भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में यह लिखा जाये तो
किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए और न ही मुझ जैसे नादान प्राणी को यह सवाल
करने के जुर्म में शक की नजरों से देखा जाना चाहिए।आप नजदीकी स्कूल का मुआयना करके
इसके बारे में यह आश्चर्यजनक जानकारी प्राप्त कर सकते है।आपने कई बार बुझदिल लोगों
की जबान से सुना भी होगा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच
चुकी है।मैं बुझदिल इसलिए कह रहा हूँ कि वो सबकुछ जानते हुए भी इस और कुछ करने की
सोचते तक नहीं।जो थोडा बहुत सोचते है वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकालकर
पब्लिक स्कूल में दाखिला करवा देते है क्योंकि वो इन स्कूलों की मोटी फीस भरने के
काबिल है।काबिल होना भी समाज पर आजकल भारी बोझ बनना होता है क्योंकि वो अपने आप को
समाज से ऊपर समझने लग जाता है वो ही फाइव स्टार वाली फीलिंग में खो जाता है। जनता
के चुने हुए नुमाइंदे पब्लिक स्कूलों की मान्यता के लिए दिए जाने वाले धन में खोकर
अपने लोगों को ही अंधेरगर्दी में धकेलने का सौदा कर डालते है।ऐसा नहीं है कि हर
नेता या हर अफसर ऐसे ही होते है।कुछ लोग बदलाव करने की कोशिश करते है तो भ्रष्ट
लोगों के पेट में मरोड़ आने लग जाती है।सही काम करने वाले की राह में रोड़े अटकाने
में लग जाते है।ईमानदार लोग परेशान होकर चुप हो जाते है या जिम्मेवारियों से मुंह मोड़ लेते है।ऐसा नहीं है कि यह आज की तात्कालिक समस्या है बल्कि मैकाले के 1935
के
शिक्षा अधिनियम में इस बात की ठोस नींव रख दी गई थी।शिक्षा के लिए संविधान निर्माण
सभा से लेकर नेहरूजी के 14 साल तक के बच्चों की
शिक्षा के अधिकार तक उसी तंत्र में फले-फुले।उसके
बाद आने वाली सरकारों ने केंद्रीय स्तरपर बदलाव करने के लिए कई कानून बनाये ,कई
योजनाये चलाई लेकिन धरातल पर पहुँचते-पहुँचते
खुद कीमरती चली गई।चाहे मिड डे मील योजना हो या शिक्षा का मौलिक अधिकार!सब कुछ
रसायन विज्ञान कीसैद्धांतिक शिक्षा जैसी बनकर रह गई जिसमे प्रयोगों पर अघोषित
पाबंधी सी रही।न शिक्षा का स्तर बदला औरन जिन कन्धों पर बदलाव की जिम्मेवारी थी उनकी
नियत बदली। सरकारी
की जगह निजी शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आ गई।शिक्षा को सामाजिक सरोकार से हटाकर 100%व्यापारिक
वस्तु बना दी गई।जब यह व्यापार बन गई तो मुनाफे की होड़ मचनी ही थी।कैसे भी चलाओ
लेकिन मुनाफा हमेशा बढ़ता रहे।इस दौड़ में शिक्षा के स्तर में सुधार की उम्मीद करना
अपने आप में बेमानी हो जाती है।अच्छी शिक्षा गरीब लोगों का मुद्दा है। पूंजीवाद के
हवाले हो चुके समाज को बचाने की जिम्मेवारी सरकारों की होती है।जब हुक्मरान खुद
पूंजीवाद के हवाले हो जाये तो शिक्षा की ऐसी भयानक तस्वीर सामने आती है।सक्षम लोग
अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर पब्लिक स्कूलों में पहुँच चुके
है।सरकारी स्कूलें गरीबों के हवाले कर दी गई। अब गरीब लोग जाने व् उनके हालात
जाने।जो शिक्षक शिक्षा में बदलाव लाने की चहुँ तरफ बातें करते घूमते है उन्होंने खुद ही अपने बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिल करवा दिया। अब
सरकारी स्कूलें सिर्फ गरीबों के हवाले कर दी गई तो सुधार कैसे हो?नीति
निर्माता के पदों पर कोई गरीब है नहीं और न ही अफसर गरीब है।न्यायपालिका खुद
निर्णय देकर पीछे हट जाती है क्योंकि जजों के बेटे भी सरकारी स्कूलों में कहाँ
पढ़ने जाते है!ऊपर सब जगह घालमेल है तो निचले तबके का कचूमर निकलना निश्चित है।इलाहबाद
हाइकोर्ट ने सरकारी वेतन प्राप्त लोगों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का
फरमान दिया तो सब जगह ख़ामोशी छा गई।मीडिया भी चुप हो गई।कोई वाद-विवाद नहीं हुआ।जिस
सरकारी शिक्षक ने कोर्ट में याचिका लगाई उसको ही नौकरी से निकाल दिया गया।मतलब उच्च तबके की नियत की पोल खुल चुकी है। अब
शोषित व् पीड़ित तबके को किसी से उम्मीद लगाने के बजाय खुद को मैदान में आना
पड़ेगा।अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी।गरीबी से लड़ने वाले अमीर बन गए।शिक्षा के लिए लड़ने
वाले खुद बुद्धिजीवी का तमगा लेकर पंचसितारा मौज मस्ती कर रहे है।इसलिए जागरूक
होइए।अपने बच्चों को जितना पढ़ा सकते हो पढ़ाइये।सरकारी स्कूलों में सुविधाओं के लिए इकट्ठे होकर धरना-प्रदर्शन
करिये।हुक्मरान न सुने तो तालाबंधी करिये। दबाव जितना बना सकते होबनाइये।आपका
सिर्फ एक बच्चा ही पढाई से पीछे नहीं रह रहा है बल्कि आपकी एक पीढ़ी
अँधेरे के गर्त में जा रही है। आप अपनी अगली पीढ़ी को गुलामी के जाल में मत
धकेलिये।इस दुनियां में बुद्धि के अभाव को ही असली अभाव माना जाता है बाकि अभाव
क्षणिक होते है और वो कमियां कहलाते है जिसकी पूर्ति बुद्धि से कभी भी की जा सकती
है.......
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