किसान नेताओं से मेरी अपील

कुछ दिन और बोझ उठा लो भाई
चले गए तो फिर ये मयस्सर नहीं होंगे!

क्योंकि हमें हमारी कौम के सूखे पेड़ों को भी आदर के साथ विदा करने का हुनर बखूबी आता है।हमे हर पल हर क्षण आपके क्रियाकलापों के जहर को अमृत मानकर निगलने की तरकीब भी सलीके से निभानी आती है। हे कौम के नेताओं !हमने अंधेरों में तुम्हारे घर के मटकों में पानी भरा है!हे कौम के सियासतदानों हमने घनघोर घटाओं के साए में भी आपके झंडों को रोशन किया है!हमने कौम को बैशाखी देने के बजाय कौम की जड़ों में मठा डालते हुए भी आपकी भुजाओं को ताकत देने का काम किया है।हम जानते थे कि गोदी तो मनुवादियों की होगी लेकिन कम से कम खून तो रगों में कौम का ही दौड़ेगा लेकिन कभी भी आपने कौम के स्वाभिमान की लड़ाई चौक-चौराहों पर लड़ने की हिम्मत नहीं जुटाई!किसान गर्त में डूबते रहे और आप मंडी वाले सीए व् फंडी वाले भाग्यविधाता के यहाँ नमन करते रहे!हम किसानपुत्र इस इंतजार में बैठे रहे कि आप ताकत हासिल करोगे व् एक दिन कौम के कर्ज का फर्ज निभाने आगे आओगे!लेकिन बड़े दुःख की बात है कि आज हमें अपनों के ही पैर काटने के लिए मैदान में उतरना पड़ रहा है।हमारे बुजुर्ग हमेशा से कहते रहे है कि पहली फसल से खेत की सफाई अच्छी तरह नहीं हो जाती तब तक दूसरी फसल का लहलहना मुमकिन नहीं है इसलिए अब हम उस बेहूदा खरपतवार को साफ़ करने निकले है जो नई फसल के फलने-फूलने में रोड़ा बन रही है। अब तय आपको करना है कि आपको खड़ा खुरपी के साथ होना है या बथुए के साथ।सात दिसम्बर को नागौर की पावन धरा पर हम निर्णय करने के लिए जुटेंगे।हमे साथ खुरपी का भी लेना आता है व् सफाई बथुए की भी करनी आती है।न कांग्रेस की कब्र में हम किस्मत ढूंढेंगे न भाजपा के भाग्य में भविष्य तलाशेंगे।अगर आपको लगता है कि आपकी पौध को हमने खून-पसीने से सींचा है तो हमारी आपसे गुजारिश है कि अब कर्तव्य कर्म की पराकाष्ठा आपसे हिसाब वसूलना चाहती है।या तो खुद को कौम के हिसाब से ढाल लो या अपना बोरिया बिस्तर समेट लो मुसलसल गेसुओं की बरहमी अच्छी नहीं होती

इस कदर खुलकर मत रोना कौम के सिपाहियों
जहाँ बुनियाद हो वहां इतनी नमी अच्छी नहीं होती!

हम हमारे झंडाबरदारों के सामने ज्यादा गिड़गिड़ाना अच्छा नहीं समझते क्योंकि हमने आज तक झंडा बिना बुनियाद वालों का ही उठाया है।हम आपको आगाह करने निकले है कि आज तक झूठी शान के खातिर आपको ढोते रहे,अब और ढोना मुमकिन नहीं है।राजनीतिक पंडित अपने हिसाब से गुणाभाग करेंगे!सरकारी तंत्र अपने हिसाब से ताकत को नापेगा!हम अपने हिसाब से भाग्य का फैसला करने निकले है व् 7दिसम्बर की रैली में हम बताएंगे कि किसान का स्वाभिमान क्या होता है?हम मनुवादियों को लक्ष्मण रेखा बताएंगे!हम मंडी वालों को खाता-बही के पन्नो का हिसाब देंगे!सबसे बड़ी बात यह होगी कि हम हमारे नाम पर रेंग रहे परजीवी किसान नेताओं को उनका वजूद बताएंगे।हमारे पास खोने को कुछ नहीं है लेकिन आपके पास लूटने को बहुत कुछ है।अमीरी की कब्र पर पैदा हुई गरीबी बहुत दुखदायी है साहब!बाप-दादाओं के जनाजों को राजनीतिक जुलुस में बदलने वाले किसान नेताओं व् उनकी कब्रों पर उगी घास से अपनी दुकान चलाने वाले नेताओं से मेरा करबद्ध निवेदन है कि 7 दिसम्बर कयामत का दिन भी हो सकता है व् भाग्योदय का भी?

फैसला आपको करना है।

खेत-खलिहानों से गूंजेगी इंकलाब की बोलियां।
जब घर-घर से निकलेगी यूँ युवाओं की टोलियां।।

आपकी सुविधा के लिए बता दूं कि किसान कोई जाति नहीं है वह कौम होती है कौम!खेती का काम करने वाली हर जाती इस कौम का हिस्सा होती है।जो सदियों से हमारे साथ खेतों में काम करते रहे वो किसान कौम का अभिन्न अंग है।हम उन्हें आदर देते है,भाई मानते है और भविष्य की राह अपनी भुजा मानकर तय करना चाहते है।दलित-पिछड़े व् मुसलमानों को हम हमारा हमदर्द मानते है।हमे पता है कि आप हमारे घर को छोड़कर मनुवादियों की गौद को आश्रय बना चुके है लेकिन पंछियों को अपना घौंसला बनाना अच्छी तरह आता है इसलिए किसी गलतफहमियों के पर्दों की आड़ में छिपने के बजाय तय कर लीजिए कि आपको किस तरफ खड़ा होना है?

गलतियों से जुदा तू भी नही,मैं भी नहीं

दोनों इंसान है,खुदा तू भी नहीं ,मैं भी नहीं।
गलतफहमियों ने पैदा कर दी ये दूरियां
फितरत का बुरा तू भी नहीं मैं भी नहीं।।

गलतफहमियां पाले लोगों से मेरी आखिरी प्रार्थना है कि किसान हुंकार रैली आखिरी दरवाजा है जहाँ से किसानों के हाईवे पर चढ़ने की अंतिम गुंजाइश बचती है।इसके बाद राह जुदा, इरादे जुदा हो जायेंगे।फिर कौम के युवाओं को कोसने के बजाय खुद के गिरेबान में झाँकने के सिवाय कुछ बचेगा नहीं। नहीं तो हम  भी समझते है कि अभी भी नहीं चेते तो हम समझेंगे कि आपकी पगड़ियों की सलवटें शान के बजाय लाठियों से बचने की खड़ग से ज्यादा कुछ नहीं है!आपकी धोती की गांठे अपने जुर्मों को छुपाने की पनाहगाह थी!बड़ों का आदर करना हमारा संस्कार है लेकिन किस किताब में लिखा है कि बड़ों की हठधर्मिता का नकाब हटाना गुनाह है? जो खेतों में अपने बाप की आँखों में आंसुओं का सैलाब छोड़कर आये है!जो नरेगा में मिट्टी ढोती अपनी माँ के डगमगाते चरणों को छोड़कर आये है वो कैसे चमचमाती गाड़ियों में चलते किसान नेताओं पर भरोसा कर लेंगे?वो कैसे नशे में लड़खड़ाते आपके शहजादों का बोझ उठाने के लिए अपना कन्धा दे देंगे?मनुवादियों की भूलभुलैया में खोए किसान नेताओं!जरा अपने गिरेबान में झांको!अंतिम मौका है यह अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का!अंतिम मौका है अपने पापों को धोने का!इसके बाद चाहे गंगा में नहाना या अपने पापों सहित डूब जाना कोई दो बूंद आंसुओं की टपकाने वाला नहीं मिलेगा!
https://sunilmoga.blogspot.com/
Add caption

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts