देश को आजाद किसने
कराया?सवाल का उत्तर बड़ा सरल है लेकिन सबकी उलझनें बड़ी
कठिन है। हमारे पूर्वजों के सामूहिक नेतृत्व ने इस देश की आजादी
की अपने अपने हिसाब से जंग लड़ी।सबका योगदान रहा है। तरीका अलग-अलग रहा है। कुछ लोगों ने हथियारों से तो कुछ लोगों ने
विचारों से लड़ाईयां लड़ी। कुछ
क्रांति के साथ खड़े हुए तो कुछ आंदोलन के साथ। किसी ने चरखे
व् सूत को सांकेतिक चिन्ह बनाकर आर्थिक चोट पहुँचाने
की कोशिश की तो किसी ने हथियारों के साथ भौतिक नुकसान पहुंचाकर जंग लड़ी। आज देश के सामने
बहुत समस्याएं है। भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,किसानोंकी आत्महत्या,शिक्षा,चिकित्सा कुपोषण,सड़क,बिजली,पीने का
पानी आदि सैंकड़ों समस्याएं त्वरित निस्तारण की कतार में खड़ी है। लेकिन इन समस्याओं से ध्यान हटाकर ज्यादा देशभक्त कौन? इतिहास में किसने कितनी गलतियां की?कौ न क्या कर सकता था और क्या नहीं? इन सवालों
में उलझ गए।बड़ी विडम्बना है इस देश की। आजादी के 68 सालों
बाद हम कौनसी अदालत लगाकर निर्णय सुनाने की फ़िराक में खड़े है! आज हम अपने गौरवशाली
इतिहास को संजोने के बजाय इतिहास को तार-तार करने को उत्सुक ज्यादा है। लोकतंत्र के नाम पर
बोलने की आजादी के अधिकार का उपयोग अपने पूर्वजो को गालियां देने में बर्बाद नहीं किया
जाना चाहिए। वो भी इंसान थे। हो सकता है उनसे भी गलतियां हुई होगी लेकिन अब समय उन गलतियों को
कोसने का नहीं,उसमे सुधार करने का होना चाहिए। आज राजनीतिक बाध्यताओं के फलस्वरूप
हमारे मतभेद हो सकते है लेकिन पूर्वजों को आगे रखकर देशभक्ति का
प्रमाण-पत्र मत बाँटिये। आज भी हर नागरिक अपने-अपने हिसाब से देश सेवा
कर रहा है। किसी का योगदान मीडिया में आकर चमक जाता है तो किसी का गुमनाम
योगदान होता है।विरासत हड़पने की कोशिश के बजाय भविष्य के निर्माण के बारे में
सोचना चाहिए। आप उस सभ्यता व् संस्कृति की नुमाइंदगी करते है जिसमें खुद
भगवान राम उस गिलहरी को नमन करते है जो मिट्टी में लौटकर रामसेतु के निर्माण में
योगदान देती है।जाति-धर्म के विद्वेष को ख़त्म किया जाना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण हर इंसान पढता है लेकिन जातीय विद्वेष मिटाने के बजाय
रोज करोड़ों वाल्मीकियों को जलील कर रहे है।सर्वधर्म समभाव का तिलक लगाकर धार्मिक भेदभाव करने वालों को नहीं रोक पाते! हम खुद अपंग व् लाचार हो गए है। हमारे अंदर जड़ता आती जा रहीं है। भविष्य संवारने की कोशिश करने के बजाय इतिहास के अचार का चटकारा लेने
में व्यस्त है। हमे वैश्वीकरण के दौर में तकनीक के सहारे
दुनियां से सीख लेनी चाहिए। नागासाकी व् हिरोशिमा को भूलकर जापानी नागरिक
अपने भविष्य के लिए अमेरिका के साथ भी खड़े हो सकते है तो दुनियां में कुछ भी नामुमकिन
नहीं है।बस जरुरत है खुलकर सोचने की। मेरा भी गांधीजी के रास्ते से मतभेद है।मैं भी
मानता हूँ सिर्फ चरखे से आजादी नहीं मिली,लेकिन उनके योगदान को कभी नकारा नहीं है। कल
उनकी जयंती पर जो गालियां दी गई उनसे मुझे बहुत पीड़ा हुई। मुझे यह उम्मीद कतई नहीं थी कि इतने समय बाद
मेरे देश में ऐसी असहिष्णु फ़ौज पैदा होगी जो भविष्य की समस्याओं का समाधान खोजने की
कोशिश करने के बजाय अपने पूर्वजों को गालियां देने में मशगूल हो जायेगी।इतिहास को मत खोदो। गौरवशाली टीले स्वार्थी
तत्व हड़प लेंगे और गड्ढे आपके लिए छोड़ देंगे जिसको भरने में आपकी पीढियां खप जायेगी....
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