अक्सर मेरा रोज ऐसे लोगों से सामना होता है जो जातिवाद को खत्म करने की बात करते है व दूसरी तरफ ऐसे लोगों से भी सामना होता है जो जातीय गोलबंदी का झंडा लिए खड़े है।मैं भी दिल से चाहता हूँ कि जातिवाद खत्म हो मगर जब जमीन पर उतरता हूँ तो अपनी जाति का झंडा उठा लेता हूँ।यह दुविधा सिर्फ मेरे अकेले की नहीं है बल्कि जातिवाद के खिलाफ जो भी दिल मे भावना रखता है वो अपने समाज/जाति के साथ नाइंसाफी देखता है तो उसके विचार बदलने लग जाते है।मैं किसान जाति से हूँ इसलिए अस्पृश्यता रूपी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है मगर समाज के विकास की बात आती है,उचित अवसरों की बात आती है,लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की बात आती है,सत्ता में भागीदारी की बात आती है तो हमारे साथ अव्वल दर्जे की नाइंसाफी इस देश का सिस्टम करने लग जाता है!
यह साबित बात है कि अपनी श्रेष्ठता व सत्ता कायम रखने के लिए इस देश की जनता को लगभग 6700जातियों में बांटा गया और सहूलियत के हिसाब से ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई कि कुछ को तो बिल्कुल अधिकारविहीन कर दिया गया और कुछ को सीमित अधिकार दिए गए।खुद को सुप्रीम पावर बताकर स्वछंदता हासिल कर ली।खैर इतिहास में जो भी हुआ उसे हमे एकबारगी भूल जाना चाहिए और आजादी के बाद बने संविधान के आधार पर हमें सोचना है।
भारत का संविधान अपनी प्रस्तावना अर्थात कलेजे से कहता है भारत के सभी लोग समानता,स्वतंत्रता व बंधुता की भावना से आगे बढ़ेंगे।भारत का संविधान हमे गरिमामय जीवन जीने की गारंटी प्रदान करता है।रूल्स ऑफ लॉ का राज कायम होगा अर्थात कानून के सामने सब बराबर होंगे।राज्य का कर्तव्य है कि अपने नागरिकों में वैज्ञानिक सोच पैदा करे अर्थात भारत सरकार अपने नागरिकों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने का कार्य करेगी।
अब मैं 3घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा जिससे स्थिति साफ हो जायेगी।1997में बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में रणवीर सेना ने निम्न कही जाने वाली जाति के 60लोगों की हत्या कर दी थी और 2011में मुख्य आरोपी ब्रह्मेश्वर मुख्या जेल से बाहर आ गया।न राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बनी और न टीवी चैनलों पर कोई हायतौबा हुई।
1999 में में दिल्ली में जेसिकालाल नामक एक मॉडल की गोली मारकर हत्या कर दी गई।2006में सभी आरोपी बरी हो गए।हर राष्ट्रीय अखबार की खबर थी No body killed jesica और जेसिका को किसी ने नहीं मारा।इस पर No one killed नाम से फ़िल्म भी बनाई गई।
2012में दिल्ली में निर्भया गैंग रेप की घटना घटी।4आरोपियों को फांसी की सजा,एक ने जेल में खुद फांसी खा ली व एक नाबालिग को 3साल के लिए सुधारगृह भेज दिया गया।1971में महाराष्ट्र के चंद्रपुर थाने के दो पुलिस वालों ने 12वर्षीय आदिवासी लड़की मथुरा के साथ गैंगरेप किया और 1979में दोनों आरोपी बरी हो गए।
2002 को गोड्डा में साबरमती एक्सप्रेस में 68 यात्रियों को जलाकर मार दिया गया।इनके आरोपियों में से ज्यादातर को सजा दे दी गई।2007 में समझौता एक्सप्रेस में बम ब्लास्ट हुआ और चारो आरोपी पिछले दिनों बरी हो गए।इन घटनाओं व हुए इंसाफ के बारे में आप गहराई से सोचिये।इस देश के सिस्टम ने इंसाफ किया है यह!
जम्हूरियत में धर्म व जाति की कट्टरता को कम करने के लिए हुकूमत को चाहिए कि वो संविधान को जमीन पर उतारे और सबको एक नजरिये से देखें।जब देश का दस्तूर कहता है कि कानून के सामने सब बराबर है तो धर्म/सम्प्रदाय/वर्ग/जाति देखकर ये फैसले क्यों होते है?जब अखलियतों पर/अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों द्वारा अत्याचार किये जाते है तो देश का सिस्टम संविधान के अनुरूप चलने से इनकार क्यों कर देता है?जब सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार होते है तो देश का वर्गीय मीडिया खामोशी क्यों बरत लेता है?देश के हुक्मरान बयानबाजी तक सीमित क्यों हो जाते है?देश का प्रशासन वर्ग विशेष के गिरेबां में हाथ डालकर कानून के सामने लाने से क्यों लड़खड़ाने लग जाता है?अंधी कानून की देवी के आगे बैठे काले झोले वाले मी लार्ड की कलम संविधान भूलकर अपने धर्म व जाति के आईने में अपराधियों को देखकर सजा लिखने से पीछे क्यों हट जाती है?
जहां मुल्क की मरकजी हुकूमतें धर्म व जाति के आधार पर विभाजन की नीति पर चलती है,जहां का मीडिया धर्म व जाति के आधार पर मुद्दे तय करता हो,जहां की कार्यपालिका धर्म व जाति देखकर कार्य करती हो,जहां की न्यायपालिका पूजा/इबादत के तौर तरीके देखकर, पहना लिबास देखकर इंसाफ का ढोंग करती हो उस देश मे धर्म विशेष के अनुयायी धार्मिक गोलबंदी करेंगे,जाति विशेष के लोग जातिय गोलबंदी करेंगे ही क्योंकि उनको इस देश के तंत्र पर भरोसा नहीं है,इस देश की व्यवस्था से कोई उम्मीदें नहीं होती है!
जब देश की विधायिका कानून बनाते समय भेदभाव करती है,कार्यपालिका लागू करते समय भेदभाव करती है,न्यायपालिका इंसाफ करते समय भेदभाव करती है तो मजलूमों में एक भय का माहौल पैदा होता है और धार्मिक व जातीय गोलबंदी ही उनके अस्तित्व के लिए एकमात्र उम्मीद नजर आती है।संविधान की पोथी कांच के डिब्बे में रखने के लिए नहीं रची गई थी बल्कि उसमे लिखे एक-एक वाक्य को हिंदुस्तान की फिजाओं में समान रूप से घोलना था!
जिन अल्पसंख्यकों ने,जिन निम्न व मध्यम जातियों ने आजादी के बाद बेहतर भविष्य की कल्पना की थी उनके अरमानों का क्या हुआ!उनके सपनों का हिसाब कहाँ गया!उनकी रोज टूटती उम्मीदों की भरपाई कौन करेगा!न्यायपालिका पर वर्ग विशेष का कब्जा,सत्ता पर वर्ग विशेष का कब्जा,शिक्षा पर वर्ग विशेष का कब्जा,मीडिया पर वर्ग विशेष का कब्जा!हर कदम पर यह अहसास करवाया जाता है कि आप अल्पसंख्यक हो या कमजोर जाति के हो इसलिए आपको अत्याचार सहन करना पड़ेगा!आप किसान कमेरे के बच्चे हो इसलिए ऊपरी ओहदों पर तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं हैं!तुम अल्पसंख्यक हो इसलिए संसद में आने की तुम्हे कोई जरूरत नहीं है!तुम निम्न जाति के हो इसलिए तुम्हे बैंक से कर्ज नहीं मिलेगा और तुम उद्योग नहीं लगा सकते,तुम मजदूरी करने के लिए पैदा हुए हो!
कैसे मिटेगी धार्मिक व जातिय दूरियाँ जब धर्म व जाति देखकर ही सबकुछ तय होता है?इसलिए मेरा तो यही कहना है कि अगर धार्मिक सौहार्द्र पैदा करना है,अगर जातिय भेदभाव दूर करना है तो हुक्मरान नागरिकों को फालतू का ज्ञान बांटने के बजाय संविधान को लागू करे।संविधान मजबूती से लागू होगा तभी देश के नागरिक भयमुक्त होंगे,संविधान मजबूती से लागू होगा तो जाति-धर्म की कट्टर बेड़ियां खुद ही ढीली पड़ने लगे जाएगी,संविधान मजबूती से लागू होगा तो धर्म/जाति से परे हर आदमी खुद को इस राष्ट्र का अव्वल दर्जे का नागरिक महसूस करेगा और आत्मविश्वास से लबरेज,जोश से परिपूर्ण नागरिक ही राष्ट्र की असली पूंजी होती है।
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