गीता पर लिखूं या रामायण पर!

गीता पर लिखूं या रामायण पर!
बाइबिल पर लिखूं या कुरान पर!

यथार्थ लिखूं तो भावनाएं आहत?भगवान-यीशु या अल्लाह ने तो ये किताबें लिखी नहीं है! तुम सभी ही तो कहते हो यह ही सबका मालिक है,सबका बाप है तो मैं सवाल क्यों न पूछूँ? मैंने भी बहुत सजदे किये है जनाब!सवाल पूछने का हक़ तो मेरा भी है!सारी ये धार्मिक किताबें पढ़ने के बाद थोड़ा इंसान बन पाया हूँ और इसी इंसानियत को आगे ले जाना चाहता हूँ। इंसान होने का सबसे बड़ा सबूत भावुक होना है न कि तर्कसंगत होना।तर्क आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है लेकिन भावुकता इंसानियत को जिन्दा रखने का वाहन है।न हिन्दू बनो!न ईसाई बनो!न मुसलमान बनो!सिर्फ और सिर्फ इंसान बनो क्योंकि

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,ईसाई
इंसान न होने की कसमें खाई।।

किसी हिन्दू को पूछ लीजिये कि तुम कौन हो?तो जवाब मिलेगा कि मैं हिन्दू हूँ,हमारा धर्म प्रेम सिखाता है!हम वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात पुरी दुनियां हमारा परिवार के सिद्धांत पर चलते है!जब उसी को पूछो कि मुसलमानों के बारे में कुछ जानते हो?तो जवाब मिलेगा गद्दार,देशद्रोही,मानवता के विरोधी,क्रूर लोग है!इनका खात्मा ही दुनियां में शांति ला सकता है!मतलब एकदम व् एक साँस में वसुधैव कुटुम्बकम को किनारे फेंककर अपने ही कुटुंब के लोगों के प्रति ये भावना!अजीब ज्ञान होता है इनका और यह ज्ञान हिन्दू धर्म का अनुयायी बनकर हासिल किया है! किसी मुसलमान को पूछकर देख लो तो बताएगा कि इस्लाम मोहब्बत सिखाता है,इस्लाम गला काटना नहीं बल्कि गले मिलना सिखाता है!जब पूछो कि हिंदुओं के बारे में क्या राय है तो बोलेंगे कि जाहिल लोग है,काफिर है,ये मुसलमानों के दुश्मन लोग है और यह अद्भुत ज्ञान इन्होंने इस्लाम का झंडा थामकर हासिल किया है। यही हाल ईसाई धर्म का है।मतलब हर धर्म का आदमी प्रेम,मोहब्बत,सद्भावना की बात तो करता है लेकिन अपने धर्म की सीमा के भीतर तक।फिर धर्म की सीमाओं के भीतर जाति, फिरका,गुटों में सिमट जाता है।इसके इतर अपने गुरु,मौलवी, पादरी के पीछे स्वयंभू कबीला अलग से बना लेते है। इन सबका गहनता के साथ अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि जो लोग अपने आप को उच्च धार्मिक बताते है उनसे ज्यादा लालची, कपटी,धूर्त लोग नहीं होते! ये इंसानियत के दुश्मन लोग होते है और अपने उन्माद की मदहोशी में मानवता का क़त्ल करते चलते है। अगर वाकई में इस देश को किसी से असली खतरा है तो इन धार्मिक उन्मादी लोगों से है।गाँवों व् दूरदराज के क्षेत्रों में अज्ञानी लोग इनके बहकावे में आकर खुद लुटते है लेकिन बड़े शहरों में पढ़े-लिखे धार्मिक उन्मादी लोग बीच सड़कों पर इंसानियत का क़त्ल करते है।धमकी, अपहरण , हत्या हफ्तावसूली आदि से अर्जित धन को धार्मिक पर्वों पर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए उड़ाते है।हर धर्म के उच्च धार्मिक लोगों का लगभग यही हाल है।जिनके गुनाहों से पर्दा उठ जाता है वो ढोंगी व् जो छिपाने में कामयाब हो जाते है वो धर्मगुरु!
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