क्यों ऐतबार हो इतना,रोज हम अगर-मगर कर गए।
बीए एम्ए हुए,नौकर हुए,पेंशन मिली और मर गए।।
वाकई क्या जिंदगी है।क्या इतने में भी खुश हो जाये या कुछ और भी करे?सवाल खुद से तो जवाब और कहाँ मिलेगा? दिखने में मैं जितना आराम-फरामोश हूँ,खुश हूँ,होशियार हूँ,हकीकत में मैं एक लापरवाह की हद तक बेपरवाह इंसान हूँ।लेकिन भगवान ने एक गुण गलती से डाल दिया!वो है संवेदनशीलता।यह कीड़ा रोज परेशान करता है।चाहकर भी दुनियां से विमुख होकर,खुद में मस्त हो नहीं सकता। लोग कहते है "अच्छी खासी सरकारी नौकरी कर रहे हो।अब तो आपके मौजे ही मौजे है।"मुस्कराकर चुप रह जाता हूँ।लेकिन अंदर ही अंदर बकता हूँ।बस करो शैतानो!शर्म करो थोड़ी।तुम भी अज्ञानी अंधों की दौड़ में शामिल हो गए हो!ऐसे लगता है जैसे कमीनों को मेरी दुखती रग का पता चल गया हो!लेकिन अंदर की बात को कभी सटीक तरीके से मैंने कभी प्रकट ही नहीं की।या यूँ कहूँ कि किसी ने मुझ पर विश्वास जताकर पूछा ही नहीं।क्योंकि मैं बहुत लापरवाह हूँ।सत्य व् ईमानदारी का इतना पक्का कि उसके सामने हर बनी मंजिल को कभी भी गिरा देता हूँ। जब भी बीच राहों में कुछ गड़बड़ का पता चलता है तो तुरंत वापिस मुड़ जाता हूँ।हो सकता है वक्त व् जमाने के हिसाब से मैं अपने आप को अनुकूलित कर नहीं पाया हूँ।मैं आज तक तय नहीं कर पाया कि असली सफल कौन है?सफलता का पैमाना क्या है?जीवन का मकसद क्या है?जैसे जैसे आगे बढ़ता हूँ,अंदर से खाली होता जाता हूँ।पहले फूलों की तरह मुलायम होता तो आज अंदर से कंटीली थोर जैसा हो रहा हूँ।अपने आप को राह पर चलते राही के रूप में पेश करने के लिए अपने हर रिश्ते को विराम देने की फ़िराक में लगा हूँ।क्या अपनों को भूलकर परायों के साथ जीवन का सुकून मिल पायेगा?संदेह व् संघर्ष के अथाह समुद्र में तीर चला रहा हूँ। पीछे की और मुड़कर देखता हूँ तो आगे बढ़ने की जद्दोजहद में लगे लोग मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है।सफ़र के हर पड़ाव का विश्लेषण करता हूँ तो पाता हूँ कि हर अगले पड़ाव पर इंसान खोखला होता जाता है।तो करे क्या?यह सवाल मेरी आत्मा में तीर की तरह चुभ रहा है।
रोज नजर पड़ती है उन तमाम महफ़िलों पर
जहाँ सजे संवरे लोग बहुत है पर अपना कोई नहीं।
चकाचौन्द भरी दुनिया में कौन-किस तरफ जा रहा है!कुछ भी पता नहीं चलता।कोई अपराध का प्रमुख है तो कोई सिंहासन का।कोई एक वक्त के खाने पर हजारों उड़ा देता है तो कोई खाने के अभाव में इस दुनियां से रुखसत हो जाता है।वाकई दुनिया बूझो तो जाने वाली पहेली नहीं है,यह अबूझ पहेली है।किसी को कुछ पूछने की जरुरत भी नहीं है।बस जानने के लिए जिन्दा रहना जरुरी है।लेकिन इस दौड़ में जिन्दा रहना भी तो आसान नहीं है।और फिर अंत समय में जानकर भी क्या करेंगे? रोज खुद से सवाल करता हूँ और खुद ही जवाब ढूंढता रहता हूँ। फिरता रहता हूँ दर-ब-दर......।
मयखानों में जमकर पियो।मंदिरों में जाकर खूब चंदा दो।शौक भी उपरवाला रहे और आपका कमीनापन भी दूर न हो।वाकई लाजवाब हो तुम।कहीं जिंदगी में कुछ मिल गया तो उड़ाओ जश्न।अगर न मिले तो कहदो वो मंजिल ही छोटी थी,उसके नसीब में मैं कहाँ?अकबर इलाहाबादी हज की यात्रा नहीं कर पाये तो उन्होंने लिखा...
सिधारे शौख काबे को,हम इंग्लिस्तान देखेंगे।
वो देखे घर खुदा का,हम खुदा की शान देखेंगे।।
दुःख की जड़ भी खुद व् उसका समाधान भी खुद के पास।अपने आप को संतुष्ट तो कर ही सकते है! नहीं कभी नहीं । सिर्फ दुनियां को दिखाने के लिए।असफलता इंसान को कभी संतुष्टि नहीं दे सकती। जिस दिन इंसान संतुष्ट हो गया दुनिया रुक जायेगी और अपने विनाश की तरफ बढ़ने लग जायेगी।तो आप कोशिश करते रहिये। सफलता जरूर मिलेगी।मैंने तो पहले ही बता दिया कि मैं उलझन में हूँ।आप क्यों उलझ रहे हो?
बार-बार बुलावा आया किसी अमीर का।
लेकिन सौदा कर न सका अपने जमीर का।।
जब सब कुछ भूलकर सौदेबाजी पर उतर जाऊंगा तो आप दोस्तों को जरूर बताऊंगा.......

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