जब आक्रोश सहनशीलता की सीमा लांघ जाता है तो जनता क्रांति को तैयार होती है।चाहे चे ग्वेरा की जुलाई क्रांति हो,चाहे लेनिन की अक्टूबर क्रांति हो या हो ची मिन्ह का राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम हो सब जगह एक ही दृश्य नजर आता है कि जनता के सामने करो या मरो के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा था!ऐसे में ये लोग क्रांति की चिंगारी लेकर जनता के बीच गए,मुक्ति के लिए प्रेरित किया व क्रांति का जरूरी प्रशिक्षण दिया और जनता के साथ मिलकर क्रांति का आगाज कर दिया!
दुनियाँ में फ्रांस की क्रांति व ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को ही ज्यादा पढ़ाया गया,प्रचारित-प्रसारित किया गया जिससे दुनियाँ इन असली क्रांतियों को पढ़ने/जानने से अनभिज्ञ रह गई!ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के दौरान बच्चों/महिलाओं व बूढ़ों को 18-18घंटे कार्य करवाया जाता था।दयनीय हालत में मजदूरों की जिंदगी थी।कार्ल मार्क्स ने जब यह देखा तो उन्होंने एक सिद्धांत दिया वर्ग संघर्ष का।यह कोई वैज्ञानिक सोच नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के अहसास से/अनुभव से बताई गई हकीकत थी।
मानव की मूलभूत आवश्यकता है रोटी,कपड़ा और मकान।ये भौतिक वस्तुएं है और ये उत्पादन से हासिल की जा सकती है।कच्चे माल को उपयोग लायक बनाने की प्रक्रिया को उत्पादन कहा जाता है और कच्चा माल प्राकृतिक संसाधनों से मिलता है।पूंजीवाद में ताकतवर लोग येन-केन-प्रकारेण प्राकृतिक संसाधनों व उत्पादन की प्रक्रियाओं के मालिक बन जाते है और कम ताकतवर लोगों को मजदूर बना दिया जाता है।इस प्रकार मालिक व मजदूर के रूप में दो वर्ग बनकर उभर जाते है।जब मालिक मजदूरों के शोषण की सीमा लांघ जाते है तब वर्ग संघर्ष होता है और मजदूरों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों व उत्पादन-उपभोग की प्रक्रियाओं पर समान अधिकारों की लड़ाई को क्रांति कहा जाता है।दुनियाँ में जितनी भी क्रांतियां हुई है उनका आधार यही रहा है चाहे कहीं कम तो कहीं ज्यादा!
भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो कभी क्रांति नहीं हुई है।आज के समय मे भी क्रांति संभव नहीं है।उसका मुख्य कारण वर्ण व्यवस्था,धर्म व जाति रहा है।वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण मालिक रहे है,क्षेत्रीय रक्षक व वैश्य उत्पादन की प्रक्रिया का हिस्सा और क्षुद्र मजदूर के रूप में रहे है।क्षुद्र बगावत न कर दें उसके लिए हथियार उठाने से लेकर शिक्षा तक पर पाबंदियां रही है।शुरुआत में ठीकठाक चलता रहा मगर जब लगा कि क्षुद्रों में आक्रोश बढ़ रहा है बुद्ध के नेतृत्व में बगावत हुई तो उसको थामने के लिए क्षुद्रों को जातियों के रूप में टुकड़ों में तोड़ने की योजना ईजाद की गई जो अभी तक चल रही है।
आप देखिए क्षेत्रीय आज मजदूर होगा मगर वो वैश्य मजदूर की पीड़ा को अपने बराबर की नहीं मानता,वैश्य मजदूर अपनी पीड़ा को क्षुद्र मजदूर के समान नहीं मानता मगर पीड़ित सब है।सब धर्म व जातियों में बंटे हुए मजदूर है।धर्म व जाति का सिद्धांत इतना मजबूत है कि मजदूरों को एकसाथ आने ही नहीं देता है।मजदूर सारे एक हो गए तो क्या होगा!सबकी पीड़ा समान हो जायेगी तो क्या होगा!यही डर मालिकों को सताता रहता है और मालिक इनको एक न होने देने के जतन रोज करते रहते है।
पूंजीवाद का ढांचा दुनियाँ भर में ढह रहा है मगर मालिक कंपनियां बनाकर अपने देशों से बाहर निकल चुके है इसलिए बगावत के सुर अभी सुनाई नहीं देंगे मगर भारत जैसे देश मे पूंजी के मालिक कब्जा किये हुए बैठे ही थे ऊपर से दुबारा विदेशी कंपनियां आ धमकी है,विदेशी मालिक आ धमके है।मतलब देशी व विदेशी मालिकों की दोतरफा मार भारत के बहुसंख्यक मजदूरों पर पड़ रही है।किसी भी धर्म का हो,किसी भी जाति का हो मगर है तो मजदूर ही!है तो मालिकों से परेशान ही!देशी मालिकों के साथ मिले हुए विदेशी मालिकों को अभी 30साल भी पूरे नहीं हुए है मगर मजदूरों में बैचेनी पैदा होने लगी है।आखिर मजदूर तो मजदूर है।बेसिक नीड्स अर्थात रोटी,कपड़ा,मकान तक नसीब नहीं हो रहा है तो क्या करेंगे?बुनियादी जरूरतों के आगे या तो हारकर आत्महत्या कर ले क्योंकि धर्म व जाति का बंधन तोड़ने में खुद को असहाय समझता है या फिर धर्म-जाति की बेड़ियां उतारकर फेंक दें और खुद को सिर्फ मजदूर समझकर लड़-भिड़े!
इस देश का किसान जातियों में,धर्म मे विभक्त न होते तो 15लाख किसान आत्महत्या न करते मगर वो धर्म/जाति का बंधन तोड़ने में नाकाम रहे है और हारकर आत्महत्या कर ली!भारत मे तो मालिकों ने और भी विभेद की दीवारें खड़ी कर दी!सफाई मजदूर हड़ताल करेंगे तो खान मजदूर कहेंगे हम इनसे अलग है उनके साथ खड़े क्यों हो?फैक्ट्री मजदूर हड़ताल करेंगे तो खेतिहर मजदूर कहेंगे उनका तो अलग मैटर है हमारा उनसे क्या लेना देना?असल मे देखा जाये तो सबका मैटर तो एक ही है।सबके लिए मैटर बुनियादी जरूरतें ही है!मगर उनके मन मे मालिकों ने भाव पैदा कर दिया कि उनका मैटर अकेले का मैटर है इसलिए सब टुकड़ों में लड़ रहे है।
भारत मे कहने को तो दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ संविधान है मगर वो कांच के बॉक्स में बंद पड़ा है।भारत के मजदूरों ने जिस दिन संविधान पढ़ लिया उस दिन से मालिकों की शामत आने लग जायेगी!मगर राजनेता भी मालिक बन बैठे।मालिकों व राजनेताओं का एक अनूठा गठबंधन इस देश मे चल रहा है और पश्चिम के पढ़े लिखे पूंजीवादी अर्थशास्त्री मजदूरों को शांत करने की इनको नई-नई युक्तियां बता रहे है।इन्हीं की सलाह पर किसानों को हर साल 6हजार रुपये देने की योजना आई है व इन्हीं की सलाह पर मजदूरों को हर साल 72हजार का वादा आया है।किसान आक्रोश में है मजदूर बर्बाद है,कहीं बगावत न कर दें इसलिए लोकतंत्र के टेंट हाउस में बैठाकर राहत के छींटे डाल दिये जायें ताकि मजदूर शांत हो जाएं!आगे कोई नई युक्ति तलाश लेंगे!
इस देश के मजदूरों को कभी धर्म मे फँसाकर मारा गया,कभी जातियों में फंसाकर मारा गया,कभी अलग-अलग मजदूर संगठनों में बांटकर मारा गया है।एक बात और गौर करने वाली है कि मजदूरों को जितनी भी टुकड़ियों में बांटे गए है उनका नेतृत्व मालिकों के रिश्तेदार ही करते है!मगर मजदूर खुश है कि हमारी लड़ाई मालिकों के घर से आया ही लड़ रहा है!
कोई राजनैतिक बगावत न कर दें इसलिए जो भी मजदूरों के वर्ग से कोई आवाज उठाता है उसको मालिकों के गठजोड़ में शामिल कर लिया जाता है।उसको बता दिया जाता है कि देख अब तू भी मालिक है और मजदूरों को जगाने की बात की तो तुझे भी खतरा है।मजदूर वर्ग से मालिक बना आदमी खतरा तुरंत भांप लेता है और चुपचाप मालिकों के साथ चल देता है!क्रांति तुरंत भ्रांति में तब्दील हो जाती है।मजदूर गुमराह होकर नया क्रांतिकारी ढूंढने लग जाता है।भारतीय मजदूरों को सदा बताया गया है कि कोई चमत्कारिक मसीहा आयेगा, वो ही तुम्हारी समस्याओं का समाधान लायेगा!इसलिए कोई मजदूर बगावत नहीं करता है।सबके सब राहत के छींटों का इंतजार कर रहे है या आत्महत्या कर रहे है!मालिक चाहे अहिंसा की रक्षा के लिए हिंसा करते रहे है मगर मजदूरों को समझा दिया गया है कि अहिँसा परमोधर्मः!खुद जहर खा लेना,खुद फाँसी पर लटक जाना मगर बुनियादी जरूरतों को हासिल करने के लिए हिंसा मत करना!
मालिक मजदूरों को कह रहे है कि गीता पढ़ो,कुरान पढ़ो,गांधी पढ़ो मगर मैं मजदूरों को कहता हूँ तुम भगतसिंह को पढ़ो,तिलका मांझी को बढ़ो,असफाक उल्लाह को पढ़ो,बिरसा मुंडा को पढ़ो,चौधरी छोटूराम को पढ़ो, बाबा साहेब अंबेडकर को पढ़ो और इन सबसे ऊपर भारत के संविधान को पढ़ो।तुम इस देश के मालिक हो।प्राकृतिक संसाधनों पर तुम्हारा भी उतना ही हक है जितना मालिकों का है।उत्पादन की प्रक्रियाओं के निर्माण के संसाधन ये बाहर से नहीं लाये है बल्कि तुम्हारे खून-पसीने से जमा तुम्हारे बैंकों की पूंजी है।

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