लोकसभा व राज्यसभा की वेबसाइट पर सांसदों के बॉयोडाटा देखने पर पता चलता है कि 543सांसदों में से 5सांसद किसान है 39सांसद एग्रीकल्चर साइंस पढ़े हुए शिक्षक,लेक्चरर, प्रोफेसर है।543सांसदों में से सिर्फ पांच सांसदों ने अपना पेशा शुद्ध रूप से किसानी बताया है।80%आबादी जो खेती पर निर्भर है उसका प्रतिनिधित्व सबसे बड़ी पंचायत में संकटग्रस्त श्रेणी से भी नीचे है अर्थात रेड बुक में इस प्रजाति का नाम दर्ज होने वाला है।80%आबादी का 1%भी प्रतिनिधित्व नहीं है!इससे बड़ी सिस्टम की विडंबना क्या हो सकती है?
खेती के मामलों की संसदीय समिति के 20सदस्यों में 10सांसद बिल्डर है।कर्नाटक के सांसद नलिन कुमार पेशे से बिल्डर है,रीवा से सांसद जनार्दन मिश्रा पेशे से वकील है,तमिलनाडु के सांसद सी महेन्द्रन पेशे से बिजनेसमैन है,बिहार से सांसद जय प्रकाश पेशे से वकील है।इस समिति में एकमात्र बिजनेसमैन व किसान लिखने वाले राजस्थान के जालोर से सांसद देवजी पटेल है।किसानों का भला करने वाली 20सदस्यों की समिति में आधा-अधूरा किसान है!
लोकसभा की कृषि स्टैंडिंग कमेटी में 20सदस्यों का बॉयोडाटा देखा तो यह समिति भी सांसदों को स्पेशल भत्ते वितरण के लिए एडजस्ट करने वाली ही नजर आई।बिजनेसमैन/बिल्डर/समाजसेवी आदि लोगों के बीच चार ऐसे सांसद है जिन्होंने अपनी खेती से आय दिखाई है!फार्महाउस आजकल खेती से आय दिखाकर काले धन को सफेद करने का धंधा भी बन चुके है इसलिए इनको किसानी पेशा मानना भी उचित नहीं है!
किसानों का प्रतिनिधित्व नगण्य है और किसानों के भले के लिए नीति-निर्माण की कुर्सियों पर बिल्डर/व्यापारी/समाजसेवी बैठे है तो खेतों में बिल्डर व सड़कों पर किसान नजर नहीं आएंगे तो फिर दूसरा नजारा क्या हो सकता है?जिन 39सांसदों ने खुद को कृषि की शिक्षा से संबंधित बताया है उनमें से 23सांसद एक ऐसे वर्ग विशेष से है जिनकी पुश्तों ने कभी खेती नहीं की है!इनका बॉयोडाटा लेकर कृषि अनुसंधान में इनके कार्यों की जानकारी जुटाने की कोशिश की तो एक भी होनहार कृषि विशेषज्ञ ऐसा नहीं निकला जिन्होंने कोई बीज उत्पाद,कृषि रसायन,नई प्रजाति,नई खेती की तकनीक ईजाद की हो या स्कूल/कॉलेज/विश्विद्यालय में रहते हुए कोई नवाचार किये हो या किसानों के बीच जाकर कोई जागरूकता अभियान ही चलाया हो!
पिछले एक दशक में कृषि से संबंधित जो बिल पास हुए है उनमें किसी पर 2घंटे से ज्यादा कोई बहस नहीं हुई है और चर्चा में भाग लेने वाले सभी सांसदों में से भाग लेने वाले एक भी सांसद ने यह नहीं पूछा कि अबतक जो कृषि उपक्रम/प्राधिकरण है उनका आउटपुट क्या है?खेती में व्यापक बदलाव तो छोड़िए जमीनी स्तर पर असर डालने वाला कोई एक भी बिल न संसद में आया न पास करने की कोई नौबत आई!
2008में कृषि/खाद्य प्रसंस्करण निर्यात विकास प्राधिकरण बिल पास हुआ।
2012में रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय बिल पास हुआ।
2013में कृषि जैव-विविधता सुरक्षा बिल आया।बताया जाता है कि कुछ बिल्डरों की आपत्ति के बाद पास कराने में किसी ने रुचि नहीं ली और यह बिल लेप्स हो गया।
2015में राजेंद्र केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय बिल पास हुआ।
2016में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय संशोधन बिल पास हुआ।
2017में राष्ट्रीय कृषि/ग्रामीण विकास बैंक संशोधन बिल पास हुआ।
2012में रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय बिल पास हुआ।
2013में कृषि जैव-विविधता सुरक्षा बिल आया।बताया जाता है कि कुछ बिल्डरों की आपत्ति के बाद पास कराने में किसी ने रुचि नहीं ली और यह बिल लेप्स हो गया।
2015में राजेंद्र केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय बिल पास हुआ।
2016में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय संशोधन बिल पास हुआ।
2017में राष्ट्रीय कृषि/ग्रामीण विकास बैंक संशोधन बिल पास हुआ।
पिछले एक दशक में ये तमाम बिल पास हुए है व बजट व पदों की बंदरबाट का इंतजाम जरूर हुआ मगर खेत मे किसानों का भला किस तरह हो उस पर कोई बिल नहीं आया!किसान आंदोलन व किसानों पर गोलियां चली तब एक दिन जरूर लोकसभा में पूरे दिन इन बिल्डरों/व्यापारियों व समाजसेवियों ने घड़ियाली आंसू जरूर बहाए थे!
भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर 15वीं लोकसभा के बिल्डर/व्यापारी भी जरूर उतावले नजर आ रहे थे और 16वीं लोकसभा के भी बिल्डर/व्यापारी उतावले नजर आए मगर जमीनी विरोध का आकलन करने के बाद समाजसेवियों ने आगाह कर दिया इसलिए यह बिल अटक गया।यह हाल सिर्फ केंद्रीय पंचायत का ही नहीं है,कमोबेश हालात राज्य विधानसभाओं के भी यही है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि 200से ज्यादा सांसद जो अपने आप को किसान नेता/किसान मसीहा कह रहे है उनको क्या समझा जाएं?मान लिया इन्होंने किसान कौमों में जन्म लिया है व बाद में बिल्डर/व्यापारी बन गए मगर जब 80%आबादी के हकों की बात आती है,हितों की बात आती है वहाँ ये किसान नेता के बजाय बिल्डर/व्यापारी बनकर ही कार्य करते क्यों नजर आते है?क्या लोकी के भाव,प्याज के भाव,टमाटर के भाव के सवाल पूछकर किसान नेता होने की पदवी बरकरार रखी जा सकती है?
खेतों से,किसान आंदोलनों से निकलने वाले लोगों की राजनीति की कब्र ये किसान कौम में पैदा हुए बिल्डर/व्यापारी ही खोदते है।किसानों का जरूरी प्रतिनिधित्व जब तक नीति-निर्धारण वाले पदों पर नहीं होगा तब तक ये किसानों को भिखारी समझते हुए कभी कर्जमाफी तो कभी खाते में 6हजार रुपये डालकर बर्बादी के जंजाल में फंसाएं रखेंगे!किसानों को 60साल की उम्र के बाद पेंशन देने का दावा ये किसानों के दलाल जरूर करते है मगर ये लोग इस हकीकत से नजर चुरा लेते है कि किसानों की जीवन प्रत्याशा ही 60साल के आसपास है तो पेंशन लेगा कौन?
देश का किसान संकट में है,खेती संकट में है,खेती से सर्विस सेक्टर की तरफ जिस अंदाज में जीडीपी शिफ्टिंग हुई है उसके अनुरूप रोजगार सृजन हुए नहीं है और किसानों के बच्चे बेरोजगार घूम रहे है।इन मुद्दों पर कहीं कोई बहस नहीं।फर्जी किसान नेताओं की खेप किसानों के रास्ते का रोड़ा बनकर खड़ी है जो किसानों को जाति/धर्म मे उलझा रही है और किसानों के बच्चों को जातीय/धार्मिक सेनाओं में भर्ती करके बर्बाद कर रहे है!व्यापारी का पेशा मुनाफा कमाने का होता है,बिल्डर का पेशा जमीन छिनने का होता है,यह बात जिस दिन किसान व किसानों के बच्चे समझ लेंगे उसी दिन बदलाव की आहट आने लग जायेगी।
कहाँ छुपा के रख दूँ मैं अपने हिस्से की सराफ़त,
जिधर भी देखता हूँ उधर बेईमान खड़े है!
क्या ख़ूब तरक़्क़ी कर रहा है अब देश देखिये,
खेतों में बिल्डर ओर सड़कों पर किसान खड़े है!!
जिधर भी देखता हूँ उधर बेईमान खड़े है!
क्या ख़ूब तरक़्क़ी कर रहा है अब देश देखिये,
खेतों में बिल्डर ओर सड़कों पर किसान खड़े है!!

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें