बचपन इंसानी जिंदगी का खूबसूरत लम्हा होता है।जिसने बचपन को नहीं जिया,उसने जिंदगी को नहीं जिया। खिलखिलाते बच्चों की आवाज ही सुनकर हमारे अंदर आनंद की लहर उठ जाती है। नन्हे-मुन्नों की अठखेलियां देखकर हम रोमांचित हो उठते है।वो पानी पर कागज की नांव चलाना हो,वो मिट्टी के घर बनाना हो,वो लकड़ी-पत्थर की गाड़ियां बनाकर चलाना हो,वो हम सब छोटे बच्चों का एकत्रित होकर शादी रचानी हो या आपस में हाथ पकड़कर श्रृंखला बनाकर छुक-छुक रेल चलाना हो!हर पल,हर लम्हा रोमांचित कर जाता है।वाकई बचपन जिंदगी का स्वर्णकाल होता है।न भविष्य की चिंता न घाटे-नफे की बौखलाहट! जब संसद ने बाल सरंक्षण कानून 1986 में कुछ दिन पहले संशोधन किया तो मेरे सामने एक एक करके घटनाये हकीकत के परदे की तरह तैरने लगी।निराशा छाने लगी।न विपक्ष का विरोध् न सत्ता पक्ष की कोई गंभीरता।न बुद्धिजीवियों की कलम चली न समाजसेवियों का हंगामा हुआ। न मीडिया में कोई चर्चा न नागरिकों में कोई हलचल।वाकई बहुत डरावना मंजर प्रतीत हो रहा है।युवा देश के युवाओं का खून भी जम गया।दिल्ली के नबी करीम,चांदनी चौक,सदर बाजार,गांधीनगर सहित तमाम मासूमों के बूचड़खानों को दुगुनी गति से आगे बढ़ने का निर्देश दे दिया गया उत्तरप्रदेश,बिहार,झारखण्ड सहित तमाम राज्यों के छोटे-छोटे बच्चे इन कारखानो की तंग गलियों में तिल तिलकर मर रहे है।सुबह 6 बजे से देर रात 10बजे तक ये नन्हे कोमल हाथ कहीं झूठे बर्तनों को धो रहे है तो कहीं सुई-धागे पकड़कर बटन-ज़िप लगा रहे है।कहीं लिपाई-पुताई की कुञ्जी हाथ में थामे नजर आते है तो कहीं कोमल कंधे बोझ तले दबकर सिकुड़ रहे है।न खाने की कोई माकूल व्यवस्था और न पीने को साफ़ पानी। हर बड़े शहर का यही डरावना सच है।कहीं माँ-बाप की मजदूरी में हाथ बंटाते है तो कहीं ईंट के भट्टों पर बंधुआ मजदूरी करते है।पूरी दुनियां में सवा सौ करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करने को मजबूर है।भारत में सरकारी आंकड़ो के हिसाब से एक करोड़ तीस लाख बच्चे जिनकी उम्र 5 साल से 18 साल है,मजदूरी कर रहे है जिनमे 43 लाख बच्चे 5-14 साल उम्र के है।गैर सरकारी आंकड़ों के हिसाब से लगभग 6करोड़ बच्चे बाल मजदूरी कर रहे है जिनमे से सवा चार करोड़ बच्चे 5-14 वर्ष की उम्र के है।यह वो उम्र है जो देश की नींव के पत्थर है जिनको तराशकर एक सभ्य व् ताकतवर देश खड़ा किया जा सकता है। इन बच्चों में से 52%बच्चे यौन शोषण के शिकार है।36%बच्चे बार बार यौन हिंसा के शिकार होते है। कितनी बड़ी विडम्बना है इस देश के लोगों की,कि जब तक बचपन बचाओ आंदोलन चलाने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला तब तक कोई नहीं जानता था।इससे यह जाहिर हो गया कि हम बचपन व् बाल मजदूरी को लेकर कितने संजीदा है?बाल संरक्षण अधिनियम 1986 में सरकार ने यह कहकर संशोधन किया कि उसको हम ठीक से लागू नहीं कर पा रहे थे इसलिए सुधार जरुरी है। अगर किसी कानून को ठीक से लागू नहीं कर पाओगे तो अपनी नाकामी को इस तरह जायज ठहरा दोगे?बलात्कार कानूनों को ठीक से लागू नहीं कर पाओगे तो क्या इन कानूनों की मूलभावना व् व्यवहारिकता के उद्देश्यों को छिन्न-भिन्न करने वाले संशोधन करके बलात्कार को जायज ठहरा दोगे? यह किसी एक सरकार या कार्यकाल की नाकामी नहीं है। उतरोतर सत्ता की बाल मुजदूरों की हालात में सुधार के प्रयास के प्रति उदासीनता है। अब 5-14 साल के बच्चे पारिवारिक कार्यों,कुटीर उद्योगों आदि में काम कर सकेंगे।आपको याद होना चाहिए कि भूमि बंटवारे के आंदोलन को परिवार की परिभाषा ने किस प्रकार गहरे खड्डे में डाला था!आपने परिवार के साथ साथ रिश्तेदारों का भी उल्लेख कर दिया।आज तक ठीक से आप परिवार को परिभाषित नहीं कर पाये तो अब रिश्तेदार को कौन व् कैसे परिभाषित करेंगे?14 से 18 साल की उम्र के बच्चों को खतरनाक कार्यों में न लगाने का प्रावधान था।आप खतरनाक कामों की सूची को 83 से सीधे 3 पर ले आये।इसका मतलब 80 वो काम जो आज तक बच्चों के लिए खतरनाक थे और अब एकदम सुविधाजनक हो गए? भ्रष्ट तंत्र ने जो लुटिया इस देश की डुबोई है उसको जायज ठहराने के लिए कानूनों को ही बदलकर ठीक करने का प्रयास इस देश को ले डूबेगा।आज सयुंक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ आपसे पूछ रही है कि जिन बच्चों को गरीबी के कारण स्कूल नहीं भेज पा रहे थे उस नाकामी को छुपाने के लिए आपने एक मजदुर बनाकर क़ानूनी जामा कैसे पहना दिया? द हेग कन्वेंशन में किये आपके बाल मजदूरी के वादे को कैसे पूरा करोगे?देश के विकास की रफ़्तार को बढ़ाने के लिए,उद्योगों को बढ़ाने के लिए अपनी भावी पीढ़ी को इस तरह बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।नन्हे मुन्नों को कीड़े-मकोड़े की तरह इन भभकती भट्टियों में नहीं धकेला जाना चाहिए । असफलता को छिपाने के लिए मानव सभ्यता के कलंक को कानूनों के जरिये जायज ठहराने की कोशिश ही भविष्य में देश को हर जगह,प्रगति के हर मोड़ पर शर्मसार करती जायेगी। बाल मजदूरी सिर्फ प्रशासनिक असफलता नहीं है,यह सामाजिक-आर्थिक समस्या है।सामाजिक भेदभाव व् गरीबी इसके मुख्य कारण है।दलितों को सदियों से शिक्षा से वंचित रखा गया उनको हक़ से दरकिनार किया गया।आज थोड़ी चेतना आई है उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है।उनको ओर आगे ले जाने की जरूरत है। आज बाल मजदूरों में 90%से ज्यादा बच्चे दलितों-पिछड़ों और मुसलमानों के है।ये हमेशा शिक्षा स्थलों पर सामाजिक भेदभाव के शिकार होते है।स्कूलों में भेदभाव के कारण, अपनेपन की भावना न होने के कारण इनका उनसे मोहभंग हो जाता है और अपने गरीब माँ-बाप की माली हालात को देखकर उनके साथ या उनके लिए काम शुरू कर देते है।जिनको काम नहीं मिलता वो भीख मांगना शुरू कर देते है। हमे गरीबी मिटाने की तरफ हमारे कदम बढ़ाने थे।हमे सामाजिक भेदभाव मिटाने के लिए प्रयास करने थे।हमे सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना था।हमे पढ़ने वाले गरीब बच्चों के लिए 18 साल तक खर्चे का समुचित भार हमारे कन्धों पर लेना था।हमे धर्म के अंधविश्वासों की बेड़ियाँ तोड़कर गरीबों को वैज्ञानिक शिक्षा की तरफ लाना था।हमे तंत्र की रग-रग में समाये भ्रष्टाचार के संक्रमण को साफ़ करना था।हमे तो हमारी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करके बचपन को आनंदमय,जवानी को रोजगारपरक व् बुढ़ापे को सम्मानजनक बनाना था।आज हम किस दिशा में जा रहे है?ऑनलाइन की आड़ में गरीबों को सुविधाओं से महरूम करके गरीबी के आंकड़े को नीचे लाने के प्रयास करने लग गए!बुजुर्गों की पेंशन बंद कर रहे है! सरकारी अस्पतालों को श्मसान घाटों में तब्दील कर रहे है!भ्रस्टाचारियों के आगे अनुनय-विनय करने लगे गए कि आप कालेधन की घोषणा कर दो!बाल मजदूरी को जायज बनाने लग गए!शिक्षा संस्थानों को अकुशल श्रमिक बनाने की फैक्ट्री बनाने लग गए!गरीब,शोषित,दलित आज भी टकटकी लगाये दिल्ली के सिंहासन की तरफ उसी तरह देख रहा है जैसे अकबर के जमाने से देखता रहा है।कभी निराशा के भंवर में फंसकर अपने जीवन को जारी रखने के लिए अपनी कोख को ही बेच डालता है तो कभी सत्ता-परिवर्तन के साथ उनकी उम्मीदों को पर लग जाते है लेकिन न बदलता तो सिर्फ सत्ता का रवैया!असंवेदनशीलता की दीवार लुटियन जोन में इतनी बड़ी खड़ी कर दी गई है कि इनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँचने से पहले ही ख़ामोश हो जाती है। हमे याद रखना चाहिए कि अमीरों के बच्चों की तरह गरीब बच्चे भी समुचित परवरिश,माँ-बाप के प्यार व् शिक्षा के हक़दार है।कब तक हम मुंह मोड़कर इनका गला घोंटते रहेंगे?
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