में बची नहीं है।जो सोचते है वो रजाई से बाहर नहीं निकल पाते।जो काबिल है उनकी आँखों पर पट्टी बंधी है।जो सक्षम है वो खुद स्वहित के लिए समाज का दुरूपयोग कर रहे है।फिर कैसे उम्मीद करे कि अम्बेडकर पैदा हो रहा है?कैसे उम्मीद करे कि सर छोटूराम के सपने पुरे हो जायेंगे?
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