ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में खेती सिर्फ किसान की घरेलू परिस्थतियों से ही प्रभावित नहीं होती है बल्कि भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय संगठन WTO से बंधा हुआ है और उसी की शर्तों के अनुसार किसानों की मदद कर सकता है।LPG अपनाने से पहले भारत सरकार ने सिर्फ भुखमरी से पीड़ित जनता के बारे में सोचते हुए गेहूं व चावल को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखते हुए किसानों की हालत को दरकिनार किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव में आकर नीति-निर्माण का काम किया।भारत के किसानों को झूठे वादे करके बरगलाया गया और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर किसान विरोधी समझौतों पर हस्ताक्षर करते रहे।अब किसान जागरूक हुए है व थोड़े बहुत सवाल-जवाब करने लगे है तो उनको जाति-धर्म के नाम पर असली मुद्दे से भटकाने की कोशिश की जा रही है।
किसानों को WTO की शर्तों के अनुसार किस तरह मदद की जा सकती है वो हमें ढंग से समझना चाहिए WTO के हिसाब से तीन तरह की सब्सिडी दी जाती है।
1.greenbox subsidyकिसानों को WTO की शर्तों के अनुसार किस तरह मदद की जा सकती है वो हमें ढंग से समझना चाहिए WTO के हिसाब से तीन तरह की सब्सिडी दी जाती है।
2.blue box subsidy
3.Amber box subsidy
भारत के किसान इस सब्सिडी के अंतर्राष्ट्रीय खेल को समझे!
1.Greenbox subsidy
WTO ने ग्रीनबोक्स सब्सिडी के रूप में कुछ शर्तें बताई है जो सीधे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित नहीं कर सके।
1. Research
2. Disease control
3. Infrastructure
4. Relief on crop failures
5. Incentive for environment protection.
अगर भारत सरकार कृषि अनुसंधान पर पैसा खर्च करना चाहे तो wto अर्थात विश्व व्यापार संगठन की तरफ से कोई सीमा रेखा तय नहीं है।फसली बीमारियों के बचाव के लिए सरकार किसानों की सीधी मदद करे तो कोई रोक नहीं है।अगर सरकार नदियों को जोड़कर नहरों का जाल बिछाकर सिंचाई का साधन किसानों को उपलब्ध करवाना चाहे तो जितनी मर्जी खर्च कर सकती है।फसल बर्बादी पर किसानों को मुआवजा देने पर कोई रोक नहीं है।अगर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सरकार किसानों को सीधा बेनिफिट देना चाहे तो दे सकती है जैसे पंजाब के किसान पराली न जलाने की एवज में 200रुपये/क्विंटल मांग कर रहे थे वो देने में WTO की तरफ से कोई अड़चन नहीं है।
2. Blue box subsidy
ब्लू बॉक्स सब्सिडी उत्पादन बढ़ाने या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विकृत करने के लिए नहीं दिया जाता है।कुछ देश अपनी घरेलू परिस्थतियों के मुताबिक कुछ फसलों/पशुओं का उत्पादन घटाने के लिए प्रभावितों को सब्सिडी देती है।मान लो मुर्गियों से बीमारीं फैलने का खतरा है और सरकार मुर्गीपालन को हतोत्साहित करना चाहती है या नष्ट करना चाहती है तो प्रभावितों को सब्सिडी दे सकती है व इस पर किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं है।
3. Amber box subsidy
इस तरह की सब्सिडी अंतराष्ट्रीय व्यापार को बड़े स्तर पर प्रभावित करती है इसलिए इन पर लिमिट तय की गई है।1986-88 की बेस प्राइस को आधार मानकर विकसित देश 5%तक व विकासशील देश 10%तक
सब्सिडी दे सकते है।इस सब्सिडी की गणना 100%फसल पर लागू होती है।माना कि भारत सरकार कुल
उत्पादन का 25%धान खरीदती है और 25हजार करोड़ सब्सिडी देती है।WTO की शर्तों के मुताबिक यह 100%खरीद मानी जायेगी और 1लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी मानी जायेगी।
दूसरा पहलू यह भी है कि विकसित देशों में बहुत ज्यादा उत्पादन होता है जिसको वो निर्यात कर सके।कुछ देश अपने उत्पादन का 50%से ज्यादा निर्यात करते है।भारत खाद्य पदार्थों का 1.1%निर्यात करता है।भारत जैसे देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ज्यादा प्रभावित नहीं करते लेकिन WTO की शर्तों के मुताबिक बंधे होने के कारण सब्सिडी में कटौती करके अपने किसानों को बर्बाद करके विकसित देशों के लिए बड़ा बाजार बन सकते है साधारण तरीके से देखा जाए तो भारतीय कृषि क्षेत्र की सब्सिडी WTO की शर्तों के अनुसार तय हो रही है और इनकी सीमा तय है।इन सीमाओं के कारण.....
1.भारत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में कटौती करने को बाध्य है लेकिन हुक्मरान दावा कर रहे है कि हम सभी फसलों पर डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देंगे या दे रहे है!
2.फ्री बिजली नहीं दे सकते लेकिन कुछ राज्य दे रहे है व कुछ देने का वादा कर रहे है।
3.खाद व बीज पर सीधी सब्सिडी नहीं दे सकते लेकिन दे रहे है या देने का वादा कर रहे है।
4.स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं लेकिन वादा किया गया व कर रहे है।
5.सीधे सिंचाई पर सब्सिडी नहीं दे सकते अर्थात मुफ्त सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं करवा सकते।
6.निर्यात के लिए सब्सिडी नहीं दे सकते जबकि आयात शुल्क धीरे-धीरे घटाने होंगे।
कुल मिलाकर सीधे 10%तक सब्सिडी दी जा सकती है और भारत सरकार इसी 10%के भीतर खेल खेल रही है। खाद की सब्सिडी काटकर समर्थन मूल्य में देती है तो बीज की सब्सिडी काटकर सस्ती बिजली में देती है। खेल 10%के अंदर ही गोल-गोल खेल रही है और किसानों के साथ बड़े स्तर पर धोखा किया जा रहा है।आज राजस्थान चुनावों के दंगल में है और तमाम किसान नेता दावा कर रहे है कि हम किसानों को स्वर्ग की सैर करवाएंगे या चांद-तारे तोड़कर देंगे तो हमारे सवाल इन किसान नेताओं से मुद्दों पर आधारित होने चाहिए आज किसान का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ा जा रहा है तो हवा-हवाई बातें करके चुनाव जीतने से कोई भला नहीं होने वाला है।किसान नेता हमे पूरा रोडमैप बताएं कि आप किस तरह किसानों का का भला करोगे?जब आपके नेता WTO के मंच पर हस्ताक्षर कर रहे थे तब आप चुप थे।जब लोकसभा में WTO की शर्तों के हिसाब से किसानों का गला घोंटने वाले बिल पास हो रहे थे तब आप हिजड़ों की तरह तालियां/टेबल्स बजा रहे थे और चुनावों के समय किसानों के बीच आते हो तो घड़ियाली आंसू बहाने लग जाते हो! किसान के घर मे पैदा होना ही किसान नेता होने की अनिवार्य शर्त नहीं होती बल्कि किसानों के हितों में कितना लड़ते हो वो तय करेगा कि आप कितने बड़े किसान नेता हो!युवा साथियों व दबाव समूहों से निवेदन है कि इन सवालों पर अपने-अपने नेताओं से जवाब-तलब करो।अगर इनका जवाब देने में काबिल न हो तो सीधे कहो कि आप हमारे लिए संघर्ष करने योग्य नहीं हो।
3.Amber box subsidy
भारत के किसान इस सब्सिडी के अंतर्राष्ट्रीय खेल को समझे!
1.Greenbox subsidy
WTO ने ग्रीनबोक्स सब्सिडी के रूप में कुछ शर्तें बताई है जो सीधे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित नहीं कर सके।
1. Research
2. Disease control
3. Infrastructure
4. Relief on crop failures
5. Incentive for environment protection.
अगर भारत सरकार कृषि अनुसंधान पर पैसा खर्च करना चाहे तो wto अर्थात विश्व व्यापार संगठन की तरफ से कोई सीमा रेखा तय नहीं है।फसली बीमारियों के बचाव के लिए सरकार किसानों की सीधी मदद करे तो कोई रोक नहीं है।अगर सरकार नदियों को जोड़कर नहरों का जाल बिछाकर सिंचाई का साधन किसानों को उपलब्ध करवाना चाहे तो जितनी मर्जी खर्च कर सकती है।फसल बर्बादी पर किसानों को मुआवजा देने पर कोई रोक नहीं है।अगर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सरकार किसानों को सीधा बेनिफिट देना चाहे तो दे सकती है जैसे पंजाब के किसान पराली न जलाने की एवज में 200रुपये/क्विंटल मांग कर रहे थे वो देने में WTO की तरफ से कोई अड़चन नहीं है।
2. Blue box subsidy
ब्लू बॉक्स सब्सिडी उत्पादन बढ़ाने या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विकृत करने के लिए नहीं दिया जाता है।कुछ देश अपनी घरेलू परिस्थतियों के मुताबिक कुछ फसलों/पशुओं का उत्पादन घटाने के लिए प्रभावितों को सब्सिडी देती है।मान लो मुर्गियों से बीमारीं फैलने का खतरा है और सरकार मुर्गीपालन को हतोत्साहित करना चाहती है या नष्ट करना चाहती है तो प्रभावितों को सब्सिडी दे सकती है व इस पर किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं है।
3. Amber box subsidy
इस तरह की सब्सिडी अंतराष्ट्रीय व्यापार को बड़े स्तर पर प्रभावित करती है इसलिए इन पर लिमिट तय की गई है।1986-88 की बेस प्राइस को आधार मानकर विकसित देश 5%तक व विकासशील देश 10%तक
सब्सिडी दे सकते है।इस सब्सिडी की गणना 100%फसल पर लागू होती है।माना कि भारत सरकार कुल
उत्पादन का 25%धान खरीदती है और 25हजार करोड़ सब्सिडी देती है।WTO की शर्तों के मुताबिक यह 100%खरीद मानी जायेगी और 1लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी मानी जायेगी।
दूसरा पहलू यह भी है कि विकसित देशों में बहुत ज्यादा उत्पादन होता है जिसको वो निर्यात कर सके।कुछ देश अपने उत्पादन का 50%से ज्यादा निर्यात करते है।भारत खाद्य पदार्थों का 1.1%निर्यात करता है।भारत जैसे देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ज्यादा प्रभावित नहीं करते लेकिन WTO की शर्तों के मुताबिक बंधे होने के कारण सब्सिडी में कटौती करके अपने किसानों को बर्बाद करके विकसित देशों के लिए बड़ा बाजार बन सकते है साधारण तरीके से देखा जाए तो भारतीय कृषि क्षेत्र की सब्सिडी WTO की शर्तों के अनुसार तय हो रही है और इनकी सीमा तय है।इन सीमाओं के कारण.....
1.भारत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में कटौती करने को बाध्य है लेकिन हुक्मरान दावा कर रहे है कि हम सभी फसलों पर डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देंगे या दे रहे है!
2.फ्री बिजली नहीं दे सकते लेकिन कुछ राज्य दे रहे है व कुछ देने का वादा कर रहे है।
3.खाद व बीज पर सीधी सब्सिडी नहीं दे सकते लेकिन दे रहे है या देने का वादा कर रहे है।
4.स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं लेकिन वादा किया गया व कर रहे है।
5.सीधे सिंचाई पर सब्सिडी नहीं दे सकते अर्थात मुफ्त सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं करवा सकते।
6.निर्यात के लिए सब्सिडी नहीं दे सकते जबकि आयात शुल्क धीरे-धीरे घटाने होंगे।
कुल मिलाकर सीधे 10%तक सब्सिडी दी जा सकती है और भारत सरकार इसी 10%के भीतर खेल खेल रही है। खाद की सब्सिडी काटकर समर्थन मूल्य में देती है तो बीज की सब्सिडी काटकर सस्ती बिजली में देती है। खेल 10%के अंदर ही गोल-गोल खेल रही है और किसानों के साथ बड़े स्तर पर धोखा किया जा रहा है।आज राजस्थान चुनावों के दंगल में है और तमाम किसान नेता दावा कर रहे है कि हम किसानों को स्वर्ग की सैर करवाएंगे या चांद-तारे तोड़कर देंगे तो हमारे सवाल इन किसान नेताओं से मुद्दों पर आधारित होने चाहिए आज किसान का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ा जा रहा है तो हवा-हवाई बातें करके चुनाव जीतने से कोई भला नहीं होने वाला है।किसान नेता हमे पूरा रोडमैप बताएं कि आप किस तरह किसानों का का भला करोगे?जब आपके नेता WTO के मंच पर हस्ताक्षर कर रहे थे तब आप चुप थे।जब लोकसभा में WTO की शर्तों के हिसाब से किसानों का गला घोंटने वाले बिल पास हो रहे थे तब आप हिजड़ों की तरह तालियां/टेबल्स बजा रहे थे और चुनावों के समय किसानों के बीच आते हो तो घड़ियाली आंसू बहाने लग जाते हो! किसान के घर मे पैदा होना ही किसान नेता होने की अनिवार्य शर्त नहीं होती बल्कि किसानों के हितों में कितना लड़ते हो वो तय करेगा कि आप कितने बड़े किसान नेता हो!युवा साथियों व दबाव समूहों से निवेदन है कि इन सवालों पर अपने-अपने नेताओं से जवाब-तलब करो।अगर इनका जवाब देने में काबिल न हो तो सीधे कहो कि आप हमारे लिए संघर्ष करने योग्य नहीं हो।

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