कर्ज माफी की घोषणा राजनीतिक दलों के लिए ब्रह्मास्त्र का काम कर रही हैं पांच राज्यों के बीच चुनाव में खूब काम भी किया किसानों के कर्ज माफी वाले वादे को लेकर सभी सभाओं में चिल्ला चिल्ला कर घोषणा की गई कर्ज माफ किया जाएगा हुआ यह सत्ता में आते ही अपने हाथ में गंगाजल लिए हुए वादे हो या आम सभा में पुकार कर के किए हुए वादों के मुताबिक अपने कर्जा माफी के काम में जुट गई सत्ता की लालसा रखने वाली राजनैतिक पार्टियां ऐसे ही कर्ज मुक्ति का लालच देंगी और कुर्सियां हासिल कर लेंगी आज कांग्रेस ने दो लाख तक का कर्ज माफ करने की घोषणा करके देश की खेती पर निर्भर लगभग आधी आबादी को आकर्षित किया है आने वाले समय दुसरा कोई राजनैतिक दल 2019 में फिर ऐसी ही चार लाख कर्ज मुक्ति की घोषणा करके अपनी और इस बड़े वोट बैंक को आकर्षित कर लेगा! लेकिन स्थाई समाधान की बात ना तो कर्जा मुक्त करवाने वाले करते और ना कर्जा मुक्त करने वाले करते जो इन किसानों के कर्ज का स्थाई समाधान केवल एक ही है वह है स्वामीनाथन रिपोर्ट उस पर ना तो बात होती और ना ही उसका लागू करने वाला कोई राजनैतिक पार्टी वादा करती और ना ही कर्ज का बोझ उठाने वाले किसान करते कर्ज़ चाहे किसी व्यापारी का माफ हो या किसी किसान का माफ हो कर्ज माफी देश की अर्थव्यवस्था को खराब करने के लिए ही होता है इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती जब तक स्वामीनाथन जैसी रिपोर्ट लागू नहीं होगी यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है। सभी सरकारें किसान हितैषी दिखने के दबाव में होती हैं और चुनाव के नजदीक ये कदम उन्हें फायदा भी पहुंचाते हैं। 2009 में यूपीए ने करीब 60 हजार करोड़ कर्ज माफ करके सत्ता में वापसी की थी। 2019 का चुनाव भी कांग्रेस इसी तर्ज पर जीतना चाहती है। 2017 से लेकर अब तक 8 राज्य किसानों का कर्ज माफ कर चुके हैं। इसे फौरी राहत की तरह बताया और जताया जाता है। जबकि इस कर्ज माफी का बोझ राज्यों की जीडीपी पर पड़ता है। हकीकत ये है कि खेती का जीडीपी में योगदान मात्र 16 फीसदी है और खेती पर निर्भर लोगों की संख्या कहीं अधिक है लगभग इस देश की जनसंख्या की आधी। यह जो कर्ज माफी के लिए पैसा इस्तेमाल किया जा रहा है क्या यह सरकार अपनी जेब से दे रही हैं? या देंगी कभी यह सोचा है? इसके लिए भी सरकार कहीं ना कहीं से कर्ज ही लेकर इस कर्ज को चुकाएगी आंकड़ों की मानें तो लगभग 132 करोड़ प्रत्येक भारतीय हर भारतीय पर 340 डॉलर का कर्ज है। इसे यदि रुपए में बदलें तो ये कर्ज 22 हजार 135 रुपए 70 पैसे बनता है। भारत पर वर्ल्ड बैंक कुल कर्ज 471,852,000,000 डॉलर है इसे देश का दुर्भाग्य कहिए या फिर कुछ और कि सरकार कोई भी रही हो, उसे लोन लेना ही पड़ा है. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 1945 से 21 जुलाई 2015 के बीच भारत पर कुल 101 बिलियन डॉलर (676 अरब रुपये) का कर्ज सिर्फ और सिर्फ विश्व बैंक का था. इसके अलावा International Bank for Reconstruction and Development नाम की एक संस्था है, जो विश्व बैंक का ही हिस्सा है. इसने भारत को कुल 52.7 मिलियन डॉलर (3.5 अरब रुपये) का कर्ज दे रखा है। तो मितरों, बात ये है कि कोई भी सरकार देश का विकास करती है, तो उसके लिए उसे पैसा चाहिए होता है. वो मनमोहन सिंह रहे हों या फिर नरेंद्र मोदी, वो अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या फिर एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, नरसिम्हा राव या फिर कोई भी प्रधानमंत्री हर सरकार ने विश्व बैंक से कर्जा लिया ही है. और रही बात जेब भरने की, तो ये एक राजनैतिक जुमला है. अगर इसमें जरा भी सच्चाई होती तो अभी की ‘ईमानदार’ केंद्र सरकार पैसे का हिसाब-किताब करके अपनी जेबें भरने वाले भ्रष्टाचारियों को जेल भेज चुकी होती।तो मित्रों कर्ज माफी कोई सथाई समाधान नहीं है इसलिए चुनाव से पहले कर्जमाफी वाले लॉलीपॉप लेना बंद करो और इस देश की खेती पर निर्भर आधी आबादी को ईस तरफ ध्यान देने की बहुत जरूरत है की कर्ज माफी से तुम्हारी समस्याएं खत्म नहीं होगी बल्कि ऐसी ही ज्यों की त्यों बनी रहेंगी तुम फाइट करो तुम्हारी स्वामीनाथन रिपोर्ट के लिए एक वही सहारा है जो तुम्हें इस कर्ज जैसे कैंसर से छुटकारा दिला सकता है। वैसे भी बड़ा कर्ज लेकर इस देश से भगोड़े हो जाते हैं छोटे कर्ज वालों के माफ हो जाएंगे और इस कर्ज को चुकाएंगे वही जो कभी कर्ज नहीं लेते जिसको कर्ज की जरूरत है उसको कर्ज मिलता और अगर उसको कर्ज मिल भी जाता है तो उसका माफ नहीं होता ये असलियत है।
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