आज आपसे मैं दो समान घटनाओं का जिक्र करना चाहता हूँ।एक घटना से देश के लोगों ने सबक लिया,हिम्मत दिखाई और कायापलट कर दिया।दूसरी घटना पर देश के लोग जमकर रोये,कायरता दिखाई और आज भी उनकी कुर्बानियों को याद कर-करके रो ही रहे है।मैं तो इनको रोना भी नहीं कहता क्योंकि जहां समझ हो वहां दर्द होता है!यहां न समझ है न हिम्मत है!इनके लिए सिर्फ ये पूजा स्थल है,टूरिस्ट स्पॉट है!
22जनवरी 1905को जॉर्जी गेपोन के नेतृत्व में सेंट पीटर्सबर्ग में हजारों लोग शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे और इन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर निरंकुश जार ने गोलियां चलवा दी थी जिसमे मासूम बच्चे,औरतें ,युवा व बुजुर्ग लोग हजारों की संख्या में काल कवलित हो गए।जिसे दुनियाँ ब्लडी संडे के नाम से जानती है क्योंकि उस दिन रविवार था।उसके बाद लेनिन का उदय होता है और निरंकुश जारशाही को दफन कर दिया जाता है।
13अप्रैल 1919को भारत के पंजाब सूबे के अमृतसर में एक मैदान में औपनिवेशिक अंग्रेजी सरकार के खिलाफ निहत्थे लोग शांतिपूर्वक सभा कर रहे थे जिसे जलियांवाला बाग कहा जाता था।जिसमे बच्चे,बूढ़े व औरतें भी शामिल थी।तत्कालीन अंग्रेज सरकार के जनरल डायर ने गोली चलाने के आदेश दे दिए।1000से अधिक लोग मारे गए और 2000से ज्यादा लोग घायल हुए थे।बाद में सरदार उधमसिंह ने जनरल डायर को लंदन में जाकर गोली मारकर बदला भी लिया था।भगतसिंह के जीवन पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य पढ़ना शुरू किया।
धर्म व जाति में बंटा और देशी रियासतों के रोड़ों के कारण यह देश एकजुट न हो सका और भगतसिंह के नेतृत्व में जो क्रांति का बीजारोपण हो रहा था वो सफल न हो सका!अगर कांग्रेसी बूढ़े भगतसिंह का कहना मानते या भगतसिंह का सहयोग करते तो देश क्रांति की घाटी से निकल पड़ता और मूढ़ता,मूर्खता भरा प्राचीन रोग आज हम नहीं ढो रहे होते!
इसी जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगतसिंह के माध्यम से हमे एक विचारधारा उपलब्ध करवाई है।जलियांवाला बाग में शहीद हुए उन हजारों लोगों को नमन करते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए।ब्लडी संडे के बाद रूस के लोगों ने हिम्मत दिखाई थी और आज रूस एक ताकतवर देश के रूप में खड़ा है और हम भारतीय जलियांवाला बाग कांड के बाद वो हिम्मत नहीं दिखा सके इसलिए हमारे पास आज भी उन शहीदों को नमन करने के लिए आंखों में आंसू व कांपते हाथों में पकड़ी सिर्फ मालाएं है!
ब्लडी संडे के बाद रूस में नया सवेरा आया मगर हम आज 100बाद भी जलियांवाला बाग से बाहर निकलते है तो डबडबाई आंखों के सामने घनघोर अंधेरा छाया नजर आता है।उस समय भी हम कायरों का चोला ओढ़कर बैठ गए थे और आज भी कायरों की तरह रोने-धोने से बाहर नहीं निकल पा रहे है।
"शहीदों की चिंताओं पर लगेंगे हर बरस मेले" सरीखे नारे गढ़ लिए और भेड़ों की तरह झुंड बनाकर मेलों में घूम रहे है मगर बै-गैरत के इस देश मे कोई गैरत का खिताब हासिल करना नहीं चाहता!हम पाखंड व अंधविश्वास में इतने डूबे हुए है कि हमने शहीद स्थलों को सिर्फ पूजा स्थल मान लिया है जबकि ये शहीद स्थल,इन शहीदों की निशानियाँ हमे अधूरे पड़े कार्यों को पूर्ण करने,देश को आगे ले जाने की प्रेरणा देते है,हमे विचार देते है,रास्ता बताते है।
अपने बच्चों को ले जाइए !इन शहीदों की निशानियाँ बताइए!इनका इतिहास पढ़ाइये!इनके विचार समझाइए ताकि हमारी कायरता की चादर शायद ये हटाने में कामयाब हो सके!

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