संवेदनशील होना गुनाह है?

अपनी समझ व् बुद्धि के अनुसार किसी घटना पर उपजी ऐसी तात्कालिक प्रतिक्रिया जो इंसान को अंदर ही अंदर झकजोर देती है।सोचने के लिए मजबूर कर देती है।ऐसा नहीं है कि संवेदनशीलता सिर्फ इंसानो में ही होती है बल्कि हर जीवित प्राणी का यह नैसर्गिक गुण होता है।किसी में कम व् किसी में ज्यादा हो सकती है। संवेदनशीलता को समाज के संस्कार हमेशा प्रेरित करते है व् समाज को इसके फलस्वरूप भविष्य का फल मिलता है।हर दिन हर पल की अनवरत प्रकिया है जो समय-समय पर पना परिणाम समाज के सामने प्रस्तुत  करती है।किस घटना को किस रूप में लिया जाये यह उस व्यक्ति के इस गुण पर निर्भर करती कि उसमे संवेदनशीलता कितनी है।जब सहिष्णुता व् असहिष्णुता का मुद्दा देश की फिजाओं में गूंज रहा हो तो मैंने भी सोचा कि क्यों न संवेदनशीलता पर भी बात हो जाये?किसी बलात्कार की घटना को पढ़ने-ुनने के बाद आपकी प्रतिक्रिया क्या होती होगी यह मैं नहीं जानता!मैं यह भी नहीं जानता कि आप क्या सोचते होंगेयह व्यक्ति विशेष का अपना गुण है।मैं जब भी ऐसी घटना को पढता हूँ या सुनता हूँ तो एकदम मेरी प्रतिक्रिया होती है कि दोषी को पकड़कर हाथों हाथ फाँसी पर लटका देना चाहिए।मेडिकल रिपोर्ट व् पीड़ित के बयान के अलावा क़ानूनी उलझन नहीं होनी चाहिए।चाहे देश का कानून या बुद्धिजीवी मेरे मत से सहमत हो या नहीं  क्योंकि यह मेरी उस घटना पर प्रतिक्रिया मात्र है जिसे आप लोग भावावेश में बताकर इसको नकार दोगे  लेकिन यह मेरा गुण है जो बचपन से संस्कार के रूप में मेरे अंदर पैदा हुआ है। मुझे आप एकदम बदल नहीं सकते। जब किसी मुठभेड़ में फौजी भाई की मौत होती है तो मैं कहता हूँ कि इस देश को बुलेट ट्रेन से पहले बुलेट जैकेट की जरूरत है तो कोई कैसे मुझे कांग्रेस का एजेंट बताकर मेरी संवेदनशीलता को नकार  सकता  हैजब रोहित वेमुला की मौत पर मैं लिखता हूँ तो मुझे नकारात्मक बताकर कोई कैसे मुझे दरकिनार कर सकता हैराहुल गांधी किसी दलित के घर खाना खाते है तो मैं बता देता हूँ कि आपके पूर्वजों ने ईमानदारी से समाज कल्याण की योजनाएं आगे बढ़ाई होती तो आपको आज यह नाटक करने की नौबत ही क्यों आती?यह मेरी बुद्धि व् समाज के हिसाब से मेरी प्रतिक्रिया है।हर घटना अगर मुझे कुछ कहने को मजबूर करती है तो मैं इसे मेरी संवेदनशीलता समझता हूँ आप मेरे बारे में जो बोलना चाहते हो बोलते रहो।नजरअंदाज करना चाहो कर सकते हो।वह आपकी समझ से उपजी संवेदनशीलता का परिणाम होता है। अगर आपको किसी घटना या दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि इससे मुझे क्या लेना-देना है तो आप जड़ इंसान है।कैसे कोई बुजुर्ग दंपत्तिको भीख मांगते हुए देखकर आप आराम से पास से गुजर सकते हो?कैसे आप सड़कों पर अर्धनग्न अवस्था में लूटते बचपन को नजरअंदाज कर सकते हो?कैसे किसी इंसान की आत्महत्या आपको सिर्फ एक छोटी घटना मात्र लगने लगती है? सड़क किनारे ठण्ड से मरते इंसान के हालात आपको क्यों नहीं झकझोर पाते है?अन्नदाता की उपाधि प्राप्त इंसान अपने ही खेत में पेड़ पर लटक जाता है तो आपको रोटी खाते वक्त ख़ुशी  कैसे हो सकती है?पड़ौसी के घर किसी की मौत से कोहराम मचा हुआ है और अपने घर के दरवाजे बंद  करके गानों को सुनकर खुश कैसे हो सकते है?आप उन चीत्कारों को दरकिनार कैसे कर सकते हैमुझे फर्क पड़ता है।मैं हर घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देता हूँ।मुझे देश के हर नागरिक की मौत पर दुःख होता है।मुझे हर बुरी घटना विचलित करती है।मुझे हर अन्याय की खबर पर अफ़सोस होता है।मैं मेरे द्वारा प्राप्त संस्कारों से उपजी संवेदनशीलता के हिसाब से प्रतिक्रिया देता हूँ।हाँ दोगली संवेदनशीलता का मुजाइरा करना मैंने नहीं सीखा है।मुझे हर समान घटना समान रूप से प्रभावित करती है।मुझे निर्भया गैंगरेप ने भी विचलित किया था तो मुज्जफरनगर गैंगरेप ने भी उतना ही विचलित किया है।मुझे अख़लाक़ की मौत पर अफ़सोस है तो उतना ही अफ़सोस प्रशांत पुजारी की मौत पर है।मुझे सलमान द्वारा फूटपाथ पर सोये लोगों पर गाडी चढाने से जितना दुःख होता उतना ही दुःख किसी राजनेता का दुर्घटना में मारे जाने पर होता है।मुझे जितनी परेशानी हिन्दू धर्म के पाखंड से है उतनी ही परेशानी इस्लाम या ईसायत के पाखंड से है। मुझे हर गरीब की गरीबी ठेस पहुंचाती है चाहे वो किसी धर्म या जाति से क्यों न हो!आप चाहे मुझे कांग्रेस का एजेंट बताओ या बीजेपी का बताकर खुश हो जाओ।आप आरएसएस का एजेंट बताकर अपने आप पर गौरव करो या आम आदमी पार्टी का बताकर गदगद महशूस करो।मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।मैं खुश हूँ कि मेरे अंदर संवेदनशीलता के गुण   का पैमाना उच्चतर स्तर पर है।मेरी आपसे एक ही गुजारिश है कि आप भी संवेदनशील बनिए।इस गुण को अपने अंदर चरम तक पहुँचने दीजिये।संवेदना रूपी प्रतिक्रिया जब फूटती है तो समाज को जागरूक करती है। समाज एक साथ खड़ा होने की हिम्मत जुटाता है।संवेदना को विकास की चमक व् एक-दूसरे के साथ दिखावे की होड़ में मरने मत दीजिये।अगर संवेदना मर गई तो इंसान को तो छोडो प्राणी मात्र से भी पीछे चले जाओगे।संवेदना नहीं बचेगी तो इंसानियत किसी भी रूप में अपना वजूद नहीं बचा पायेगी।तो हर घटना पर खुलकर बोलिये।अपने इस अनमोल गुण का समाज में प्रचार करते रहिये....
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