धर्म हमेशा से सत्ता पर कब्जे की सीढ़ी मात्र रहा है

जहाँ इंसान की सोच ख़त्म होती है वहां से धर्म की धूर्तता शुरू होती है।धर्म हमेशा से सत्ता पर कब्जे की सीढ़ी मात्र रहा है और इंसानी शोषण की शुरुआत यहीं से होती है।पहले धर्म खुद को सर्वेसर्वा रखकर सत्ता अपने प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपता था व् बाद में धीरे-धीरे परिवर्तित होता गया(ब्राह्मण श्रेष्ठ व् सत्ता क्षेत्रियों को/चर्च श्रेष्ठ व् सत्ता राजा को) व् आज सत्ता सर्वोपरि हो गई व् धर्म सत्ता पर कब्जे की चाबी के रूप में उपयोग होने लग गया।इसका भी कारण है।पहले सत्ता-धर्म के गठजोड़ का सीधा सामना जनता से था लेकिन आज उसका स्वरूप बदल गया है आज एक नए बिचौलिये वर्ग का उदय हो गया जिसे हम व्यापारी-उद्योगपत्ति कहते है। यह वर्ग पहले जनता का शोषण करता है और प्राप्त पूंजी का एक निश्चित हिस्सा धर्म को दान के नाम पर व् राजनेताओं को चंदे के नाम पर बांटता है।यह वर्ग तय करता है कि सत्ता किसको सौंपनी चाहिए!धर्मगुरु-राजनेता-उद्योगपत्ति मिलकर जनता के भविष्य का फैसला करते है।इनकी संख्या ज्यादा नहीं है लेकिन पूंजी का  90%हिस्सा इनके कब्जे में है जिसके बल पर ये लोग हर षड्यंत्र को सफल बनाने में कामयाब होते रहे है। किसको बेहतर धर्मगुरु सिद्ध करना है ये इनके हाथों में है। मीडिया में लगभग 100%कब्ज़ा इन्हीं दलालों का है। कहाँ-किसको चमत्कारी बताना है! किसके पीछे गरीब जनता की आँखों में धुल झौंककर अंधभक्तों की भीड़ खड़ी करनी है! किसको सब समस्याओं के समाधान का ज्ञाता घोषित करना है!यह सब मीडिया के माध्यम से ये दलाल तय करते है।किस राजनेता को जनता की सब समस्या के समाधानकर्ता के रूप में पेश करना है! यह पहले ही बंद कमरों में तय हो जाता है।सत्ता सौंपने के पहले ही सारे सौदे तय हो जाते है।सत्ता सौंपने के बदले इन दलालों को सत्ता क्या-क्या सहूलियतें देगी उसका खाका पहले ही खींच दिया जाता है।गरीब-अज्ञानी जनता उसी के शोषण से अर्जित पूंजी से निर्मित इन नेताओं व् धर्मगुरुओं के ख्याली अच्छे दिनों की आस में भागती नजर आती है।शोषण के दुष्चक्र में उलझती ही जाती है।अच्छे भक्त व् कार्यकर्त्ता की पहली शर्त ही मानसिक गुलामी होती है।जो धर्मगुरुओं के इशारों पर अपनी अक्ल की कुर्बानी दे बैठे ऐसे लोगों को भक्त कहा जाता है। जो राजनेताओं के इशारों पर अपने समाज की बलि देने को तैयार रहे ऐसे लोगों को कार्यकर्त्ता कहा जाता है। बहुत सारे समाजसुधारकों ने इनके खिलाफ आंदोलन चलाये,बहुत सारे क्रांतिकारियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया लेकिन यह वर्ग समय के हिसाब से इनके जीवन इतिहास को ही अपने हिसाब से स्थापित करते गया । जो इनके धंधे में फिट नहीं बैठे उनको दरकिनार कर दिया गया।गांधी-दीनदयाल-सावरकर का गुणगान करने से पूंजीपतियों को कोई नुकसान नहीं है बल्कि इनके सत्ता हस्तानांतरण के काम में फायदेमंद है। जब बात भगतसिंह-बाबा साहेब-सर छोटूराम आदि की होगी तो सीधे निशाने पर धर्म व् दलाली ही आएगी  इनकी विचारधारा को सामने लाने से इनका धंधा चौपट हो जायेगा।ये लोग बाबा साहेब का यह विचार क्यों स्वीकार करेंगे कि वर्ण व्यवस्था मानवता के खिलाफ है जबकि वर्ण व्यवस्था की रचना ही इन्होंने अपने हिसाब से शोषण के लिए की है।धर्म की रचना ही बहुसंख्यक जनता का शोषण करने के लिए की हो,भय पैदा करके लूटने के हथियार के रूप में की हो! ये भगतसिंह के उन विचारों का गुणगान कैसे करेंगे जिसमे इनको शोषक के रूप में प्रस्तुत किया है व् आम जनता को शोषित के रूप में?शोषणकर्ता व् शोषित कभी एक हो सकते है क्या?क्या शोषितों को भगतसिंह की क्रांति की विचारधारा को बताकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे? क्या सर छोटूराम के उस विचार को मानेंगे कि किसान का असली दुश्मन मंडी-फंडी है?फिर इनकी शोषण की दुकानें कैसे चलेगी? इसलिए अपना भविष्य इन असली दुश्मनों के षड्यंत्रों में ढूंढने के बजाय अपने अच्छे कार्यों में ढूंढो।अपनी सही दिशा में जाती मेहनत में ढूंढों।इनके बहकावी नारों में बहने के बजाय अम्बेडकरवादी तर्कों में खोजों!इनके प्रति वफादारी जताने के बजाय सर छोटूराम द्वारा बताये दुश्मनों को पहचानकर किनारे करो! इनको अपना बाप समझने के बजाय असली दुश्मन समझो और भगतसिंह के पद-चिन्हों पर चलते हुए क्रांति का बिगुल फूंको।अपने दिमाग में भरे हुए इस धर्म रूपी कचरे की सफाई करो!धर्म कभी मानवता का हक न कभी था न कभी होगा।जितने भी बड़े-बड़े जन-संहार हुए है वो धर्म ने ही करवाये है।धार्मिक नहीं सिर्फ और सिर्फ इंसान बनो!धर्म रूपी अफीम के नशे में मदमस्त होकर झूमना बंद कर दोगे तो आधी से ज्यादा समस्याओं का समाधान अपने आप ही हो जायेगा।शोषण का सबसे बड़ा द्वार बंद हो जायेगा।जब इंसान बनने की ओर अग्रसर हो जाओगे तो धर्म का पहला षड्यंत्र यानि जातीय भेदभाव एक झटके में समाप्त हो जायेगा। कोई धर्म अपने आप को सबसे पुराना बताये तो समझो कि सबसे सड़ा व् बदबूदार कूड़ेदान यही है!कोई धर्म अपने आप को सबसे बड़ी संख्या वाला बताये तो समझो सबसे बड़ा कुड़ापात्र यही है!
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