बेशर्म सत्ता और बर्बाद होते किसान!

परसों शाम से राजस्थान में किसान नेताओं को गिरफ्तार करने का सिलसिला शुरू हुआ और कल रात को हरियाणा में भी 23फरवरी के दिल्ली कूच को देखते हुए भारतीय किसान यूनियन के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।बात बड़ी गौर करने वाली है कि शांतिपूर्वक अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने जाने वाले किसान नेताओं को गिरफ्तार क्यों किया जा रहा है?राजस्थान में बीजेपी सरकार के कार्यकाल के अंतिम बजट पेश हो चुका है व केंद्र में मोदी सरकार का भी अंतिम बजट पेश हो गया।किसानों से जो वादे किए गए थे वो सरकार पूरा नहीं कर पाई या यूं कहूँ कि किसानों के साथ जो वादे किए गए वो जुमलों में उड़ा दिए गए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जो विकास की तेज गति का ढींढोरा पीटा जा रहा है वो सिर्फ चंद उद्योगपत्तियों को मालामाल करने वाला व बहुसंख्यक जनता को गरीबी के जाल में धकेलकर गुलाम बनाने का है।दुनियाँ की सबसे बड़ी गरीब आबादी वाले देश मे पूंजीवादी मॉडल को बेतरतीब तरीके से जबरदस्ती लागू करना देश के विनाश का कारण बन रहा है।इसकी सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ी है।1991से जो पूंजीवादी मॉडल अपनाया गया है उसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे है।बिना मुक्कमल तैयारी के कोई भी व्यवस्था लागू करना विनाश का कारण बनती है।अति का अंत एक न एक दिन तो होना ही है।किसान आंदोलन इस अति के अंत की आहट है।लंबे समय तक किसान चुपचाप जयपुर या दिल्ली की तरफ देख रहे थे लेकिन हुकूमत की नाकामियों का बोझ ढोते-ढोते किसान आजिज आ चुका है।आज किसान सरकारों से बेहद खफा है,व्यवस्था से बेहद परेशान है।ज्यादातर जमीनें बैंकों-साहूकारों के पास गिरवी पड़ी है,खेती घाटे का सौदा बन गई,पाखंड ने लूट मचा रखी है,किसानों के बच्चों को दूसरा रोजगार मिलता नहीं! किसान करे तो क्या करे?
खेती को मुनाफे में लाने,किसानों की आय दुगुनी करने,फसलों का लागत से डेढ़ गुणा दाम देने सहित तमाम वादे जुमले बनकर किसानों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे है।दूसरी तरफ हुकूमत में बैठे लोगों के दोस्त-रिश्तेदार देश के हजारों करोड़ रुपये लूटकर विदेश भाग रहे है,सरकार उद्योगपत्तियों के कर्ज को राइट ऑफ कर रही है,किसानों से छीनकर सस्ती जमीन दे रही है,सस्ती बिजली उपलब्ध करवा रही है और इन सबके बावजूद टैक्स में भारी छूट दी जा रही है।किसानों के पढ़े लिखे बेरोजगार बच्चे इस भेदभाव को अच्छी तरह समझ रहे है।अनपढ़ किसानों को रोज बता रहे है कि बापू हम तो फसलों पर 500-700रुपये सरकार ज्यादा मांग रहे है और सरकार आनाकानी कर रही है और मोदी के दोस्त की बहन का लड़का 11300करोड़ रुपये लेकर विदेश भाग गया है!यह सब बातें आक्रोश पैदा करती है।कर्ज में डूबे व लाचार किसान के सामने जब लूट मची हो तो आक्रोश क्रांति की तरफ बढ़ने लगता है।यह किसान क्रांति की आहट है जिसे हुक्मरान बलपूर्वक दबाने की नादान हरकत कर रहे है।
किसान कोई चोर या देशद्रोही नहीं है।सबसे बड़ी व मेहनतकश कौम की जायज आवाज को सरकार द्वारा सहानुभूति पूर्वक सुनने की जरूरत है।यह व्यवस्था की सताई व धैर्यशील कौम है।आज तक विभिन्न वर्गों के आंदोलन आपने देखे होंगे लेकिन किसानों के आंदोलन यदा-कदा ही होते है।एक किसान आंदोलन 1967 में नक्सलबाड़ी बंगाल में हुआ था और सरकारों की नाकामियों व लापरवाही के कारण आज तक एक तिहाई देश उस आग में झुलस रहा है।दूसरा किसान आंदोलन महाराष्ट व मध्यप्रदेश से पिछले साल शुरू हुआ था लेकिन सरकारें किसानों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के बजाय बल प्रयोग पर उतर गई और पूरे देश मे जगह-जगह किसान आंदोलन शुरू हो गए।सरकार अब भी नहीं चेती और किसान नेताओ को गिरफ्तार करते हुए बलपूर्वक दबाने की कोशिश जारी रखी तो इसके भयंकर दुष्परिणाम जल्द ही सामने आएंगे।

सियासत गोबर को कोहिनूर बताने में रह गई
हुकूमत हिन्दू को मुसलमान से लड़ाने में रह गई!
किसान लटक रहे थे पेड़ों पर फंदा लगाकर
सरकार आय बढ़ाने के मंत्र बताने में रह गई!!

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