संघर्ष_करते_किसान

किसान इस देश की जनता के लिए अन पैदा करने वाला, प्राकृतिक आपदाओं से झूझने वाला सरकारों से  लड़ने वाला,राजनीति का शिकार, मंडी में सफेदपोश व्यापारियों का शिकार, नेताओं के लिए देश की आधी आबादी का वोट बैंक, सड़कों पर उतर आता है बार-बार अपनी मांगों को लेकर होता क्या है, वह तो सबको पता है मिलते हैं आश्वासन और लौट जाते हैं, अपने घरों को वापस! जब भी खेती, किसान का जिक्र आता है, किसान की आमदनी की बात होती है, देश में अनाज के बंपर उत्पादन की बात होती है, हरित क्रांति की बात चलती है एक शख्स का नाम जरुर आता है वो हैं प्रो एमएस स्वामीनाथन। प्रो. स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक कहा जाता है, उन्होंने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए जो सुझाव दिए थे,अगर वो पूरी तरह लागू हो जाएं तो किसानों की दशा बदल सकती है। स्वामीनाथन रिपोर्ट में भूमि सुधारों की गति को बढ़ाने पर खास जोर दिया गया है,किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए ,सिंचाई के लिए सभी को पानी की सही मात्रा मिले, फसली बीमा के लिऐ आसान वित्तीय सुविधाओं को आम किसान तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया है!
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि फ़सलों के सही दाम ना मिलना मंडी की अव्यवस्थता, पानी की सही व्यवस्था ना होना, समय पर कर्ज़ ना मिलना, भूमि सुधार का अधूरा रह जाना ये सब किसानों की समस्या के मुख्य  कारक है। वर्तमान में किसान की स्थिति पर स्वामिनाथन कहते हैं कि खेती एक जीवन देने वाला उद्योग है और यह बहुत दुखद है कि हमारे देश का किसान ख़ुद ही अपना जीवन समाप्त कर लेता है। खेती से किसानों की आमदनी बढ़ाए जाने के लिए,देश के जाने माने कृषि के जानकार देवेंदर शर्मा पिछले काफी समय से किसानों की आमदनी बढ़ाने के तरीकों निकालने पर जोर देते रहे हैं, उन्होंने इस पर अध्ययन भी किया है। उनके कई लेख और वीडियो मैं देखते हैं उन्हें कहते हुए , 1970 में गेहूं 76 रुपए कुंटल था और 2018में करीब 1750 रुपए कुंटल, यानि सिर्फ 19 गुना जबकि इस दौरान सरकारी कर्मचारियों का मूल वेतन और डीए 120 गुना बढ़ा, प्रोफेसर रैंक में 150-170 गुना और कॉर्पोरेट सेक्टर में ये बढ़ोतरी 300-1000 गुना की था। अगर उस अनुमात में किसान की तुलना करें तो गेहूं कम से कम 7600 रुपए कुंटल होना चाहिए।
अस्सी के दशक में गेहूं एक रुपए किलो, दूध एक रुपए लीटर और देसी घी करीब 5 रुपए लीटर था। उस वक्त चपरासी की तनख्वाह 80 रुपए और प्राइमरी के मास्टर का मूल वेतन 195 रुपए था। वक्त की सुई को तेजी से घुमाते हैं और 2018 में आते हैं। आज सरकारी चपरासी को कम से कम 20 हजार रुपए और प्राइमरी स्कूल के मास्टर को न्यूनतम 30 से 40 हजार रुपए मिलते हैं, जबकि ऊपर के ग्रेड में तनख्वाह और तेजी से बढ़ी हैं। जबकि गेहूं का सरकारी मूल्य 16 रुपए 25 पैसे ही है। 37 साल में सरकारी नौकर की सैलरी में कम से 150 गुना बढ़ोतरी हुई जबकि गेहूं की कीमत 16 गुना ही बढ़ी। जबकि इस दौरान 1 रुपए वाला डीजल 58 रुपए लीटऱ हो गया है। और 2-3 रुपए  वाली मजदूरी 200 रुपए प्रतिदिन हो गई है। यानि किसान का खर्च तो तेजी से बढ़ा लेकिन बाकी लोगों के अऩुपात में उसे उपज की सही कीमत नहीं मिली! सोशल मीडिया पर मार्मिक अपील वाला परचा खूब शेयर किया जा रहा है,और दिल्ली में होने वाला किसानों का यह चौथा आंदोलन है, देश के चारों कोने के किसानों ने धरना प्रदर्शन दिल्ली में आकर करके देख लिया एक साथ यह किसान भी नहीं आते, और सरकारों को भी कोई फर्क नहीं पड़ता इससे पहले वाली सरकारों ने कौन सा किसानों के लिए कुछ खास किया था, जो आज किसानों के हितैषी बनकर स्टेज पर जाकर खड़े हुए हैं! आगे उनकी सरकार भी आ जाती हैं, तो वह कितना कर पाएंगे किसानों के लिए यह भी देखने वाली बात होगी राजनीति चमकाना अलग मुद्दा है,और समस्याओं को हल करना एक अलग मुद्दा है, आंदोलन बहुत दिन से किसान करते आ रहे हैं एकता किसानों में नहीं करना सरकारों ने भी नहीं चाहा कुछ इनके के लिए!
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