भारत माँ का सौतेला बेटा किसान.....

अक्सर समाज मे देखा जाता है कि सौतेला बेटा मेहनत बाकी बेटों से ज्यादा करता है लेकिन उसके हिस्से रूखी-सुखी खाकर दिन तोड़ने के अलावा आता नहीं है। इस भारतीय समाज व देश के नागरिकों की यही असलियत है। देश का पेट भरने वाला,अपने बच्चों को सीमा की रखवाली व आंतरिक कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए भेजने वाला किसान है। न कभी धूप से मायूस हुआ न कभी ठंड के सामने समर्पण किया। न बाढ़ से विचलित हुआ न सूखे से! किसान अगर व्यथित हुआ तो इस देश के सिस्टम से,इस देश के राजनेताओं से,किसान कौम के दलालों से मीडिया से व देश विरोधी लुटेरों से! आज के हालात यह है कि 15%लोगों ने 85%लोगों की मेहनत पर अर्थात पूंजी उत्पादन की क्षमता पर कब्जा  कर लिया है। पूंजीवाद में पूंजी का उत्पादन बैक बोन होती है और पूंजी का उत्पादन मेहनतकश लोग करते है लेकिन व्यवस्था का आलम देखिए 12-16घंटे तक पसीने से तरबतर इंसान बुनियादी सुविधाओं को हासिल करने की जंग लड़ रहा है और 2-4घंटे आफिस में बैठकर दलाली करने वाला हजारों करोड़ रुपये समेटकर भारत माता को गद्दारी का प्रमाणपत्र दिखाकार रफूचक्कर हो रहा है लेकिन इस देश की सत्ता अकड़कर मजलूमों पर लाठियां भांजती है,सत्ता के चमचे किसानों को षड्यंत्रकारी बता रहे है,धारा 377 व 497 पर 22वीं सदी का खाका पेश करते हुए 5 स्टार होटलों में व्हिस्की की चुस्की के साथ एन्जॉय कर रही है! मीडिया किसानों की मांगों को धता बताते हुए जवान बनाम किसान की लड़ाई बताकर 70%आबादी की आवाज व उनके हकों की हत्या कर रहा है। किसान समुदाय हजारों सालों की व्यवस्था का सबसे गंभीर मरीज रहा है।जिंदगी की सांसें चलाने के लिए  सबसे ज्यादा हांफता है लेकिन डॉक्टरों से सबसे कम शिकायत करता है। कुर्बानियां ही उनके हिस्से आती रही है। आजादी से पहले राजशाही व धर्म के मिले-जुले जाल में फंसकर बर्बादी के मंजर को देखते हुए भी अंतिम सांस तक संघर्ष किया। आजादी के बाद लगा कि अब हमारी मेहनत का परिणाम मिलेगा और जिनके हाथ मे सत्ता आई उन्हीं के निर्देशों पर रात-दिन जुटा रहा। आजादी के बाद देश को कोई पेट भरने की उधारी देने को तैयार नहीं था तब देश के किसानों ने कमर कसी और हरित क्रांति के आव्हान को साकार करके दिखाया।एक तरफ सत्ता के लालची कीड़े जाति-धर्म का जहर फैलाकर कुर्सी हासिल करने का षड्यंत्र रच रहे थे तो दूसरी तरफ निश्चिंत किसान मेहनत के बल पर देश को खड़ा करने का ख्वाब देखते हुए सबकुछ कुर्बान कर रहे थे।
गांधी से शुरू हुई क्रांति हत्या की साजिश को कांग्रेस ने 70सालों तक इस देश के मेहनतकशों की बर्बादी के बल पर आगे बढ़ाया है और जाति-धर्म की खेती की खरपतवार बीजेपी ने इस देश की क्रांति को बलपूर्वक दबाने का अभूतपूर्व प्रयास किया है।आजादी के बाद 70साल की क्रांति को दबाने का गुब्बार फुटा और जुमलेंद्र मोदी के रूप में तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट देश के तख्त पर बैठा! 2013-14 के जुमलेंद्र जी के किसानों से किये वादों को दुबारा सुन लीजिए। पहली बार 1991 मे मनमोहनसिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए किसान कौम को अंतराष्ट्रीय मंडी में बेचा था व दुसरी बार 2015 मे मोदी ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में जाकर मुखाग्नि दी थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं है। आज किसानों पर जो लाठियां बरसी, पानी बरसा व आंसू गैस के गोले दागे गए थे वो किसान कौम की नासमझी, नादानियों,दलालों व किसान कौम से निकले राजनेताओं की सामूहिक कब्रगाह का जीता जागता उदाहरण है। किसान कौम के राजनेता 70%किसान वोटों को ठेंगा दिखाकार 15%लोगों की व्यवस्था के चमचे बनकर बर्तनों की टकराहट में आवाज बने तो किसानों को सोचना चाहिए कि आजादी के 70सालों में हमने उत्पादन तो खूब किया लेकिन व्यवस्था,सत्ता व तंत्र के लिए हमने कितना उत्पादन किया है! किसान खेत से निकलकर सड़क पर आ रहा है, उसका बेटा सीमा से तिरंगे में लिपटकर घर आ रहा है, दूसरा बेटा सड़क पर खड़े बाप पर लाठियां बरसा रहा है, तीसरा बेटा बाप की मरहम पट्टी करते हुए व्यवस्था को कोसते हुए जार-जार रो रहा है। क्या एक आव्हान पर भूखे देश को भुखमरी से निकालने वाला, एक आव्हान पर सीमा की जंग जीतने वाला, एक आव्हान पर व्यवस्था बदलने की ताकत रखने वाला किसान इतना कमजोर हो गया है कि बाप-बेटे आपस मे ही लड़कर मर रहे है? क्या किसान माताओं ने भगतसिंह-उधमसिंह पैदा करने बंद कर दिए है?क्या किसान माताओं ने दादा छोटूराम, चौधरी चरणसिंह, ताऊ देवीलाल, सर हयातखान, लालू यादव, मुलायम यादव, देवेगौड़ा जैसे बालक पैदा करने बंद कर दिए है? अगर राकेश टिकैत मांगों पर अड़े रहेंगे तो देशभर से किसान कौम के हजारों भगतसिंह कल मैदान में नजर आएंगे। अगर दो दिन अपने स्टैंड पर कायम रहे तो देश मे बहुत बड़ी क्रांति का आगाज होगा जो सदा-सदा के लिए किसान हित में एक सिस्टम तैयार कर देगी। अगर राकेश टिकैत अपनी इतनी बड़ी मेहनत को किसान हित मे समर्पित करना चाहते है तो कल से टिकैत साहब के साथ हजारों भगतसिंह व लाखों किसान मसीहा नजर आएंगे। किसान धैर्यशील होकर दर्द सहन करने की क्षमता बढ़ाता रहा है लेकिन जब जख्मों पर नमक छिड़का जाए तो हर किसान का बेटा भगतसिंह बनने को तैयार है। किसान ने सदैव देश की अस्मिता का ख्याल रखा है लेकिन जब अस्मिता ठगों के चंगुल में फंसकर तार-तार हो तो अस्मिता बचाने के लिए किसान मैदान में उतरेगा। लोकतंत्र जब जुमलातंत्र के हवाले हो तो किसानों को लठतंत्र का उपयोग जरूर करना चाहिए। 2लठ अगर बीजेपी की पीठ पर पड़े तो चार लठ कांग्रेस की पीठ पर और आठ लठ वहां बजने चाहिए जो सदैव किसान हितों की लड़ाई लड़ने की बातें करते है लेकिन कल किसानों के हित मे दिल्ली की तरफ कूच न करे या इस आंदोलन पर खामोशी बरतें!
https://sunilmoga.blogspot.com/


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts