देश का प्रधानमंत्री मीडिया से हार गया!
कुछ तो खूबियां रही होगी उस फूल में!
कुछ तो खूबियां रही होगी उस फूल में!
हस्ती मिटाने के प्रयास में ही निपटते गए!!
चौधरी चरणसिंह कोई व्यक्ति नहीं थे!चौधरी चरणसिंह कोई राजनेता नहीं थे! चौधरी चरणसिंह कोई मंत्री,मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं थे बल्कि किसान-कमेरे वर्ग की एक विचारधारा थे।जब भी इस देश मे किसानों की बात होगी तो चौधरी चरणसिंह भारत के चमन के उजले सितारे के रूप में आपको या हमे जगाते रहेंगे,दिशा देते रहेंगे,असली वजूद बताते रहेंगे और इन सबके बीच हमे सदा याद दिलाते रहेंगे...
हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है!
तब जाकर कहीं चमन में दीदावर पैदा होता है!!
सन् 1979 में वित्तमंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में चोधरी साहब ने राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की।बाद में मोरारजी देसाई और चरण सिंह के बीच मतभेद बढ़ गए और देसाई ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। एक बार मेरठ में सुबह 5बजे कश्मीर के वर्तमान राज्यपाल सतपाल मलिक गाड़ी चला रहे थे और चौधरी चरणसिंह साथ मे बैठे थे।शहर के बाहर कुछ महिलाएं सड़क किनारे खड़ी थी तब चौधरी साहब ने कहा था कि सतपाल मेरे मन मे यह मलाल सदा रहता है कि मैं इन महिलाओं के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं कर पाया! न यूपी में मुख्यमंत्री रहने का लंबा अवसर मिला और न प्रधानमंत्री रहने का!अगर चौधरी चरणसिंह 10साल यूपी के सीएम रह जाते तो आज यूपी तमाम राज्यों का रोल मॉडल होता और अगर 10साल प्रधानमंत्री रह जाते तो आज देश जाति-धर्म की लड़ाई के बजाय शिक्षा/चिकित्सा की दरों को लेकर वाद-विवाद करता नजर आता! चौधरी साहब 3 अप्रैल, 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे,तब उनकी निर्णायक प्रशासनिक
क्षमता की धमक और जनता का उन पर भरोसा ही था कि सन् 1967 में पूरे देश दंगे होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में कहीं पत्ता भी नहीं हिला।वर्तमान जातिय व धार्मिक दंगों का इलाज तत्कालीन समय मे वो महापुरूष बनकर खड़ा था।17 अप्रैल, 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दुबारा 17 फरवरी, 1970 को वह मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपने सिद्धांतों व मर्यादित आचरण से कभी समझौता नहीं किया। वो मैले कपड़े पहनकर आधी रात को अस्पताल पहुंच जाते थे।उनका कार्य करने का तरीका ऐसा था कि हर डिपार्टमेंट का अफसर कोई बुजुर्ग उनके कक्ष में घुसता तो 5मिनट तक चुपचाप खड़ा होकर निहारता रहता कि कहीं मैँ सीएम चौधरी चरणसिंह से तो मुखातिब होने तो नहीं जा रहा हूँ! कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से जनता (एस) के नेता चरण सिंह 28 जुलाई, 1979 को प्रधानमंत्री बने।राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने निर्देश दिया था कि चरण सिंह 20 अगस्त तक लोकसभा में अपना बहुमत साबित करें।पर इस बीच इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त को ही यह घोषणा कर दी कि वह चरण सिंह सरकार को संसद में बहुमत साबित करने में साथ नहीं देगी। उसूलों के पक्के चरण सिंह ने लोकसभा का सामना किए बिना ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति ने 22 अगस्त, 1979 को लोकसभा भंग करने की घोषणा कर दी।
लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी 14 जनवरी, 1980 को प्रधानमंत्री बन गईं।
चौधरी चरणसिंह अगर भ्रष्ट् नीतियों पर कार्य करने को राजी हो जाते तो वो 10साल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज रह सकते थे मगर अपनी चहुँमुखी काबिलियत के बावजूद किसान-कमेरे वर्ग के प्रति उनकी ईमानदारी,वफादारी व समर्पण उनकी बाधा बनते गए और इस वर्ग के लिए यूपी से लेकर दिल्ली की गद्दी पर बैठकर जो निर्णय लिए वो सदा अवरोधक बनते गए मगर उन्होंने शारीरिक प्रतिष्ठा के लिए कभी अपने वर्ग के लिए,कभी देश के लिए समझौते नहीं किये।इसलिए चौधरी चरण सिंह इस देश की फिजाओं में एक विचार बनकर सदा गूंज रहा है।
अटलबिहारी सरकार ने चौधरी चरणसिंह के जन्मदिन को किसान दिवस घोषित किया तो यूपी की योगी सरकार कल धूमधाम से चौधरी साहब की जयंती मनाने जा रही है और केंद्र सरकार भी धर्म व जाति के दंश से पिंड छुड़ाने के लिए कल चौधरी साहब के विचारों के आगे घुटनों के बल नतमस्तक नजर आए तो आश्चर्य मत करियेगा। जो किसान राजनीति में रुचि रखते हो,जिनको देश से प्रेम है ,जिनको देश को आगे बढ़ाने के विचारों से अवगत होना है उनको चौधरी चरणसिंह को पढ़ना चाहिए व उनके द्वारा लिखित किताबें ‘अबॉलिशन ऑफ़ ज़मींदारी’, ‘लिजेण्ड प्रोपराइटरशिप’ और ‘इंडियास पॉवर्टी एण्ड इट्स सोल्यूशंस’ नामक पुस्तकों को ढंग से पढ़ना चाहिए।
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