अगर आप रात को सोकर सुबह उठे हो व् गली में निकले तो एकदम नई सड़क बनी हुई मिली इसका मतलब यह नहीं है कि अब अधिकारी लोग अपनी दिमागी जंग को उतारकर काम करने लग गए है या जो रोड किनारे दोनों तरफ चुने की लाइन्स खींचने वाला अब आम लोगों को आदर देने की भावना अपने अंदर जागृत कर चुका है! आज कोई बड़ा नेता आने वाला है!अगर नेता मंत्री भी हो तो ऐसा नजारा हर जगह नजर आता है।चाहे केंद्रीय सरकार के मंत्री हो या राज्य सरकार के मंत्री।सबसे बड़ी रोचक बात यह है कि ऐसे मौकों पर सड़के बनती है तो कभी विभागों में आपसी मतभेद नहीं होता।सारे अधिकारी अपने कर्मचारियों को साथ लेकर बिना आरोपों-प्रत्यारोपों के मैदान में डटे रहते है।मैं तो सोच रहा था कि मंत्रीजी रोज दो-तीन जगह निरीक्षण पर आने की घोषणा करते रहे तो जनता के काम यूँ ही हो जायेंगे लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है! मंत्रीजी चुनावो के समय घर घर के दरवाजे पर पहुँचते है और समस्याओं से वाकिफ होते है लेकिन जैसे ही मंत्री बनते है तो सबकुछ भूल बैठते है।फिर जनता दरबार लगाने का ढोंग करने लग जाते है। समस्याओं के समाधान केंद्र के नाम पर जगह-जगह अपने लोगों को सेट कर देते है फिर पैसे के बदले काम योजना की शुरुआत हो जाती है।अधिकारी के हाथ जवाब देने लगते है फ़ाइल है कि आगे बढ़ती ही नहीं,जैसे समाधान केंद्र में संपर्क किया जाता है तो अधिकारी हाथ में कलम लेता है व् समाधान केंद्र वाला भाई आराम से बताता है कि भाई ये अधिकारी हरामी होते है!बिना दिए कुछ काम करते नहीं है,इसलिए आपको इतना इंतजाम तो करना ही पड़ेगा! हाँ सड़क वाला मामला थोडा अलग है। रात को सड़क बने व् सुबह मंत्रीजी उस पर अवतरित हो तो मंत्रीजी को भी अच्छे से पता है कि सड़क मेरे आने पर बनी है लेकिन मंत्रीजी अपने स्वागत की तैयारियों में अधिकारीयों की एकरात्रि मेहनत देखकर इतने भावुक हो जाते है कि शाबाशी के अलावे मुंह से कोई और शब्द निकल ही नहीं सकता।मन ही मन वीआईपी वाली भावना भी हिलोरे लेने लगती है।फिर देखो उस दिन मंत्रीजी मंच से क्या-क्या लच्छेदार फेंकते है!जनता झूमने लग जाती है।तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मंत्रीजी वापिस लौट जाते है और जनता का जब जोश ठंडा होता है तो सुन्न सी हो जाती है।लगता है कि मंत्रीजी सिर्फ फेंककर गए है।टीवी चालू करते है तालियों की गिनती-नारों व् मंत्रीजी की लोकप्रियता के बखान हो रहे है। गरीब टीवी देखकर दुबारा अपने हाथों की तरफ देखता है कि जोश में मेरे इन्हीं हाथों ने खुद के साथ अन्याय तो नहीं कर दिया! लेकिन अपने दिल की व्यथा किसको बताये क्योंकि तालियाँ तो उसी ने बजाई थी?फालतू में फजीहत कराने से अच्छा है कि या तो चुप हो जाओ या फिर पहले वाले मंत्री को गालियां देना शुरू कर दो।खैर मेरे यहाँ तो सड़क बन गई आप अपनी सड़क के उन पुराने गड्ढों का ख्याल रखकर चलियेगा नहीं तो जोश में घुटने न टूट जाये!एक दिन का शोर-शराबा तो सहन करना ही पड़ेगा क्योंकि नई सड़क जो बनी है।आप मायूस मत होइए शायद मंत्रीजी अगली बार आपके इलाके में आ जाये
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