मोदी नहीं तो क्या पप्पू?

जब भी मोदी सरकार की गलत नीतियों को लेकर आलोचना की जाती तो मोदी समर्थकों का सबसे बड़ा सवाल आमजन से यही होता है।लोकतंत्र कभी विकल्पहीन नहीं होता है यह शाश्वत सत्य है।सवा सौ करोड़ आबादी वाले लोकतंत्र में अहंकार व व्यक्तिवादी तानाशाही के लिए कहीं कोई जगह नहीं है यह इन विधानसभा चुनावों में जनता ने तय कर दिया है।निरंकुश तानाशाही के खिलाफ जनता बगावत करती है तो वो पहले कभी यह नहीं देखती कि उसका विकल्प क्या है बल्कि जनता का एक ही मकसद होता है क्रूर शासकों से पहले मुक्ति हासिल की जाएं। यह किसी बेहतर विकल्प की जीत नहीं है बल्कि बेलगाम व जनविरोधी सत्ता की हार है जिसे स्वीकार करके आत्ममंथन करने की जरूरत है।2014में जिस द्विअर्थी गुजरात मॉडल को लेकर देशभर में बवंडर खड़ा किया गया था उसकी हवा निकल चुकी है।2002के गुजरात दंगों के बाद जो हिन्दू हृदय सम्राट के  रूप में नरेंद्र मोदी की छवि गढ़ी गई और देशभर के धार्मिक चरमपंथियों को हवा देकर माहौल बनाया गया था वो खुद चरमपंथी समूहों के बीच काफूर हो चुका है।धार्मिक उन्मादी समूहों के बीच इस तरह का आईना रखा गया जिसमें वो देखने लगे थे कि मोदीजी प्रधानमंत्री बन जाएंगे तो अयोध्या में भव्य राममंदिर बन जायेगा! कश्मीर से  370समाप्त हो जायेगी!एक के बदले 10सिर लाकर अगले 2-3साल में मोदीजी पाक सेना तो साफ कर ही देंगे! देश हिन्दू राष्ट्र बन जायेगा!प्राचीन रामराज्य या स्वर्णयुग का दौर लौट जायेगा जहाँ धर्म के नाम पर मौज मस्ती करेंगे!मगर 21वीं सदी के लोकतंत्र में ऐसा होना संभव नहीं है यह परत उनके जहरीले दिमाग से हट चुकी है! जबकि इस तरह के मुद्दों का जनता की आर्थिक जिंदगी से कोई लेना देना नहीं होता है और अभी पूंजीवादी दौर में अर्थ ही बेहतर जिंदगी की बुनियाद होता है। जो जागरूक लोग थे और उनका हिन्दू  हृदय सम्राट या राममंदिर से ज्यादा मतलब न होकर भ्रष्टाचार,पॉलिसी पैरालिसिस और विकास आदि मुद्दे थे उनके बीच गुजरात मॉडल को इस तरह पेश किया गया था कि गुजरात गरीब अफ्रीकी देश का हिस्सा था और अकेले मोदीजी ने उसको टोक्यो बना डाला बाकी गुजराती लोग भुखमरी से पलायन करके गए हुए थे और वापिस आये तो गुजरात एकदम चकाचक नजर आया!असल मे कुछ गुजराती व्यापारियों के साथ मिलकर मोदीजी ने अमनपसंद/विकास पसंद लोगों के बीच जो भ्रामक जाल बुना था उसकी परते हट चुकी है। झूठ का बवंडर खड़ा करके लोकतांत्रिक देशों में सत्ता हासिल तो की जा सकती है मगर उसको बरकरार रखना बड़ा मुश्किल होता है।2024तक प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली नहीं है!अगले 50साल तक हम ही राज करेंगे!जन प्रतिनिधि मेरी पार्टी के टिकट से जीतते है!इस तरह के अहंकारी बोल जनता को तब नागवार गुजरते है जब देश का किसान वादा दिलाने के लिए दिल्ली आता है तो लाठियां भांजते हो और साम्प्रदायिकता का  झंडा लेकर दिल्ली आने पर दिल्ली की सत्ता पलक-पाँवड़े बिछाकर खड़ी हो जाती है। हिन्दू व हिंदुत्व आरएसएस और बीजेपी का कॉपीराइट नहीं है यह देश का बहुसंख्यक हिन्दू जानता है। धार्मिकता के नाम पर सांप्रदायिकता का जहर घोलने वाले लोगों पर लगाम लगाने के बजाय जब सत्ताधारी पार्टी के नेता/मंत्री ऐसे लोगों को सम्मानित करते है/बैक अप करते है जनता आईना दिखा ही देती है! विकास के नाम पर 100से ज्यादा योजनाओं के नाम बदलना/सड़कों व रेलवे स्टेशनों के नाम बदलने के सिवाय  मोदी सरकार के पास बताने को कुछ है नहीं!तमाम कोशिशों के बावजूद मेक इन इंडिया वाला दहाड़ता शेर  बीमार होकर सूखता जा रहा है।तमाम लीपापोती के बावजूद नोटबंदी के कारण जो आर्थिक मंदी देश मे आई  है वो अब सबके सामने आ रही है!वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर डटे भूतपूर्व सैनिक हर बड़े आंदोलन  के बीच आकर खड़े हो जाते है कि हमारे साथ ठगी की गई है!फसल बीमा योजना मुआवजा देने के बजाय किसानों को ही कुतर रही है!स्टार्ट अप इंडिया की गाड़ी की चाबी कहीं ख़ो गई है! स्किल इंडिया वाले ट्रेनर अपना सामान समेटकर कौशल विकास मंत्रालय के आगे बैठे है!स्मार्ट सिटी में दुकान लगाने को आतुर व्यापारी समान लेकर किनारे खड़े है!सांसदों व विधायकों की गोद से गांव उतरे तो गांव वाले लुत्फ उठाएं बेचारे  इंतजार में ही बैठे रह गए! जो विकास का गुजरात मॉडल था उसकी हवा निकल चुकी है और जो हिन्दू हृदय  सम्राट वाला मॉडल था उसको लागू करने की तरफ कदम बढ़ाना खुद के हाथ जलाने के समान है। धार्मिकता व  साम्प्रदायिकता का फर्क जनता समझ चुकी है।अयोध्या की धर्म सभा मे 20हजार लोग आए और 9दिसंबर    को रामलीला मैदान में 35-40हजार लोग। बाकी ख्याली पुलाव अच्छे है सजाते रहिये!विकास के नाम पर बताने को कुछ है नहीं तो सिर नकली हिन्दू-हिंदुत्व से ही फोड़ने की मजबूरी है। फिर से याद दिलाना चाहता हूँ कि लोकतंत्र में जनता विकल्प बाद में देखती है और व्यक्तिकेन्द्रित-जनविरोधी सत्ता का इलाज पहले करती है।
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