हर ट्रेन का एक स्टेशन ऐसा होता है जहां यात्री को उतरना ही होता है। उसके बाद या तो उसकी यात्रा ख़त्म हो जाती है या फिर आगे की यात्रा शुरू होती है। मुझे नहीं पता कि मेरी ये आपके साथ यात्रा अब हमेशा के लिए ख़त्म हो रही है या आगे कोई और यात्रा है। हो सकता है, कभी-कभी किसी घटना या व्यक्ति के बारे में मेरा निष्कर्ष और आकलन ग़लत रहा हो क्योंकि मेरे ज्ञान और मेरी समझ का दायरा सीमित हैं। लेकिन इतना तो सौ फ़ीसदी सच है कि जिसके साथ भी रिस्ते रखे, वो पूरी ईमानदारी से रखे। हमारे बीच में कुछ मतभेद थे लेकिन वे कभी निजी तौर पर प्रदर्शित नहीं किए गए। फ्रेंड्स पर बहुत कुछ लिखा गया है। सबसे अच्छी बात ऑस्कर वाइल्ड साहब ने कही है- फ्रेंड के साथ उसके कष्टों में तो कोई भी खड़ा हो सकता है। फ्रेंड के साथ उसके सुख में भी खड़ा होने के लिए बहुत बेहतरीन स्वभाव चाहिए।
बचपन से अब तक न जाने कितने दोस्त बने लेकिन बमुश्किल दो-तीन ही ऐसे निकले जिनसे एक बार छन गई तो फिर कभी छूटी ही नहीं। हालांकि इस बात का कोई व्यवहारिक अर्थ नहीं बचा है। जिंदगी ने दूरियां पैदा कर दी हैं। किसी से साल में एक-दो बार फोन पर बात हो जाए, मिलना-जुलना दो-चार साल में एक बार ही हो पाए तो इसमें दोस्ती बनी रहने जैसा क्या है? बस, भीतर यह एहसास रहता है कि हमारे बीच भरोसे का रिश्ता है। यहां से लगता है कि अपनी हर दोस्ती की बुनियाद में खुद आप ही होते हैं। अगर आप भीतर से खुले हुए हैं, मन के भीतर गांठें नहीं भर रखी हैं तो दोस्तों का अकाल आपको कभी नहीं घेरेगा। उनमें कुछ कम तो कुछ ज्यादा दिन साथ रहेंगे, लेकिन उनकी दोस्ती का उजाला आपकी भीतरी राहों को हमेशा रोशन किए रहेगा। दोस्तों का साथ मिला तो किसी न किसी वजह से उसमें दरार आ गई। किसी ने कुछ कह दिया तो गुस्सा, हमारी बात पर असहमति जता दी तो मुश्किल। झगड़े की इस लिस्ट में इससे भी छोटी वजहें शामिल हैं, जैसे सुनी-सुनाई बात पर भरोसा कर लिया, किसी ने रूडली बात कर ली तो हमसे बर्दाश्त नहीं हुआ, मुझे छोड़कर किसी और को लिफ्ट दे दी, हमेशा मैं ही क्यों कॉल करूं, उधार देने से मना कर दिया और ऐसी ही बहुत-सी छोटी-छोटी बातें। इन जरा-जरा-सी बातों को हमने ही इतना बड़ा कर दिया कि दोस्ती इनके सामने छोटी हो गई। यह खाई हमने खोदी और गिरे भी हम ही।
समस्या यह है कि हर कोई आपको जानता है। और उनमें से ज्यादातर आपको चाहते हैं। और उनमें से कई चाहते हैं कि आप उनसे अपने दोस्तों की तरह व्यवहार करें। और यह बहुत मुश्किल है।
सुनील मोगा
बचपन से अब तक न जाने कितने दोस्त बने लेकिन बमुश्किल दो-तीन ही ऐसे निकले जिनसे एक बार छन गई तो फिर कभी छूटी ही नहीं। हालांकि इस बात का कोई व्यवहारिक अर्थ नहीं बचा है। जिंदगी ने दूरियां पैदा कर दी हैं। किसी से साल में एक-दो बार फोन पर बात हो जाए, मिलना-जुलना दो-चार साल में एक बार ही हो पाए तो इसमें दोस्ती बनी रहने जैसा क्या है? बस, भीतर यह एहसास रहता है कि हमारे बीच भरोसे का रिश्ता है। यहां से लगता है कि अपनी हर दोस्ती की बुनियाद में खुद आप ही होते हैं। अगर आप भीतर से खुले हुए हैं, मन के भीतर गांठें नहीं भर रखी हैं तो दोस्तों का अकाल आपको कभी नहीं घेरेगा। उनमें कुछ कम तो कुछ ज्यादा दिन साथ रहेंगे, लेकिन उनकी दोस्ती का उजाला आपकी भीतरी राहों को हमेशा रोशन किए रहेगा। दोस्तों का साथ मिला तो किसी न किसी वजह से उसमें दरार आ गई। किसी ने कुछ कह दिया तो गुस्सा, हमारी बात पर असहमति जता दी तो मुश्किल। झगड़े की इस लिस्ट में इससे भी छोटी वजहें शामिल हैं, जैसे सुनी-सुनाई बात पर भरोसा कर लिया, किसी ने रूडली बात कर ली तो हमसे बर्दाश्त नहीं हुआ, मुझे छोड़कर किसी और को लिफ्ट दे दी, हमेशा मैं ही क्यों कॉल करूं, उधार देने से मना कर दिया और ऐसी ही बहुत-सी छोटी-छोटी बातें। इन जरा-जरा-सी बातों को हमने ही इतना बड़ा कर दिया कि दोस्ती इनके सामने छोटी हो गई। यह खाई हमने खोदी और गिरे भी हम ही।
समस्या यह है कि हर कोई आपको जानता है। और उनमें से ज्यादातर आपको चाहते हैं। और उनमें से कई चाहते हैं कि आप उनसे अपने दोस्तों की तरह व्यवहार करें। और यह बहुत मुश्किल है।
सुनील मोगा

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