बलात्कार!
शब्द ही इतना घिनोना कि इंसानियत ही सहम जाती है।मानव सभ्यता पर कलंक।इस बात की खोज की जानी चाहिए कि इस शब्द के रचियता कौन है? सारे बुद्धिजीवी माफ़ करना!मुझे आजकल बुद्धिजीवी शब्द भी कमघिनोना नहीं लगता।टीवी पर आकर एक घंटे का बेतुका तर्कशास्त्र पढ़कर चले जाने वाले लोगों से क्या उम्मीद!शाम के समय चौराहों पर लगने वाली मोमबत्ती ब्रिगेड में ही छेड़खानी की घटनायेकानून!ऐसा बेतुका झमेला जो थाने की चौखट पर ही दम तोड़ देता है।हाथ इतने लंबे कि आपस में ही उलझ जाते है।न्याय क्या होता है यह बलात्कार पीड़िता से पूछो जिसने अदालत तक जाने की हिम्मत जुटाई है?पीड़ितों को इंसाफ तो मिथ्या भ्रम लगता है। तमाम महिला संगठनों के बारे में तो क्या लिखे?जब मीडिया में किसी बलात्कार के क्रियाकर्म पर हंगामा मचता है तो सोलह श्रृंगार के साथ मुख्या टीवी पर आती है और निंदा प्रस्ताव रख देती है।उसका ध्यान पीड़िता के दर्द पर न होकर इस बात पर ज्यादा रहता है कि चंदे के पैसे से जो मेक-अप किया है,वो ख़राब न हो जाये।पूरी पुरुष जमात को ही पृथ्वी पर मिथ्या रचना सिद्ध करने में लग जाती है।क्या करे जनाब? स्कोरिंग तो करनी पड़ती है! चार कानून के जानकर भी बरसाती मेंढक की तरह आ टपकते है।टीवी एंकर ऐसे सवाल जवाब करता है कि पुलिस भी वही,जज भी वही!अभी तुरंत फाँसी का फंदा यहीं मंगा लेगा।2-4 घंटे में सभी ऐसे गायब हो जाते है जैसे आसोज के महीने में पश्चिमी भारत से मानसून के बादल होते है।पूंजीवाद का जमाना है जनाब।जिधर पूंजी दिखी उधर रंगरोगन शुरू। तिल तिल कर मरती उस पीड़ित अबला का दर्द कौन जाने?सब अपनी मन की बात प्रस्तुत करने की होड़ में लगे है।यह मन है कि........... मानता नहीं।दर्शनशास्त्र,समाजशास्त्र,मनोविज्ञान आदि सारे शास्त्रों के जानकर भी मन की परिभाषा नहीं दे पाते। जब अपनी संस्कृति की याद दिलाई जाती है तो तमाम पश्चिमपरस्त जमातें हमेंढ़िवादी,सांप्रदायिक,आदिम मानव ना जाने किन किन प्रशस्ति पत्रों से नवाजती है।जब आप किसी बंधन को मानने को तैयार ही नहीं हो तो मुफ़्त में आपके कुकर्मों के परिणाम भी तो मिलेंगे।लोकतंत्र के नाम पर अपनी दकियानूसी सोच की रोटियां सेकोगे तो इन अपराधों पर लगाम कैसे लगेगी?हर बड़े नेता व् अधिकारी की पत्नी ही NGO खोलकर समाजसेविका बनेगी तो समाज की सेवा ही तो ऐसी ही होगी। जब स्वतंत्रता के नाम पर स्वछँदता करोगे तो अंजाम भी तो भुगतना पड़ेगा।जब अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़कर सिर्फ अधिकारों की रट लगाओगे तो अधिकार भी तो मृग मरीचिका की तरह ही प्राप्त होंगे।जब अनुशासन भूलकर कुकर्मों में लगे रहोगे तो इसके साइड इफेक्ट वापिस लात मारने लगते ही है।फिर घायल कुत्ते की तरह किंकियाने से क्या फायदा?अभी भी वक्त है अपने आप को सुधारने का,अपने शब्दकोष से बलात्कार शब्द को हटाने का।संभालना ही होगा अपने आप को।नहीं तो आने वाली पीढियां हमें माफ़ नहीं करेगी। उठो,जागो और सुधार करो इस समाज का।हर लात्कारी को,चाहे कहीं भी छिपा बैठा हो,खींचकर कानून के हवाले करो।पुलिस थाने से लेकर अदालत तक घसीटकर ले जाओ।समयबद्ध तरीके से फाँसी के फंदे पर लटकाओ।बलात्कार शब्द को सुनते ही हवस के दरिंदो का कलेजा काँपना चाहिये। न्याय सिर्फ मिलना ही नहीं चाहिए मिलते हुए दिखना भी चाहिए।सिस्टम सुधरना ही चाहिए।जब कोई दरिंदा कानून के शिकंजे से बच जाये तो कानून के रखवालों की जवाबदेही तय करके उनकी सजा मुकर्रर होनी चाहिए,ताकि इन मानसिक बलात्कारियों को भी सबक मिले।
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