किसकी जीत,किसकी हार!

देश मे चुनावी पर्व चल रहा है।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,प्रिंट मीडिया व सोशल मीडिया में धूम मची हुई है।कोई किसी को जीता रहा है तो किसी को मगर जमीन पर इस बार खामोशी ज्यादा नजर आ रही है।सोशल मीडिया से आमजन तक सूचनाएं पहुंच रही है और लोग अपने-अपने हिसाब से चुपचाप मानस बना रहे है।पैसे के बल पर कहीं कहीं भीड़,जुलूस व रैलियां जरूर की जा रही है मगर शामिल होने वाली जनता किसको मतदान करेगी यह तय नहीं है।
कुछ चर्चाएं आम है जिसका बिना जिक्र किये आगे बढ़ना उचित नहीं होगा!बीजेपी की खामोश हार होगी!कांग्रेस खत्म हो जाएगी!प्रधानमंत्री तो मोदी ही बनेंगे!राहुल प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं!गठबंधन की सरकार बनेगी।क्षेत्रियों दलों का रुतबा बढ़ेगा आदि!मेरा नजरिया इन चर्चाओं से थोड़ा अलग है।मेरे हिसाब से यह चुनाव मोदी ब्रांड बनाम जनता होता प्रतीत हो रहा है।तमाम असमंजस के बीच जनता के मानस पटल पर द्विधारी सोच तैर रही है।मोदी को जिताने वाली व मोदी को हराने वाली!जिताने की सोच वालों के दिमाग मे बस यही है कि मोदी हर हाल में जीते नहीं तो देश खत्म हो जायेगा और हराने की सोच वालों के दिमाग मे बस यही है कि मोदी दुबारा आ जायेगा तो संविधान बदल दिया जायेगा, लोकतंत्र खत्म कर दिया जायेगा, तानाशाही का आगाज होगा।
एक बात गौर करने वाली यह भी है कि जो जीताना चाहते है वो सिर्फ सुनाना चाहता है!सुनना उनको कतई पसंद नहीं है मतलब एकतरफा प्रचार हो रहा है।शायद उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए कुछ खास है नहीं!या फिर इनको अंदर ही अंदर कुछ डर सता रहा है या इनको भटका दिया गया है!दूसरी तरफ हराने वाले बाकायदा तथ्यों के साथ जनता के सामने जा रहे है,जनता के सवालों के जवाब दिए जा रहे है और ये लोग कांग्रेस की विचारधारा से इतर लोग है।कहने का मतलब यह है कि इनका कांग्रेस से कोई लेना देना नहीं है।चाहे कांग्रेस जिये या खत्म हो!
जब मुझे लगा कि असल मे बीजेपी व कांग्रेस जनता के बुनियादी मुद्दों पर न आकर हवा-हवाई क्यों चल रहे है तो दूसरे नजरिये से कुछ छानबीन शुरू की।सबसे पहले संघ के मुख्यालय की तहकीकात की।बड़ी-बड़ी फार्च्यूनर जैसी गाड़ियों का काफिला खड़ा नजर आया।10 साल पहले बाकायदा इस मुख्यालय में साइकिलों के लिए पार्किंग स्टैंड बने हुए थे जो अब लगभग गायब हो गए है और उनकी जगह इन लक्जरी गाड़ियों ने ले ली है।स्वदेशी व सादगी की गाथा गाने वाले व साइकिलों पर चलने वाले प्रचारक अब खुलकर आरएसएस के स्वयंसेवक लिखा टी शर्ट पहनते है और इन लग्जरी गाड़ियों में घूमने लगे है।कभी संघ कहा करता था कि यह शुद्ध रूप से सांस्कृतिक संगठन है और इसका राजनीति से कोई मतलब नहीं है!बीजेपी से सदा अलग होने की दुहाई देता रहा था मगर पिछले पांच सालों में उतरोतर म्यान से तलवार बाहर आती गई और अब खुलकर बीजेपी व संघ देश के सामने आ गया है।
मैंने पहले एक लेख के माध्यम से लिखा था कि संघ ने भाजपा के सामने समर्पण कर दिया है।सत्ता की धौंस व पैसे की खनक संघ को लील रही है।यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक और न कांग्रेस के लिए,न देश के लिए निर्णायक है और न जनता के लिए!ये चुनाव सिर्फ और सिर्फ आरएसएस के लिए निर्णायक है।कोई जीते या कोई हारे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है मगर यह चुनाव इस सांस्कृतिक संगठन के ताबूत में आखिरी कील जरूर ठोक देगा।
पिछले पांच सालों में बीजेपी के विधायकों-सांसदों,पार्टी पदाधिकारियों, मंत्रियों के इर्द-गिर्द संघ के स्वयंसेवको का जमावड़ा रहा है और पैसे का खून उनके मुँह पर लग चुका था इसलिए मोदी सरकार की विदेशनीति से लेकर एफडीआई तक पर संघ ने कभी मुंह नहीं खोला।सार्वजनिक उपक्रम निजी पूंजीपतियों के हवाले होते गए,मेक इन इंडिया के नारे के बीच विदेशी कंपनियां देश के संसाधनों पर कब्जा करती रही मगर संघ खामोश रहा।किसान पर लाठियां बरसती रही और संघ का संगठन भारतीय किसान संघ ने कभी मुँह नहीं खोला।11अशोका रोड से कार्यालय अरबों रुपये के हाईटेक केंद्र में बदल गया और संघ उसके पीछे चलता गया।कहने लबो-लुआब यही है कि 90साल जो स्वयंसेवक शाखाओं में प्रशिक्षण ले रहे थे वो प्रशिक्षण कहीं काम नहीं आया और सत्ता ने एक ही झटके में अपने आगोश में ले लिया।
2014के जीत के बाद बीजेपी के प्रभावी नेतृत्व व धनबल के साथ संघ का जो टकराव शुरू हुआ था वो 2019आते-आते मुकम्मल तरीके से खत्म हो चुका है।इन पांच सालों में स्वयंसेवक देशी चे-ग्वेरा की तरह क्रांति करते हुए सत्ता के इर्द-गिर्द माल लूटते नजर आए!स्वयंसेवकों को इन पांच साल की सत्ता के लुत्फ ने यह समझा दिया है कि बिना उत्पादन के हरामखोरी में कैसे एशो-आराम की जिंदगी काटी जाती है।कहा जाता है कि फुल टाइम स्वयंसेवकों के पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती मगर अब देख सकते है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 3करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का ब्यौरा चुनावी घोषणापत्र में दिया है।यह सभी स्वयंसेवको को साफ संदेश है कि पूंजी पर ध्यान केंद्रित करो!आज कई स्वयंसेवकों ने लक्जरी गाड़ियां,बंगले व फार्म हाउस तक हासिल कर लिए है!नौकरशाही में समाया स्वयंसेवक राज्यपाल,वाईस चांसलर सरीखे पदों पर बैठकर आनंद-मंगल में है।अब स्वयंसेवक पेड कार्यकर्ता है।पूंजी निर्माण वाला सिनेमा कभी विचारधारा का वाहक नहीं होता है।देश व समाज के प्रति निष्ठा का लोप बड़े बड़े सांस्कृतिक संगठनों को ले डूबता है जिसमे संघ भी अपवाद नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि राम-मंदिर कौन बनायेगा?धारा 370कौन हटायेगा?समान नागरिक संहिता लागू करके देश को एकसूत्र में कौन पिरोयेगा?हिन्दू राष्ट्र कौन बनायेगा?इन सवालों को समझने के लिए पिछले पांच सालों में आरएसएस व बीजेपी की चुपी बहुत कुछ कहती है।पथभ्रष्ट लोगों का झुंड कभी बनाने में विश्वास नहीं करता है।इनका कार्य स्थापित चीजों को तोड़ना होता है।इनकी नींव ही विध्वंस के रास्ते से हुई है।दो-नेशन थ्योरी के जनक ये ही लोग थे।देश के नागरिकों को नफरत की बुनियाद पर धर्मों के बाड़े में बांटने वाले ये ही लोग है!इनका इतिहास उठाकर देख लीजिए इन्होंने कभी जोड़ने/बनाने का कोई कार्य नहीं किया है!अब संघ व भाजपा आपस मे घुल-मिलकर एक होने का नजारा पेश कर रही है तो यकीन मानिए जड़ अर्थात संघ पूंजीवादी भाजपा के चंगुल में है और 2019 के बाद संघ की शाखाएं पार्कों/मैदानों/खेतों से निकलकर शहरों में दलाली के आउटलेट बनती नजर आयेगी!जिस गति से तोड़क बाण से देश को टुकड़ों में तोड़ने का काम किया है,धर्म से निकलते हुए जातियों में तोड़ रहे है,यह कार्य अब दुगुनी तेजी से होगा!
आपका ध्यान किधर है!
टुकड़े-टुकड़े गैंग इधर है!!


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