श्रम कानून,मजदूर व सरकार

पूंजीवादी व्यवस्था में दो तरह के वर्ग होते है मजदूर व उद्योगपत्ति।पूंजीपति संख्या में कम व मजदूर संख्या में ज्यादा होते है मगर पावर के मामले में पूंजीपति मजबूत होते है व मजदूर कमजोर। इसलिए हर देश की सरकार मजदूर हितों के सरंक्षण के लिए कानून बनाती है ताकि पूंजीपति मनमर्जी से मजदूरों का शोषण न कर सके व मजदूर एक नागरिक के रूप में अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।विकसित देशों में फिलहाल श्रम कानून सख्ती से लागू किये जा रहे है लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों में श्रम कानून सिर्फ कागजों में सिमटकर पड़े है।जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारों की एक बड़ी फौज तैयार हो गई है जिसको नियमों के मुताबिक काम पर लगाना एक पेचीदा कार्य है लेकिन सरकारों की नीयत भी कभी अपने देश के मजदूरों को नागरिक समझने की रही नहीं है। हमारे पूर्वजों के लंबे संघर्ष व बलिदानों की बदौलत अंग्रेजों ने सन 1926में भारत सरकार श्रम अधिनियम पारित करवाया जिसमें परमानेंट नौकरी,सोसियल सिक्योरिटी व सामूहिक सौदेबाजी एग्रीमेंट शामिल था। अंग्रेजों ने इसे सख्ती से लागू करने की कोशिश भी की थी लेकिन 1947में देश आजाद हो गया।1990तक भारत सरकार ने मजदूरों के हितों में कुछ संशोधन भी किये।जैसे कार्य के घंटों में कमी,छुट्टी का प्रावधान,चिकित्सा का प्रावधान आदि।1992के बाद पूंजीवादी व्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाते ही श्रमिक हितों को दांव पर रखे जाने की शुरुआत हो गई।पहला बड़ा बदलाव पंडित अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने किया जिसमें पेंशन व्यवस्था को खत्म करके न्यू पेंशन स्कीम लागू कर दी।परमानेंट नौकरी प्राप्त लोगों को बुढ़ापे में पूंजीवादी व्यवस्था के दलदल में फेंकने का यह सबसे बड़ा कदम था। 
2014में FDI का विरोध व स्वदेशी का झंडा लेकर सत्ता में आई मोदी सरकार से मजदूरों को बहुत उम्मीदें थी लेकिन एक-एक करके सारे श्रम कानूनों के दांत काट दिए गए।श्रम कानूनों का मुख्य आधार होता है नौकरी की सुरक्षा अर्थात परमानेंट नौकरी।सार्वजनिक उपक्रमों अर्थात ओएनजीसी,LIC, HAL को एकतरफ बर्बाद किया जा रहा है तो दूसरी तरफ निजी कारखानों के श्रमिकों की शिकायत पर कोई लेबर इंस्पेक्टर कार्यवाही नहीं कर सकता,ऐसे कानून पास किये गए।उसको कार्यवाही के लिए लेबर कमिशनर से अनुमति लेनी होगी। पहली शिकायत पर समझाइश होगी व दूसरी शिकायत पर 50हजार रुपये श्रम विभाग में जमा करवाने होंगे और शिकायत सही पाई गई तो ये 50हजार रुपये जब्त कर लिए जाएंगे।मध्यप्रदेश सहित बीजेपी शासित राज्य यह कानून पास कर चुके है और इनके लिए निर्देश मोदी सरकार से मिल रहे है! 40से कम श्रमिक व बिना बिजली वाले और 20से कम श्रमिक व बिजली वाले कारखानों पर श्रम कानून लागू नहीं होंगे।यह संशोधन कर दिया गया है मतलब 70%मजदूर इन छोटे व मझोले कारखानों में काम करते है उनको एक झटके में मालिकों की मर्जी के हवाले कर दिया गया।72%कारखानों को(19-40श्रमिक संख्या)16श्रम कानूनों से मुक्त कर दिया गया है।

सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन करके 300मजदूरों तक के कारखानों को मालिकों की मर्जी से बंद करने 
का कानून में संशोधन करके रास्ता खोल दिया है।इससे पहले सरकार से अनुमति लेनी होती थी।सरकार कारखाने की हालत देखकर उसको चलाने या मजदूरों को अन्यत्र समायोजित करने का प्रावधान करती थी। अब सिर्फ मालिक की मर्जी से कभी भी बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के कभी भी ताला लटकाया जा सकता है। अप्रेंटिस एक्ट में संशोधन करके प्रशिक्षुओं को काम पर लगाने का प्रावधान कर दिया है।30%की लिमिट खत्म कर दी गई है।ठेका,कैजुअल,डेली रेटेड मजदूरों को शामिल करने के लिए मजदूर की परिभाषा ही बदल दी गई है।प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के नाम पर कारखानों के मजदूरों को अप्रेंटिस व प्रशिक्षुओं से बदलने का मार्ग खोल दिया है।प्रशिक्षण की अवधि 3साल कर दी गई और इन प्रशिक्षुओं को ठेका मजदूरों से सस्ता मैनपावर बनाकर पूंजीपतियों के हवाले करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। फिक्स टर्म एक्ट में संशोधन करके समय सीमा लाद दी गई है।2या 3साल के लिए नौकरी दो जमकर शोषण करो और फिर निकाल दो।समान कार्य,समान वेतन का नियम सरकार खुद अपने विभागों में लागू नहीं करती है निजी कारखानों में यह नियम कौन लागू करवायेगा?ठेका अधिनियम में संशोधन करके इसको खत्म सा कर दिया है।इसके खिलाफ कोई शिकायत करेगा तो उसको नौकरी से निकाल दिया जाएगा क्योंकि नौकरी की सुरक्षा के कानून पहले ही प्रो-कॉर्पोरेट बना दिये गए है। संविदा श्रमिक(विनियमन व उन्मूलन)एक्ट में संशोधन करके 50से कम श्रमिकों के ठेके पर लाइसेंस का प्रावधान खत्म कर दिया है।न मजदूर का पीएफ काटने का झंझट न चेक से सैलरी देने का क्योंकि बिना लाइसेंस के जब ठेके दिए जाएंगे तो कोई भी विभाग मजदूरों के प्रति जवाबदेह नहीं होगा।सरकार ने एक नई नौकरी ईजाद की है जिसे MTS अर्थात मल्टी टास्किंग स्टाफ कहा जा रहा है।चाहे मजदूर बी टेक किया हुआ हो लेकिन उसका उपयोग आप जिस तरह करना चाहो कर सकते हो।वो अधिकारी के कहने पर सफाई से लेकर फाइल्स तक का सभी कार्य देखेगा।मना कर ही नहीं सकता।ऑल इन वन कर्मचारी! मजदूर अपनी मांगों को लेकर दुनियाभर में सदियों से हड़ताल करते आये है व उसको मजदूरों का लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है लेकिन सरकार ने हड़ताल को अवैध घोषित करने के हिसाब से बहुत सारे श्रम कानूनों में बदलाव कर दिए है।हर हाल में हड़ताल अवैध घोषित हो जाये ऐसा जाल बुन दिया गया है।जैसे ही हड़ताल अवैध घोषित होगी वैसे हड़ताली कर्मचारी की एक दिन की हड़ताल के बदले 8दिन का वेतन काटने का अधिकार मालिकों को दे दिया गया है।मजदूरों नेताओं पर जुर्माने से लेकर जेल भेजने तक के प्रावधान लागू कर दिए है।इतना ही नहीं हड़ताल के दौरान मालिकों को हुई क्षति की भरपाई कर्मचारियों का वेतन काटकर करने का प्रावधान भी लागू कर दिया है।ऐसे में कौन मालिक क्षति से डरकर मजदूरों की मांगे मानेगा!

मोदी सरकार सभी 44श्रम कानूनों को खत्म करके 4श्रम संहिता बनाने की और अग्रसर है जिसका प्रस्ताव 
लोकसभा में लाया गया है।वेतन संहिता,औद्योगिक संबंध संहिता,औद्योगिक सुरक्षा संहिता और सामाजिक सुरक्षा संहिता।इसको पूर्ण रूप से प्रो-कॉर्पोरेट बनाया जा रहा है।श्रम कानून पहले से ही ठीक तरह से लागू नहीं है इसलिए वर्कशॉप में 10th पास 5हजार में मजदूरी कर रहा है और मेकेनिकल इंजीनियर नौकरी की तलाश में भटक रहा है।योग्य लोग नौकरी प्राप्त नहीं कर पा रहे है तो कम योग्य लोगों को मजदूरों की मंडी में झोंककर शोषण किया जा रहा है।

जब परमानेंट नौकरी वाले की पेंशन खत्म कर दी गई!बेरोजगारों को पूंजीपतियों की मर्जी पर छोड़ा जा रहा है 
तो हमारे नेता बैठे-बिठाए युवाओं को बेरोजगारी भत्ता किस तरह देंगे यह सोचने वाली बात है।मोदी सरकार ने कहा कि हम हर साल 2करोड़ रोजगार पैदा करेंगे लेकिन किस तरह का रोजगार होगा उस बारे में कोई स्पष्ट नहीं बताया गया।अब तक बिना पेंशन वाली सिर्फ 35लाख नौकरियां दी गई है।राजस्थान सरकार ने 50लाख नौकरियों की बात की थी लेकिन वो नौकरियां कहाँ है?जब लोकसभा व विधानसभाओं में मजदूर विरोधी ये संशोधन पास हो रहे थे तब किसान-कमेरे वर्ग के नेता कहाँ थे?क्यों विरोध नहीं किया गया? असल मे हमारे नेता उद्योगपत्तियों से मोटा चंदा लेते है।धनबल-बाहुबल से चुनाव जीतते है और फिर संसद व विधानसभाओं में बैठकर प्रो-कॉर्पोरेट बिल पास करते है और अपनी हिस्सेदारी लेकर ऐशो-आराम करते है। जब तक आम जनता इनके द्वारा पारित कानूनों पर सवाल-जवाब नहीं करेगी!इनके कुकर्मों का हिसाब चुनावी रण में नहीं करेगी तब तक मेक इन इंडिया के लिए मजदूरों की मंडी बनकर खड़ी रहेगी।


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