गुलामी की व्यथा कथा!

राजनैतिक पार्टियां सत्ता के लिए किस तरह तड़प रही है उसका अंदाजा भारत की जनता को शायद नहीं है!उस समय भी नहीं था जब सिकंदर भारत आक्रमण करने आया था!असल मे भारत देश प्राचीन काल मे छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था और एकदूसरे से आपस मे लड़ते रहते थे।राज्य पर कब्जे के लिए ईमान धर्म का कोई बंधन नहीं था।सत्ता पर काबिज होने/रहने या विरोधी को सबक सिखाने के लिए दुश्मनों की मदद करने में कभी परहेज नहीं किया गया था।
चंद एशो-आराम या चंद टुकड़ों के लालच में देश बेचना श्रेष्ठी वर्ग के खून में सदा रहा है।आज देश मे विदेशी निवेश,विदेशी कंपनियां आ रही है और देशी उपक्रम ध्वस्त हो रहे है तो इतिहास के झरोखों से हमे देखना चाहिए कि सत्ता के लिए हमारे प्राचीन राजाओं,मंत्रियों व पंडितों ने कैसे देश बेचा था!
राजा पौरस पर आक्रमण के लिए राजा अम्भी ने सिकंदर को न्यौता भेजा था क्योंकि अम्भी की नजर पौरस के राज्य को हड़पने की थी।
सोमनाथ पर आक्रमण के लिए पंडित तिलक ने गजनवी का सहयोग क्योंकि वो मंदिर की संपदा पर कब्जा करना चाहता था!
राजा दाहिर पर आक्रमण के लिए मोहम्मद बिन कासिम को न्यौता ब्राह्मण मंत्री ज्ञानबुद्ध ने भेजा था व युद्ध के समय दाहिर की सेना का मनोबल तोड़ने के लिए पुजारी मनसुख व हरनन्दराय ने दीपल मंदिर का ध्वज झुका दिया था।
पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण के लिए मुहम्मद गौरी को न्यौता जयचंद ने अपने पुरोहितों के माध्यम से भेजा था और चौहान जब हार रहा था तब जयचंद खुशी का तमाशबीन था।
बाबर को आक्रमण के लिए पंडित रेमीदास ने बुलाया था।राणा प्रताप से लड़ने अकबर की तरफ से मानसिंह आया और बुलावा देने वाला राणा प्रताप का भाई था!
सिराजुदौला के खिलाफ ईस्ट इंडिया को बुलावा भेजने वाला मीर जाफर था।थॉमस रो को सूरत में फैक्ट्री लगाने की अनुमति देने वाला जहांगीर था।
आपसी झगड़े में व सत्ता के लालच के लिए दुश्मनों से सहयोग लेने में कभी कोई गुरेज नहीं करता था।उस समय राष्ट्र नाम की कोई परिकल्पना/भावना अस्तित्व में नहीं थी।अंग्रेजों ने देश का एकीकरण करके राष्ट्र का स्वरूप दिया मगर भारतीय श्रेष्ठी वर्ग की मानसिकता चंद टुकड़ों के लिए ईमान बेचने से आगे नहीं बढ़ पाई।
अंग्रेजों के समय भी राजे-रजवाड़े आपस मे सहयोग करके अंग्रेजों का विरोध करने के बजाय अधीनता की संधियां कर रहे थे और पंडे-पुजारी अंग्रेजों की नौकरियां लेने में व्यस्त हो गए थे।
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनके राज्य पर अंग्रेजों का कब्जा हो रहा है,सब चंद टुकड़ों व सत्ता में हिस्सेदारी के लिए बिक रहे थे!
आजादी के आंदोलन में सिर्फ किसानों-मजदूरों ने कुर्बानियां दी थी और दूसरी तरफ अंग्रेजो के साथ भागीदार बना तबका सत्ता पर कब्जे के लिए आपस मे लड़ रहा था।भला हो द्वितीय विश्वयुद्ध का कि ब्रितानिया हुकूमत जर्जर हो गई और अमेरिका के दबाव में सत्ता हस्तानांतरण करना पड़ा!
आजादी के बाद भी एक राष्ट्र होने की भावना हमारे राजनेताओं में पैदा न हो पाई।सत्ता में बैठने के लिए व बैठकर लूट-खसोट तक ही राजनीति सिमटकर रह गई।चंद कंपनियों के नाम पर देशी सामंत तैयार कर दिए व कुछ निवेश के नाम विदेशी लुटेरों को गर्व के साथ न्यौता दे रहे है!
चाहे गजनवी आये,चाहे बाबर आये,चाहे थॉमस रो ईस्ट इंडिया कंपनी आये,चाहे अमेज़ॉन-वालमार्ट आएं न्यौता देने वाले गद्दार तो इसी देश के है!
यह पूरी कहानी लिखने का मतलब यह नहीं था कि मैं आपको इतिहास पढ़ाऊँ बल्कि बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ।मार्च 2018में मोदी सरकार ने FCRA अर्थात फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट 1976 में बदलाव करके राजनैतिक पार्टियों के लिए विदेशी चंदे का रास्ता खोल दिया।
जनता के बुनियादी मुद्दों वाले बिल लोकसभा में पास होकर राज्यसभा में अटक जाते है मगर यह बिल 20मिनट में पास हो गया और किसी भी राजनैतिक पार्टी ने विरोध नहीं किया!जब बिल में बदलाव हो गया तो मोदी सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आई।
अब इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदकर अमेज़ॉन,वालमार्ट, अलीबाबा आदि कंपनियां भारत की राजनैतिक पार्टियों को चंदा देगी और उस पैसे से सत्ता पर कब्जा करवाने में मदद करेगी।
इस चंदे से बड़े-बड़े मंचो से,बड़ी-बड़ी रैलियों से नेता कसमें खाएंगे कि "मैं देश नहीं बिकने दूंगा!"और कुर्सी मिलते ही देश इन कंपनियों को बेचना शुरू कर देंगे।देश इसी तरह से बिकता रहा है व इसी तरह से बिक रहा है!बाकी देश बिकने की कोई अंतरराष्ट्रीय मंडी थोड़े ही लगती है!
हमारे हुक्मरान गुलाम थे,गुलाम है और गुलाम ही रहेंगे और सत्ता के बदलते चेहरों को देखकर जनता समझ लेती है कि हमने कोई बड़ी क्रांति कर दी है या व्यवस्था परिवर्तन की नींव रख दी है!हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है!


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