आज सबसे पहले मैं शहीद भगतसिंह संधू के शहीदी दिवस पर उनको नमन करता हूँ,श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ।जब मैं समाज मे असमानता,गरीबी,लाचारी,बेबसी, अन्याय,अत्याचार,शोषण आदि देखता हूँ तो खुद के सामने भगतसिंह को जिंदा खड़ा पाता हूँ।मैँ कई बार ओशो की एक बात को बार-बार दोहराता हूँ कि जिस दिन भगतसिंह को फांसी हुई थी उसी दिन इस देश की जवानी मर गई थी।भगतसिंह कहा करते थे कि ये मनुवादी-पूंजीवादी गोरे अंग्रेज जाएंगे और मनुवादी-पूंजीवादी काले अंग्रेज उनकी जगह बैठ जाएंगे।अंग्रेजों की पूंजीवादी व्यवस्था से पैदा हुआ ऐशो-आराम वाला बुढापा व्यवस्था परिवर्तन को तैयार नव तरुण जवानी के ऊपर बैठ गया।आजादी के समय इस देश मे शिक्षित लोगों की बेहद कमी थी और इस जटिल पूंजीवादी व्यवस्था को समझने में नाकाम रहे!
पूंजीवादी-मनुवादी भेड़ियों ने भेड़ों के झुंड में पहुंचकर कहा कि मैं आप ही के खानदान से हूँ और आपका ही हित करने आया हूँ और देश की जनता ने काले मन के बजाय काले तन को देखकर अपने खानदान का समझ लिया था।जो लोग धर्म के नाम पर इस देश की बहुसंख्यक जनता को अपने ऐशो-आराम के लिए गुलाम बनाकर रखे थे वो ही गोरे अंग्रेजों की जगह प्रतिस्थापित हो गए।भगत सिंह जिस वर्ग चेतना की बात करते थे उन्हीं वर्गों को खंड-खंड करके बीच मे असमानता की मोटी दीवारें खड़ी कर दी गई।अंग्रेजों के समय जो वर्ग चेतना का भाव जगा था ,अंग्रेजों के जाते ही उस वर्गीय चेतना को टुकड़ों में बांटकर गला घोंट दिया गया।
भगतसिंह जिस धार्मिक व जातीय असमानता को दूर करने की बात करते थे उसी असमानता को आज उस मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर दिया है कि देश की जवानी उसमे उलझकर मर रही है।चंद मनुवादी/पूंजीवादी लोग अपने ऐशोआराम के लिए इस देश की तरुण जवानी के अरमानों को,सपनों को ,उम्मीदों को मार रहे है और धार्मिक-जातीय समूहों में बंटे उन्मादी झुंड एक दूसरे के खून के प्यासे होकर भाग रहे है।आज कर्ज में डूबा अन्नदाता आत्महत्या कर रहा है।अन्न पैदा करने वाला भूख से मर रहा है तो उसका बेटा सीमा पर पर्याप्त भोजन के अभाव से जूझ रहा है।अन्न पैदा करने वाला खेत मे मर रहा है व उसका बेटा सीमा पर शहीद हो रहा है।कौन लोग है जो बाप की मेहनत को अपने बेटे तक नहीं पहुंचने दे रहे है!कौन लोग है जो किसान को उसकी उपज का भाव नहीं लेने देते और सीमा पर खड़े उसके बेटे की थाली से दाल गायब कर रहे है!यह बात इस देश के नौजवानों को समझने की जरूरत है।
छत्तीसगढ़,झारखंड,मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,उड़ीसा,बंगाल के आदिवासियों की जमीनें छीनकर धन्ना सेठों को देने वाले कौन लोग है?जब आदिवासी/किसान रोजी-रोटी मांगते है तो उनको नक्सली बताकर उनके ही बेटों के हाथों गोलियों से भुनवा दिया जाता है।लुटा-पीटा बाप जब हक मांगता है तो उसी का बेटा सीने में गोलियां दाग देता है!कौन लोग है जो बाप-बेटे के बीच यह खाई खड़ी कर रहे है यह बात आपको समझनी होगी!कम से कम नौजवानों को अपने ईमान को कोयले की खदान समझकर जिंदल-अडानी के हाथों में जाने से रोकना होगा!
आज देशभर में हर दूसरे दिन कहीं न कहीं से धार्मिक-जातीय तनाव/हिंसा की खबरे आती है।कौन लोग है जो धार्मिक अड्डों में बैठकर माल लूट रहे है?कौन लोग है जो इन दंगों से हुए ध्रुवीकरण से राजनीति साधकर सत्ता की मलाई मार रहे है?क्या किसी मंदिर के पुजारी,मस्जिद के मौलवी या चर्च के पादरी का बेटा/भाई सीमा पर शहादत देने जाता है?क्या किसी विधायक/सांसद/मंत्री का बेटा वर्दी पहनकर,हाथ मे बंदूक लेकर सीमा पर खड़ा है?क्यों आज भगतसिंह वाली जवानी धार्मिक उन्मादी समूहों में बंटकर मर रही है?क्यों भगतसिंह वाली जवानी काले अंग्रेजों के समर्थक गुटों में बंटकर आपस मे जूतमपैजार कर रही है?
आज किसी गरीब का बच्चा दो जून की रोटी हासिल नहीं कर पाता है,शिक्षा से वंचित है,बीमारीं में इलाज नहीं मिल रहा है तो हमारा खून क्यों नहीं खोलता?धर्म के नाम पर हजारों सालों से गरीबों का शोषण हो रहा है।क्यों भारत के नौजवान गरीबों के हित मे खड़ा होकर धार्मिक सत्ता के खिलाफ बगावत नहीं करते?हर अन्याय भरी,भेदभाव भरी व्यवस्था पर सवाल क्यों नहीं खड़े कर पाते?आज धार्मिक उन्मादी लोग बाबर की गलती का बदला सलीम से लेने की बात करते है तो शम्बूक के कानों में शीशा भरने वाले राजा रामचंद्र के वंशजों के सामने हम सवाल खड़े करने से क्यों कतराते है?अगर पूर्वजों की गलतियों का हिसाब ही करना है तो सबका हिसाब हो!
हम भगतसिंह के सपनों का भारत बनाना चाहते है और मनुवादी लोग नाथूराम के सपनों का भारत बनाना चाहते है।हम धर्म व जाति से परे समतामूलक समाज की बात करते है और मनुवादी लोग एकल हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात करते है।हिन्दू राष्ट्र कैसा होगा?वो ही चार वर्ण होंगे और वो तुलसीदास की चौपाई में कहा जायेगा कि "क्षुद्र,ढोर, पशु और नारी,ये सब ताड़न के अधिकारी!"क्या मनुवाद व भगतसिंहवाद एक साथ चल सकते है?भगतसिंह को चाहने वालों!खेतों में धान रोपने वाली,खलिहानों में गेहूं काटने वाली,सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली,सड़क निर्माण में गिट्टी कंक्रीट डालने वाली तुम्हारी भारत माता है।भगतसिंह प्रेमियों!खेतों में हल चलाने वाला,खानों में पत्थर तोड़ने वाला, ऊंची-ऊंची इमारतों पर ईंटे ढोने वाला तुम्हारा राष्ट्र पिता है।काल्पनिक कार्टूनों,धार्मिक पाखंडियों,आदर्श वादी/हवाई किताबों,तथाकथित मसीहाओं को छोड़कर राष्ट्रनिर्माण में लगे असली लोगों को नमन/सलाम/प्रणाम करना शुरू कर दोगे उसी दिन से व्यवस्था परिवर्तन की शुरुआत हो जाएगी।
अगर आपके पडौसी का बच्चा शिक्षा से वंचित है,आपका पडौसी इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है,कर्ज में डूबा किसान आत्महत्या कर रहा है,शांतिकाल में भी आपका भाई सीमा पर शहीद हो रहा है,चोर लुटेरे गरीबों की जमीनें लूट रहे है,पाखंडी लोग गरीबों का शोषण कर रहे है,काले अंग्रेज धंनसेठों से गलबहियाँ करते हुए घूम रहे है,महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे है,बेटियों को गर्भ में ही मारा जा रहा है,दलितों पर जाति के आधार पर अत्याचार हो रहे है,अल्पसंख्यकों को दुश्मन बताकर बहुसंख्यक लोगों को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है और आप चुपचाप देख रहे है तो आपको आज भगतसिंह को नमन करने की कोई जरूरत नहीं है!आपने भगतसिंह का मात्र फोटो देखा है उनको पढ़ा नहीं है।फोटो लगाकर जोश में आना धार्मिक उन्मादी लोगों से ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि धार्मिक उन्मादी लोगोँ को अपना मकसद/उद्देश्य पता होता है लेकिन आप लोग फोटो लगाकर अनजाने में उनके विचारों की हत्या कर रहे होते हो!
भगतसिंह की पसंदीदा शायरी....
उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।

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