मैं हमेशा से धर्म के पाखंड के खिलाफ लिखता रहता हूँ।हर रश्म-रिवाज को वैज्ञानिक आधार पर तर्कों की कसौटी पर परखता हूँ।कभी इस आधार पर कोई रिवाज फ़ैल हो जाये व् वो इंसानियत के जज्बे व् आपसी भाईचारे को मजबूत करने का काम करे तो भी सही मान लेता हूँ लेकिन धर्म को धंधा बनाकर परजीवी लोगों द्वारा गरीबों का शोषण करने की प्रक्रिया से मुझे सख्त नफरत है।यह एकतरफा वसूली है न !वो जनता के साथ साथ पूरे देश के भविष्य के लिए खतरनाक है।मुफ्त में ठगकर खाने वाली आदत बड़ी ख़राब होती है। खुद तो निट्ठले होकर खा ही रहे है लेकिन आम जनता के विकास की प्रक्रिया को रोक देते है।किसी गरीब के पास 5हजार रूपये है तो वो अपने बच्चों की पढाई पर खर्च करने के बजाय मंदिर-मस्जिद-चर्च को चंदा दे देता है।बेचारे बच्चों का भविष्य कुर्बान कर दिया जाता है। अब हम इस तरह की लूट-चोरी पर सवाल उठाते है तो हमे नसीहत दी जाती है कि तुम लोग हिन्दू विरोधी हो!कम्युनिस्ट हो!मुल्ला हो!देशद्रोही हो!तो क्या करे?हम लूट को चुपचाप बैठकर बर्दाश्त करते रहे?एक सवाल इनका बड़ा हैरान करने वाला होता है कि लोग अपनी मर्जी से देते है तेरा मन नहीं है तो मत दे! लोग मर्जी से दान देते है!क्या आपको भी ऐसा ही लगता है कि लोग दान अपनी मर्जी से देते है?मैं तो ऐसा कभी नहीं मान सकता।जब कोई महिला गर्भवती होती है तो इनका प्रतिनिधि यह बताने आ जाता है कि आपके होने वाला बच्चा बड़ा योग्य होगा!बस थोड़ा राहु का प्रकोप है।पैदा होने के सातवें दिन एक मौत की घाटी आएगी जिसको कुछ मन्त्र पढ़कर व् दान देकर टाला जा सकता है।आप 10ब्राह्मणों को खाना खिलाकर कुछ दान दे दो यह समय टल जायेगा। अब 9महीने तक पीड़ा झेलने वाली वो महिला क्या करेगी?उसके पास दो ही विकल्प होते है।एक तो पंडित जी के कहे हिसाब से चलकर बच्चे को बचा ले या दूसरा विकल्प पैदा करने के बाद सातवें दिन को मरने के लिए छोड़ दे!कोई भी माँ अपने बच्चे को मरने के लिए नहीं छोड़ सकती।तो वह पहला रास्ता अपनायेगी व् ढोंग पर अपनी मेहनत की कमाई टायेगी।तो क्या हम यह मान ले कि उस माँ ने डरकर नहीं अपनी इच्छा से यह खर्चा कर डाला?90%लूट के ढोंग का बौझ उठा रहे इस बूढ़े धर्म की सफाई नहीं होनी चाहिए!कोई मर गया तो वो भूत बनकर परेशान न करे इसलिए पंडितजी के कहे अनुसार उधार लेकर ही सही लेकिन झोली-झंडा ठाकर गंगा में बहाने के लिए हरिद्वार की तरफ निकलना ही पड़ेगा चाहे जिंदगी में कभी भूत देखा ही नहीं हो लेकिन पंडित जी ने डराया है तो डरना ही पड़ेगा।मासूमों की अज्ञानता का इस तरह नाजायज फायदा उठाना क्या धर्म के हिसाब से सही हो सकता है?शायद कोई धर्म नहीं कहता कि अज्ञानियों को डरा-धमकाकर वसूली करते रहो! या तो वैज्ञानिक शिक्षा व् तार्किकता लाकर दुनियां के साथ मानव सभ्यता की दौड़ में साथ हो जाये या ललाट पर भँवरे,कान के पीछे तिल या हथेली की खाज को खुजलाते-खुजलाते किसी नहोनी से डरते रहिये या धन खोजते रहिये।आप चाहे तो पुराने काले जादू से भी चमत्कार की उम्मीद कर कते है क्योंकि ये लोग सब समस्याओं का समाधान ज्योतिष व् जादू से करने का दावा जो करते है।हर गली-नुक्कड़ पर इनकी दुकाने सजी हुई है।गरीब लोगों का लूटना लगभग तय माना जाता है चाहे वो आर्थिक रूप से गरीब हो या मानसिक रूप से।मानसिक गरीब ज्यादा खतरनाक होते है क्योंकि इनका लूट के अड्डों पर आवागमन बहुत बड़ी आबादी पर प्रभाव डालता है।ये धनी व् पढ़े लिखे लोग होते है जिनको देखकर आर्थिक गरीब लोग भी अपना मानसिक आपा खो देते है।साइरस मिस्त्री मंत्रो के बूते टाटा ग्रुप पर कब्ज़ा जमाने की कोशिश करे तो बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है क्योंकि आर्थिक गरीब लोगों के दिमाग में भी यह घर कर जाता है कि शायद तिरुपति के दर्शन से अमिताभ बच्चन इतने बड़े स्टार बने होंगे व् श्रीनाथजीको सोने का मुकुट चढाने से ही अम्बानी इतने बड़े उद्योगपत्ति बने है! न तो लूटने वाले इस आदत से बाज आने वाले है न लुटाने वाले क्योंकि धर्म एक महफ़िल की तरह व् ढोंग नशे की तरह होते है।इस मदहोशी में जो झूमता है वो पूरा होश-हवास खो देता है।एक मेरे मित्र है।काफी समय बाद उनसे मिला तो वो ललाट पर हाथ फेरते हुए कुछ इस तरह बताने लगे"मेरे तीसरा नेत्र खुलता है,मैं मोहमाया से बहुत दूर हो चूका हूँ,मैं नौकरी छोड़कर हरिद्वार जाऊंगा,भजन करूँगा!"तभी उनका 12 वर्षीय बेटा पानी की गिलास लेकर आ गया व् उसके पीछे-पीछे 7वर्षीय बच्ची भी आ गई।मैं बच्चों का मासूम चेहरा देखकर सहम सा गया।इन बच्चों का क्या होगा?था तो मैं भी जल्दी में लेकिन उन बच्चों की मासूमियत ने रोक लिया ।फिर तीन घंटे तक साइकोथेरेपी का दौर चला।वो बिलकुल ठीक हो गए।आज भी उधर से गुजरता हूँ तो मिलने की हरसंभव कोशिश करता हूँ।वो भी मुझे कहीं पर भी देखते है तो प्रेमभाव चेहरे से ही झलकने लगता है।पहले मैं कभी उनके घर नहीं गया था।उस दिन भी किसी अन्य दोस्त के माध्यम से संपर्क हुआ था।उसके बाद कई बार घर आना जाना हुआ।आज उनके बच्चे अच्छी पढाई कर रहे है।जब भी मिलते है तो बच्चों के भविष्य के बारे में चर्चा करते है।आज वो घर हकीकत में मुझे स्वर्ग नजर आता है।अगर वो नौकरी छोड़कर हरिद्वार चले जाते तो क्या वो घर खुशहाल रहता? कमजोर लोग संघर्षों से मानसिक संतुलन खो देते है और धर्म का धंधा करने वाले लोग ऐसे लोगों को ही टारगेट करते है।धार्मिक बनाने या धर्म परिवर्तन का भी असली कारण यही है।धर्म के नहीं इंसानियत के रखवाले बनो!धार्मिक-स्थलों को नहीं अपने घर-परिवार को सजाओ।मानव सभ्यता की उत्तरोत्तर दौड़ में अपने आप का वजूद बनाये रखना ही असली जीवन है।इस दौड़ का मैदान छोड़कर धर्म की महफ़िलों में बैठकर ढोंग के नशे में झूलना ब्रह्म की खोज नहीं बल्कि मानव जीवन से पलायन मात्र है।इसलिए मानव होने का सबूत मानव सभ्यता की बेहतरी के लिए कुछ योगदान देकर दीजिये।अपने आसपास के संबंधों को गुलजार करिये।इंसान बनिये सिर्फ और सिर्फ इंसान।
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