संसद की कार्यवाही व् हंगामे को देखकर मुझे बाबा साहेब अम्बेडकर की वो बात याद रही है जब संसद में ही उन्होंने कहा था कि ऐसा न हो कि लोग मुझे संविधान निर्माता कहे और मुझे अपने हाथों से ही संविधान को जलाना पड़े!क्योंकि संविधान सच्चे जन प्रतिनिधियों के बजाय राक्षसों के हाथों में चला जाता है तो देश की जनता की भलाई करने में मददगार बनने के बजाय जनता पर ही कहर बनकर टूटेगा। कल श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि भगवान् के लिए संसद में यह हंगामा बंद कर दो।किसी देश के राष्ट्रपति की पीड़ा इससे ज्यादा क्या हो सकती है कि अपने देश के चुने हुए जन प्रतिनिधियों से जनता के बजाय काल्पनिक भगवान की दुहाई देकर हंगामा बंद करने की अपील करनी पड़े? 750 लोग भीड़तंत्र का दुरूपयोग करके लोकतंत्र के मंदिर में घुस जाए व् सालाना 40अरब रुपये अपनी सुख-सुविधाओं पर खर्च करते रहे और देश की जनता को लाइव टेलीकास्ट दिखाकर,चिढ़ा-चिढ़ाकर गाल पर तमाचा मारे कि हम तो हम ही है! मुझे तो लग रहा है कि अब संविधान सौ प्रतिशत लुटेरों के हाथों में जा चूका है।संविधान विशेषज्ञ डी डी बासु व् सुभाष कश्यप संसद कार्यवाही की धारा 193,398 की दुहाई दे रहे है तो बड़ी हंसी आती है।क्या करे? राक्षसों ने अपनी-अपनी सेनाएं बना ली है व् कानून-धाराओं को अपनी कालीनों के रूप में बिछाकर भक्तों की खिदमत में उपयोग करना शुरू कर दिया है।बेचारी जनता अब भी टकटकी लगाकर देख रही है!सुन रही है कि हमारे नेताजी ने बोला है कि छींका टूटेगा।अब नेताजी पिछले दरवाजे से छींके की डोरी ऊपर खींचकर कह रहे है थोड़ा समय और दे दो छींका नहीं टूटेगा तो मुझे फांसी पर लटका देना!जनता यकीन करती जाती है कि अबकी बार तो छींका पक्का टूटेगा।इसी तरह 70 सालों से देश को सर्कस की रिंग के इर्द-गिर्द मदहोशी में झुलाया जा रहा है।सर्कस के किरदार नये नये आते गये!दर्शक बदलते गये लेकिन छींका टूटने का इंतजार हर
दर्शक के साथ शमशान घाट की यात्रा करता गया।आज राज्यसभा में नारे लग रहे थे"किसान विरोधी सरकार, नहीं चलेगी-नहीं चलेगी!"बेचारे किसानों को आजतक समझ ही नहीं आया कि किसान हितैषी सरकार कैसी होती है व कौनसी थी या आगे कौनसी हो सकती है।कौनसी सरकार किसकी हितैषी है या किसकी विरोधी है यह तय कौन करेगा?क्या यह भी हक़ किसानों से छीनकर मदारियों ने ले लिया है?
दर्शक के साथ शमशान घाट की यात्रा करता गया।आज राज्यसभा में नारे लग रहे थे"किसान विरोधी सरकार, नहीं चलेगी-नहीं चलेगी!"बेचारे किसानों को आजतक समझ ही नहीं आया कि किसान हितैषी सरकार कैसी होती है व कौनसी थी या आगे कौनसी हो सकती है।कौनसी सरकार किसकी हितैषी है या किसकी विरोधी है यह तय कौन करेगा?क्या यह भी हक़ किसानों से छीनकर मदारियों ने ले लिया है?
किसानों का कौन हितैषी-कौन विरोधी
यह किसान का बेटा बोल सकता है!
हुकूमत के हंगामे व् इशारों पर तो
कब्र से उठकर मुर्दा भी बोल सकता है!!
बहुत सी कुर्सियां खड़ी है लाशों पर यहाँ
ऐसा सच तो झूठे से झूठा बोल सकता है!!!
मजदुर परेशान है!किसान परेशान है!गरीब लोगों को खाना नहीं मिल रहा है!इसलिए हमारे ये नेताजी हंगामा कर रहे है?वाकई ऐसा दर्द किसी नेता के दिल में आजतक मैंने नहीं देखा!नेता हो तो ऐसे कितना दर्द है इनके दिलों में कि बेचारे रेहड़ी वालों की तरह लोकतंत्र के मंदिर में चिल्ला रहे है। मेरा इन नेताओं से करबद्ध निवेदन है कि कृपया वहां रोना मत!इस देश की जनता बहुत ही भावुक है।
उमड़ पड़ेगा आंसुओं का सैलाब यूँ
नदी-नालों के उफान को कौन रोकेगा!
तैरने लगेगी दर्द भरी कश्तियाँ यहाँ
केवट बनकर किनारे कौन रोकेगा!!
आज बड़े विचित्र अंदाज में राहुल बाबा संसद के बाहर खड़े होकर बोल रहे थे कि मैं बोलूंगा तो भूकंप आ जायेगा!जनाब क्यों कहर ढाह रहे हो?आपके सारे नेता कह रहे है कि इस देश के किसान-मजदूर-गरीब पहले से ही बहुत परेशान है।परेशानी में जी रहे लोगों को आप जलजले में क्यों मारना चाहते हो?हम परेशान जनता आपसे निवेदन करती है कि कृपया थोड़ी रहम खाइये!हम परेशानी आगे से नहीं जताएंगे और आपके किसी नेता तक इसकी बात ही नहीं पहुँचने देंगे कि हम परेशान है बस एक बार हमारे माफीनामे को स्वीकार कर लो।
तीन पीढ़ियों के जनाजे को'हमने कंधा दिया था भाई
थोड़ी रहम खा लो नहीं तो हमारा पराभव तो है ही।
अब हम बोझ बनकर नहीं बैठें रहेंगे तेरे भरोसे यूँ
मान जाओ अब नहीं तो कंधा देने का अनुभव तो है ही।।
यह किसान का बेटा बोल सकता है!
हुकूमत के हंगामे व् इशारों पर तो
कब्र से उठकर मुर्दा भी बोल सकता है!!
बहुत सी कुर्सियां खड़ी है लाशों पर यहाँ
ऐसा सच तो झूठे से झूठा बोल सकता है!!!
मजदुर परेशान है!किसान परेशान है!गरीब लोगों को खाना नहीं मिल रहा है!इसलिए हमारे ये नेताजी हंगामा कर रहे है?वाकई ऐसा दर्द किसी नेता के दिल में आजतक मैंने नहीं देखा!नेता हो तो ऐसे कितना दर्द है इनके दिलों में कि बेचारे रेहड़ी वालों की तरह लोकतंत्र के मंदिर में चिल्ला रहे है। मेरा इन नेताओं से करबद्ध निवेदन है कि कृपया वहां रोना मत!इस देश की जनता बहुत ही भावुक है।
उमड़ पड़ेगा आंसुओं का सैलाब यूँ
नदी-नालों के उफान को कौन रोकेगा!
तैरने लगेगी दर्द भरी कश्तियाँ यहाँ
केवट बनकर किनारे कौन रोकेगा!!
आज बड़े विचित्र अंदाज में राहुल बाबा संसद के बाहर खड़े होकर बोल रहे थे कि मैं बोलूंगा तो भूकंप आ जायेगा!जनाब क्यों कहर ढाह रहे हो?आपके सारे नेता कह रहे है कि इस देश के किसान-मजदूर-गरीब पहले से ही बहुत परेशान है।परेशानी में जी रहे लोगों को आप जलजले में क्यों मारना चाहते हो?हम परेशान जनता आपसे निवेदन करती है कि कृपया थोड़ी रहम खाइये!हम परेशानी आगे से नहीं जताएंगे और आपके किसी नेता तक इसकी बात ही नहीं पहुँचने देंगे कि हम परेशान है बस एक बार हमारे माफीनामे को स्वीकार कर लो।
तीन पीढ़ियों के जनाजे को'हमने कंधा दिया था भाई
थोड़ी रहम खा लो नहीं तो हमारा पराभव तो है ही।
अब हम बोझ बनकर नहीं बैठें रहेंगे तेरे भरोसे यूँ
मान जाओ अब नहीं तो कंधा देने का अनुभव तो है ही।।
संविधान की चादर ओढ़कर लोकतंत्र के मंदिर में सुस्ताने वाले लोगों के भरोसे मत रहिये।जैसे मैं लिखते-लिखते काम पर जा रहा हूँ वैसे ही आप भी पढ़ते-पढ़ते काम पर जरूर जाइये क्योंकि खजाना लुटेरों के हाथों में जा चूका है।अब इस देश की नींव हम लोग है।आप भावुक मत होइए क्योंकि जहाँ बुनियाद होती है वहां ज्यादा नमी अच्छी नहीं होती!अपने एक एक आंसू को संभालकर रखिये क्योंकि यह नमक का पानी आँखों की पलकों से गालों की तरफ उतरता है तो बड़ा खतरनाक हो जाता है.....
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