क्या सवाल करना या आलोचना करना लोकतंत्र विरोधी व् देशद्रोह है?

क्या सवाल करना या आलोचना करना लोकतंत्र विरोधी व् देशद्रोह है? क्या दोष सिध्द होने से पहले आरोपों के आधार पर अपराधी कहना देश के संविधान व् कानून का मख़ौल उड़ाना नहीं है? भोपाल जेल से भागे आतंकवाद के आरोपियों को संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा आतंकी कहना जायज है जबकि अभी तक कानून के मुताबिक उन पर आरोप सिध्द नहीं हुए है? क्या लकड़ी की चाबियों से ताला खोलने की आधुनिक प्रणाली विकसित होने की कला के बारे में हमे जानने की उत्सुकता नहीं रखनी चाहिए? चाक-चौबंद सुविधाओं वाली जेल में अमरुद की लकड़ी व् बेडशीटों से सीढ़ी निर्माण की प्रक्रियाओं को खामोश मिजाजी के साथ होने देने वाले पुलिस वालों पर सवाल उठाना देश के साथ गद्दारी है? भागने से तीन दिन पहले सीसीटीवी कैमरों का बंद होना,35फ़ीट ऊँची दीवार पर बिजली प्रवाहित तारों में अचानक बिजली बंद हो जाना,सभी आठों आरोपियों का एक ही दिशा में साथ भागना,भागने के 5 घंटे के अंदर मुठभेड़ के समय पेंट-शर्ट-घडी पहनकर सामने आना,समर्पण को तैयार आरोपी को गोली मारना, जमीन पर पड़े घायल को पास में खड़े होकर गोली मारना, सभी आरोपियों को गोली कमर से ऊपर मारना,दो आईपीएस अधिकारियों द्वारा हथियारों को लेकर विरोधाभासी बयान देना आदि ऐसे तमाम सवाल है जो सुप्रीम कोर्ट के मुठभेड़ को लेकर दिए गए दिशा-निर्देशों से ही पैदा होते है।सवाल करने से हम आतंकवाद समर्थक कैसे हो जाते है? अगर सवाल  करना समर्थन करना है तो कल शिवराज सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश क्यों दिए?क्या यह आयोग तमाम पहलुओं पर सवाल जवाब नहीं करेगा?फिर आपके हिसाब से यह आयोग व् जाँच का आदेश देने वाले शिवराज सिंह आतंकवाद समर्थक ही होंगे? पूर्व सैनिक रामकिशन ने जब आत्महत्या की तो फिर से सवाल करने वालों को गालियों से सामना करना पड़ा।क्या धरना-प्रदर्शन करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा आत्महत्या करना जायज मानकर हम खामोश बैठ जाए?मानते है आत्महत्या करना देश के कानून के मुताबिक अपराध है और हम आत्महत्या करने को जायज नहीं ठहरा रहे है लेकिन आत्महत्या करने के कारणों पर चर्चा करना,सवाल-जवाब करना अपराध कैसे हो जाता है?फिर किसी भी आत्महत्या करने वाले के कारणों को जानने व् आत्महत्या तक पहुँचाने वाले कारकों पर पुलिसिया कार्यवाही क्यों की जाती है?आपके मुताबिक तो यह भी गलत ही होना चाहिए।आप कहते हो कि सवाल करने वाला गद्दार व् मोदीजी का विरोधी है।इस मुद्दे को उठाने वाला विपक्ष राजनीति कर रहा है।अरे भाई विपक्ष राजनीती नहीं करेगा तो क्या चौराहों पर गोल-गप्पे के ठेले लगायेगा?जिनका काम राजनीति करना है वो राजनीति करेगा।जिसका काम सवाल-जवाब करने का है वो सवाल-जवाब करेगा। ऐसा नहीं है कि सवाल सिर्फ मोदी सरकार से ही किये जा रहे है बल्कि आजादी के बाद हर सरकार को ऐसे ही सवाल पूछे गए है व् आगे भी पूछे जाएंगे।दिल्ली में जब निर्भया कांड हुआ था तब कांग्रेस की सरकार के खिलाफ राष्ट्रपति भवन तक को नहीं बख्शा गया था।तब भी सरकार कह रही थी कि विपक्ष बलात्कार पीड़िता पर राजनीति कर रहा है।झारखण्ड में आदिवासी लोगों को धन्ना-सेठों की सह पर गोलियों से भुना जा रहा है व् जमीनें छीनी जा रही है।हम तो सवाल उस पर भी उठा रहे है।हम तो जब भी किसी किसान की आत्महत्या की खबर सुनते है तो उस पर भी सवाल उठाते है।सवाल उठाना तो लोकतंत्र का मूल स्तम्भ होता है।सवाल करने से सत्ता बेलगाम नहीं होती व् तानाशाही प्रवृति की ओर जाने से रोका जा सकता है।आपके मन में भी कोई सवाल हो तो जरूर पूछिये और सवाल हमेशा से सत्ता से मांगे जाते है विपक्ष से नहीं क्योंकि जो विपक्ष में बैठे है उन्होंने जनता के सवालों को नजरअंदाज कर दिया था इसीलिए उनको बाहर बैठाया है।यह कौनसा प्रतिसवाल होता है कि पिछली सरकार ने भी यही किया था या उन्होंने यह किया-वो किया?अरे भाई उन्होंने अगर ठीक किया होता तो वो सत्ता से बाहर क्यों होते? आपका इरादा भी वैसा ही है क्या? हर मुद्दे पर सवाल करो,हर मुद्दे पर राजनीति करो।सवाल अच्छे होते है।राजनीति अच्छी होती है।राजनीति करना गलत बात है कहकर लोग राजनीति कर लेते है।ये सब हमे बरगलाने की कोशिशें है।राजनीति न करने की सलाह देने वाले अगर वाकई में राजनीति गन्दी होती तो खुद राजनीति क्यों नहीं छोड़ देते?सवाल करना व् राजनीति करना दो अलग बात होती है।राजनीति करने वाला पार्टी से जुड़ा होता व् सवाल करने वाला जरुरी नहीं होता कि वो हमेशा राजनीतिक कार्यकर्त्ता ही हो।मीडिया व् जागरूक लोग सवाल कर सकते है।हाँ इतना जरूर है कि ज्यादा सवालों से सत्ता कमजोर होती है व् विपक्ष को फायदा मिलता है।सत्ता में बैठे लोगों को समस्याओं व् विभिन्न मुद्दों का त्वरित व् बेहतर निदान निकालने की कोशिश करनी चाहिए ताकि सवाल कम से कम उठे।हमारे पास सवालों की फेहरिस्त इसलिए ज्यादा हो रही है क्योंकि सत्ता राह भटक कर सटीक निर्णय,ठोस व् तेजी से कदम उठाने में नाकाम हो रही है।सत्ता को अपनी सोच व् विचारधारा को थोपने के बजाय जनता के ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।हर इंसान की हर पार्टी या संगठन की अपनी सोच होती है लेकिन देश सोच से नहीं संविधान से चलता है।इसलिए दूसरे की सोच को निगलने की कोशिश करने के बजाय संवैधानिक व् लोकतान्त्रिक मूल्यों का आदर करते हुए आगे बढ़ना चाहिए.....

कट जाये मेरी सोच के पर

इससे तुझको क्या है?
डूब जाये मेरे देश के सपने
इससे तुझको क्या है?
यूँ उन्मादी बन बैठा तूँ
तेरा काम है कश्तियाँ डुबोना
कोई मरे या कोई जिए
इससे तुझको क्या है?
https://sunilmoga.blogspot.com/
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