मरती मानवता-मुस्कराती सत्ता

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 26%जनता इतनी गरीब है कि रोटी-कपडा-मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए मोहताज है। पिछले दिनों मैंने खबर पढ़ी कि एक आदिवासी इस उम्मीद के साथ अपने दो बच्चों व् बीवी को लेकर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर गया कि शायद वहां खाने का इंतजाम हो जायेगा लेकिन तीन दिनों के प्रयास के बावजूद न कोई काम मिला और न खाना। सोचा भूख से तड़पकर मरना ही तो वापिस गाँव में ही जाकर मरेंगे। वापिस पैदल बच्चों को लेकर गाँव की तरफ चल दिया। चलते-चलते रास्ते में ही एक बच्चे ने भूख से तड़पकर दम तोड़ दिया फिर भी वह उसके शव को लेकर चलता रहा है। दोनों पति-पत्नी रो रहे थे और चल रहे थे। रास्ते में कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता मिल गया। उसने बात की तो यह हृदय-विदारक घटना सामने आई। फिर सरकारी कार्यवाही शुरू हुई।बच्चे का पोस्टमार्टम करवाया गया तो रिपोर्ट से पता चला कि बच्चे की आँते खाली थी। चिपककर सड़ चुकी थी। शायद पिछले 4-5 दिनों से उसने कुछ नहीं खाया।सरकारी अफसरों की कार्यशैली देखो कि पांच दिन बाद 20 किलो चावल दिए गए तब तक दूसरा बच्चा भी दम तोड़ देता यदि उस सामाजिक कार्यकर्त्ता ने अपनी जेब से उनको खाना नहीं खिलाया होता! यह हमारा तंत्र है गरीबी से लड़ने का जो कभी गरीबों के आसपास पहुँच नहीं पाता। गरीबों के लिए योजनाएं बनाकर धन आवंटन करने वालों से लेकर अंतिम सरकारी आदमी पटवारी-ग्रामसेवक-सरपंचो ने बड़े-बड़े बंगले खड़े कर लिए। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमकर गरीबी से लड़ने का दावा करते है लेकिन सिर्फ गरीबों से लड़ते प्रतीत होते है। क्या यह संभव है कि ये तीनों एक गाँव में ईमानदारी के साथ काम करे और कोई गरीब भूख से मर जाए?क्या यह संभव है कि ये ठीक से काम करे और कोई गरीब बिना मकान के ठण्ड-बारिश या बिना इलाज के मर जाये? नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता!तो कमी कहाँ है? कमी हमारे तंत्र में है।कमी उस जनता में है जो गरीबी के दुष्चक्र को तोड़कर बाहर निकली और अपने सफर को भूल गई। कमी हम युवाओं में है जो गाय की मौत पर घरों को, बस्तियों को जिन्दा लोगों को आग के हवाले करने के लिए तो निकल जाते है लेकिन किसी गरीब की मौत के लिए जिम्मेदार इन दरिंदों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कमी हमारे संस्कारों में है कि पैदा होते ही हमें उस दिशा में हांकना शुरू किया जाता है कि तुम हिन्दू हो,तुम मुसलमान हो,तुम ईसाई हो लेकिन कभी यह नहीं सिखाया जाता कि तुम इंसान, तुम मानवता के वाहक हो। कमी हमारी शिक्षा व्यवस्था में है जहाँ रोज सुबह हाथ जोड़कर प्रार्थना करवाई जाती है कि "धर्म के वास्ते जीना,धर्म के वास्ते मरना"लेकिन यह कभी नहीं बताया जाता कि इंसान के वास्ते जीना, इंसानियत के वास्ते मरना। मैं बार बार कहता हूँ कि गरीबी हुक्मरान कभी नहीं मिटायेंगे।ये एक योजना को ख़त्म करके दूसरी योजना पेश करते रहेंगे।ये करोड़ों रूपए बर्बाद यह  बताने में कर देंगे कि देखो मेरी बोतल की वाइन कितनी बेहतर है! धर्म के ठेकेदार कभी गरीबों को सही रास्ता नहीं बताएंगे क्योंकि इनकी दुकाने गरीबों के शोषण से ही चलती है। अपनी दुकान अपनी मर्जी से कौन बंद करना चाहेगा? कोई उद्योगपति अपनी मर्जी से मुनाफा गरीबों में नहीं बाँटेगा क्योंकि यह मुनाफा गरीबों का खून चूसकर ही हासिल किया जाता है। गरीबों के हाथों जो बड़ी-बड़ी इमारते खड़ी होती है उसमे से एक भी कमरा कभी किसी गरीब के हवाले करते किसी को देखा है? नहीं न! फिर हम इन लोगों से उम्मीद लगाकर क्यों बैठे है? हम इन लोगों को सत्ता सौंपकर शांत क्यों हो गए? हम बड़े-बड़े मॉल बनाकर इन लुटेरों के अड्डों को क्यों आबाद करे? हम पेट पर तौलिया बांधकर लंबी-लंबी यात्राएं करके इन पाखंडियों की दुकाने क्यों गुलजार करे? अब हमे खड़ा होना पड़ेगा! खुद को पहचानना पड़ेगा! खुद पर भरोसा करना पड़ेगा! संघर्ष के लिए तैयार करना पड़ेगा! हमे इनसे हमारा हक छीनकर लेना पड़ेगा! अब हमे हर मौत पर जिम्मेवार का इलाज करना होगा! हुक्मरानों को सवाल नहीं पूछेंगे सिर्फ जवाब देंगे। हक़ दो या बोरिया-बिस्तर समेटो! उद्योगपतियों को जवाब देंगे कि राहत-पैकेज नाम से जो हमारी कमाई लूटी है वो वापिस दो! धर्म के ठेकेदारों को जवाब देंगे कि देश में 31करोड़ गरीबों की मदद करने में तुम्हारे 33करोड़ देवता असफल कैसे हो गए? जागो! उठो! जलाओ मशाल संघर्ष की! जलाओ मशाल सोये हुओं को जगाने की! तब तक न रुको, जब तक अंतिम गरीब का चेहरा न खिल जाये! उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारी सफलता होगी! उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारी सत्ता होगी!उस गरीब के चेहरे की मुस्कान ही हमारा धर्म 


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