किसान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
किसान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

किसान बदलेंगे व्यवस्था

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 26%जनता इतनी गरीब है कि रोटी-कपडा-मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए मोहताज है जिसमे बहुसंख्यक किसान या विस्थापित किसान है।पिछले साल मैंने खबर पढ़ी कि एक आदिवासी इस उम्मीद के साथ अपने दो बच्चों व् बीवी को लेकर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर गया कि शायद वहां खाने का इंतजाम हो जायेगा लेकिन तीन दिनों के प्रयास के बावजूद न कोई काम मिला और न खाना।सोचा भूख से तड़पकर मरना ही तो वापिस गाँव में ही जाकर मरेंगे।वापिस पैदल बच्चों को लेकर गाँव की तरफ चल दिया। चलते-चलते रास्ते में ही एक बच्चे ने भूख से तड़पकर दम तोड़ दिया फिर भी वह उसके शव को लेकर चलता रहा है।दोनों पति-पत्नी रो रहे थे और चल रहे थे।रास्ते में कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता मिल गया।उसने बात की तो यह हृदय-विदारक घटना सामने आई।फिर सरकारी कार्यवाही शुरू हुई।बच्चे का पोस्टमार्टम करवाया गया तो रिपोर्ट से पता चला कि बच्चे की आँते खाली थी।चिपककर सड़ चुकी थी। शायद पिछले 4-5 दिनों से उसने कुछ नहीं खाया।सरकारी अफसरों की कार्यशैली देखो कि पांच दिन बाद 20 किलो चावल दिए गए तब तक दूसरा बच्चा भी दम तोड़ देता यदिउस सामाजिक कार्यकर्त्ता ने अपनी जेब से उनको खाना नहीं खिलाया होता! यह हमारा तंत्र है गरीबी से लड़ने का जो कभी गरीबों के आसपास पहुँच नहीं पाता।गरीबों के लिए योजनाएं बनाकर धन आवंटन करने वालों से लेकर अंतिम सरकारी आदमी पटवारी-ग्रामसेवक-सरपंचो ने बड़े-बड़े बंगले खड़े कर लिए।बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमकर गरीबी से लड़ने का दावा करते है लेकिन सिर्फ गरीबों से लड़ते प्रतीत होते है।क्या यह संभव है कि ये तीनों एक गाँव में ईमानदारी के साथ काम करे और कोई गरीब भूख से मर जाए?क्या यह संभव है कि ये ठीक से काम करे और कोई गरीब बिना मकान के ठण्ड-बारिश या बिना इलाज के मर जाये?नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता!तो कमी कहाँ है? कमी हमारे तंत्र में है।कमी उस जनता में है जो गरीबी के दुष्चक्र को तोड़कर बाहर निकली और अपने सफर को भूल गई।कमी हम युवाओं में है जो गाय की मौत पर घरों को,बस्तियों को जिन्दा लोगों को आग के हवाले करने के लिए तो निकल जाते है लेकिन किसी गरीब की मौत के लिए जिम्मेदार इन दरिंदों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।कमी हमारे संस्कारों में है कि पैदा होते ही हमें उस दिशा में हांकना शुरू किया जाता है कि तुम हिन्दू हो,तुम मुसलमान हो,तुम ईसाई हो लेकिन कभी यह नहीं सिखाया जाता कि तुम इंसान हो,तुम मानवता के वाहक हो।कमी हमारी शिक्षा व्यवस्था में है जहाँ रोज सुबह हाथ जोड़कर प्रार्थना करवाई जाती है कि "धर्म के वास्ते जीना,धर्म के वास्ते मरना"लेकिन यह कभी नहीं बताया जाता कि इंसान के वास्ते जीना,इंसानियत के वास्ते मरना। मैं बार बार कहता हूँ कि गरीबी हुक्मरान कभी नहीं मिटायेंगे।ये एक योजना को ख़त्म करके दूसरी योजना पेश करते रहेंगे।ये करोड़ों रूपए बर्बाद यह बताने में कर देंगे कि देखो मेरी बोतल की वाइन कितनी बेहतर है!धर्म के ठेकेदार कभी गरीबों को सही रास्ता नहीं बताएंगे क्योंकि इनकी दुकाने गरीबों के शोषण से ही चलती है।अपनी दुकान अपनी मर्जी से कौन बंद करना चाहेगा?कोई उद्योगपति अपनी मर्जी से मुनाफा गरीबों में नहीं बाँटेगा क्योंकि यह मुनाफा गरीबों का खून चूसकर ही हासिल किया जाता है।गरीबों के हाथों जो बड़ी-बड़ी इमारते खड़ी होती है उसमे से एक भी कमरा कभी किसी गरीब के हवाले करते किसी को देखा है?नहीं न!फिर हम इन लोगों से उम्मीद लगाकर क्यों बैठे है?हम इन लोगों को सत्ता सौंपकर शांत क्यों हो गए?हम बड़े-बड़े मॉल बनाकर इन लुटेरों के अड्डों को क्यों आबाद करे?हम पेट पर तौलिया बांधकर लंबी-लंबी यात्राएं करके इन पाखंडियों की दुकाने क्यों गुलजार करे? अब हमे खड़ा होना पड़ेगा!खुद को पहचानना पड़ेगा!,खुद पर भरोसा करना पड़ेगा!संघर्ष के लिए तैयार करना पड़ेगा!हमे इनसे हमारा हक छीनकर लेना पड़ेगा!अब हमे हर मौत पर जिम्मेवार का इलाज करना होगा!हुक्मरानों को सवाल नहीं पूछेंगे सिर्फ जवाब देंगे। हक़ दो या बोरिया-बिस्तर समेटो!उद्योगपतियों को जवाब देंगे कि राहत-पैकेज नाम से जो हमारी कमाई लूटी है वो वापिस दो!धर्म के ठेकेदारों को जवाब देंगे कि देश में 31करोड़ गरीबों की मदद करने में तुम्हारे 33करोड़ देवता असफल कैसे हो गए?जागो!उठो!जलाओ मशाल संघर्ष की!जलाओ मशाल सोये हुओं को जगाने की!तब तक न रुको,जब तक अंतिम गरीब का चेहरा न खिल जाये!उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारी सफलता होगी!उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारी सत्ता होगी!उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारा धर्म होगा!आज जन्तर मंतर से किसान इस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ हुंकार भर चुके है।देशभर के किसान एकजुट हो चुके है।सत्ता को चेतावनी दे चुके है।इस लड़ाई को मिलकर हम लोग अंजाम तक पहुंचाएंगे।
https://sunilmoga.blogspot.com/

14साल में कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ी गिरावट।

14साल में कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ी गिरावट। बेरोजगारी दर45सालों में चरम पर।पिछले साल 5.9के मुकाबले इस बार 7.2%। महिला अपराध के मामले में भारत दूसरे नंबर पर। कर्ज में डूबी व दिवालिया के लिए आवेदनरत कंपनी को राजकोट में एयरपोर्ट बनाने का ठेका! पनामा कांड में पड़ौसी देश का पीएम जेल में मगर भारत मे कोई चर्चा तक नहीं। 100दिन में काला धन वापिस लाने की बात नहीं! स्मार्टसिटी का स्मार्ट शगूफा सांसद आदर्श ग्राम योजना गोदी में अटक गई! चुनावी मोड़ पर अर्थव्यवस्था व विकास की बात सिरे से खारिज और देश को राष्ट्रवाद की भट्टी में झौंक दिया! दूध वाले से पूछो कि दूध पतला कैसे तो जवाब मिलता है गौमाता का अपमान नहीं सहा जाएगा! मंत्री को पूछो कि आपके विभाग में यह काम ठीक नहीं तो दूसरे विभाग का मंत्री आकर जवाब देता है कि तुमने  नेहरू से सवाल क्यों नहीं किया! पानी वाले को पूछा कि पानी पीने लायक है तो तुरंत जवाब कि तुम सिंधु नदी के पानी पर शक जताकर हमारीप्राचीन विरासत को बदनाम कर रहे हो! केबल वाले से पूछा कि सिर्फ ज़ी,इंडिया टीवी,सुदर्शन न्यूज़ जबरदस्ती क्यों दिखा रहे हो तो जवाब मिला आपको पब्लिक न्यूज़ या ज्यो न्यूज़ से इतना प्रेम क्यों है! अब तो नागरिक होने के नाते सत्ता से सवाल पूछने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है यहां तो गली-गली में बिस्कुट बेचने वाला ही ब्रांड के हिसाब से देशभक्ति का प्रमाणपत्र व वीसा सर्टिफिकेट उपलब्ध करवाने लग गया है! सोच रहा हूँ सत्ता का चुनाव मैंने गलत कर लिया या सत्ता ने मुझे गलत जगह पैदा होने के जुर्म में गिरफ्तार करके आतताइयों के हवाले कर दिया है! याद रखियेगा जहां सवाल अपराध बन जाते है वहां सत्ता क्रूर बनकर जनता पर कहर बरपाने लग जाती है! बीच के पेज के किसी कोने में शहीद के घरवालों की आवाज छापने के लिए इस अखबार वाले को कोई अन्तराष्ट्रीय पुरस्कार जरूर मिलना चाहिए और शहीद परिवारों को इनके समर्थन में कोई रैली, धरना, प्रदर्शन जरूर करना चाहिए! बिके हुए टीवी के पर्दों पर जनता की आवाज का आना व चापलूस अखबारों के पन्नो पर सवाल का छपना भी इस दौर में कम हिम्मत का काम नहीं है!


कृषि प्रधान देश में तंगहाल किसान

इस कुर्सी प्रधान देश में अब कृषि की कोई जरुरत नहीं है। जब झूठे वादों व् इरादों से देश चल सकता है तो मेहनत व् रहम की जरुरत कहाँ बच जाती है! हर प्राकृतिक आपदा को झेलता है किसान, हर विकास की पहली सीढ़ी किसान की गर्दन मरोड़कर बनाई जाती है, हर मंजिल का रास्ता किसान के खेत व् श्रम के बिना अधूरा रह जाता है।किसान का जवान बेटा फिल्मो, स्वीमिंग पूल,बार, डिस्को से मनोरंजन किये बगैर वहां उपलब्ध हर चीज़ में अपना योगदान दे देता है। किसान की बेटी किसी प्रकार की बड़ी पोस्ट या गाड़ी या मनोरंजन के साधनो की चाहत नहीं रखती, उसका एक ही सपना होता है कि इस बार फसल अच्छी हो जाये और साहूकार का कर्जा उतर जाये ताकि अगले साल मेरी शादी का इंतजाम हो सके। बिना छाते के बरसात में काम करता किसान, बिना जैकेट-ब्लैंकेट के सर्द हवाओं में चलता किसान, बिन छाँव व् अधनंगे बदन से झुलसती गर्मियों में काम करता किसान।खून पसीने की असली कमाई उसे ही कहते है। कामचोरी नाम का शब्द तो शायद ऊपर वाला ही शब्दकोष में डालना भूल गया। लेकिन आधुनिक मायावी दुनिया में हमेशा सताया जाने वाला प्राणी किसान। हर नोंचने वाले की दृष्टि इस सरल व् भोले भाले किसान नामक प्रजाति पर ही टिकी रहती है। किसान इतना भोला कि कभी धर्म के नाम पर ठग लिया जाता है तो कभी मनमोहक सपनो के नाम पर। कुछ इसी जमात से निकले राजनेता अपने आपको गर्व से किसान नेता कहते है लेकिन खेत में काम करते अपने बाप के साथ भी फोटो खिंचवाने में शर्मिंदगी महशूस करते है। जिसको जब मौका मिला तब लूट लिया। जिनका काम पूजा, धर्म,शिक्षा था वो आज प्रॉपर्टी डीलर बन गया। जमीन किसकी? प्रॉपर्टी किसकी?लेकिन माल बनाने का तरीका उसी ने ईजाद कर लिया, दुनिया पेटेंट व् कॉपीराइट एक्ट से चलने लग गई। 15 दिन बिल लटकने से आपका विकास रुक रहा था, लेकिन अब इस प्राकृतिक आपदा पर आपके मुंह पर ताला किसने लटका दिया? विकास जरुरी है, जीडीपी का भी व् सेंसेक्स का भी लेकिन याद रखना सेंसेक्स के आंकड़ों को देखते देखते आपकी गर्दन टेढ़ी हो जायेगी लेकिन पेट की आग यही   किसान, यही भूखा-नंगा फ़कीर ही बुझाएगा। शोषण का यह तरीका ठीक नहीं है।कसाई भी मुर्गे की गर्दन  काटते वक्त अपनी नजरे कहीं और घुमा लेता है लेकिन आप तो इसमें भी मनोरंजन ढूँढने लग गए!किसान  कुछ बात रखे तो उसी को मजाक बना देते हो।किसान का शिकार इन तथाकथित किसान नेता के कंधे पर बंदूक रखकर कर रहे हो वो बेहद शर्मनाक है।आपको धान सस्ता चाहिए,आपको खाद्य तेल सस्ता चाहिए,आपको फल सब्जियों की कीमत चुकाने में परेशानी है लेकिन किसानो को सब्सिडी पर आपको एतराज है।कैसे मिलेगा सस्ता?अपनी बालकनी में पैदा करने का नया अविष्कार क्यों नहीं कर लेते? उस बेबस किसान की बेबसी पर तनिक भी रहम नहीं आती।उनके नंगे पाँव घूमते बच्चों को देखकर आपका दिल नहीं पसीजता,और किसानों की आत्महत्या पर आपको किसी प्रकार के मानव अधिकारों का हनन भी नजर नहीं आता?अंत में एक ही बात कहना चाहता हूँ...

चेहरे पर अपने जो,दोहरा नकाब रखता है।

किसान उनकी चालाकियों का हिसाब रखता है.....


https://sunilmoga.blogspot.com/
Add caption

कब_तक_दी_जाएगी_कर्जमाफी_की_टॉफी

कर्ज माफी की घोषणा राजनीतिक दलों के लिए ब्रह्मास्त्र का काम कर रही हैं पांच राज्यों के बीच चुनाव में खूब काम भी किया किसानों के कर्ज माफी वाले वादे को लेकर सभी सभाओं में चिल्ला चिल्ला कर घोषणा की गई कर्ज माफ किया जाएगा हुआ यह सत्ता में आते ही अपने हाथ में गंगाजल लिए हुए वादे हो या आम सभा में पुकार कर के किए हुए वादों के मुताबिक अपने कर्जा माफी के काम में जुट गई  सत्ता की लालसा रखने वाली राजनैतिक पार्टियां ऐसे ही कर्ज मुक्ति का लालच देंगी और कुर्सियां हासिल कर लेंगी आज कांग्रेस ने दो लाख तक का कर्ज माफ करने की घोषणा करके देश की खेती पर निर्भर लगभग आधी आबादी को आकर्षित किया है आने वाले समय दुसरा कोई राजनैतिक दल 2019 में फिर ऐसी ही चार लाख कर्ज मुक्ति की घोषणा करके अपनी और इस बड़े वोट बैंक को आकर्षित कर लेगा! लेकिन स्थाई समाधान की बात ना तो कर्जा मुक्त करवाने वाले करते और ना कर्जा मुक्त करने वाले करते जो इन किसानों के कर्ज का स्थाई समाधान केवल एक ही है वह है स्वामीनाथन रिपोर्ट उस पर ना तो बात होती और ना ही उसका लागू करने वाला कोई राजनैतिक पार्टी वादा करती और ना ही कर्ज का बोझ उठाने वाले किसान करते कर्ज़ चाहे किसी व्यापारी का माफ हो या किसी किसान का माफ हो कर्ज माफी देश की अर्थव्यवस्था को खराब करने के लिए ही होता है इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती जब तक स्वामीनाथन जैसी रिपोर्ट लागू नहीं होगी यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है। सभी सरकारें किसान हितैषी दिखने के दबाव में होती हैं और चुनाव के नजदीक ये कदम उन्हें फायदा भी पहुंचाते हैं। 2009 में यूपीए ने करीब 60 हजार करोड़ कर्ज माफ करके सत्ता में वापसी की थी। 2019 का चुनाव भी कांग्रेस इसी तर्ज पर जीतना चाहती है। 2017 से लेकर अब तक 8 राज्य किसानों का कर्ज माफ कर चुके हैं। इसे फौरी राहत की तरह बताया और जताया जाता है। जबकि इस कर्ज माफी का बोझ राज्यों की जीडीपी पर पड़ता है। हकीकत ये है कि खेती का जीडीपी में योगदान मात्र 16 फीसदी है और खेती पर निर्भर लोगों की संख्या कहीं अधिक है लगभग इस देश की जनसंख्या की आधी। यह जो कर्ज माफी के लिए पैसा इस्तेमाल किया जा रहा है क्या यह सरकार अपनी जेब से दे रही हैं? या देंगी कभी यह सोचा है? इसके लिए भी सरकार कहीं ना कहीं से कर्ज ही लेकर इस कर्ज को चुकाएगी आंकड़ों की मानें तो लगभग 132 करोड़ प्रत्येक भारतीय हर भारतीय पर 340 डॉलर का कर्ज है। इसे यदि रुपए में बदलें तो ये कर्ज 22 हजार 135 रुपए 70 पैसे बनता है। भारत पर वर्ल्ड बैंक कुल कर्ज 471,852,000,000 डॉलर है इसे देश का दुर्भाग्य कहिए या फिर कुछ और कि सरकार कोई भी रही हो, उसे लोन लेना ही पड़ा है. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 1945 से 21 जुलाई 2015 के बीच भारत पर कुल 101 बिलियन डॉलर (676 अरब रुपये) का कर्ज सिर्फ और सिर्फ विश्व बैंक का था. इसके अलावा International Bank for Reconstruction and Development नाम की एक संस्था है, जो विश्व बैंक का ही हिस्सा है. इसने भारत को कुल 52.7 मिलियन डॉलर (3.5 अरब रुपये) का कर्ज दे रखा है। तो मितरों, बात ये है कि कोई भी सरकार देश का विकास करती है, तो उसके लिए उसे पैसा चाहिए होता है. वो मनमोहन सिंह रहे हों या फिर नरेंद्र मोदी, वो अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या फिर एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, नरसिम्हा राव या फिर कोई भी प्रधानमंत्री हर सरकार ने विश्व बैंक से कर्जा लिया ही है. और रही बात जेब भरने की, तो ये एक राजनैतिक जुमला है. अगर इसमें जरा भी सच्चाई होती तो अभी की ‘ईमानदार’ केंद्र सरकार पैसे का हिसाब-किताब करके अपनी जेबें भरने वाले भ्रष्टाचारियों को जेल भेज चुकी होती।तो मित्रों कर्ज माफी कोई सथाई समाधान नहीं है इसलिए चुनाव से पहले कर्जमाफी वाले लॉलीपॉप लेना बंद करो और इस देश की खेती पर निर्भर आधी आबादी को ईस तरफ ध्यान देने की बहुत जरूरत है की कर्ज  माफी से तुम्हारी समस्याएं खत्म नहीं होगी बल्कि ऐसी ही ज्यों की त्यों बनी रहेंगी तुम फाइट करो तुम्हारी स्वामीनाथन रिपोर्ट के लिए एक वही सहारा है जो तुम्हें इस कर्ज जैसे कैंसर से छुटकारा दिला सकता है। वैसे भी बड़ा कर्ज लेकर इस देश से भगोड़े हो जाते हैं छोटे कर्ज वालों के माफ हो जाएंगे और इस कर्ज को चुकाएंगे वही जो कभी कर्ज नहीं लेते जिसको कर्ज की जरूरत है उसको कर्ज मिलता और अगर उसको कर्ज मिल भी जाता है तो उसका माफ नहीं होता ये असलियत है।
https://sunilmoga.blogspot.com/

संघर्ष_करते_किसान

किसान इस देश की जनता के लिए अन पैदा करने वाला, प्राकृतिक आपदाओं से झूझने वाला सरकारों से  लड़ने वाला,राजनीति का शिकार, मंडी में सफेदपोश व्यापारियों का शिकार, नेताओं के लिए देश की आधी आबादी का वोट बैंक, सड़कों पर उतर आता है बार-बार अपनी मांगों को लेकर होता क्या है, वह तो सबको पता है मिलते हैं आश्वासन और लौट जाते हैं, अपने घरों को वापस! जब भी खेती, किसान का जिक्र आता है, किसान की आमदनी की बात होती है, देश में अनाज के बंपर उत्पादन की बात होती है, हरित क्रांति की बात चलती है एक शख्स का नाम जरुर आता है वो हैं प्रो एमएस स्वामीनाथन। प्रो. स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक कहा जाता है, उन्होंने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए जो सुझाव दिए थे,अगर वो पूरी तरह लागू हो जाएं तो किसानों की दशा बदल सकती है। स्वामीनाथन रिपोर्ट में भूमि सुधारों की गति को बढ़ाने पर खास जोर दिया गया है,किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए ,सिंचाई के लिए सभी को पानी की सही मात्रा मिले, फसली बीमा के लिऐ आसान वित्तीय सुविधाओं को आम किसान तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया है!

WTO - किसान व किसान राजनीति

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में खेती सिर्फ किसान की घरेलू परिस्थतियों से ही प्रभावित नहीं होती है बल्कि  भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय संगठन WTO से बंधा हुआ है और उसी की शर्तों के अनुसार किसानों की मदद कर सकता है।LPG अपनाने से पहले भारत सरकार ने सिर्फ भुखमरी से पीड़ित जनता के बारे में सोचते हुए गेहूं व चावल को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखते हुए किसानों की हालत को दरकिनार किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव में आकर नीति-निर्माण का काम किया।भारत के किसानों को झूठे वादे करके बरगलाया गया और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर किसान विरोधी समझौतों पर हस्ताक्षर करते रहे।अब किसान  जागरूक हुए है व थोड़े बहुत सवाल-जवाब करने लगे है तो उनको जाति-धर्म के नाम पर असली मुद्दे से भटकाने की कोशिश की जा रही है।
किसानों को WTO की शर्तों के अनुसार किस तरह मदद की जा सकती है वो हमें ढंग से समझना चाहिए WTO के हिसाब से तीन तरह की सब्सिडी दी जाती है।
1.greenbox subsidy
2.blue box subsidy
3.Amber box subsidy
भारत के किसान इस सब्सिडी के अंतर्राष्ट्रीय खेल को समझे!
1.Greenbox subsidy
WTO ने ग्रीनबोक्स सब्सिडी के रूप में कुछ शर्तें बताई है जो सीधे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित नहीं कर सके।
1. Research
2. Disease control
3. Infrastructure
4. Relief on crop failures
5. Incentive for environment protection.
अगर भारत सरकार कृषि अनुसंधान पर पैसा खर्च करना चाहे तो wto अर्थात विश्व व्यापार संगठन की तरफ से कोई सीमा रेखा तय नहीं है।फसली बीमारियों के बचाव के लिए सरकार किसानों की सीधी मदद करे तो कोई रोक नहीं है।अगर सरकार नदियों को जोड़कर नहरों का जाल बिछाकर सिंचाई का साधन किसानों को  उपलब्ध करवाना चाहे तो जितनी मर्जी खर्च कर सकती है।फसल बर्बादी पर किसानों को मुआवजा देने पर कोई रोक नहीं है।अगर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सरकार किसानों को सीधा बेनिफिट देना चाहे तो दे  सकती है जैसे पंजाब के किसान पराली न जलाने की एवज में 200रुपये/क्विंटल मांग कर रहे थे वो देने में  WTO की तरफ से कोई अड़चन नहीं है।
2. Blue box subsidy
ब्लू बॉक्स सब्सिडी उत्पादन बढ़ाने या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विकृत करने के लिए नहीं दिया जाता है।कुछ देश अपनी घरेलू परिस्थतियों के मुताबिक कुछ फसलों/पशुओं का उत्पादन घटाने के लिए प्रभावितों को सब्सिडी देती है।मान लो मुर्गियों से बीमारीं फैलने का खतरा है और सरकार मुर्गीपालन को हतोत्साहित करना चाहती है या नष्ट करना चाहती है तो प्रभावितों को सब्सिडी दे सकती है व इस पर किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं है। 
3. Amber box subsidy
इस तरह की सब्सिडी अंतराष्ट्रीय व्यापार को बड़े स्तर पर प्रभावित करती है इसलिए इन पर लिमिट तय की गई है।1986-88 की बेस प्राइस को आधार मानकर विकसित देश 5%तक व विकासशील देश 10%तक 
सब्सिडी दे सकते है।इस सब्सिडी की गणना 100%फसल पर लागू होती है।माना कि भारत सरकार कुल 
उत्पादन का 25%धान खरीदती है और 25हजार करोड़ सब्सिडी देती है।WTO की शर्तों के मुताबिक यह  100%खरीद मानी जायेगी और 1लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी मानी जायेगी।
दूसरा पहलू यह भी है कि विकसित देशों में बहुत ज्यादा उत्पादन होता है जिसको वो निर्यात कर सके।कुछ  देश अपने उत्पादन का 50%से ज्यादा निर्यात करते है।भारत खाद्य पदार्थों का 1.1%निर्यात करता है।भारत जैसे देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ज्यादा प्रभावित नहीं करते लेकिन WTO की शर्तों के मुताबिक बंधे होने के कारण सब्सिडी में कटौती करके अपने किसानों को बर्बाद करके विकसित देशों के लिए बड़ा बाजार बन सकते है साधारण तरीके से देखा जाए तो भारतीय कृषि क्षेत्र की सब्सिडी WTO की शर्तों के अनुसार तय हो रही है और इनकी सीमा तय है।इन सीमाओं के कारण.....
1.भारत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में कटौती करने को बाध्य है लेकिन हुक्मरान दावा कर रहे है कि हम  सभी फसलों पर डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देंगे या दे रहे है!
2.फ्री बिजली नहीं दे सकते लेकिन कुछ राज्य दे रहे है व कुछ देने का वादा कर रहे है।
3.खाद व बीज पर सीधी सब्सिडी नहीं दे सकते लेकिन दे रहे है या देने का वादा कर रहे है।
4.स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं लेकिन वादा किया गया व कर रहे है।
5.सीधे सिंचाई पर सब्सिडी नहीं दे सकते अर्थात मुफ्त सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं करवा सकते।
6.निर्यात के लिए सब्सिडी नहीं दे सकते जबकि आयात शुल्क धीरे-धीरे घटाने होंगे।
कुल मिलाकर सीधे 10%तक सब्सिडी दी जा सकती है और भारत सरकार इसी 10%के भीतर खेल खेल रही  है। खाद की सब्सिडी काटकर समर्थन मूल्य में देती है तो बीज की सब्सिडी काटकर सस्ती बिजली में देती है। खेल 10%के अंदर ही गोल-गोल खेल रही है और किसानों के साथ बड़े स्तर पर धोखा किया जा रहा है।आज राजस्थान चुनावों के दंगल में है और तमाम किसान नेता दावा कर रहे है कि हम किसानों को स्वर्ग की सैर करवाएंगे या चांद-तारे तोड़कर देंगे तो हमारे सवाल इन किसान नेताओं से मुद्दों पर आधारित होने चाहिए आज किसान का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ा जा रहा है तो हवा-हवाई बातें करके  चुनाव जीतने से कोई भला नहीं होने वाला है।किसान नेता हमे पूरा रोडमैप बताएं कि आप किस तरह किसानों का का भला करोगे?जब आपके नेता WTO के मंच पर हस्ताक्षर कर रहे थे तब आप चुप थे।जब लोकसभा में  WTO की शर्तों के हिसाब से किसानों का गला घोंटने वाले बिल पास हो रहे थे तब आप हिजड़ों की तरह तालियां/टेबल्स बजा रहे थे और चुनावों के समय किसानों के बीच आते हो तो घड़ियाली आंसू बहाने लग जाते हो! किसान के घर मे पैदा होना ही किसान नेता होने की अनिवार्य शर्त नहीं होती बल्कि किसानों के हितों में कितना लड़ते हो वो तय करेगा कि आप कितने बड़े किसान नेता हो!युवा साथियों व दबाव समूहों से निवेदन है कि इन सवालों पर अपने-अपने नेताओं से जवाब-तलब करो।अगर इनका जवाब देने में काबिल न हो तो सीधे कहो कि आप हमारे लिए संघर्ष करने योग्य नहीं हो।
https://sunilmoga.blogspot.com/
Add caption

भारत माँ का सौतेला बेटा किसान.....

अक्सर समाज मे देखा जाता है कि सौतेला बेटा मेहनत बाकी बेटों से ज्यादा करता है लेकिन उसके हिस्से रूखी-सुखी खाकर दिन तोड़ने के अलावा आता नहीं है। इस भारतीय समाज व देश के नागरिकों की यही असलियत है। देश का पेट भरने वाला,अपने बच्चों को सीमा की रखवाली व आंतरिक कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए भेजने वाला किसान है। न कभी धूप से मायूस हुआ न कभी ठंड के सामने समर्पण किया। न बाढ़ से विचलित हुआ न सूखे से! किसान अगर व्यथित हुआ तो इस देश के सिस्टम से,इस देश के राजनेताओं से,किसान कौम के दलालों से मीडिया से व देश विरोधी लुटेरों से! आज के हालात यह है कि 15%लोगों ने 85%लोगों की मेहनत पर अर्थात पूंजी उत्पादन की क्षमता पर कब्जा  कर लिया है। पूंजीवाद में पूंजी का उत्पादन बैक बोन होती है और पूंजी का उत्पादन मेहनतकश लोग करते है लेकिन व्यवस्था का आलम देखिए 12-16घंटे तक पसीने से तरबतर इंसान बुनियादी सुविधाओं को हासिल करने की जंग लड़ रहा है और 2-4घंटे आफिस में बैठकर दलाली करने वाला हजारों करोड़ रुपये समेटकर भारत माता को गद्दारी का प्रमाणपत्र दिखाकार रफूचक्कर हो रहा है लेकिन इस देश की सत्ता अकड़कर मजलूमों पर लाठियां भांजती है,सत्ता के चमचे किसानों को षड्यंत्रकारी बता रहे है,धारा 377 व 497 पर 22वीं सदी का खाका पेश करते हुए 5 स्टार होटलों में व्हिस्की की चुस्की के साथ एन्जॉय कर रही है! मीडिया किसानों की मांगों को धता बताते हुए जवान बनाम किसान की लड़ाई बताकर 70%आबादी की आवाज व उनके हकों की हत्या कर रहा है। किसान समुदाय हजारों सालों की व्यवस्था का सबसे गंभीर मरीज रहा है।जिंदगी की सांसें चलाने के लिए  सबसे ज्यादा हांफता है लेकिन डॉक्टरों से सबसे कम शिकायत करता है। कुर्बानियां ही उनके हिस्से आती रही है। आजादी से पहले राजशाही व धर्म के मिले-जुले जाल में फंसकर बर्बादी के मंजर को देखते हुए भी अंतिम सांस तक संघर्ष किया। आजादी के बाद लगा कि अब हमारी मेहनत का परिणाम मिलेगा और जिनके हाथ मे सत्ता आई उन्हीं के निर्देशों पर रात-दिन जुटा रहा। आजादी के बाद देश को कोई पेट भरने की उधारी देने को तैयार नहीं था तब देश के किसानों ने कमर कसी और हरित क्रांति के आव्हान को साकार करके दिखाया।एक तरफ सत्ता के लालची कीड़े जाति-धर्म का जहर फैलाकर कुर्सी हासिल करने का षड्यंत्र रच रहे थे तो दूसरी तरफ निश्चिंत किसान मेहनत के बल पर देश को खड़ा करने का ख्वाब देखते हुए सबकुछ कुर्बान कर रहे थे।
गांधी से शुरू हुई क्रांति हत्या की साजिश को कांग्रेस ने 70सालों तक इस देश के मेहनतकशों की बर्बादी के बल पर आगे बढ़ाया है और जाति-धर्म की खेती की खरपतवार बीजेपी ने इस देश की क्रांति को बलपूर्वक दबाने का अभूतपूर्व प्रयास किया है।आजादी के बाद 70साल की क्रांति को दबाने का गुब्बार फुटा और जुमलेंद्र मोदी के रूप में तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट देश के तख्त पर बैठा! 2013-14 के जुमलेंद्र जी के किसानों से किये वादों को दुबारा सुन लीजिए। पहली बार 1991 मे मनमोहनसिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए किसान कौम को अंतराष्ट्रीय मंडी में बेचा था व दुसरी बार 2015 मे मोदी ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में जाकर मुखाग्नि दी थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं है। आज किसानों पर जो लाठियां बरसी, पानी बरसा व आंसू गैस के गोले दागे गए थे वो किसान कौम की नासमझी, नादानियों,दलालों व किसान कौम से निकले राजनेताओं की सामूहिक कब्रगाह का जीता जागता उदाहरण है। किसान कौम के राजनेता 70%किसान वोटों को ठेंगा दिखाकार 15%लोगों की व्यवस्था के चमचे बनकर बर्तनों की टकराहट में आवाज बने तो किसानों को सोचना चाहिए कि आजादी के 70सालों में हमने उत्पादन तो खूब किया लेकिन व्यवस्था,सत्ता व तंत्र के लिए हमने कितना उत्पादन किया है! किसान खेत से निकलकर सड़क पर आ रहा है, उसका बेटा सीमा से तिरंगे में लिपटकर घर आ रहा है, दूसरा बेटा सड़क पर खड़े बाप पर लाठियां बरसा रहा है, तीसरा बेटा बाप की मरहम पट्टी करते हुए व्यवस्था को कोसते हुए जार-जार रो रहा है। क्या एक आव्हान पर भूखे देश को भुखमरी से निकालने वाला, एक आव्हान पर सीमा की जंग जीतने वाला, एक आव्हान पर व्यवस्था बदलने की ताकत रखने वाला किसान इतना कमजोर हो गया है कि बाप-बेटे आपस मे ही लड़कर मर रहे है? क्या किसान माताओं ने भगतसिंह-उधमसिंह पैदा करने बंद कर दिए है?क्या किसान माताओं ने दादा छोटूराम, चौधरी चरणसिंह, ताऊ देवीलाल, सर हयातखान, लालू यादव, मुलायम यादव, देवेगौड़ा जैसे बालक पैदा करने बंद कर दिए है? अगर राकेश टिकैत मांगों पर अड़े रहेंगे तो देशभर से किसान कौम के हजारों भगतसिंह कल मैदान में नजर आएंगे। अगर दो दिन अपने स्टैंड पर कायम रहे तो देश मे बहुत बड़ी क्रांति का आगाज होगा जो सदा-सदा के लिए किसान हित में एक सिस्टम तैयार कर देगी। अगर राकेश टिकैत अपनी इतनी बड़ी मेहनत को किसान हित मे समर्पित करना चाहते है तो कल से टिकैत साहब के साथ हजारों भगतसिंह व लाखों किसान मसीहा नजर आएंगे। किसान धैर्यशील होकर दर्द सहन करने की क्षमता बढ़ाता रहा है लेकिन जब जख्मों पर नमक छिड़का जाए तो हर किसान का बेटा भगतसिंह बनने को तैयार है। किसान ने सदैव देश की अस्मिता का ख्याल रखा है लेकिन जब अस्मिता ठगों के चंगुल में फंसकर तार-तार हो तो अस्मिता बचाने के लिए किसान मैदान में उतरेगा। लोकतंत्र जब जुमलातंत्र के हवाले हो तो किसानों को लठतंत्र का उपयोग जरूर करना चाहिए। 2लठ अगर बीजेपी की पीठ पर पड़े तो चार लठ कांग्रेस की पीठ पर और आठ लठ वहां बजने चाहिए जो सदैव किसान हितों की लड़ाई लड़ने की बातें करते है लेकिन कल किसानों के हित मे दिल्ली की तरफ कूच न करे या इस आंदोलन पर खामोशी बरतें!
https://sunilmoga.blogspot.com/


किसान उठने के बजाय गिरता ही क्यों जा रहा?

दरअसल हम भारतीय लोगों की मानसिकता खुद के कर्मों का विश्लेषण करने के बजाय सब कुछ किस्मत से घटित घटना मान लेना है।किसान का आज फोकस सिर्फ आय पर है जबकि किसी व्यक्ति/परिवार/समाज/देश की आर्थिक अवस्था आय व व्यय दोनों तराजू पर निर्भर होती है। आय बढ़ती जाएं उसका मतलब यह कतई  नहीं है कि किसान खुशहाल होता जाएगा।किसानों की समस्या आय से ज्यादा व्यय के तौर-तरीकों के कारण नासूर बनी है।किसानों को बजट मैनेजमेंट के गुर सीखने ही होंगे।आय का किस तरह उपयोग किया जाए यह बात हर किसान के दिमाग को कौंधती रहनी चाहिए। एक उदाहरण के माध्यम से मैँ आपको एक मझोले किसान की आय-व्यय का अनुमानित ब्यौरा बताता हूँ। जिस किसान के पास 10बीघा सिंचित भूमि है उसकी सालाना आय खेती से 1लाख रुपये से कम नहीं है। किसान साथ मे 2भैंस रखता है व एक समय का दूध बेचता है तो 15लीटर दूध कम से कम 30रुपये किलो बेचकर 13500रुपये अपनी आमदनी सुनिश्चित कर सकता है। 5साल का दूध देने का अनुमान निकाले तो कम से कम हर साल 7महीने भैंस दूध देती है 7x13500=94500 रुपये हर साल दूध से आमदनी हो जाती है।ज्ञात रहे मैने एक समय के दूध का हिसाब लगाया है।एक समय का दूध भैंस के खर्चे व घर मे खाने पीने के लिए छोड़ दिया गया है। दो भैंस कम से कम हर तीसरे साल एक नई भैंस तैयार कर देती है मतलब हर तीसरी साल एक भैंस को किसान बेचने योग्य हो जाता है जिसकी कम से कम कीमत 50हजार रुपये होती है।हर साल लगभग 17हजार रुपये की आय। अगर किसान 2बकरी रखता है तो हर साल अनुमानित आय बकरे/बकरी को बेचकर 10हजार रुपये से कम नहीं बैठती और 2भैंस व 2बकरी की खाद किसान को मुफ्त में मिल जाती है जिसकी कीमत भी 10हजार से कम नहीं होती। अब हिसाब लगाइए। 1लाख+94500+17000+10000+10000=231500रुपये प्रति वर्ष। यह मध्यम किसान परिवार की आय है। अब किसान के खर्चों का हिसाब देखिए।हर साल एक रातिजोगा जिसका खर्च 10हजार रुपये। कहीं रातिजोगा नहीं है तो सवामणी,भंडारा आदि विभिन्न स्वरूपों में है।किसान परिवार का कोई एक सदस्य हर साल किसी पाखंड यात्रा पर जाता है जिसका खर्च 10हजार रुपये। हर तीसरे साल भजन सांध्य/जागरण/कथा आदि करवाता है जिसका खर्च कम से कम 75हजार रुपये।मतलब हर साल 25000रुपये।सालाना किसी मंदिर निर्माण में 5हजार रुपये तो देता ही है।गृह प्रवेश/मुहर्त/पुत्र होने पर या अन्य ऐसा कोई न कोई कार्य करता है जिसका खर्च हर साल के हिसाब से निकाले तो 10हजार रुपये से  कम नहीं होता है। सबसे ज्यादा खर्च दिखावे की प्रतिस्पर्धा में फंसकर शादियों में करते है।अगर हाथ मे पैसा हो तो जमा पूंजी के रूप में बच्चों के लिए उपयोग कर सकते है। सबसे बड़ी मार मृत्युभोज की पड़ती है।दो मृत्युभोज एक किसान परिवार की 10साल की कमाई पर पानी फेर देता है।कुलमिलाकर देखा जाए तो किसान अपनी कमाई की 20साल उम्र पाखंड/अंधविश्वास/फिजूलखर्ची में बर्बाद कर देता है। किसान के दो बच्चे होते है तो उसकी पढ़ाई का खर्च,परिवार की चिकित्सा का खर्च,जिंदगी सरल बनाने की सुविधाओं पर खर्च करने के लिए कुछ बचता ही नहीं है। आय-व्यय की महत्ता को समझते हुए बजट मैनेजमेंट करना बहुत जरूरी है और उसके लिए किसानों को धर्म के नाम के पाखंडों से सबसे पहले मुक्त होना जरूरी है।किसान आय की कमी से व्यय के तौर-तरीकों से  ज्यादा बर्बाद हुआ है व हो रहा है। मैंने एक अनुमानित आय व व्यय बताया है।थोड़ा फेरबदल हो सकता है लेकिन बहुतायत में प्रवाह यही है। बर्बादी के लिए रोज उठते ही व्यवस्था को गालियां देने के बजाय खुद का विश्लेषण भी करना चाहिए। सिर्फ कंधों से ही नहीं बल्कि दिमाग से भी मजबूत बनना पड़ेगा नहीं तो भावुकता का धंधा करने वाले लोग उकसाते हुए यूँ ही बर्बादी के नए-नए विकल्प देते रहेंगे।
https://sunilmoga.blogspot.com/
Add caption


बेशर्म सत्ता और बर्बाद होते किसान!

परसों शाम से राजस्थान में किसान नेताओं को गिरफ्तार करने का सिलसिला शुरू हुआ और कल रात को हरियाणा में भी 23फरवरी के दिल्ली कूच को देखते हुए भारतीय किसान यूनियन के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।बात बड़ी गौर करने वाली है कि शांतिपूर्वक अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने जाने वाले किसान नेताओं को गिरफ्तार क्यों किया जा रहा है?राजस्थान में बीजेपी सरकार के कार्यकाल के अंतिम बजट पेश हो चुका है व केंद्र में मोदी सरकार का भी अंतिम बजट पेश हो गया।किसानों से जो वादे किए गए थे वो सरकार पूरा नहीं कर पाई या यूं कहूँ कि किसानों के साथ जो वादे किए गए वो जुमलों में उड़ा दिए गए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जो विकास की तेज गति का ढींढोरा पीटा जा रहा है वो सिर्फ चंद उद्योगपत्तियों को मालामाल करने वाला व बहुसंख्यक जनता को गरीबी के जाल में धकेलकर गुलाम बनाने का है।दुनियाँ की सबसे बड़ी गरीब आबादी वाले देश मे पूंजीवादी मॉडल को बेतरतीब तरीके से जबरदस्ती लागू करना देश के विनाश का कारण बन रहा है।इसकी सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ी है।1991से जो पूंजीवादी मॉडल अपनाया गया है उसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे है।बिना मुक्कमल तैयारी के कोई भी व्यवस्था लागू करना विनाश का कारण बनती है।अति का अंत एक न एक दिन तो होना ही है।किसान आंदोलन इस अति के अंत की आहट है।लंबे समय तक किसान चुपचाप जयपुर या दिल्ली की तरफ देख रहे थे लेकिन हुकूमत की नाकामियों का बोझ ढोते-ढोते किसान आजिज आ चुका है।आज किसान सरकारों से बेहद खफा है,व्यवस्था से बेहद परेशान है।ज्यादातर जमीनें बैंकों-साहूकारों के पास गिरवी पड़ी है,खेती घाटे का सौदा बन गई,पाखंड ने लूट मचा रखी है,किसानों के बच्चों को दूसरा रोजगार मिलता नहीं! किसान करे तो क्या करे?
खेती को मुनाफे में लाने,किसानों की आय दुगुनी करने,फसलों का लागत से डेढ़ गुणा दाम देने सहित तमाम वादे जुमले बनकर किसानों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे है।दूसरी तरफ हुकूमत में बैठे लोगों के दोस्त-रिश्तेदार देश के हजारों करोड़ रुपये लूटकर विदेश भाग रहे है,सरकार उद्योगपत्तियों के कर्ज को राइट ऑफ कर रही है,किसानों से छीनकर सस्ती जमीन दे रही है,सस्ती बिजली उपलब्ध करवा रही है और इन सबके बावजूद टैक्स में भारी छूट दी जा रही है।किसानों के पढ़े लिखे बेरोजगार बच्चे इस भेदभाव को अच्छी तरह समझ रहे है।अनपढ़ किसानों को रोज बता रहे है कि बापू हम तो फसलों पर 500-700रुपये सरकार ज्यादा मांग रहे है और सरकार आनाकानी कर रही है और मोदी के दोस्त की बहन का लड़का 11300करोड़ रुपये लेकर विदेश भाग गया है!यह सब बातें आक्रोश पैदा करती है।कर्ज में डूबे व लाचार किसान के सामने जब लूट मची हो तो आक्रोश क्रांति की तरफ बढ़ने लगता है।यह किसान क्रांति की आहट है जिसे हुक्मरान बलपूर्वक दबाने की नादान हरकत कर रहे है।
किसान कोई चोर या देशद्रोही नहीं है।सबसे बड़ी व मेहनतकश कौम की जायज आवाज को सरकार द्वारा सहानुभूति पूर्वक सुनने की जरूरत है।यह व्यवस्था की सताई व धैर्यशील कौम है।आज तक विभिन्न वर्गों के आंदोलन आपने देखे होंगे लेकिन किसानों के आंदोलन यदा-कदा ही होते है।एक किसान आंदोलन 1967 में नक्सलबाड़ी बंगाल में हुआ था और सरकारों की नाकामियों व लापरवाही के कारण आज तक एक तिहाई देश उस आग में झुलस रहा है।दूसरा किसान आंदोलन महाराष्ट व मध्यप्रदेश से पिछले साल शुरू हुआ था लेकिन सरकारें किसानों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के बजाय बल प्रयोग पर उतर गई और पूरे देश मे जगह-जगह किसान आंदोलन शुरू हो गए।सरकार अब भी नहीं चेती और किसान नेताओ को गिरफ्तार करते हुए बलपूर्वक दबाने की कोशिश जारी रखी तो इसके भयंकर दुष्परिणाम जल्द ही सामने आएंगे।

सियासत गोबर को कोहिनूर बताने में रह गई
हुकूमत हिन्दू को मुसलमान से लड़ाने में रह गई!
किसान लटक रहे थे पेड़ों पर फंदा लगाकर
सरकार आय बढ़ाने के मंत्र बताने में रह गई!!

https://sunilmoga.blogspot.com/
Add caption

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts