चुनाव का समय चल रहा था।हर तरफ वादों-इरादों का बोलबाला चल रहा था। चुनावों के समय हर कोई चंद दिनों के लिए नेता बन जाते है।कुछ जानकारी या समझ हो न हो एक नेताओं वाली ड्रेस चकाचक हर कोई जरूर रखता है।बुजुर्ग लोग थोड़े अनुभवी होते है।वो घर का काम जल्दी निपटाकर उस ड्रेस को उपयोग में लेते है।नेताजी वाली गाडी आएगी तो उसमे बैठकर रवाना हो जाते है।रिश्तेदारों के यहाँ प्रचार के साथ साथ मिलन का प्रोग्राम भी कर लेते है।सारा हालचाल पूछने के बाद जाते जाते थोडा संकेत में कह जाते है कि नेताजी ठीक है।देख लेना कभी जरूरत पड़ी तो काम आएंगे।उनको पता होता है कि मुझे तो खेत में ही काम करके जिंदगी गुजारनी होगी लेकिन बेटा कुछ हटकर करेगा तो कहीं जरूरत पड़ पाये या कहीं उल्टा काम भी करके आये तो कम से कम छुड़ाने में तो मदद कर ही देंगे!मतलब बुजुर्ग लोग कभी अपनी औकात से बाहर जाकर काम नहीं करते व् बेटा सफल होगा ही,ऐसी गफलत में भी नहीं जीते।वो हर तरह अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार करते रहते है। एक बार एक बड़े नेताजी की राजनीतिक रैली थी।नेता हमेशा भीड़ जुटाकर अपना शक्ति प्रदर्शन करते है।इसलिए भीड़ जुटाने के लिए आगे से आगे पैसे बांटकर ऐसी श्रृंखला से भीड़ जुटाने का इंतजाम किया जा रहा था।इसी श्रृंखला में एक छात्रनेता को 1000 युवाओं को जुटाने का ठेका मिल गया।उस छात्र नेता ने होस्टलों में व् किराये के कमरों में रहकर पढ़ने वाले छात्रों को गाडी से लाने-ले जाने व् शाम को पार्टी देने का लालच देकर लड़कों को राजी कर लिया।शाम को जमकर शराब व् हलुआ पूरी का लुत्फ़ उठाया जा रहा था।अक्सर ग्रामीण इलाकों से शहर जाकर रहने वाले छात्रों के लिए खर्चे की हमेशा कमी रहती है।इसलिए जब भी ऐसी पार्टियां होती है,एक समय खाना बनाने व् सब्जी खरीदने की परेशानी से मुक्ति मिल जाती है। ऐसे ही एक गरीब घर से आया मोहन भी एक दोस्त के साथ किराये के मकान में रहता है।किसी दोस्त के माध्यम से उसको इस पार्टी की सूचना मिलती है तो दोनों दोस्त पार्टी में पहुँच जाते है।ऐसी पार्टियों में न जात देखी जाती है न धर्म,न अपना देखा जाता है न पराया!यहाँ संख्या मायने रखती है।इसलिए किसी को भी शामिल होने में झिझक भी नहीं होती है।इसी कारण शायद मोहन को शामिल होने का हौंसला मिला होगा।रात को जमकर पार्टी के मजे लिए गए।सुबह 7 बजे कमरे के सामने 8-10 दोस्तों से भरी गाडी आ गई।नेताजी जिंदाबाद के नारे लगाये जा रहे थे।मोहन को भी जवानी का जोश चढ़ गया व् कुछ रात को खाया उसका फर्ज भी निभाना था तो तैयार होकर गाडी में बैठ गया। गाडी ऐसे रवानी होती है जैसे फार्मूला वन रेस में चल रही हो। हो भी क्यों नहीं नेताजी की रैली में युवा लोगों का पहुँचने का अंदाज ही यही होता है।जब गाडी मुख्य सड़क पर दौड़ रही थी ऐसे लग रहा था कि दौड़ नहीं उड़ रही है।एकदम जोर से धमाके की आवाज आती है।आसपास खेतों में काम कर रहे लोगों की नजर एकाएक सड़क की तरफ पड़ती है तो भयानक नजारा होता है।एक ट्रक व् पिक-अप गाडी की टक्कर होती है व् इधर-उधर खून से सने टुकड़ों में बिखरे शव।ऐसा नजारा कि एक बार तो देखकर यमराज भी सहम जाये।मोहन की भी मौत हो चुकी थी।किसी तरह उसके घर सूचना देने की कोशिश की गई।सरपंच को फोन किया गया।माँ नरेगा में मिट्टी खोद रही थी व् बाप बकरियां चरा रहा था। किसी तरह बाप से संपर्क करके उसको घर लाया गया।घर आते ही झोंपड़ी की तरफ देखकर बाप बेसुध होकर गिर पड़ा।चाचा शव लाने अस्पताल गया हुआ था।माँ अभी भी नरेगा में मिट्टी खोद रही थी व् सपना देख रही थी कि इस सप्ताह जो भी पैसा मिलेगा वो पूरा मोहन को दूंगी ताकि वो नए जूते खरीद सके।सबके लड़के नए-नए जूते व् कपडे पहनकर घूमते है और मेरा मोहन फ़टे जूते पहनकर। बच्चे के दिल पर क्या गुजर रही होगी? जब नरेगा से छुट्टी हुई तो अपना सामान लेकर मोहन की माँ घर की तरफ तेज क़दमों से चलने लगी। रास्ते में चलते हुए लकड़ियाँ इकट्ठी करती रही ताकि शाम को चूल्हा जलाने में काम आ सके।जब अपने खेत की मेड़ पर चढ़ी तो झोंपड़ी के आगे भीड़ देखकर कदम ठिठक से गए।कदमों ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया।घर में बेटे व् पति के अलावे कोई और था भी नहीं।आशंका हकीकत प्रतीत होते ही माथे पर लकड़ियों से भरी तगारी गिर पड़ी।झोंपड़ी के पास खड़ी दो तीन महिलाएं उस तरफ भागी।जब तक वो पहुँच पाती उससे पहले मोहन की माँ बेहोश होकर गिर पड़ी।हकीकत को जान भी नहीं पाई कि पति या बेटा!महिलाओं ने उठाकर उसको ले जाकर झोंपड़ी में लेटा दिया और चारों तरफ बैठ गई। उधर गाडी से चाचा मोहन का शव लेकर आ गए।गाडी वाले को देने के लिए चाचा के पास भी किराया नहीं था।किसी तरह गाडी वाले को लौटाया गया।शव कपड़ों में बंधा हुआ था।माँ-बाप बेसुध हालत में थे इसलिए दिखाया भी नहीं गया।गाँव वालों ने अंतिम संस्कार की तैयारी कर ली।उधर नेताजी की रैली में गए गाँव वाले भी लौटने लगे।नेताजी भाषण देकर चले गए। छुटभैये नेता अपना स्कोर बना गए और इधर एक गरीब का घर उजाड़ दिया गया।किसी को किसी से कोई मतलब नहीं।गाँव वालों ने अंतिम संस्कार करके अपना कर्तव्य पूर्ण कर दिया।आज भी मोहन के माँ-बाप की सूखी आँखे व् धुंधलाती नजर खेत की मेड की तरफ जा जाकर उनको सदमे में धकेल रही है।रोज जिन्दा रहने की कोशिश करते करते मौत के नजदीक पहुँच रहे है।जब अरमानों व् सपनों की हत्या हो चुकी है तो जिएँ भी तो किसके लिए?जिन्दा रहने का कुछ तो मकसद हो।
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