लोक का विलयकरण.

भारतीय लोकतंत्र का राजनेताओं,मीडिया व उद्योगपत्तियों ने बड़े शातिराना अंदाज में अपहरण किया है जहां लोक इनके द्वारा तैयार तंत्र में फंसकर खुद की सांसें खींचने में भी असहाय नजर आता है। अब तो नजारा ऐसा  लगता है कि लोकतंत्र में लोक खुद लोक न रहकर विलयकरण का शिकार हो गया है। मीडिया की कलम का सत्ता के साथ सदा संघर्ष रहना ही सच्चे लोकतंत्र की पहली शर्त होती है मगर भारतीय  मीडिया सत्ता की गोदी में बैठकर खेल रहा है। लोक का तो यह हाल है कि सत्ता की गाड़ी में बैठने वाले पत्रकारों के फैन क्लब बनकर उनके साथ विलीन हो रहा है!राजनेताओं के फैन बनकर लोक राजनेताओं में विलीन हो रहा है और पत्रकारों व राजनेताओं के पीछे बैठकर उद्योगपत्ति इनको हांक रहे है। जो मनोरंजन के क्षेत्र के नायक/नायिका है उनके न बनना अच्छी बात है क्योंकि वो आपकी व आपकी भावी पीढ़ी के भविष्य का फैसला नहीं कर सकते। जिनके हाथ में लोक के वर्तमान व भविष्य की चाबी होती है उनके फैन बन जाते है तो फिर लोक बनकर आप सवाल नहीं कर सकते क्योंकि साथ मे सेल्फी खींचकर अपनी प्रोफाइल पर चस्पा करके तस्दीक कर दी है कि आपने अपना लोक होने का वजूद उसमे विलीन कर दिया है। फैन मतलब आप अपने बुनियादी अधिकारों व सुविधाओं के लिए जंग की पहली सीढ़ी ही हार गए है।लोकतंत्र में लोक सदा जिंदा रहना चाहिए।सत्ता सदैव क्रूर होती है और हर हाल में जनता पर नियंत्रण चाहती है।सत्ता में बैठा इंसान सदैव डरा हुआ होता है और उसी डर के कारण अपने फैन के माध्यम से बाकी बचे लोक को डराने-धमकाने का कार्य करता रहता है।
भारतीय महाद्वीप की यह सदा त्रासदी रही है कि लोक खुद से कभी लोक बनने की तरफ कोशिश करता नजर ही नहीं आया।बीच-बीच मे कोई ढंग का कारीगर आता है और लोक होने का अहसास करवा देता है और फिर वही ढाक के तीन पात! लोकतंत्र में जन आंदोलन,मीडिया द्वारा सत्ता के बजाय जनता की आवाज बनना व नागरिकों के सवाल ऐसे अपरिहार्य स्तंभ है जो तंत्र के ऊपर लोक को स्थापित करते है। मैँ हर किसी से सवाल  इसलिए नहीं करता कि मुझे उनको नीचा दिखाना है बल्कि मैँ लोकतंत्र में लोक बनकर अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रहा हूँ।मैँ मतदाता हूँ मगर अंगुली की स्याही के साथ ही मेरी राजनीति खत्म हो जाती है और मैँ लोक की भूमिका पर ध्यान केंद्रित कर देता हूँ।ये पत्रकारों के फैन क्लब,उद्योगपत्तियों को राष्ट्रवादी बताना,राजनेताओं के फैन क्लब आदि तंत्र में लोक का विलयकरण है जिससे सदा बचा जाना चाहिए।

यह समस्या सिर्फ भारत की ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की है व पहले यूरोप में भी बहुतायत में रही है मगर यूरोप में लोक जागरूक हुआ उसी का नतीजा है कि फ्रांस की सड़कों पर लाखों करोड़ों लोग राष्ट्रपति को हटाने के लिए सड़कों पर उतर जाते है!क्या भारतीय उप महाद्वीप में लोक किसी विधायक को हटाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर सकते है!फैन क्लब वाले कानून विशेषज्ञ इस तरह के परिवर्तन की मांग पर कुंडली मारकर बैठे है,मीडिया लोक को तुरंत अपराधी घोषित करेगी,विधायक जी के फैन क्लब वाले हुड़दंग शुरू करके तंत्र को बल का प्रयोग करने के लिए बुला लेंगे। लोक के विलयकरण का ही नतीजा है कि राजनेता लोक के सवालों के जवाब नहीं देते,तंत्र लोक के आंदोलनों को तवज्जो नहीं देता।कितने ही बड़े जन आंदोलन इस विलयकरण के शिकार होकर दम तोड़ गए और जागरूक लोक मायूस होकर बैठ गए।जिस गति से लोक का विलयकरण हो रहा है उसी गति से तंत्र के पंजे में फंसकर लोक बर्बाद होता जा रहा है। सोशल मीडिया में गाली-गलौच,भीड़ द्वारा लोगों पर हमला,सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं आदि इसी लोक  के विलयकरण का नतीजा है।एक नया राजनेता सभी राजनेताओं को गालियां देता है तो लोक ताली बजाता है! एक पत्रकार सभी पत्रकारों को बेईमान कहता है तो लोक तालियां बजाता है!एक जज जजों को भ्रष्ट बताता है तो लोक तालियां बजाता है!एक डॉक्टर सभी डॉक्टरों को लालची-भ्रष्ट बताता है तो लोक तालियां बजाता है!

इसका साफ मतलब है कि लोकतंत्र में लोक अभी भी जिंदा है मगर इस कॉकटेल के भय से अपने जिंदा होने का सबूत देने से कतराने लग गया है और लोकतंत्र के क्षरण का मुख्य कारण भी यही है

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