देखिये इसे! आज जन्तर-मंतर तहरीर चौक बनने जा रहा है! आज नया इतिहास लिखा जा रहा है!
निकलो बाहर मकानों से
निकलो बाहर मकानों से
जंग लड़ो बेईमानों से!!
मुझे भी लगा कि वाकई देश बदल रहा है लेकिन वहां गया तो लोगों से ज्यादा कैमरे थे।
ओबी वैन व् कैमरों के बीच झूल रहे तारों की उलझने थी।किसी तरह बचकर अन्ना (तमिल ढाबा)के ढाबे पर सांभर-वड़ा खाया व पास में खड़े पानी वाले से पानी पीकर सुस्ताते हुए देखा तो लगा कि यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई जनाक्रोश नहीं बल्कि मीडिया को लूट में अपना हिस्सा नहीं मिला इसलिए देश की जनता का भावनात्मक शोषण करने की चाल मात्र थी। अब आप सोचो हनुमान बेनीवाल की रैली को कोई मीडियावाला कवरेज क्यों देगा? जो दबे-कुचले,शोषित लोग खुद कुछ हासिल करने के अरमानों को सजाने आये हो वो किसी और को क्या देंगे? जो अपने हकों को हासिल करने के लिए जमे हो,जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध लामबंद होने की कोशिश कर रहे हो!वो किसी और को क्या देने के हालात में होंगे!यह देश,यह मीडिया,ये नेता-अफसर सबकुछ लेनदेन से सेट होते हो वहां मांगने वालों की आवाज में आवाज मिलाने कौन खड़ा होगा? क्या यह उम्मीद करना बेमानी नहीं है?आप किसी लूटने वाले की फ़ौज के सिपाही से यह उम्मीद कैसे कर सकते हो कि वो अपने मुखिया की खिलाफत कर बैठेगा?कोई कहता है कि इस देश की रगों में भ्रष्टाचार बह रहा है! कोई कहता है कि यहाँ मुर्दा कौमे है जिस पर कोई भी लुटेरा अपनी जुबान के प्रयोग मात्र से कब्ज़ा कर लेता है।क्या यह रैली इस सच को उजागर कर पाई है?क्योंकि वहां घर से बीड़ी व् माचिस लेकर आये किसान थे। घर से जेब से पैसों का इंतजाम करके गाडी जुटाकर आये युवा थे फिर भी इतनी भीड़ व सोशल मीडिया में इतनी चर्चा!क्या यह सत्ता-नेता-अफसरों के गठजोड़ को सतह पर लाकर डालने के लिए नाकाफी है! जब केजरीवाल सत्ता में आये तो सबसे ज्यादा बजट वाला निर्णय प्रचार पर खर्च करने का था। 500करोड़ का बजट मीडिया पर लुटा दिया गया।आज मीडिया मोदी के बाद दूसरे नंबर पर केजरीवाल को रखती है। ऐसा जाल बुनना किसानों के बूते की बात नहीं है न किसान कभी बुनेंगे,क्योंकि देशभक्ति किसान के खेत व किसान के बेटों की सीमा पर सहादत से पैदा होती है।मंदिरों में घंटा बजाने वाले व् मंडियों में कम तोलकर ज्यादा वसूलने वाले लोगों ने इस देश को बर्बाद किया है।मुझे अन्ना की बहुत याद आ रही है। काश अन्नाजी आप हजारे से दो हजारे तक पहुंचने से पहले जन्तर-मंतर पर पूर्व सैनिकों के सम्मान की लड़ाई लड़ने आते!काश आप किसी किसान की आत्महत्या के बाद उस पेड़ के नीचे बैठते जिस पेड़ की टहनी पर लटककर उसने अपनी जिंदगी से बेवफाई की थी!लेकिन आप उड़नखटोलों में बैठ-बैठकर इन मनुवादी मीडिया के इशारों पर दिल्ली की गद्दी पर एक लाला को बैठाकर चले गए!अब किसान मजदूर जाग चूका है।अब दलित-मुसलमान जाग चूका है!अब शोषित-पिछड़ा जाग चूका है।जितने षड्यंत्र रचना चाहो रच डालो!जितनी वैचारिक बारूदी-सुरंगें बिछाना चाहो,बिछा डालो लेकिन अब यह आवाज बढ़ती ही जायेगी।अब हुंकार भरी है तो उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही छोड़ेंगे।
आप लगे रहो क्योंकि......
आप लगे रहो क्योंकि......

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