दिल्ली!देश की राजधानी,हिंदुस्तान का दिल,दिल्ली दिलवालों की आदि न जाने ऐसे कितने नामों से आप जानते होंगे।लेकिन इस शहर पर लगे इस प्रकार के तमाम तमगे परसों शाम को बेमानी व् खोखले नजर आये जब आनंद पर्वत जैसे भीड़ भाड़ वाले इलाके में दिन दहाड़े 19 वर्षीय मीनाक्षी को दो दरिंदो ने चाकुओं से गोदकर बीच सड़क पर मार दिया। सैंकड़ों लोग तमाशबीन बनकर यह सब देख रहे थे।किसी की हिम्मत नहीं हुई उसे बचाने की।वो चीखती रही।चिल्लाती रही।मदद की गुहार लगाते इधर उधर भागती रही।वो दोनों दरिंदे पीछे भाग भागकर चाकुओं से हमला कर रहे थे।मरती उस अबला को देखकर किसी का भी दिल नहीं पसीजा।
किसी को भी मरती उस इंसानियत पर शर्म नहीं आई। उस मीनाक्षी की गलती यही थी कि उसने उन दरिंदो के विरुद्ध दो साल पहले शिकायत दर्ज करवाई थी।15 दिन की जेल भी हुई।अगर खाकी सही कार्यवाही करती व् काले कोट वाले को उनको छोड़ते वक्त अपनी बेटी याद आई होती तो कल मीनाक्षी नहीं मरती।लेकिन जब जनप्रतिनिधि ही दिल्ली की जनता को केजरीवाल व् मोदी के बीच फुटबॉल बना दे तो सारी न्याय की उम्मीदें टूट जाती है। दिल्ली की जनता भगवान के भरोसे है या इन गुंडों,दरिंदों के रहमों कर्म पर।पुलिस की कमाई में केजरीवाल के आने के बाद गिरावट आई तो बदले में पुलिस ने अपने हाथ पीछे खींच लिए।डरी-सहमी जनता खुलकर सामने आने से कतराने लग गई।ले-देकर अपराधियों के साथ ही समझौता करने को मजबूर है।जब पता हो कि जब किसी के साथ खड़ा होने की सजा पुलिस व् गुंडे मिलकर तय करेंगे तो कौन आगे आएगा। दिल्ली के दामन में रोज नए दाग लगते है।दिल्ली रोज सड़कों पर दम तोड़ती है।हर पल दिल्ली हैवानियत की शिकार होती है।हर चौक चौराहे पर दिल्ली शर्मसार होती है।संकरी गलियों में बच्चों का बचपन लूट जाता है।सड़कों के किनारे भूख व् इलाज के अभाव में गरीब तिल-तिल कर मर जाता है।फिर भी लुटियन जॉन के 100 हेक्टेयर के बीच घूमकर,राजपथ व् इंडिया गेट का दीदार करके मज़बूरी में कहना पड़ता है वाकई दिल्ली बहुत खूबसूरत है!क्योंकि देश की सत्ता यहीं से चलती है।दिये तले अँधेरा देखने की आदत हमारे हुक्मरानों में नहीं है। बचकर रहना।आज मीनाक्षी का शिकार हुआ है कल किसी और का होगा।कोई रखवाला नहीं।कोई सुनने वाला नहीं।दर्द उस माँ के दिल में है जिसने अपने जिगर के टुकड़े को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है।कितना ख़ौफ़नाक मंजर रहा होगा।माँ उस समय खूब चिल्ला रही थी।आज भी चिल्ला रही है।लेकिन दिल्ली उसी अंदाज में चलती रहेगी।क्योंकि हम मोटी चमड़ी के बुझदिल इंसान जो ठहरे!जो जिन्दा होता है उम्मीद उनसे की जाती है।पहले दिल्ली पुलिस मरी फिर दिल्ली की जनता मरी।आज जनप्रतिनिधि मर रहे थे।जब सब मर रहे है तो आशा की किरण कैसी?सबके घर में माँ होगी!सबके घर में बहन होगी!जरा एक बार अपने अंदर झांककर जरूर देखना।हम कितने गहरे कुएं में बैठ चुके है।
किसी को भी मरती उस इंसानियत पर शर्म नहीं आई। उस मीनाक्षी की गलती यही थी कि उसने उन दरिंदो के विरुद्ध दो साल पहले शिकायत दर्ज करवाई थी।15 दिन की जेल भी हुई।अगर खाकी सही कार्यवाही करती व् काले कोट वाले को उनको छोड़ते वक्त अपनी बेटी याद आई होती तो कल मीनाक्षी नहीं मरती।लेकिन जब जनप्रतिनिधि ही दिल्ली की जनता को केजरीवाल व् मोदी के बीच फुटबॉल बना दे तो सारी न्याय की उम्मीदें टूट जाती है। दिल्ली की जनता भगवान के भरोसे है या इन गुंडों,दरिंदों के रहमों कर्म पर।पुलिस की कमाई में केजरीवाल के आने के बाद गिरावट आई तो बदले में पुलिस ने अपने हाथ पीछे खींच लिए।डरी-सहमी जनता खुलकर सामने आने से कतराने लग गई।ले-देकर अपराधियों के साथ ही समझौता करने को मजबूर है।जब पता हो कि जब किसी के साथ खड़ा होने की सजा पुलिस व् गुंडे मिलकर तय करेंगे तो कौन आगे आएगा। दिल्ली के दामन में रोज नए दाग लगते है।दिल्ली रोज सड़कों पर दम तोड़ती है।हर पल दिल्ली हैवानियत की शिकार होती है।हर चौक चौराहे पर दिल्ली शर्मसार होती है।संकरी गलियों में बच्चों का बचपन लूट जाता है।सड़कों के किनारे भूख व् इलाज के अभाव में गरीब तिल-तिल कर मर जाता है।फिर भी लुटियन जॉन के 100 हेक्टेयर के बीच घूमकर,राजपथ व् इंडिया गेट का दीदार करके मज़बूरी में कहना पड़ता है वाकई दिल्ली बहुत खूबसूरत है!क्योंकि देश की सत्ता यहीं से चलती है।दिये तले अँधेरा देखने की आदत हमारे हुक्मरानों में नहीं है। बचकर रहना।आज मीनाक्षी का शिकार हुआ है कल किसी और का होगा।कोई रखवाला नहीं।कोई सुनने वाला नहीं।दर्द उस माँ के दिल में है जिसने अपने जिगर के टुकड़े को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है।कितना ख़ौफ़नाक मंजर रहा होगा।माँ उस समय खूब चिल्ला रही थी।आज भी चिल्ला रही है।लेकिन दिल्ली उसी अंदाज में चलती रहेगी।क्योंकि हम मोटी चमड़ी के बुझदिल इंसान जो ठहरे!जो जिन्दा होता है उम्मीद उनसे की जाती है।पहले दिल्ली पुलिस मरी फिर दिल्ली की जनता मरी।आज जनप्रतिनिधि मर रहे थे।जब सब मर रहे है तो आशा की किरण कैसी?सबके घर में माँ होगी!सबके घर में बहन होगी!जरा एक बार अपने अंदर झांककर जरूर देखना।हम कितने गहरे कुएं में बैठ चुके है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें