दुनियाँ के देशों का इतिहास उठाकर देखते है तो कहीं सामंतवाद के बाद पूंजीवाद की स्थापना हुई तो कहीं सामंतवाद के बाद साम्यवाद की स्थापना हुई।दुनियाँ भर में सोवियत रूस के नेतृत्व में साम्यवाद व ब्रिटेन-अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवाद के बीच संघर्षों की कहानियों से इतिहास की किताबें भरी पड़ी है मगर भारत के संदर्भ में देखा जाएं तो सामंतवाद के बाद न साम्यवाद का रास्ता अपनाया गया और न पूंजीवाद का!बीच का ढुलमुल रवैया अपनाया गया जिसे समाजवाद कहा गया!
साम्यवाद धीमी पूंजी निर्माण की प्रक्रिया के कारण ध्वस्त होता नजर आया तो पूँजीवाद ने तीव्र गति से पूंजी निर्माण करके दुनियाँ पर छा गया।आज जो भी साम्यवादी देश होने का दावा कर रहे है असल मे वो पूंजीवाद अपनाने की प्रक्रिया में चल रहे है या सैद्धान्तिक रूप से उन्होंने अपने रास्तों में बदलाव कर लिया है।
एक नजर से भारत की व्यवस्था को देखा जाएं तो पुराने सामंतों को विस्थापित करके पूंजीवादी सामंतों को उनकी जगह देकर देश की जनता को एक सपना दिखाया गया था जो 1990का दशक आते-आते नंगा हो गया।भारत ने आजादी के तुरंत बाद साम्यवाद व पूंजीवाद में से एक रास्ता चुना और न आर्थिक मंदी झेलकर 1990 में पूर्णतया पूंजीवाद रास्ता अपनाया।कैपिटलिज्म अर्थात पूंजीवाद कहकर जो लोग देश की जनता के सामने वर्तमान मॉडल को पेश कर रहे है वो निहायत ही बेवकूफ बनाते है!असल मे भारत मे क्रोनी कैपिटलिज्म लागू है।
उद्योगपत्ति पूंजी के बल पर राजनेताओं को नॉमिनेट करते है, इलेक्ट करते है और जनता के सामने दिखावा रिप्रेजेंट करने का जरूर करवाते है।मनमोहन सिंह के राज में भी यही चल रहा था जिसे मोदी ने विस्तार दिया है।पूंजीवाद का यह घिनौना स्वरूप इस देश को बर्बादी के कगार पर ले गया।
राजनेता सत्ता में आते ही सरकारी उपक्रमों को बर्बाद करने की नीतियां बनाते है,बैंकों पर दबाव डालकर अपने हित के उद्योगपत्तियों को कर्ज दिलवाते है और फिर कंपनियों को दिवालिया घोषित कर देते है।पैसा एक कंपनी से दूसरी कंपनी में ऑफ दी रिकॉर्ड ट्रांसफर कर दिए जाते है।पैसा अर्थव्यवस्था में चल रहा है।पैसे से खरीद फरोख्त हो रही है।शेयर बाजार आसमान छू रहा है मगर किंगफ़िशर दिवालिया हो जाती है,जेट एयरवेज बंद हो जाती है,BSNL व MTNL बंद होने की कगार पर है,HAL, ONGC आदि का नंबर लग चुका है,कई बैंक खोखले हो चुके है।रोजगार सृजन हो नहीं रहा है और इन कंपनियों के हजारों कर्मचारी सड़कों पर आ चुके है।
असल मे पूंजीवादी व्यवस्था होती तो 30सालों में निपटने की कगार पर नहीं पहुंचती है।बर्बाद करती तो है मगर गति इतनी तीव्र नहीं होती है।असल मे सामंतवाद को विस्थापित करके जो नए सामंत तैयार किये थे वो पहले समाजवाद के नाम पर फसलें चाट रहे थे और बाद में पूंजीवाद के नाम के नाम पर चट करने लग गए मगर अपना सामंती स्वरूप बनाये रखा।यूरोप की कंपनियों के मालिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करते या साईकिल से आफिस जाते देखे जा सकते है मगर क्या भारत मे अम्बानी/अडानी/सिंघानिया/डालमिया/बिड़ला आदि से यह अपेक्षा कर सकते है?
पूंजीवाद के नाम पर जो कृषि की कब्र पर सर्विस सेक्टर को तवज्जो दी गई वो भारतीय हालातों के अनुरूप नहीं थी।अर्द्ध शिक्षित युवाओं को गांवों से भगाकर जो शहरों में बसाने का सब्जबाग दिखाया जा रहा था वो शुरुआत के कुछ समय तो झेल लिया मगर अब बढ़ते बोझ से चरमरा चुका है।हालात यह है कि देश के किसान बर्बाद हो गए,12करोड़ युवा आज रोजगार पाने के लिए लाइन में खड़े है और दूसरी तरफ सरकारी उपक्रम ध्वस्त हो रहे है जिसके कारण बेरोजगारों की भीड़ बढ़ती जा रही है।सरकारी उपक्रमों की पूंजी क्रोनी कैपिटलिज्म के हवाले होकर शेयर बाजार में गोते लगाने लग गई मगर बेरोजगार हुए कर्मचारियों को खपाने के लिए निजी कंपनियां असहाय नजर आती है।
2014तक 3लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का एनपीए हो गया था जो कि 2019आते-आते 15लाख करोड़ रुपये तक हो गया है!इसका साफ मतलब है कि क्रोनी कैपिटलिज्म के जरिये बड़ी तेजी से जनता के खजाने पर हाथ फेरा गया है।बेईमान सत्ता में बैठे लोगों को न देश नजर आया और न देश के भूख से बिलखते,इलाज के लिए तड़पते इंसान नजर आए।हालात इस कदर तक बिगड़ चुके है कि सरकारें 5साल सत्ता में रहकर अपना रिपोर्ट कार्ड देने के बजाय किसानों,मजदूरों,बेरोजगारों को धर्म,संस्कृति, राष्ट्रभक्ति का झुनझुना थमा रही है!
अब 20000जेट एयरवेज के,12000फर्स्ट फ्लाइट करियर कंपनी के कर्मचारी बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो चुके है और 1,74000कर्मचारी बीएसएनएल,45हजार कर्मचारी एमटीएनएल के जुड़ने वाले है।बाकी ONGC, HAL सहित कई बैंकों के कर्मचारी लाइन में लग चुके है!
पूंजीवाद का मॉडल हमने भी कई बार पढ़ा है और सेंकडों सालों से कई देशों में लागू है और अभी भी ठीकठाक चल रहा है मगर इस देश की तरह खुली बंदरबांट वाला क्रोनी कैपिटलिज्म कहीं नहीं है।मानते है यूरोप में जनता जागरूक है,अमेरिका में जनता जागरूक है जो लगातार सत्ताधारियों पर दबाव बनाए रखती है और भारत मे जनता जागरूक नहीं है और पढ़े-लिखे तमाशबीन है मगर हुक्मरानों की इस देश के प्रति कोई जिम्मेवारी नहीं है?ठरके से आवारा पशुओं की तरह देश को खा रहे है!
क्या समाजवादी झुनझुना सिर्फ जनता का मन बहलाने का झुनझुना मात्र था?क्या पूंजीवाद व साम्यवाद का मध्यम मार्ग देश के संसाधनों को नव सामंतवाद के द्वारा लूटने का मार्ग था?पूंजीवादी व साम्यवादी देशों के सत्ताधारी व उद्योगपत्ति कम से कम अपने अपने देश के प्रति तो वफादार है!गौरी,मुगल,अंग्रेज सेंकडों सालों तक यूँ ही बजाकर नहीं गए है!इस देश का श्रेष्ठी वर्ग बेईमान था।आज दुबारा WTO, IMF, ADB आदि घर-घर पहुंच चुके है।
गलती इस शहरी मध्यम वर्ग की भी है क्योंकि यह अहसान फरामोश,खुदगर्ज होकर ग्रामीण व कमजोर तबके से कट चूका था!अब मार पड़ी तो आंसुओं का सैलाब आया है!जबकि इस वर्ग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी लोगों को जागरूक करने की व सत्ता पर दबाव बनाए रखने की!

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