कल एक दिल दहलाने वाली खबर महाराष्ट्र से आई। बुलडाणा के बोर्डिंग स्कूल में 12 नाबालिग लड़कियों के साथ महीनो तक बलात्कार किया गया।जब लड़कियां दीवाली पर घर गई तो 3 लड़कियों ने पेट दर्द की शिकायत की तो परिजन अस्पताल लेकर पहुंचे।अस्पताल में जांच से पता चला कि वो गर्भवती है। जब लड़कियों से पूछा गया तो पूरा मामला खुल गया। सोचो कि इतना बड़ा अपराध महीनों तक होता रहा वो भी एक स्कूल में और किसी को भनक तक नहीं लगी। इससे साबित होता है कि सरकारें गरीब आदिवासियों के कल्याण के लिए कितनी गंभीर है! इससे यह भी साबित होता है कि तमाम गैर-सरकारी संगठन व् नागरिक समाज अपनी जिम्मेदारी कितनी संवेदनशीलता के साथ निभा रहा है? इसमें गलती सिर्फ चुनी हुई सरकारों की ही नहीं है बल्कि गरीबों के भले की बात करने वाले हर संगठन व् संस्था की है।आजादी के बाद हजारों योजनाओं की घोषणाएं हुई।अरबों रूपए आदिवासी कल्याण के नाम पर लुटे गये लेकिन आज भी आदिवासी दुगुनी तेजी के साथ ख़त्म या विस्थापित किये जा रहे है।इस घटना ने ऐसे तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी।
हर दावे व् दावा करने वाला कठघरे में खड़ा है।पिछले साल जयपुर में भी मिशनरी के एक बोर्डिंग स्कूल में इसी तरह के मामले में पादरी गिरफ्तार हुआ था।2013 में बिहार के कोसी इलाके में काम करने वाली मिशनरी का मुख्या भी नाबालिगों के यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार हुआ था।ये तो वो घटनाएं है जिस पर कुछ स्वतंत्र पत्रकारों की नजर पड़ जाती है और हम जान जाते है।आदिवासी इलाकों में आदिवासी कल्याण की बातें करने वाले हवस के भूखे दरिंदे खुलेआम घूमते है।नक्सलवाद की मुख्य वजहों में यह भी बहुत बड़ी वजह है।जमीन छीन रहे है।रोजगार के नाम पर शोषण किया जाता है।लड़कियों को पढाई के नाम पर अपने इन हवस के अड्डों पर लाकर अपनी यौन कुंठाओं को शांत करने में उपयोग करते है।कोई विरोध करता है तो उनको नक्सली बताकर मार दिया जाता है।क्या ऐसा संभव है कि लाखों करोड़ रूपये लेकर पूरा तंत्र आदिवासियों की भलाई में ईमानदारी के साथ लगने के बावजूद आजादी के 70 सालों के बाद इनकी समस्याओं का समाधान न निकाल पाएं और अंतिम विकल्प के तौर पर गोली से इनको मिटाकर ही समस्या का समाधान करना पड़े! देश की लगभग एक चौथाई आबादी को ही मिटाकर कैसे हम इस समस्या का समाधान कर पाएंगे?क्या यह हमारी गौरवशाली कही जाने वाली मानव सभ्यता पर कलंक नहीं है?क्या बहुसंख्यक लोगों की मानसिकता के हिसाब से अल्पसंख्यक लोगों का शोषण करने की प्रवृति में बदलाव नहीं किया जा सकता है?क्या आशाराम जैसे लोग गुजरात व् महाराष्ट्र के आदिवासी लोगों को धर्म परिवर्तन करने से किस तरह रोक रहे थे या ईसाई मिशनरी किस तरह गरीब आदिवासी लोगों को मुफ्त में शिक्षा व् चिकित्सा उपलब्ध करवा रही है उस पर सरकारों को निगरानी नहीं रखनी चाहिए?क्या शिक्षा व् चिकित्सा जैसी बुनियादी सेवाओं को निजी व् गैर-सरकारी संगठनों के हवाले छोड़कर सरकारें चिर निद्रा में सोने के लिए चुनी जाती है?आरएसएस जैसा दावा करता है कि उनके लाखों कार्यकर्त्ता आदिवासियों के कल्याण में लगे हुए है तो क्या यह संभव है कि उनको यह पता नहीं चले कि गरीब आदिवासी इलाकों से लड़कियों को उठाकर ऐसे हवस के अड्डों पर पहुँचाया जाता है?क्या महीनों एक बोर्डिंग स्कूल में नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण होता रहा और शिक्षा विभाग मृत अवस्था में पड़ा था?आदिवासी भाग,महिला व् बाल विकास विभाग के लोग क्या कर रहे थे?क्या उनकी जिम्मेवारी नहीं होती कि स्कूलों पर नजर रखी जाए?क्या उनकी जिम्मेवारी नहीं थी कि जानवरों की तरह उठाकर कोई लड़कियों को आदिवासी इलाकों से ले जाये तो उस पर ये नजर रखे? अब जब सब कुछ सामने आ गया तो दरिंदों को गिरफ्तार करके फांसी पर लटका दो लेकिन इन गरीब बच्चियों के साथ जो हुआ उसकी भरपाई कौन व् कैसे करेगा?भविष्य में दुबारा न हो इसकी जिम्मेवारी कैसे तय होगी? हाथ में तिरंगा लेकर शहरों की गलियों में देशभक्ति के नारे लगाकर उत्पात मचाना ही देशभक्ति नहीं होती! गौमाता-गौमाता चिल्लाकर गरीब दलितों व् मुसलमानों को पीटने से ज्यादा राष्ट्रवादी नहीं बन जाओगे!अगर वाकई में दिलों में देशभक्ति है तो अभी भी जाग जाओ।गरीबों-दलितों-शोषितों-मजदूरों-किसानों-आदिवासियों के हकों
की आवाज को खुद की आवाज बनाओं।इन हमारे गरीब भाइयों के दर्द को समझो!उनकी समस्याओं को ईमानदारी के साथ सुनो!उनकी पीड़ाओं का उनकी भावनाओं का आदर करते हुए समाधान निकालों!गरीबों को उपयोग की वस्तु समझने की भूल में सुधार करो!हर समस्या का समाधान बम-बन्दूक-गोली नहीं हो सकता! हर अलग सोच को गद्दार या देशविरोधी बताकर दरकिनार मत करो!बार बार किसी को देशद्रोही कहोगे तो सामने वाला विद्रोह करने पर मजबूर होता है इसी कारणों से ये समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है! सत्ता के अच्छे कामों की प्रशंसा जरूर करो लेकिन गलत कामों की आलोचना व् विरोध भी करो।सत्ता की गलत नीतियों की आलोचना करना या सवाल करना कतई देशद्रोह नहीं होता बल्कि इससे देश व् लोकतंत्र मजबूत होता है।कोई भी सरकार लोकतंत्र में सौ प्रतिशत मतों से नहीं बनती है।विरोध सत्ता में आने से पहले भी होता है वो अच्छे कामों से कम हो सकता है लेकिन बुरे काम व् नीतियों के कारण जिनका मोहभंग होता है वो अगले चुनाव में आपका साथ छोड़ भी सकते है इसलिए सत्ता को अपने बाप की जागीर समझने के बजाय देश की गरीब जनता की भलाई के लिए मिले अवसर के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। आप भी ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछिये।जो सरकार ने अच्छा किया है उसी के लिए हमने उनको चुना है।जो कमियां है उनके बारे में सवाल पूछकर याद दिलाओ।हर जागरूक नागरिक को याद रखना चाहिए कि पहले कर्तव्य निभाओगे तो ही अधिकार मिल पाएंगे.........
हर दावे व् दावा करने वाला कठघरे में खड़ा है।पिछले साल जयपुर में भी मिशनरी के एक बोर्डिंग स्कूल में इसी तरह के मामले में पादरी गिरफ्तार हुआ था।2013 में बिहार के कोसी इलाके में काम करने वाली मिशनरी का मुख्या भी नाबालिगों के यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार हुआ था।ये तो वो घटनाएं है जिस पर कुछ स्वतंत्र पत्रकारों की नजर पड़ जाती है और हम जान जाते है।आदिवासी इलाकों में आदिवासी कल्याण की बातें करने वाले हवस के भूखे दरिंदे खुलेआम घूमते है।नक्सलवाद की मुख्य वजहों में यह भी बहुत बड़ी वजह है।जमीन छीन रहे है।रोजगार के नाम पर शोषण किया जाता है।लड़कियों को पढाई के नाम पर अपने इन हवस के अड्डों पर लाकर अपनी यौन कुंठाओं को शांत करने में उपयोग करते है।कोई विरोध करता है तो उनको नक्सली बताकर मार दिया जाता है।क्या ऐसा संभव है कि लाखों करोड़ रूपये लेकर पूरा तंत्र आदिवासियों की भलाई में ईमानदारी के साथ लगने के बावजूद आजादी के 70 सालों के बाद इनकी समस्याओं का समाधान न निकाल पाएं और अंतिम विकल्प के तौर पर गोली से इनको मिटाकर ही समस्या का समाधान करना पड़े! देश की लगभग एक चौथाई आबादी को ही मिटाकर कैसे हम इस समस्या का समाधान कर पाएंगे?क्या यह हमारी गौरवशाली कही जाने वाली मानव सभ्यता पर कलंक नहीं है?क्या बहुसंख्यक लोगों की मानसिकता के हिसाब से अल्पसंख्यक लोगों का शोषण करने की प्रवृति में बदलाव नहीं किया जा सकता है?क्या आशाराम जैसे लोग गुजरात व् महाराष्ट्र के आदिवासी लोगों को धर्म परिवर्तन करने से किस तरह रोक रहे थे या ईसाई मिशनरी किस तरह गरीब आदिवासी लोगों को मुफ्त में शिक्षा व् चिकित्सा उपलब्ध करवा रही है उस पर सरकारों को निगरानी नहीं रखनी चाहिए?क्या शिक्षा व् चिकित्सा जैसी बुनियादी सेवाओं को निजी व् गैर-सरकारी संगठनों के हवाले छोड़कर सरकारें चिर निद्रा में सोने के लिए चुनी जाती है?आरएसएस जैसा दावा करता है कि उनके लाखों कार्यकर्त्ता आदिवासियों के कल्याण में लगे हुए है तो क्या यह संभव है कि उनको यह पता नहीं चले कि गरीब आदिवासी इलाकों से लड़कियों को उठाकर ऐसे हवस के अड्डों पर पहुँचाया जाता है?क्या महीनों एक बोर्डिंग स्कूल में नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण होता रहा और शिक्षा विभाग मृत अवस्था में पड़ा था?आदिवासी भाग,महिला व् बाल विकास विभाग के लोग क्या कर रहे थे?क्या उनकी जिम्मेवारी नहीं होती कि स्कूलों पर नजर रखी जाए?क्या उनकी जिम्मेवारी नहीं थी कि जानवरों की तरह उठाकर कोई लड़कियों को आदिवासी इलाकों से ले जाये तो उस पर ये नजर रखे? अब जब सब कुछ सामने आ गया तो दरिंदों को गिरफ्तार करके फांसी पर लटका दो लेकिन इन गरीब बच्चियों के साथ जो हुआ उसकी भरपाई कौन व् कैसे करेगा?भविष्य में दुबारा न हो इसकी जिम्मेवारी कैसे तय होगी? हाथ में तिरंगा लेकर शहरों की गलियों में देशभक्ति के नारे लगाकर उत्पात मचाना ही देशभक्ति नहीं होती! गौमाता-गौमाता चिल्लाकर गरीब दलितों व् मुसलमानों को पीटने से ज्यादा राष्ट्रवादी नहीं बन जाओगे!अगर वाकई में दिलों में देशभक्ति है तो अभी भी जाग जाओ।गरीबों-दलितों-शोषितों-मजदूरों-किसानों-आदिवासियों के हकों
की आवाज को खुद की आवाज बनाओं।इन हमारे गरीब भाइयों के दर्द को समझो!उनकी समस्याओं को ईमानदारी के साथ सुनो!उनकी पीड़ाओं का उनकी भावनाओं का आदर करते हुए समाधान निकालों!गरीबों को उपयोग की वस्तु समझने की भूल में सुधार करो!हर समस्या का समाधान बम-बन्दूक-गोली नहीं हो सकता! हर अलग सोच को गद्दार या देशविरोधी बताकर दरकिनार मत करो!बार बार किसी को देशद्रोही कहोगे तो सामने वाला विद्रोह करने पर मजबूर होता है इसी कारणों से ये समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है! सत्ता के अच्छे कामों की प्रशंसा जरूर करो लेकिन गलत कामों की आलोचना व् विरोध भी करो।सत्ता की गलत नीतियों की आलोचना करना या सवाल करना कतई देशद्रोह नहीं होता बल्कि इससे देश व् लोकतंत्र मजबूत होता है।कोई भी सरकार लोकतंत्र में सौ प्रतिशत मतों से नहीं बनती है।विरोध सत्ता में आने से पहले भी होता है वो अच्छे कामों से कम हो सकता है लेकिन बुरे काम व् नीतियों के कारण जिनका मोहभंग होता है वो अगले चुनाव में आपका साथ छोड़ भी सकते है इसलिए सत्ता को अपने बाप की जागीर समझने के बजाय देश की गरीब जनता की भलाई के लिए मिले अवसर के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। आप भी ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछिये।जो सरकार ने अच्छा किया है उसी के लिए हमने उनको चुना है।जो कमियां है उनके बारे में सवाल पूछकर याद दिलाओ।हर जागरूक नागरिक को याद रखना चाहिए कि पहले कर्तव्य निभाओगे तो ही अधिकार मिल पाएंगे.........
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