जब कांग्रेस पार्टी की 1885में स्थापना हुई तो उसका मकसद था अंग्रेजो व भारतीयों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करना।स्थानीय लोगों का गुस्सा बड़े गुब्बार का रूप न ले लें इससे बचने के लिए गुस्से को ट्रेस करके अंग्रेजों तक बात पहुंचाना व कुछ अंग्रेजों की तरफ से राहत लेकर गुस्से पर शांति के छींटे डालना इसका कार्य रहा था।धीरे-धीरे स्थानीय व अंतराष्ट्रीय परिस्थितियां बदलती गई और उसके साथ कांग्रेस का स्वरूप बदलता गया मगर कांग्रेस का केंद्र बिंदु सदा स्थानीय मांगों के अनुरूप अंग्रेजो से अनुनय-विनय का ही रहा था।यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि अकेली कांग्रेस ने देश को आजाद कराया है!यह आजादी के आंदोलन में शहीद हुए साढ़े सात लाख शहीदों का अपमान करने वाली बात होगी। यह बात सच है कि कांग्रेस व आरएसएस की विचारधारा अलग थी और आपस मे तालमेल की भावना के बजाय आजादी बाद की सत्ता पर कब्जे की प्रतिस्पर्धा ज्यादा थी।एक तरफ देश के करोड़ों किसान-कमेरों की कुर्बानियां हो रही थी तो दूसरी तरफ इन दोनों गुटों में कब्जे की रार चल रही थी।द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन की हालत आज की कांग्रेस की तरह हो गई थी जो दावा तो सबसे पुरानी व महान पार्टी का करती है मगर चंद चापलूसों के सिवाय महारानी के मुकुट या प्रिंस के ताज के आगे कुछ बचा नहीं है!देश की जनता के आक्रोश व अंतराष्ट्रीय दबाव के कारण अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा था और कांग्रेस कटोरा लेकर लार्ड माउंटबेटन के पीछे-पीछे चल पड़ी!जिन्नाह व पंडित नेहरू की सत्ता लोलुपता के कटोरे को देखकर स्वयं गांधीजी ने कहा था कि अब कांग्रेस को समाप्त हो जाना चाहिए।कांग्रेस को सेतु से हटाकर आजादी के असली वाहक बताने के गांधीजी के सपने को उस समय ठेस पहुंची जब कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी के रूप में सत्ता पर काबिज हो गई।
खैर कांग्रेस का इतिहास ज्यादातर भारतीयों को पता ही है व सत्ता के लिए दी कुर्बानियों को देश के लिए शहादत बताने का खेल भी अनवरत जारी है।एक विशेष सर नाम वाले परिवार से हटकर कांग्रेस के पास कभी कोई विकल्प रहा नहीं है।पुराने पत्रकार मित्रों को पता ही है कि किस प्रकार सीताराम केसरी को कांग्रेस कार्यालय से बाहर किया गया था!गैर-गांधी परिवार के कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के नाम भी वर्तमान कांग्रेसियों की जुबां पर नहीं आ पाते है क्योंकि कांग्रेस ब्रिटिश व्यवस्था से प्रेरित है और पूरी कांग्रेसी क्राउन गांधी परिवार के सामने नतमस्तक है।
गांधी परिवार के सामने कांग्रेसियों की लाचारगी कहें या स्वामिभक्ति कहें,इतनी थी कि सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कोई बगावत नहीं कर पाया!कांग्रेस सोनिया गांधी की उम्र के साथ बूढ़ी होती गई और युवाओं को आगे लाने के नाम पर बुजुर्ग सोनिया किनारे सरक गई और बेटे राहुल गांधी को अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी गई।जब राहुल गांधी को जनता के बीच कांग्रेसी चापलूस ग्लोरीफाई ढंग से नहीं कर पाए तो कांग्रेस को बुढ़ापे से बाहर निकालने के लिए राजमाता के पास प्रियंका गांधी को आगे करने का निवेदन लेकर पहुंचे!
जाहिर सी बात है कि कांग्रेस ने देश पर लंबे समय तक राज किया है इसलिए स्वामिभक्त परिवार राज्यों में भी तैयार हुए है!कुछ स्वामिभक्त मीडिया घराने भी इनके साथ चिपककर तैयार हुए है!कुछ नए स्वामिभक्त युवा भी तैयार हुए है!इन सबने मिलकर पहले राहुल गांधी को भारत का युवा भविष्य घोषित करने की कोशिश की व अब प्रियंका गांधी को लेकर मास्टर स्ट्रोक बता रहे है!
कांग्रेस पार्टी की एक व्यवस्था है जिसमे एक पिरामिड साफ झलकता है जिसके शीर्ष पर गांधी परिवार है और उसके पीछे देशभर से कुछ चुने हुए परिवार है और प्रचार-प्रसार के लिए अपना पुराना/रूढ़िवादी मीडिया है जो सिर्फ गांधी परिवार को ग्लोरीफाई करके जनता के बीच स्थायित्व देने की जंग लड़ता नजर आता है।एक परिवार की अगली पीढ़ी को देश के युवा भविष्य के रूप में परोस रहा है जबकि जाहिर सी बात है कि केंद्र में युवाओं के नाम पर राहुल-प्रियंका-वाड्रा है तो राज्यों में इनके खानदानी गुलामों के पुत्र-पुत्रियाँ है।
किसी राष्ट्रीय पार्टी के किसी क्षेत्र-विशेष पर किसी परिवार की राजनीति अनवरत जारी रहे तो यह बात थोड़ी हजम भी हो जाती है कि शायद जनता से उसका जुड़ाव होगा मगर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद एक परिवार के पास गिरवी पड़ा हो तो यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि यह पार्टी लोकतांत्रिक है और इस देश के लोकतंत्र की सही मायने में हिफाजत करने वाली है!एक केंद्रीय परिवार ने राज्यों के कुछ परिवारों के साथ मिलकर इस देश के लाखों युवाओं के सपनो की हत्या की है जो राजनीति में आकर देशसेवा करना चाहते थे!आज राहुल-प्रियंका देश के लाखों युवाओं के सपनों की कब्रगाह पर खड़े होकर यह दावा करे कि कांग्रेस युवा हो गई तो यह देश के लोगों को अपमानित करके अपने गुरुर का प्रदर्शन मात्र है जिसके आगे कांग्रेसी चापलूस लोग तो नतमस्तक हो सकते है मगर देश के करोड़ों युवाओं के आगे बेमानी सा लगता है!30साल की जवां कांग्रेस पर 1915में जो कब्जा किया गया वो 133साल की होने पर भी जारी है।
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