बढ़ते अस्पताल गिरता स्वास्थ्य..



चिकित्सा व्यवस्था किसी भी देश के नागरिकों की बुनियाद तय करती है।आर्थिक स्तर तय करती है।अच्छा स्वास्थ्य अच्छी सोच पैदा करती है वो सोच ही देश के भविष्य की नींव रखती है।ब्रिटिश राज से पहले देश के नागरिक नीम-हकीमों व् तांत्रिको से अपना इलाज करवाते थे।चरक व् सुश्रुत के देश में इलाज गायब हो गया। अंग्रेजी शिक्षा व् यूरोप के साथ संबंधों ने आधुनिक चिकित्सा की नींव रखी।शुरुआती दौर में चिकित्सा का पेशा हमारे समाज में पूण्य का काम माना जाता था।बीमार लोगों के सामने सफ़ेद कोट में लिपटा इंसान किसी  देवदूत से कम नहीं होता था या लोग उसे भगवान से कम नहीं मानते थे।आज वही भगवान शैतान व् जनता उपद्रवी कैसे बन गई?इसको समझने के लिए हमे आजादी के बाद से अब तक के बदलावों पर ध्यान देना पड़ेगा। 

1933 में भारत चिकित्सा अधिनियम के तहत भारतीय चिकित्सा परिषद् का गठन किया गया।आजादी के बाद 
1956 में संशोधन किया गया।उस समय चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में थी अर्थात अस्पताल  व् मेडिकल कॉलेज की स्थापना सरकार करती थी।1958 व् 1964 के मामूली संशोधन के बाद 1993 में पूंजीवाद अपनाने के बाद व्यापक संशोधन किये गए।निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया गया।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मेडिकल कॉलेज को दी जाने वाली मान्यता अपने हाथ में ले ली।भारतीय चिकित्सा व्यवस्था के पर कुतर दिए गए।बस यहीं से इस विधायी संस्था व् मंत्रालय के बीच की खींचतान में देश की चिकित्सा व्यवस्था फंसकर पटरी से उतर गई। जिसे 2001 के संशोधन ने और बढ़ावा दे दिया। सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के जाल में फंसकर चिकित्सा का पेशा चरमरा गया।डॉक्टरों को बड़े बड़े उद्योगपति घोड़ों की तरह खरीदने लग गए।जिसकी जितनी बड़ी रेट वो उतना बड़ा डॉक्टर!जिसका चिकित्सा के पेशे से कोई लेना देना नहीं वो मालिक और चिकित्सा करने वाला पैसों से ख़रीदा हुआ गुलाम बन गया।भ्रष्टाचार में लिप्त नेता व् अफसरों ने मान्यताओं की बंदरबांट कर डाली।पैसे फेंको और तमाशा देखो वाली कहानी रच दी गई।आज हर शहर में बड़े बड़े निजी अस्पताल खुल गए।पंचसितारा सुविधाएं उपलब्ध करवा दी गई लेकिन चिकित्सा यहाँ से विलुप्त होती गई।अमीर लोग छोटी सी बीमारी के लिए यहाँ पिकनिक की तरह आते है तो गरीब लोग इन अस्पतालों को बाहर से ही देखकर अपनी हिम्मत हार जाते है। जब डॉक्टर घोड़ों की तरह बिकने लगे,कंपनिया दवाइयाँ की जगह जहर की सप्लाई करे,सामाजिक सरोकार की जिम्मेवारी उद्योगपतियों के हवाले कर दी जाये और हुक्मरान आँख मूंदकर बैठ जाये तो जनता का मालिक दुःख बन जाता है व् दर्दभरी जिंदगी जीने के अलावा कुछ बचता नहीं है।मैं चाहता हूँ कि आपको कभी अस्पताल न जाना पड़े लेकिन मज़बूरी में कभी गए हो तो नजारा देखा ही होगा।सरकारी अस्पताल किसी श्मशान घाट से कम नजर नहीं आते है।सरकार जानबूझकर अपनी जिम्मेवारी से पीछे हट रही है।पूरी सरकारी चिकित्सा व्यवस्था डॉक्टरों की मनमानी पर निर्भर करने लग गई।क्योंकि इलाज के साथ-साथ प्रशासक भी इनको ही बना दिया गया।डॉक्टर खुद इलाज करने के बजाय संसाधनों के अभाव का रोना रोकर पल्ला झाड़ने में ज्यादा व्यस्त रहते है।जब भी परेशान लोग अपनों को लेकर सरकारी अस्पताल जाते है तो डॉक्टर सुविधाओं के न होने का इस तरह खाका खींचता है कि लोग कर्म से सीधे किस्मत के भरोसे पहुँच जाते है। सरकारी चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था करना सरकार की समाज कल्याण की नीति के तहत आती है लेकिन बात फिर गरीबी पर ही आकर अटक जाती है। मैं यह समझने की कोशिश में लगा हूँ कि सब समस्याओं की जड़ गरीबी है या सब समस्याएं मिलकर गरीबी पैदा करती है?सवाल वो ही है कि मुर्गी पहले आई या अंडा?लेकिन मैं इतना दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर गरीब में चेतना का भाव  आ जाये या समस्याओं को पहचानने की समझ आ जाये तो सब समस्याएं भाग जायेगी।सरकारी तंत्र इस प्रयास में दशकों से लगा हुआ है लेकिन गाँव में नजर आने वाली नर्स आज नजर नहीं आती।इसका मतलब है कि चिकित्सा व्यवस्था उतरोतर चौपट हुई है।तंत्र व् चुने हुए लोगों की नियत भी खराब होती गई।मैं यह भी पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ कि समाज कल्याण कभी भी ऊपर से नहीं हो सकता।सुधार के दावे-दिखावे जरूर हो सकते है।नीचे से हुआ सुधार ही असली सुधार व् स्थायी सुधार होता है।तो अपनी चेतना को जगाइए व् सुधार की और कदम बढाइये।आपका जागरूक होना व् व्यवस्था में सुधार के प्रति आपके अंदर जूनून होना बहुत जरुरी है.....


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