बाइजु झारखण्ड के आदिवासी गाँव के सरकारी स्कूल में पढता है।मध्यान्ह भोजन योजना के तहत यहाँ
सोमवार,बुधवार व् शुक्रवार को तीन अंडे दिए जाते है।बाइजु को जो अंडे दिए जाते है चुपके से छिपाकर अपने
थैले में डाल देता है और घर ले जाता है।खुद चावल या दलिया खाकर पेट भर लेता है।वो बेहद गरीब परिवार
से है। दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना उसके परिवार के लिए किसी जंग से कम नहीं है।वो अमूमन स्कूल
में सबसे शांत बच्चा है।लेकिन बाहर से दिखने वाली शांति जरूरी नहीं कि अंदर की शांति की नुमाइंदगी करे!
उसकी माँ को कई महीनों से खांसी थी।खांसी में खून भी आ रहा था।उसके बाप के पास पैसे नहीं थे इलाज
करवाने के लिए।उन्होंने नियति मानकर हार मान ली।लेकिन बाइजु ने स्कूल की दीवार पर लिखा पढ़ लिया कि
दो हफ्ते से अधिक खांसी टी बी हो सकती है।लक्षण पढ़ने के बाद उसको लगा कि माँ को टी बी है व् इलाज
मुफ़्त होता है।वो अपनी माँ को लेकर 7किलोमीटर दूर उप स्वास्थ्य केंद्र पर ले गया।डॉक्टर ने जाँच करवाकर
टी बी की दवा शुरू कर दी।खाने में प्रोटीन वाली चीजें ज्यादा खाने को कह दिया जिसमे अंडा भी था।लेकिन
घर की बदहाली में यह संभव नहीं था।तो उसने स्कूल से इस तरह अंडे लाना शुरू कर दिया। 9वर्षीय बुजुर्ग
बाइजु माँ की ममता व् उसके आँचल के महत्व को समझ गया।उनका प्रयास माँ की ममता की छाँव को
हराभरा रखने का असली प्रयास है।पिछले दिनों मदर डे था।आप व् मेरी तरह दिवस व् समारोह तो नहीं मना
पाया लेकिन मेरी नजर में बाइजु का हर दिन मदर डे ही होता है।माँ-बाप की दुआओं में सफलता होती है।छोटे
पेड़ चाहे दिखने में कितने ही सुंदर हो लेकिन फल हमेशा बड़ा पेड़ ही देता है।इसलिए अपने घर के बड़े पेड़
को संजोकर रखिये। वो माँ ही है जब हम नहीं बोलते थे तब भी हमारी बात समझ जाती थी इसलिए यह बोलने
से पहले सौ बार सोचिये कि "माँ यह तुम्हे नहीं पता!"हम सौ बार उल्टी हरकतें करते लेकिन माँ मुस्कराकर
माथे पर हाथ फेर देती।एक सवाल सैंकड़ों बार पूछते लेकिन कभी चिड़चिड़ी होने के बजाय हमे हजार बार
जवाब देती इसलिए आज उनके सवालों के जवाब दीजिये।बुढ़ापा बचपन का ही दूसरा रूप होता है।प्रकृति
हमारे बचपन का कर्ज उतारने के लिए माँ को लंबी उम्र देती है।इसलिए इस मौके का फायदा हमारे कर्मों का
हिसाब चुकता करने के लिए उठाइये। याद है न हमारे बचपन की हर गलती पर माँ माथे पर हाथ फेरकर माफ़
कर देती थी!आज बूढी माँ हमसे वो ही उम्मीद करती है।माँ को गले लगाइये,माथे पर हाथ फेरिये।ममता की
छाँव में बसी दुनियां में जीना सीख लोगे तो किसी धार्मिक यात्रा करने,यज्ञों में आहुति देने या गंगा में नहाने की
जरूरत ही नहीं पड़ेगी।माँ शब्द बोलने मात्र से हमारा मुंह खुलता है मतलब माँ ही हमारे लिए दुनियां का
दरवाजा खोलती है।हमे कभी भी माँ के लिए कोई दरवाजा बंद नहीं करना चाहिए।जहाँ माँ है वहीं स्वर्ग है।जिस
घर में माँ को आदर नहीं मिलता,उस घर में हमेशा कलह ही रहती है।
मुनव्वर राणा ने माँ के लिए लिखा है
किसी के हिस्से मकान आया
किसी के हिस्से दुकाँ आई
मैं घर में सबसे छोटा था
मेरे हिस्से में माँ आई....
जिनकी तकदीर में बुलंदी होती है उसी के हिस्से में माँ आती है।माँ को जियो,ममता को महशूस करो....अंत में
जब भी आता है तूफान जिंदगी में
जब भी छाया है सैलाब-ए-गम
चट्टान की तरह साथ खड़ी रही
अपार है माँ की दुवाओं में दम....
सोमवार,बुधवार व् शुक्रवार को तीन अंडे दिए जाते है।बाइजु को जो अंडे दिए जाते है चुपके से छिपाकर अपने
थैले में डाल देता है और घर ले जाता है।खुद चावल या दलिया खाकर पेट भर लेता है।वो बेहद गरीब परिवार
से है। दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना उसके परिवार के लिए किसी जंग से कम नहीं है।वो अमूमन स्कूल
में सबसे शांत बच्चा है।लेकिन बाहर से दिखने वाली शांति जरूरी नहीं कि अंदर की शांति की नुमाइंदगी करे!
उसकी माँ को कई महीनों से खांसी थी।खांसी में खून भी आ रहा था।उसके बाप के पास पैसे नहीं थे इलाज
करवाने के लिए।उन्होंने नियति मानकर हार मान ली।लेकिन बाइजु ने स्कूल की दीवार पर लिखा पढ़ लिया कि
दो हफ्ते से अधिक खांसी टी बी हो सकती है।लक्षण पढ़ने के बाद उसको लगा कि माँ को टी बी है व् इलाज
मुफ़्त होता है।वो अपनी माँ को लेकर 7किलोमीटर दूर उप स्वास्थ्य केंद्र पर ले गया।डॉक्टर ने जाँच करवाकर
टी बी की दवा शुरू कर दी।खाने में प्रोटीन वाली चीजें ज्यादा खाने को कह दिया जिसमे अंडा भी था।लेकिन
घर की बदहाली में यह संभव नहीं था।तो उसने स्कूल से इस तरह अंडे लाना शुरू कर दिया। 9वर्षीय बुजुर्ग
बाइजु माँ की ममता व् उसके आँचल के महत्व को समझ गया।उनका प्रयास माँ की ममता की छाँव को
हराभरा रखने का असली प्रयास है।पिछले दिनों मदर डे था।आप व् मेरी तरह दिवस व् समारोह तो नहीं मना
पाया लेकिन मेरी नजर में बाइजु का हर दिन मदर डे ही होता है।माँ-बाप की दुआओं में सफलता होती है।छोटे
पेड़ चाहे दिखने में कितने ही सुंदर हो लेकिन फल हमेशा बड़ा पेड़ ही देता है।इसलिए अपने घर के बड़े पेड़
को संजोकर रखिये। वो माँ ही है जब हम नहीं बोलते थे तब भी हमारी बात समझ जाती थी इसलिए यह बोलने
से पहले सौ बार सोचिये कि "माँ यह तुम्हे नहीं पता!"हम सौ बार उल्टी हरकतें करते लेकिन माँ मुस्कराकर
माथे पर हाथ फेर देती।एक सवाल सैंकड़ों बार पूछते लेकिन कभी चिड़चिड़ी होने के बजाय हमे हजार बार
जवाब देती इसलिए आज उनके सवालों के जवाब दीजिये।बुढ़ापा बचपन का ही दूसरा रूप होता है।प्रकृति
हमारे बचपन का कर्ज उतारने के लिए माँ को लंबी उम्र देती है।इसलिए इस मौके का फायदा हमारे कर्मों का
हिसाब चुकता करने के लिए उठाइये। याद है न हमारे बचपन की हर गलती पर माँ माथे पर हाथ फेरकर माफ़
कर देती थी!आज बूढी माँ हमसे वो ही उम्मीद करती है।माँ को गले लगाइये,माथे पर हाथ फेरिये।ममता की
छाँव में बसी दुनियां में जीना सीख लोगे तो किसी धार्मिक यात्रा करने,यज्ञों में आहुति देने या गंगा में नहाने की
जरूरत ही नहीं पड़ेगी।माँ शब्द बोलने मात्र से हमारा मुंह खुलता है मतलब माँ ही हमारे लिए दुनियां का
दरवाजा खोलती है।हमे कभी भी माँ के लिए कोई दरवाजा बंद नहीं करना चाहिए।जहाँ माँ है वहीं स्वर्ग है।जिस
घर में माँ को आदर नहीं मिलता,उस घर में हमेशा कलह ही रहती है।
मुनव्वर राणा ने माँ के लिए लिखा है
किसी के हिस्से मकान आया
किसी के हिस्से दुकाँ आई
मैं घर में सबसे छोटा था
मेरे हिस्से में माँ आई....
जिनकी तकदीर में बुलंदी होती है उसी के हिस्से में माँ आती है।माँ को जियो,ममता को महशूस करो....अंत में
उस नन्हे बालक बाइजु को मेरा सलाम जो हर रोज मदर डे मनाता है
जब भी आता है तूफान जिंदगी में
जब भी छाया है सैलाब-ए-गम
चट्टान की तरह साथ खड़ी रही
अपार है माँ की दुवाओं में दम....
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